Shamsher ALI Siddiquee

Search

Type your search keyword, and press enter


'जेपी कोई गांधी हैं क्या' - जनता पार्टी का ईतिहास

    


जब जयप्रकाश नारायण राजघाट पर नवनिर्वाचित जनता पार्टी सदस्यों को ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की शपथ दिला रहे थे, जनता सरकार में प्रधानमंत्री पद के लिए दौड़ का खेल शुरू हो चुका था. नेतृत्व की दौड़ में थे मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और चौधरी चरण सिंह.

ऐसा लगता था कि बहुमत जगजीवन राम की तरफ़ था, लेकिन जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी ने 82 वर्षीय मोरारजी देसाई के नाम पर मुहर लगाई.
इस समय इंदिरा गाँधी सेंटर ऑफ़ आर्ट्स के प्रमुख और जाने माने पत्रकार राम बहादुर राय उस घटनाक्रम को बहुत बारीकी से देख रहे थे.
राम बहादुर राय बताते हैं, "चुनाव परिणाम के बाद बहुत कश्मकश थी कि किसको नेता बनाएं. जनसंघ ने जगजीवन राम को समर्थन देने का फ़ैसला किया था. वो मानते थे कि अगर जगजीवन राम को नेता बनाया गया तो पार्टी को पाँच सालों तक चलाया जा सकता है. पर जगजीवन राम का एक कमज़ोर पक्ष ये था कि उन्होंने संसद में आपातकाल के प्रस्ताव के पक्ष में भाषण दिया था.''
राय ने कहा, ''लिहाज़ा सवाल उठा कि जिसने आपातकाल का समर्थन किया वो जनता पार्टी का नेता कैसे हो सकता है? दूसरा चौधरी चरण सिंह भी किसी भी सूरत में जगजीवन राम को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे.''
उस दौर की ग़ैरकांग्रेसी राजनीति की गहरी समझ वाले राय ने बताया, ''उधर दूसरे लोग चरण सिंह को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे. जब लोगों ने देखा कि बात बन नहीं रही है तो जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी से अनुरोध किया गया कि आज जो नाम घोषित कर देंगे, उसे हम सब स्वीकार कर लेंगे.''
राय के मुताबिक़, ''पर्दे के पीछे भी गतिविधियाँ तेज़ हुईं और जनसंघ ने भी जेपी की सलाह पर जगजीवन राम का समर्थन न करके मोरारजी देसाई के समर्थन का फ़ैसला कर लिया. इसके पीछे इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका की भी भूमिका रही."
मोरारजी देसाई आखिरकार उस पद पर पहुंच गए थे जिस पर वो पहले दो बार पहुंचते-पहुंचते रह गए थे.
मशहूर पत्रकार जनार्दन ठाकुर ने अपनी किताब 'ऑल द जनता मेन' में लिखा है, "सेंट्रल हॉल के मंच पर ही आचार्य कृपलानी ने मोरारजी देसाई से फुसफुसा कर कहा था, 'आपको बाबूजी से मिलने जाना चाहिए'. देसाई ने तमक कर जवाब दिया था, ' मैं क्यों उनसे मिलने जाऊं ? '
ठाकुर ने अपनी किताब में लिखा है, 'उधर जगजीवन राम के घर पर दूसरा ही नज़ारा था. उनके समर्थक ग़ुस्से में जनता पार्टी के झंडे कुचल रहे थे. जगजीवन राम इतने ग़ुस्से में थे कि वो हर कमरे में फर्नीचर को लात मारते हुए चिल्ला रहे थे, ' धोखा, धोखा !'
जनार्दन ठाकुर ने लिखा है, ''जनता पार्टी के एक नेता ने उन्हें मनाने के लिए कहा,' जेपी ने कहलवाया है, आप जिस मंत्रालय का नाम ले लेंगे, वो आपको मिल जाएगा.' जगजीवन राम चिल्ला कर बोले थे, ' मुझे देने वाले जयप्रकाश नारायण कौन होते हैं ?''
जनार्दन ठाकुर आगे लिखते हैं, "चार दिन के नाटक के बाद जगजीवन राम, मोरारजी देसाई से कोई भी पद लेने के लिए तैयार हो गए. उनको सिर्फ़ अपना मुंह मुंह छिपाने के लिए एक बहाना चाहिए था और वो उन्हें जेपी ने दिया. जेपी ने उन्हें फ़ोन कर कहा, 'आपके सहयोग के बिना नए भारत का निर्माण संभव नहीं हो सकेगा.''
इस तरह 'नए भारत के निर्माण' में जगजीवन राम की भागीदारी सुनिश्चित कराई गई. पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने भी इस पूरे प्रकरण का ज़िक्र अपनी आत्मकथा 'कोर्टिंग डेस्टिनी' में किया है.
शांति भूषण लिखते हैं, "जब चरण सिंह को पता चला कि त्रिकोणीय मुक़ाबले में जगजीवन राम आगे निकलने वाले हैं तो वो दौड़ से बाहर हो गए और अपना समर्थन मोरारजी देसाई को दे दिया. तभी जनसंघ ने भी जगजीवन राम का साथ छोड़ने का फ़ैसला ले लिया.''
शांति भूषण ने लिखा है, ''जनसंघ के कुछ नेता उनसे मिलने उनके घर पहुंचे. मैं भी उनके साथ था. जब जगजीवन राम को माजरा समझ में आया तो वो उन पर ज़ोर से चिल्लाए. वाजपेयी रोने लगे और जगजीवन राम की गोद में सिर रख कर उनसे माफ़ी मांगने लगे, लेकिन जगजीवन राम इससे शात नहीं हुए. वो सोच रहे थे और ये शायद सही भी था कि उनके समर्थकों ने ऐन मौके पर उनका साथ छोड़ दिया था."
लेकिन चरण सिंह ने नेतृत्व के मामले में सिर्फ़ कुछ ही समय के लिए अपने क़दम वापस खींचे थे.
इमरजेंसी के दौरान जेल गए वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र कपूर बताते हैं, "चरण सिंह ने अपनी इस इच्छा को कभी नहीं छिपाया कि वो भारत के प्रधानमंत्री बनना चाहते थे. जब वो प्रधानमंत्री बन गए तो इंडियन एक्सप्रेस ने उनको उद्धृत करते हुए छापा कि उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई है.''
कपूर के लिखा है, ''वो प्रधानमंत्री बनने के लिए इतने तत्पर थे कि उनके गृह मंत्री बनने के दो दिन बाद जब मैं उनसे उनके रेसकोर्स रोड वाले घर में मिला तो वो बैडमिंटन कोर्ट पर बनियान और अंगोछा पहने हुए बैठे हुए थे.''
कपूर आगे लिखते हैं, ''मुझसे कहने लगे- कपूर, देखो किसको प्रधानमंत्री बनाया है. ये तो सिर्फ़ बीस हज़ार वोटों से जीत कर आया है और यहां अमृतसर से ले कर नीचे तक सब लोग दो-दो लाख वोटों से जीत कर आए हैं."
कागज़ पर तो जनता पार्टी की कैबिनेट बहुत अच्छी कैबिनेट थी. उसमें एक ओर अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फ़र्नांडिस और एचएम पटेल जैसे लोग थे तो दूसरी ओर मधु दंडवते, लालकृष्ण अडवाणी और हेमवतीनंदन बहुगुणा जैसे लोग भी.
लेकिन कई दिग्गज जैसे चंद्रशेखर, नानाजी देशमुख, सुब्रमण्यन स्वामी और मधु लिमये जैसे लोग इस मंत्रिमंडल में जगह नहीं बना पाए थे. बाद में इसका ख़ामियाज़ा जनता पार्टी को भुगतना भी पड़ा.
राम बहादुर राय कहते हैं, "डॉ. सुब्रमण्यन स्वामी जब हार्वर्ड से आईआईटी में प्रोफ़ेसर बन कर आए थे तो वो जनसंघ से जुड़े. इमरजेंसी के ख़िलाफ़ अंडरग्राउंड आंदोलन में उनकी बड़ी भूमिका थी. उनको ये लगता था कि उन्हें विदेश मंत्री होना चाहिए था.''
राय बताते हैं, ''मोरारजी देसाई ने उनकी इस आकांक्षा को उनकी कमज़ोरी में बदल दिया. बाद में स्वामी ने मुझे बताया कि मोरारजी देसाई ने मेरा उपयोग किया. जिस तरह स्वामी का उपयोग मोराजी देसाई अटल बिहारी वाजपेयी की कमियों के उजागर करने के लिए कर रहे थे, उसी तरह मधु लिमए, चरण सिंह की कमज़ोरियों का फ़ायदा उठा कर सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे थे.''
राय आगे कहते हैं, ''मधु भी सरकार से बाहर थे. एन जी गोरे और अच्युत पटवर्धन दोनों ने लिखा है कि मधु लिमए काबिल ज़रूर थे, लेकिन उनमें अहंकार बहुत अधिक था. वो साचते थे कि अगर मैं मंत्री होता तो इन सबसे बेहतर करता.''
रामबहादुर राय ने कहा, ''नानाजी देशमुख का मामला दूसरा था. एक स्टेज के बाद जब उन्हें लगा कि ये बूढ़े आपस में लड़ मरेंगे तो उन्होंने प्रस्ताव दिया कि 60 साल से अधिक उम्र वाले लोगों को राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए.''
राय के मुताबिक, ''उसकी राजनीति ये थी कि ये तीनों राजनीति से अलग हो जाएं और एक अपेक्षाकृत युवा नेता प्रधानमंत्री बने. उनके मन में इस रोल के लिए चंद्रशेखर थे. ये बात अटल बिहारी वाजपेयी को पसंद नहीं आई."
जनता पार्टी को रसातल तक ले जाने में एक और शख़्स की महत्वपूर्ण भूमिका थी. वो थे इंदिरा गांधी को रायबरेली से हराने वाले राजनारायण. बिना नागा मालिश कराने वाले राजनारायण हमेशा कई वजहों से समाचारों में रहते थे.
जनार्दन ठाकुर अपनी किताब 'ऑल द जनता मेन' में लिखते हैं, "राजनारायण भारत में तो जहाज़ों और ट्रेनों की देर कराने के लिए कुख्यात थे ही, एक बार उन्होंने कुवैत में एक अंतरराष्ट्रीय उड़ान में देरी कराने की भी जुर्रत की थी.''
उन्होंने लिखा है, ''वो इसलिए ताकि उनका एक असिस्टेंट दौड़ कर वहाँ के ड्यूटी फ़्री से उनके लिए एक ट्रांजिस्टर ख़रीद कर ले आए. जहाज़ के कप्तान ने अपनी लॉगबुक में देरी का कारण ' ट्रैफ़िक' लिखा, जबकि कुवैत एयर इंडिया ने इसका कारण ' वीवीआईपी' बताया था."
कुछ दिनों बाद मोरारजी देसाई ने राजनारायण को अपने मंत्रिमंडल से निकाल दिया जिसका ख़ामियाजा उन्हें अपनी सरकार गिरवा कर देना पड़ा.
राम बहादुर राय बताते हैं, "राजनारायण विध्वंस के नेता थे और सारी ज़िंदगी उन्होंने लोहिया की रहनुमाई में समाजवादी आंदोलन का नेतृत्व किया. वो विरोध की राजनीति में रचे बसे थे जिसे उन्होंने सत्ता मिलने के बाद भी नही छोड़ा.''
राय आगे कहते हैं, ''एक बार जब मोरारजी देसाई अमरीका गए थे तो राजनारायण शिमला में एक सभा करना चाहते थे जिसकी अनुमति हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री शांता कुमार ने नहीं दी थी.''
राय के अनुसार, ''वहाँ से राजनारायण और जनसंघ ख़ेमे का टकराव शुरू हुआ. जब मोरारजी अमरीका से वापस लौटे तो राजनारायण सबके इत्र लगाते देखे गए. जब वो मोरारजी देसाई के पास इत्र लगाने पहुंचे तो उन्होंने कहा कि तुम मेरी ग़ैरहाज़िरी में तो गंदगी फैला रहे थे. अब मेरे आने पर इत्र लगा रहे हो. ये क्या तरीका है?''
राय ने आगे कहा, ''संभवत: राजनारायण के अहंकार को इससे चोट लगी. मोरारजी देसाई भी अगर व्यवहारकुशल शख़्स होते तो राजनारायण को अलग से बुला कर कहते और समझाते तो उसका ज़्यादा असर होता, लेकिन उन्होंने उनका सार्वजनिक रूप से अपमान किया. मुझे लगता है कि ऐसी छोटी मोटी घटनाएं भारत में महाभारत का कारण बनती हैं."
दूसरी तरफ़ चरण सिंह की इंदिरा गांधी के प्रति नफ़रत इस क़दर बढ़ चुकी थी कि वो उन्हें किसी कीमत पर गिरफ़्तार करवना चाह रहे थे.
वीरेंद्र कपूर बताते हैं, "चरण सिंह तिहाड़ के वॉर्ड नंबर 14 में रहा करते थे. वो और प्रकाश सिंह बादल टाइम पास करने के लिए सारा दिन कोटपीस खेला करते थे. वो एक बार मुझे अपने कमरे में ले गए. वहाँ मुसोलिनी पर एक किताब पड़ी हुई थी और विवेकानंद की एक तस्वीर लगी हुई थी.''
कपूर ने आगे लिखा है, ''मुझसे बोले- देख ले कपूर, इंदिरा गांधी को इसी कोठरी में रखूंगा.' काफ़ी लोग नहीं जानते हैं कि नई सरकार आने के बाद इंदिरा गांधी इतनी भयभीत थीं कि वो भारत छोड़ना चाहती थीं.''
कपूर ने लिखा है, ''लेकिन चरण सिंह अड़े हुए थे कि मैं उनका पासपोर्ट ज़ब्त करूंगा और उन्हें जेल भेजूंगा. अगर वो इंदिरा का पासपोर्ट ज़ब्त न करते और उन्हें विदेश जाने देते तो मैं नहीं समझता कि इंदिरा गाँधी की इतनी जल्दी भारत की राजनीति में वापसी होती."
लेकिन दूसरी तरफ़ जयप्रकाश नारायण थे जो 19 महीने जेल में रहने के बावजूद बिना किसी कटुता के इंदिरा गाँधी के घर जा कर उन्हें ढाढ़स बंधा रहे थे कि 'अभी तुम्हारे राजनीतिक जीवन का अंत नहीं हुआ है. '
राम बहादुर राय बताते हैं, "पुपुल जयकर ने भी लिखा है कि इंदिरा गाँधी उन दिनों नर्वस ही नहीं थीं, उन पर हिस्टीरिया जैसे दौरे पड़ रहे थे. उनको डर था कि संजय गाँधी को पकड़ कर उनकी सार्वजनिक रूप से उसी तरह नसबंदी करवाई जाएगी जैसे उन्होंने दूसरों की करवाई थी. यहाँ जेपी का मानवीय पक्ष काम कर रहा था.''
राय बताते हैं, ''जेपी ने इंदिरा गाँधी से भेंट की है और उनसे पूछा है कि प्रधानमंत्री न रहने पर तुम्हारा ख़र्च कैसे चलेगा? उन्होंने जेपी को बताया कि जवाहरलाल नेहरू की किताबों से मिलने वाली रॉयल्टी से वो अपना ख़र्च चलाएंगी. इस बैठक के बाद जेपी ने बयान दिया कि इंदिरा गाँधी का राजनीतिक जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ है. इसे जनता पार्टी के नेताओं को समझना चाहिए."
विडंबना ये रही कि जनता पार्टी को सत्ता में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जयप्रकाश नारायण को जनता पार्टी और उनके नेतृत्व ने हाशिए पर ला दिया. एक बार मशहूर पत्रकार कुलदीप नायर ने मोरारजी देसाई से पूछा कि आप जेपी की सलाह लेने उनसे मिलने क्यों नहीं जाते, तो उनका जवाब था, ' जेपी गाँधी हैं क्या?'
बीबीसी से बात करते हुए करते हुए कुलदीप नायर ने कहा, "मोरारजी समझते थे कि जेपी लोकप्रियता में उनसे ज़्यादा थे. वो ख़ुद चाहते थे लोकप्रिय होना, लेकिन हुए नहीं. इसलिए वो जेपी को मानते नहीं थे.''
नायर कहते हैं, ''मैंने उनसे कहा कि अभी मैं पटना में था. जेपी बहुत दुख में थे कि क्या हो रहा है भारत का. मैंने कहा कि आपको जाना चाहिए पटना उनसे मिलने. मोरारजी ने बहुत रूखेपन से जवाब दिया, ''मैं तो कभी गांधी से मिलने भी नहीं गया तो ये कौन-सी चीज़ हैं.' मैंने जब उन्हें जेपी आंदोलन की याद दिलाई तो उन्होंने कहा कि ठीक है, हम लोगों ने भी तो कुछ न कुछ किया."
सत्ता में आने के मात्र दो साल तीन महीनों बाद मोरारजी देसाई को इस्तीफ़ा देना पड़ा. उनके बाद प्रधानमंत्री बने चरण सिंह भी सिर्फ़ छह महीनों तक ही प्रधानमंत्री रह पाए.

1980 के चुनाव में इंदिरा गांधी की दोबारा वापसी हुई और 1977 में रामलीला मैदान में अटल बिहारी वाजपेयी का कहा वो जुमला ग़लत साबित हुआ कि, ''जो लोग अपने को भारत का पर्यायवाची कहते थे, उन्हें भारत की जनता ने इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया.''

23 मार्च 1931 शहीद दिवस - सिर्फ फांसी नहीं थी, जानिए भगत सिंह की मौत का सच!

 , ,    


यह 24 मार्च 1931 की सुबह थी। और लोगों में एक अजीब सी बेचैनी थी। एक खबर लोग आसपास से सुन रहे थे और उसका सच जानने के लिए यहां-वहां भागे जा रहे थे। और अखबार तलाश रहे थे।

यह खबर थी सरदार भगत सिंह और उनके दो साथी सुखदेव और राजुगुरु की फांसी की। उस सुबह जिन लोगों को अखबार मिला उन्होंने काली पट्टी वाली हेडिंग के साथ यह खबर पढ़ी कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में पिछली शाम 7:33 पर फांसी दे दी गई। वह सोमवार का दिन था।
ऐसा कहा जाता है कि उस शाम जेल में पंद्रह मिनट तक इंकलाब जिंदाबाद के नारे गूंज रहे थे।
केंद्रीय असेम्बली में बम फेंकने के जिस मामले में भगत सिंह को फांसी की सजा हुई थी उसकी तारीख 24 मार्च तय की गई थी। लेकिन उस समय के पूरे भारत में इस फांसी को लेकर जिस तरह से प्रदर्शन और विरोध जारी था उससे सरकार डरी हुई थी। और उसी का नतीजा रहा कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को चुपचाप तरीके से तय तारीख से एक दिन पहले ही फांसी दे दी गई।
फांसी के समय जो कुछ आधिकारिक लोग शामिल थे उनमें यूरोप के डिप्टी कमिश्नर भी शामिल थे। जितेंदर सान्याल की लिखी किताब 'भगत सिंह' के अनुसार ठीक फांसी पर चढ़ने के पहले के वक्त भगत सिंह ने उनसे कहा, 'मिस्टर मजिस्ट्रेट आप बेहद भाग्यशाली हैं कि आपको यह देखने को मिल रहा है कि भारत के कांतिकारी किस तरह अपने आदर्शों के लिए फांसी पर भी झूल जाते हैं।'
ये भगत सिंह के आखिरी वाक्य थे। लेकिन भगत सिंह, सुखदेव राजगुरू की मौत के बारे में सिर्फ इतना जानना कि उन्हें फांसी हुई थी, या तय तारीख से एक दिन पहले हुई थी काफी नहीं होगा। आगे पढ़िए कि 23 मार्च की उस शाम हुआ क्या था।
फांसी के दिन क्या हुआ
जिस वक्त भगत सिंह जेल में थे उन्होंने कई किताबें पढ़ीं। 23 मार्च 1931 को शाम करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई।
फांसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी ही पढ़ रहे थे।
जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनकी फांसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो।"
फांसी पर जाते समय भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू तीनों मस्ती से गा रहे थे -
मेरा रंग दे बसन्ती चोला, मेरा रंग दे;
मेरा रंग दे बसन्ती चोला। माय रंग दे बसन्ती चोला।।
फांसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहां मिट्टी का तेल डालकर इनको जलाया जाने लगा।
गांव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। जब गांव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया।
मृत्यु पर विवाद
हालांकि अभी तक भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी विवादित है। इस बारे में हर जगह एक सी जानकारियां नहीं मिलतीं। लेकिन कई किताबों और फिल्मों में यह जानकारी साफ तरह से है कि 23 तारीख को आखिर क्या हुआ था।
2002 में राजकुमार संतोषी की डायरेक्ट की गई फिल्म 'द लीजेंड ऑफ सिंह' में भी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी के बारे में यह हिस्सा दिखाया गया है।
फिल्म में यह दिखाया गया है कि भगत सिंह के परिवार और बाकी लोगों को किसी तरह इस बात की जानकारी मिल जाती है कि तीनों क्रांतिकारियों को सजा की तय तारीख से एक दिन पहले ही फांसी दी जा रही है।
फिल्म के दृष्य के अनुसार परिवार और बाकी लोग जेल के बाहर प्रदर्शन कर रहे होते हैं और अंदर उन्हें फांसी दे दी जाती है। जब लोग जेल के अंदर घुसने की कोशिश करते हैं तो उन तीनों की लाश को दूसरे गेट से बोरे में भरकर बाहर निकाला जाता है।
लेकिन प्रदर्शनकारी उन तक पहुंच जाते हैं। फिल्म में इस दृश्य के अंत में यह भी दिखाया गया है कि किस तरह ब्रिटिश पुलिस उन तीनों की लाश के टुकड़े कर उन्हें जला देती है।
क्यों हुई थी सजा
अंग्रेज़ सरकार दिल्ली की असेंबली में 'पब्लिक सेफ्टी बिल' और 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' लाने की तैयारी में थी। ये बहुत ही दमनकारी क़ानून थे और सरकार इन्हें पास करने का फैसला कर चुकी थी।
शासकों का इस बिल को क़ानून बनाने के पीछे उद्देश्य था कि जनता में क्रांति का जो बीज पनप रहा है, उसे अंकुरित होने से पहले ही समाप्त कर दिया जाए। गंभीर विचार-विमर्श के पश्चात 8 अप्रैल,1929 का दिन असेंबली में बम फेंकने के लिए तय हुआ और इस कार्य के लिए भगत सिंह एवं बटुकेश्र्वर दत्त निश्चित हुए।
इस बमकांड का उद्देश्य किसी को हानि पहुँचाना नहीं था। इसलिए बम भी असेम्बली में ख़ाली स्थान पर ही फेंका गया था। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त बम फेंकने के बाद वहाँ से भागे नहीं, बल्कि स्वेच्छा से अपनी गिरफ्तारी दे दी। इस समय इन्होंने वहाँ पर्चे भी बाटें, जिसका प्रथम वाक्य था कि- बहरों को सुनाने के लिये विस्फोट के बहुत ऊँचे शब्द की आवश्यकता होती है। कुछ सुराग मिलने के बाद 'लाहौर षड़यन्त्र' केस के नाम से मुकदमा चला।
7 अक्टूबर, 1930 को फैसला सुनाया गया, जिसके अनुसार राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह को फांसी की सज़ा दी गई। बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावाज की सजा सुनाई गई थी।
भगत सिंह का नाम भगत कैसे पड़ा ?
28 सितंबर 1907 को भगत सिंह के जन्म पर उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह जेल से रिहा हुए थे। दोनों स्वतंत्रता सेनानी थे। तभी उनकी दादी जयकौर के मुंह से निकला कि ऐ मुंडा तो बड़ा भाग वाला है। तभी परिवार के लोगों ने फैसला किया कि भागा वाला होने की वजह से लड़के का नाम इन्हीं शब्दों से मिलते-जुलते होना चाहिए, लिहाजा उनका नाम भगत सिंह रख दिया गया।
23 मार्च 1931 को भगत सिंह अपने दो साथियों, राजगुरु और सुखदेव के साथ फांसी चढ़ा दिए गए। उस दिन से लेकर आजतक लंबा समय गुजर गया। भारत बदला और भारत के हालात भी बदल गए। नहीं बदली, तो भगत की यादें।
यह देश और इसके बंटे टुकड़े पाकिस्तान में आज भी वक्त-बेवक्त भगत सिंह का नाम गूंजता रहता है। मौत के बाद इंसान मर जाता है, लेकिन आने वाली कई पीढ़ियों तक जो बरकरार रहें ऐसे लोग कम ही होते हैं। इतने कम दिनों की जिंदगी में भगत सिंह इतना कुछ कर गए और कह गए कि उनकी हस्ती का गुमनाम होना नामुमकिन है। आगे पढ़ें भगत सिंह की लिखे-कहे कुछ शब्द। जानें, क्या सोचते थे भगत...
अपनी किताब 'मैं नास्तिक क्यों हूं' में भगत सिंह ने लिखा, 'जिंदगी तो अपने दम पर ही जी जाती है। दूसरों के कंधों पर तो सिर्फ जनाजे उठाए जाते हैं।'
भगत ने अपनी जेल नेटबुक के 43वें पन्ने पर लिखा, 'मैं एक इंसान हूं और वह सब कुछ जिससे इंसानियत पर असर पड़ता है, उसकी मुझे परवाह होती है।'
अगर बहरों के कानों तक अपनी आवाज सुनानी है, तो आवाज बहुत तेज होनी चाहिए। जब हमने बम फेंका था, तो हमारा मकसद किसी की हत्या करना नहीं था। हमने ब्रिटिश सरकार पर बम फेंका था। अंग्रेजों को भारत से चले जाना चाहिए और भारत को आजाद करना चाहिए: भगत सिंह
भगत ने अपनी जेल नोटबुक में लिखा, 'वे (अंग्रेज) हमें तो मार सकते हैं, लेकिन हमारे ख्यालातों को नहीं मार सकते। बड़े-बड़े साम्राज्य खत्म हो जाते हैं, लेकिन विचार जिंदा रहते हैं।'
क्रांति के बारे में लिखते हुए क्रांतिकारी भगत सिंह ने लिखा, 'क्रांति शब्द को इसके शाब्दिक अर्थ में नहीं समझना चाहिए। इस शब्द के साथ कई मायने और कई मतलब जुड़े हुए हैं। जो लोग भी इस शब्द का इस्तेमाल या फिर बेजा इस्तेमाल करते हैं, उनके मकसद के मुताबिक क्रांति शब्द का भी अर्थ बदल जाता है। शोषण करने वाली स्थापित संस्थाओं के लिए क्रांति का यह शब्द खून में भीगी दहशत का एहसास दिलाता है। वहीं क्रांतिकारियों के लिए यह एक पावन, बहुत पवित्र शब्द है।'
भगत ने लिखा, 'क्रांति मानव जीवन का ऐसा अधिकार है, जिसे इंसान से अलग नहीं किया जा सकता है। आजादी जन्म लेने के समय से ही हर किसी का स्थायी अधिकार है। श्रम ही इस समाज को असल मायनों में चलाता और थामता है।'
भगत ना केवल एक क्रांतिकारी थे, बल्कि वामपंथी विचारक भी थे। निष्पक्ष आलोचना और बेधड़क सोच के बारे में उन्होंने लिखा, 'कठोरता से आलोचना करना और आजादी से खुलकर सोचना ही क्रांतिकारी सोच की दो मुख्य विेशेषताएं हैं।'
एक आजाद भारत का सपना देखने वाले क्रांतिकारी भगत की ख्वाहिश थी, 'ऐसा हो कि सूरज की रोशनी जहां-जहां पड़ती हो, उन सब जगहों में हमारे इस देश से ज्यादा खुश, इससे ज्यादा आजाद और इससे ज्यादा प्यारा कोई और देश ना हो।'
क्रांति के रास्ते और इसके तरीके पर भगत सिंह ने लिखा, 'जरूरी नहीं कि क्रांति खून की प्यासी हो। जरूरूी नहीं कि इसका रास्ता बम और पिस्तौल से तय किया जाए। बम और पिस्तौल से क्रांति नहीं आती। क्रांति की तलवार तो ख्यालों और विचारों के पत्थर पर घिसकर तेज होती है।'

भगत सिंह की ज़िंदगी के वे आख़िरी 12 घंटे

लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च, 1931 की शुरुआत किसी और दिन की तरह ही हुई थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था कि सुबह-सुबह ज़ोर की आँधी आई थी.
लेकिन जेल के क़ैदियों को थोड़ा अजीब सा लगा जब चार बजे ही वॉर्डेन चरत सिंह ने उनसे आकर कहा कि वो अपनी-अपनी कोठरियों में चले जाएं. उन्होंने कारण नहीं बताया.
उनके मुंह से सिर्फ़ ये निकला कि आदेश ऊपर से है. अभी क़ैदी सोच ही रहे थे कि माजरा क्या है, जेल का नाई बरकत हर कमरे के सामने से फुसफुसाते हुए गुज़रा कि आज रात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है.
उस क्षण की निश्चिंतता ने उनको झकझोर कर रख दिया. क़ैदियों ने बरकत से मनुहार की कि वो फांसी के बाद भगत सिंह की कोई भी चीज़ जैसे पेन, कंघा या घड़ी उन्हें लाकर दें ताकि वो अपने पोते-पोतियों को बता सकें कि कभी वो भी भगत सिंह के साथ जेल में बंद थे.
बरकत भगत सिंह की कोठरी में गया और वहाँ से उनका पेन और कंघा ले आया. सारे क़ैदियों में होड़ लग गई कि किसका उस पर अधिकार हो. आखिर में ड्रॉ निकाला गया.

लाहौर कॉन्सपिरेसी केस

अब सब क़ैदी चुप हो चले थे. उनकी निगाहें उनकी कोठरी से गुज़रने वाले रास्ते पर लगी हुई थी. भगत सिंह और उनके साथी फाँसी पर लटकाए जाने के लिए उसी रास्ते से गुज़रने वाले थे.
एक बार पहले जब भगत सिंह उसी रास्ते से ले जाए जा रहे थे तो पंजाब कांग्रेस के नेता भीमसेन सच्चर ने आवाज़ ऊँची कर उनसे पूछा था, "आप और आपके साथियों ने लाहौर कॉन्सपिरेसी केस में अपना बचाव क्यों नहीं किया."
भगत सिंह का जवाब था, "इन्कलाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपील से नहीं."
वॉर्डेन चरत सिंह भगत सिंह के ख़ैरख़्वाह थे और अपनी तरफ़ से जो कुछ बन पड़ता था उनके लिए करते थे. उनकी वजह से ही लाहौर की द्वारकादास लाइब्रेरी से भगत सिंह के लिए किताबें निकल कर जेल के अंदर आ पाती थीं.

जेल की कठिन ज़िंदगी

भगत सिंह को किताबें पढ़ने का इतना शौक था कि एक बार उन्होंने अपने स्कूल के साथी जयदेव कपूर को लिखा था कि वो उनके लिए कार्ल लीबनेख़ की 'मिलिट्रिज़म', लेनिन की 'लेफ़्ट विंग कम्युनिज़म' और अपटन सिनक्लेयर का उपन्यास 'द स्पाई' कुलबीर के ज़रिए भिजवा दें.
भगत सिंह जेल की कठिन ज़िंदगी के आदी हो चले थे. उनकी कोठरी नंबर 14 का फ़र्श पक्का नहीं था. उस पर घास उगी हुई थी. कोठरी में बस इतनी ही जगह थी कि उनका पाँच फिट, दस इंच का शरीर बमुश्किल उसमें लेट पाए.
भगत सिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे. मेहता ने बाद में लिखा कि भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में पिंजड़े में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे.

'इंक़लाब ज़िदाबाद!'

उन्होंने मुस्करा कर मेहता को स्वागत किया और पूछा कि आप मेरी किताब 'रिवॉल्युशनरी लेनिन' लाए या नहीं? जब मेहता ने उन्हे किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो.
मेहता ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे? भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बग़ैर कहा, "सिर्फ़ दो संदेश... साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और 'इंक़लाब ज़िदाबाद!"
इसके बाद भगत सिंह ने मेहता से कहा कि वो पंडित नेहरू और सुभाष बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने मेरे केस में गहरी रुचि ली थी. भगत सिंह से मिलने के बाद मेहता राजगुरु से मिलने उनकी कोठरी पहुंचे.
राजगुरु के अंतिम शब्द थे, "हम लोग जल्द मिलेंगे." सुखदेव ने मेहता को याद दिलाया कि वो उनकी मौत के बाद जेलर से वो कैरम बोर्ड ले लें जो उन्होंने उन्हें कुछ महीने पहले दिया था.

तीन क्रांतिकारी

मेहता के जाने के थोड़ी देर बाद जेल अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों को बता दिया कि उनको वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जा रही है. अगले दिन सुबह छह बजे की बजाय उन्हें उसी शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा.
भगत सिंह मेहता द्वारा दी गई किताब के कुछ पन्ने ही पढ़ पाए थे. उनके मुंह से निकला, "क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे?"
भगत सिंह ने जेल के मुस्लिम सफ़ाई कर्मचारी बेबे से अनुरोध किया था कि वो उनके लिए उनको फांसी दिए जाने से एक दिन पहले शाम को अपने घर से खाना लाएं.
लेकिन बेबे भगत सिंह की ये इच्छा पूरी नहीं कर सके, क्योंकि भगत सिंह को बारह घंटे पहले फांसी देने का फ़ैसला ले लिया गया और बेबे जेल के गेट के अंदर ही नहीं घुस पाया.

आज़ादी का गीत

थोड़ी देर बाद तीनों क्रांतिकारियों को फांसी की तैयारी के लिए उनकी कोठरियों से बाहर निकाला गया. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपने हाथ जोड़े और अपना प्रिय आज़ादी गीत गाने लगे-
कभी वो दिन भी आएगा
कि जब आज़ाद हम होंगें
ये अपनी ही ज़मीं होगी
ये अपना आसमाँ होगा.
फिर इन तीनों का एक-एक करके वज़न लिया गया. सब के वज़न बढ़ गए थे. इन सबसे कहा गया कि अपना आखिरी स्नान करें. फिर उनको काले कपड़े पहनाए गए. लेकिन उनके चेहरे खुले रहने दिए गए.
चरत सिंह ने भगत सिंह के कान में फुसफुसा कर कहा कि वाहे गुरु को याद करो.

फांसी का तख़्ता

भगत सिंह बोले, "पूरी ज़िदगी मैंने ईश्वर को याद नहीं किया. असल में मैंने कई बार ग़रीबों के क्लेश के लिए ईश्वर को कोसा भी है. अगर मैं अब उनसे माफ़ी मांगू तो वो कहेंगे कि इससे बड़ा डरपोक कोई नहीं है. इसका अंत नज़दीक आ रहा है. इसलिए ये माफ़ी मांगने आया है."
जैसे ही जेल की घड़ी ने 6 बजाय, क़ैदियों ने दूर से आती कुछ पदचापें सुनीं. उनके साथ भारी बूटों के ज़मीन पर पड़ने की आवाज़े भी आ रही थीं. साथ में एक गाने का भी दबा स्वर सुनाई दे रहा था, "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है..."
सभी को अचानक ज़ोर-ज़ोर से 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' और 'हिंदुस्तान आज़ाद हो' के नारे सुनाई देने लगे. फांसी का तख़्ता पुराना था लेकिन फांसी देने वाला काफ़ी तंदुरुस्त. फांसी देने के लिए मसीह जल्लाद को लाहौर के पास शाहदरा से बुलवाया गया था.
भगत सिंह इन तीनों के बीच में खड़े थे. भगत सिंह अपनी माँ को दिया गया वो वचन पूरा करना चाहते थे कि वो फाँसी के तख़्ते से 'इंक़लाब ज़िदाबाद' का नारा लगाएंगे.

लाहौर सेंट्रल जेल

लाहौर ज़िला कांग्रेस के सचिव पिंडी दास सोंधी का घर लाहौर सेंट्रल जेल से बिल्कुल लगा हुआ था. भगत सिंह ने इतनी ज़ोर से 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा लगाया कि उनकी आवाज़ सोंधी के घर तक सुनाई दी.
उनकी आवाज़ सुनते ही जेल के दूसरे क़ैदी भी नारे लगाने लगे. तीनों युवा क्रांतिकारियों के गले में फांसी की रस्सी डाल दी गई. उनके हाथ और पैर बांध दिए गए. तभी जल्लाद ने पूछा, सबसे पहले कौन जाएगा?
सुखदेव ने सबसे पहले फांसी पर लटकने की हामी भरी. जल्लाद ने एक-एक कर रस्सी खींची और उनके पैरों के नीचे लगे तख़्तों को पैर मार कर हटा दिया. काफी देर तक उनके शव तख़्तों से लटकते रहे.
अंत में उन्हें नीचे उतारा गया और वहाँ मौजूद डॉक्टरों लेफ़्टिनेंट कर्नल जेजे नेल्सन और लेफ़्टिनेंट कर्नल एनएस सोधी ने उन्हें मृत घोषित किया.

अंतिम संस्कार

एक जेल अधिकारी पर इस फांसी का इतना असर हुआ कि जब उससे कहा गया कि वो मृतकों की पहचान करें तो उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उसे उसी जगह पर निलंबित कर दिया गया. एक जूनियर अफ़सर ने ये काम अंजाम दिया.
पहले योजना थी कि इन सबका अंतिम संस्कार जेल के अंदर ही किया जाएगा, लेकिन फिर ये विचार त्यागना पड़ा जब अधिकारियों को आभास हुआ कि जेल से धुआँ उठते देख बाहर खड़ी भीड़ जेल पर हमला कर सकती है.
इसलिए जेल की पिछली दीवार तोड़ी गई. उसी रास्ते से एक ट्रक जेल के अंदर लाया गया और उस पर बहुत अपमानजनक तरीके से उन शवों को एक सामान की तरह डाल दिया गया.
पहले तय हुआ था कि उनका अंतिम संस्कार रावी के तट पर किया जाएगा, लेकिन रावी में पानी बहुत ही कम था, इसलिए सतलज के किनारे शवों को जलाने का फैसला लिया गया.

लाहौर में नोटिस

उनके पार्थिव शरीर को फ़िरोज़पुर के पास सतलज के किनारे लाया गया. तब तक रात के 10 बज चुके थे. इस बीच उप पुलिस अधीक्षक कसूर सुदर्शन सिंह कसूर गाँव से एक पुजारी जगदीश अचरज को बुला लाए.
अभी उनमें आग लगाई ही गई थी कि लोगों को इसके बारे में पता चल गया. जैसे ही ब्रितानी सैनिकों ने लोगों को अपनी तरफ़ आते देखा, वो शवों को वहीं छोड़ कर अपने वाहनों की तरफ़ भागे. सारी रात गाँव के लोगों ने उन शवों के चारों ओर पहरा दिया.
अगले दिन दोपहर के आसपास ज़िला मैजिस्ट्रेट के दस्तख़त के साथ लाहौर के कई इलाकों में नोटिस चिपकाए गए जिसमें बताया गया कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का सतलज के किनारे हिंदू और सिख रीति से अंतिम संस्कार कर दिया गया.
इस ख़बर पर लोगों की कड़ी प्रतिक्रिया आई और लोगों ने कहा कि इनका अंतिम संस्कार करना तो दूर, उन्हें पूरी तरह जलाया भी नहीं गया. ज़िला मैजिस्ट्रेट ने इसका खंडन किया लेकिन किसी ने उस पर विश्वास नहीं किया.

भगत सिंह का परिवार

इस तीनों के सम्मान में तीन मील लंबा शोक जुलूस नीला गुंबद से शुरू हुआ. पुरुषों ने विरोधस्वरूप अपनी बाहों पर काली पट्टियाँ बांध रखी थीं और महिलाओं ने काली साड़ियाँ पहन रखी थीं.
लगभग सब लोगों के हाथ में काले झंडे थे. लाहौर के मॉल से गुज़रता हुआ जुलूस अनारकली बाज़ार के बीचोबीच रूका.
अचानक पूरी भीड़ में उस समय सन्नाटा छा गया जब घोषणा की गई कि भगत सिंह का परिवार तीनों शहीदों के बचे हुए अवशेषों के साथ फिरोज़पुर से वहाँ पहुंच गया है.
जैसे ही तीन फूलों से ढ़के ताबूतों में उनके शव वहाँ पहुंचे, भीड़ भावुक हो गई. लोग अपने आँसू नहीं रोक पाए.

ब्रिटिश साम्राज्य

वहीं पर एक मशहूर अख़बार के संपादक मौलाना ज़फ़र अली ने एक नज़्म पढ़ी जिसका लब्बोलुआब था, 'किस तरह इन शहीदों के अधजले शवों को खुले आसमान के नीचे ज़मीन पर छोड़ दिया गया.'
उधर, वॉर्डेन चरत सिंह सुस्त क़दमों से अपने कमरे में पहुंचे और फूट-फूट कर रोने लगे. अपने 30 साल के करियर में उन्होंने सैकड़ों फांसियां देखी थीं, लेकिन किसी ने मौत को इतनी बहादुरी से गले नहीं लगाया था जितना भगत सिंह और उनके दो कॉमरेडों ने.
किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि 16 साल बाद उनकी शहादत भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंत का एक कारण साबित होगी और भारत की ज़मीन से सभी ब्रिटिश सैनिक हमेशा के लिए चले जाएंगे.

बिहार दिवस: बिहार जागे देश आगे!

    


आज बिहार को अलग हुए पुरे १०४ साल हो गए हैं
आजादी का जश्न सब पर चढ़ कर बोल रहा हैं। लोग
ऐसे प्रतिक्रिया कर रहे हैं जैसे हम कभी गुलाम ही ना
हो। सुशासन का असर हरेक गली चौराहे पर दिख रहा
हैं। लोग जश्ने आज़ादी में झूम रहे हैं। पटना की गलियाँ
सोनू निगम के पोस्टरों से सराबोर हैं। होली का रंग
भी कही ना कहीं इस आवेश में दब गया लगता हैं।
लोग उत्साहित हैं और जोश में भी, लेकिन इन जोश
और खरोश में हम बिहार के विभाजन का सही अर्थ
को नहीं समझ पाए हैं। ये आलेख शायद आपको
इतिहास के उस पन्नो से रूबरू करा सके जिसकी
आपको तलाश हैं - अली

वैसे तो बिहार की प्रशासनिक पहचान का अंत
होना 1765 में ही शुरू हो गया था जब ईस्ट इंडिया
कम्पनी को इसकी दीवानी मिली थी। उसके बाद
यह महज एक भौगोलिक इकाई बन गया, अगले सौ
सवा सौ सालों में बिहारी एक सांस्कृतिक पहचान
के रूप में तो रही लेकिन इसकी बिहार का प्रांतीय
या प्रशासनिक पहचान मिट सा गया। बिहार का
इतिहास संभवतः सच्चिदानन्द सिन्हा से शुरू होता
है क्योंकि राजनीतिक स्तर पर सबसे पहले उन्होंने ही
बिहार की बात उठाई थी। कहते हैं, डा. सिन्हा जब
वकालत पास कर इंग्लैंड से लौट रहे थे तब उनसे एक
पंजाबी वकील ने पूछा था कि मिस्टर सिन्हा आप
किस प्रान्त के रहने वाले हैं। डा. सिन्हा ने जब
बिहार का नाम लिया तो वह पंजाबी वकील
आश्चर्य में पड़ गया। इसलिए क्योंकि तब बिहार नाम
का कोई प्रांत था ही नहीं। उसके यह कहने पर कि
बिहार नाम का कोई प्रांत तो है ही नहीं, डा.
सिन्हा ने कहा था, नहीं है लेकिन जल्दी ही होगा।
यह घटना फरवरी, 1893 की बात है। उसके बाद एक से
एक ऐसे हादसे होते गए जिसने बिहारी अस्मिता को
झंकझोर कर रख दिया , एक समय ऐसा भी आया जब
बिहारी युवाओं (पुलिस) के कंधे पर ‘बंगाल पुलिस’
का बिल्ला लटकाए बिहार की जमीन पर काम
करना पड़ता था। उस समय बिहार की आवाज बुलंद
करने के लिए चंद ही लोग थे, जिनमे महेश नारायण,
अनुग्रह नारायण सिंह, नंदकिशोर लाल, राय बहादुर
और कृष्ण सहाय आदि प्रमुख थे। ना कोई अखबार था
ना कोई पत्रकार बिहार से प्रकशित एक मात्र
अखबार 'द बिहार हेराल्ड' था जो बिहारियों के
हित के लिए बात करता था। तमाम बंगाली अखबार
बिहार पृथक्करण का विरोध करते थे, कुछ बिहारी
पत्रकार बिहार हित की बात तो करते थे लेकिन
अलग बिहार के मुद्दे पर एकदम अलग राय रखते थे।
बिहार को अलग राज्य के पक्ष में जनमत तैयार करने
या कहें की माहौल बनाने के उद्देश्य से 1894 में डॉ.
सिन्हा ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ ‘द बिहार
टाइम्स’ अंग्रेज़ी साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू
किया। स्थितियां बदलते देख बाद में ‘बिहार
क्रानिकल्स’ भी बिहार अलग प्रांत के आन्दोलन
का समर्थन करने लगा। 1907 में महेश नारायण की
मृत्यु के बाद डॉ. सिन्हा अकेले हो गए। इसके बावजूद
उन्होंने अपनी मुहिम को जारी रखा। और 1911 में
अपने मित्र सर अली इमाम से मिलकर केन्द्रीय
विधान परिषद में बिहार का मामला रखने के लिए
उत्साहित किया। 12 दिसम्बर 1911 को ब्रिटिश
सरकार ने बिहार और उड़ीसा के लिए एक लेफ्टिनेंट
गवर्नर इन कौंसिल की घोषणा कर दी। धीरे धीरे
उनकी मुहीम रंग लाइ और 22 मार्च 1911 को बिहार
बंगाल से अलग हो स्वतंत्र राज्य हो गया।
1911 में बिहार के बंगाल से अलग होने के एक सौ एक
बरस होने वाले हैं. आज भी इतिहास के इस मोड का
बिहार की ओर से इतिहास के इस पहलु को दिखाने
का अभाव है। क्या कारण था कि बिहार को
बंगाल से अलग लेने का निर्णय ब्रिटिश सरकार ने
लिया ... इस प्रश्न का एक उत्तर यह दिया जाता है
कि ब्रिटिश सरकार बंगाल के टुकडे करके उभरते हुए
राष्ट्रवाद को कमजोर करना चाहती थी। पहले उसने
बंग-विभाजन के द्वारा ऐसा करने की कोशिश की
और फिर बाद में बंगाल से बिहार और उडीसा को
अलग करके यही दोहराया। वैसे बंग विभाजन का जो
विरोध बंगाल ने किया उतना विरोध बिहार
विभाजन के समय नहीं हुआ, यह लगभग स्वाभाविक
था क्योंकि बिहार को पृथक राज्य बनाने के लिए
हुए आन्दोलन के पीछे सच्चिदानंद सिन्हा एवं महेश
नाराय़ण समेत अन्य आधुनिक बुद्धिजीवियों के नेतृत्व
में इसका शंखनाद हुआ था।
"बिहार बिहारियों के लिए" का विचार सर्वप्रथम
मुंगेर के एक उर्दू अखबार मुर्घ -इ- सुलेमान ने पेश किया
था.एक अन्य पत्र कासिद ने भी इसी तरह के वक्तव्य
प्रकाशित किए. इसी दशक में बिहार के प्रथम
हिन्दी पत्र- बिहार बन्धु जिसके संपादक केशवराम
भट्ट थे ने भी इस तरह के विचार को आगे बढाया. तब
से लेकर 1994 तक विविध रूपों में यह विचार व्यक्त
होता रहा जिसका ही एक प्रतिफलन बिहार का
बंगाली विरोधी आन्दोलन था जो बिहार के
प्रशासन और शिक्षा के क्षेत्र में बंगालियों के
वर्चस्व के विरोध के रूप में उभरा. एल. एस. एस ओ मैली
से लेकर वी सी पी चौधरी तक विद्वानों ने बिहार
के बंगाल के अंग के रूप में रहने के कारण बढे पिछडेपन
की चर्चा की है. इस चर्चा का एक सुंदर समाहार
गिरीश मिश्र और व्रजकुमार पाण्डेय ने प्रस्तुत किया
है. इन चर्चाओं में यह कहा गया है कि अंग्रेज़ बिहार
के प्रति लापरवाह थे और बिहार लगातार उद्योग
धंधे से लेकर शिक्षा, व्यवसाय और सामाजिक क्षेत्र
में पिछडता जा रहा था। चूँकि बिहार में बर्धमान के
राजा या कासिमबाजार के जमींदार की तरह के
बडे जमींदार नहीं थे यहाँ के एलिट भी उपेक्षित ही
रहे. दरभंगा महाराज को छोडकर बिहार के किसी
बडे जमींदार को अंग्रेज महत्त्व नहीं देते थे। जिस
क्षेत्र में विदेशियों के साथ व्यापार का इतना
महत्त्वपूर्ण सम्पर्क था उसका बंगाल के अंग के रूप में
रहकर जो हाल हो गया था उससे यह निष्कर्ष
निकालना स्वाभाविक था कि बिहार को बंगाल
के भीतर रहकर प्रगति के लिए सोचना असंभव था।
बिहार को बंगाल प्रेसिडेंसी से अलग कर एक अलग
राज्य का निर्माण 1870 से ही शुरू हो गया था जब
बिहार के पढ़े लिखे लोगों को ये समझ में आना शुरू
हो गया की स्कूल, कॉलेज से लेकर अदालत और
किसी भी सरकारी दफ्तरों की नौकरियों में
बंगालियों का वर्चस्व अनैतिक है और जनतंत्र के
खिलाफ भी। बिहार के प्रथम समाचार पत्र बिहार
बन्धु में इस आशय के पत्र और लेख प्रकाशित हुए जिसमें
यहाँ तक कहा गया कि बंगाली ठीक उसी तरह
बिहारियों की नौकरियाँ खा रहे हैं जैसे कीडे खेत में
घुसकर फसल नष्ट करते हैं! सरकारी मत इससे अलग था
उनके अनुसार बंगाली; बिहारियों की नौकरियों पर
बेहतर अंग्रेज़ी ज्ञान के कारण कब्ज़ा जमाए हुए हैं।
1872 में , बिहार के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर
जॉर्जे कैम्पबेल ने लिखा था कि चूंकि बिहार का
शासन बंगाल से बंगाली अधिकारियों द्वारा
नियंत्रित किया जाता है, इसलिए हर मामले में
अंग्रेजी में पारंगत बंगालियों की तुलना में
बिहारियों के लिए असुविधाजनक स्थिति बनी
रहती है। सरकारी द्स्तावेज़ों और अंग्रेज़ों द्वारा
लिखित समाचार पत्रों के लेखों में भी यही भाव
ध्वनित होता था. यह बात खास तौर पर कही
जाती थी कि शिक्षित बंगाली रेल की पटरियों के
साथ साथ पंजाब तक नौकरियाँ पाते गये। कलकत्ता
से प्रकशित एक पत्र के सम्पादकीय में इस बात का
विश्लेषण खास तौर किया गया गया लिखा गया
की बिहार के लगभग सभी सरकारी नौकरियाँ
बंगाली के हाथों में हैं. बडी नौकरियाँ तो हैं ही
छोटी नौकरियों पर भी बंगाली ही हैं। जिलेवार
विश्लेषण करके पत्र में लिखा गया कि भागलपुर,
दरभंगा, गया, मुजफ्फरपुर, सारन, शाहाबाद और
चम्पारन जिलों के कुल 25 डिप्टी मजिस्ट्रेटों और
कलक्टरों में से 20 बंगाली हैं. कमिश्नर के दो सहायक
भी बंगाली हैं. पटना के 7 मुंसिफों ( भारतीय जजों)
में से 6 बंगाली हैं. और यही स्थिति सारन की भी है
जहां 3 में से 2 बंगाली हैं। छोटे सरकारी नौकरियों
में भी यही स्थिति है। मजिस्ट्रेट , कलक्टर, न्यायिक
दफ्तरों में 90 प्रतिशत क्लर्क बंगाली हैं। यह स्थिति
सिर्फ जिले के मुख्यालय में ही नहीं हैं, सब-डिवीजन
स्तर पर भी यही स्थिति है. म्यूनिसिपैलिटी और
ट्रेजेरी दफ्तरों में बंगाली छाए हुए हैं। इस प्रकार के
आँकडे देने के बाद पत्र ने अन्य प्रकार की नौकरियों
का हवाला दिया था. पत्र के अनुसार दस में से नौ
डॉक्टर और सहायक सर्जन बंगाली हैं. पटना में आठ
गज़ेटेड मेडिकल अफसर बंगाली हैं. सभी भारतीय
इंजीनियर के रूप में कार्यरत बंगाली हैं. एकाउंटेंट,
ओवरसियर एवं क्लर्कों में से 75 प्रतिशत बंगाली ही
हैं. संपादकीय का सबसे दिलचस्प हिस्सा वह था
जिसमें यह उल्लेख किया गया था कि जिस दफ्तर में
बिहारी शिक्षित व्यक्ति कार्यरत है उसको पग पग
पर बंगाली क्लर्कों से जूझना पडता हैं और उनकी
मामूली भूलों को भी सीनियर अधिकारियों के
पास शिकायत के रूप में दर्ज कर दिया जाता हैं।
सम्पादकीय का निष्कर्ष था कि बिहार की
नौकरियों को बंगाली आकांक्षाओं की सेवा में
लगा दिया गया है।
बंगालियों के बिहार में आने के पहले नौकरियों में
कुलीन मुसलमानों और कायस्थों का कब्ज़ा था।
स्वाभाविक था कि बंगालियों के खिलाफ सबसे
मुखर मुसलमान और कायस्थ ही थे। यहीं से 'बिहार
बिहारियों के लिए' का नारा उठा, पहले कुलीन
मुसलमानों ने इसे मुद्दा बनाया और बाद में कायस्थों
ने। अंग्रेज़ी शिक्षा के क्षेत्र में बिहार ने बहुत कम
तरक्की की थी, सबकुछ कलकत्ता से ही तय होता
था इसलिए बिहार में कॉलेज भी कम ही खोले गये.
यह बहुत प्रचारित नहीं है कि जब कॉलेज खोलने का
निर्णय किया गया तो ब्रिटिश कम्पनी सरकार ने
तय किया था कि बंगाल प्रेसिडेंसी में दो कॉलेज
खोले जाएं- एक अंग्रेजी शिक्षा के लिए कलकत्ता में
और एक संस्कृत शिक्षा के लिए तिरहुत अंचल में
क्योंकि पारम्परिक संस्कृत शिक्षा केन्द्र के रूप में
तिरहुत प्रसिद्ध था। यह बंगाल के प्रसिद्ध
भारतियों को पसंद नहीं आया और प्रयत्न करके
संस्कृत कॉलेज भी कलकत्ता में ही खोला गया।
बिहार में बडे कॉलेज के रूप में पटना कॉलेज था
जिसकी स्थापना 1862-63 में की गयी थी. इस
कॉलेज में बंगाली वर्चस्व इतना अधिक था कि 1872
में जॉर्ज कैम्पबेल ने यह निर्णय लिया कि इसे बंद कर
दिया जाए। वे इस बात से क्षुब्ध थे कि 16 मार्च
1872 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत
समारोह में उपस्थित 'बिहार' के सभी छात्र बंगाली
थे! यह सरकारी रिपोर्ट में उद्धृत किया गया है कि
"हम बिहार में कॉलेज सिर्फ प्रवासी बंगाली की
शिक्षा के लिए खुला नहीं रखना चाहते". इस
निर्णय का विरोध बिहार के बडे लोगों ने किया.
इन लोगों का कथन था कि इस कॉलेज को बन्द न
किया जाए क्योंकि बिहार में यह एकमात्र शिक्षा
केन्द्र था जहाँ बिहार के छात्र डिग्री की पढाई
कर सकते थे।
बिहार की सरकारी नौकरियों में बंगाली वर्चस्व पर
कई सरकारी रिपोर्टों में प्रमुखता से लिखा गया।
यहाँ तक की एक रिपोर्ट ऐसी भी थी जिसमे ये
कहा गया की बिहारी ;बंगाली के रहमोकरम पर हैं
जो नौकरी वो नहीं करना चाहते वो बिहारियों
को मिल जाती हैं। इस रिपोर्ट ने तहलका मचा
दिया अंतत: सरकार जगी और सरकारी आदेश दिए गए
कि जहाँ-जहाँ रिक्त स्थान हैं उनमें उन बिहारियों
को ही नौकरी पर रखा जाए जिन्हें शिक्षा का
सुयोग मिला है। आदेश में कई जगहों पर यह स्पष्ट कहा
जाता था कि इसे बंगालियों को नहीं दिया जाए।
इसी तरह के कुछ आदेश उत्तर पश्चिम प्रांत में भी दिए
गये थे. इस तरह के सरकारी विज्ञापन भी समाचार
पत्रों में छपा करते थे जिसमें स्पष्ट लिखा होता
था- "बंगाली बाबु आवेदन न करें". बिहार में भी 1870
और 1880 के दशक में कई सरकारी आदेश दिए गये थे
जिसमें यह कहा गया था कि बिहारियों को ही
इन नौकरियों में नियुक्त किया जाए।
बिहार के कई समाचार पत्रों में इस आशय के कई लेख
और पत्र प्रकाशित होते रहे जिसमें यह कहा जाता
था कि बिहार की प्रगति में बडी बाधा बंगालियों
का वर्चस्व है. नौकरियों में तो बंगाली अपने अंग्रेज़ी
ज्ञान के कारण बाजी मार ही लेते थे बहुत सारी
जमींदारियां भी बंगालियों के हाथों में थी।
इसमें संदेह नहीं कि बंगालियों के प्रति सरकारी
विद्वेष के पीछे सिर्फ स्थानीय लोगों के प्रति
उनका लगाव नहीं था. विभिन्न कारणों से बंगाल में
चल रही गतिविधियों से जुडने के कारण बिहार में
भी बंगाली समाज सामाजिक और राजनैतिक रूप से
सजग था. उनके प्रभाव से शांत समझा जाने वाला
प्रदेश बिहार भी अंग्रेज़ विरोधी राष्ट्रवादी
आन्दोलन से जुडने लगा था. कई इतिहासकारों का
मत है कि बंगालियों के प्रति बिहारियों के मन में
विद्वेष को बढाने में सरकार की एक चाल थी. वे
नहीं चाहते थे कि राष्ट्रीय और क्रांतिकारी
विचारों का जोर बिहार में बढे.
इसमें संदेह नहीं कि बिहार में बंगाली नवजागरण का
प्रभाव पडा था और बिहार के बंगाली राजनैतिक
और बौद्धिक क्षेत्र में आगे बढे हुए थे. शैक्षणिक,
स्वास्थ्य, सार्वजनिक संगठन तथा समाज सुधार के
क्षेत्र में बंगाली समाज बिहार में बहुत सक्रिय था.
यह नहीं भूला जा सकता कि भूदेव मुखर्जी जैसे
बंगाली बुद्धिजीवी-अधिकारी के कारण ही
हिन्दी को बिहार में प्रशासन और शिक्षा के
माध्यम के रूप में स्वीकृति मिल सकी। बिहार में प्रेस
के क्षेत्र में क्रांतिकारी भूमिका प्रदान करने वाले
दो महापुरूषों- केशवराम भट्ट और रामदीन सिंह को
आज बिहार के पत्रकार भुला ही चुके हैं। इन सबके
बावजूद यह मानना ही पडेगा कि बिहार के बहुत
सारे शिक्षित लोगों को यह लगता था कि बंगाल
के साथ होने के कारण और प्रशासन का कलकत्ता से
नियंत्रण होने के कारण बिहारियों के प्रति सरकार
पूरी तरह से न्याय नहीं कर पाती। और यही एक खास
वजह थी जिसने बिहार को अलग करने में खास
भूमिका निभाई।
बंगाल से बिहार के अलग होने की प्रशासनिक
भूमिका के दशकों पहले से बिहार के पढ़े-लिखो के
बीच बंगाली वर्चस्व के विरूद्ध भाव सक्रिय होने लगे
थे. इस भाव का एक प्रकाशन अल- पंच में 1889 में
प्रकाशित नज़्म में मिला था जिसका शीर्षक था-
'सावधान ! ये बंगाली है". ऐसे ही भाव की एक और
प्रस्तुति 1880 में 'बिहार के एक शुभ-चिंतक' का पत्र
है जिसमें बंगालियों की तुलना दीमकों से की गई है
जो बिहार की फसल (नौकरियों) को 'खा रहे हैं'.
बुद्धिजीवियों के बीच बंगाली वर्चस्व के प्रति इस
भाव के कारण ही इस बात के लिए समर्थन पैदा होने
लगा कि बंगाल के साथ रहकर बिहारियों की
स्वार्थ -रक्षा संभव नहीं हैं।
1890 के दशक में बिहार की पत्र पत्रिकाओं में
(खासकर बिहार टाइम्स में ) इस आशय के लेख
नियमित रूप से छपने लगे जिसमें बिहार की दयनीय
स्थिति के प्रति सचेतनता और परिस्थिति के प्रति
आक्रोश व्यक्त किया गया था। बिहार टाइम्स ने
लिखा था कि बिहार की आबादी 2 करोड 90
लाख है और जो पूरे बंगाल को एक तिहाई राजस्व देते
हैं उसके प्रति यह व्यवहार अनुचित है। इस पत्र ने
विभिन्न क्षेत्रों में बिहारियों के प्रतिनिधित्व
को लेकर जो तथ्य सामने रखे उसे ध्यान में रखने पर
बंगाल में बिहार की उपेक्षा की सच्चाई को
नकारा नहीं जा सकता। ऐसे अनेक कारण थे जो
बिहार के क्षेत्र में बिहारियों की उपेक्षा को
दिखाते थे जैसे - बंगाल प्रांतीय शिक्षा सेवा में 103
अधिकारियों में से सिर्फ 3 बिहारी थे, मेडिकल एवं
इंजीनियरिंग शिक्षा की छात्रवृत्ति सिर्फ
बंगाली ही पाते थे, कॉलेज शिक्षा के लिए आवंटित
3.9 लाख में से 33 हजार रू ही बिहार के हिस्से
आता था, बंगाल प्रांत के 39 कॉलेज (जिनमें 11
सरकारी कॉलेज थे) में बिहार में सिर्फ 1 था, कल-
कारखाने के नाम पर जमालपुर रेलवे वर्कशॉप था
(जहाँ नौकरियों में बंगालियों का वर्चस्व था) ,
1906 तक बिहार में एक भी इंजीनियर नहीं था और
मेडिकल डॉक्टरों की संख्या 5 थी।
ऐसे हालात में बिहारी प्रबुद्धों द्वारा बिहार को
पृथक राज्य बनाए जाने का समर्थन दिया जाने लगा
और स्वदेशी आन्दोलन के उपरांत हालात ऐसे हो गये
कि कांग्रेस के 1908 के अपने प्रांतीय अधिवेशन में
बिहार को अलग प्रांत बनाए जाने का समर्थन
किया गया। कुछ प्रमुख मुस्लिम नेतागण भी सामने
आये जिन्होंने हिन्दू मुसलमान के मुद्दे को पृथक राज्य
बनने में बाधा नहीं बनने दिया। इन दोनों बातों से
अंग्रेज शासन के लिए बिहार को अलग राज्य का
दर्जा दिए जाने का मार्ग सुगम हो गया। अंतत: वह
घडी आयी और 12 दिसंबर 1911 को बिहार को अलग
राज्य का दर्जा मिल गया और आखिरकार 145 बर्ष
बाद बिहार को उसका सम्मान प्राप्त हो गया।
बिहार के इतिहास में 12 दिसंबर 1911 का दिन मील
का पत्थर साबित हुआ। इसी दिन ब्रिटिश सरकार ने
भारत की राजधानी कलकत्ता से स्थानांतरित कर
दिल्ली ले जाने की घोषणा की। बिहार को बंगाल
से अलग कर गर्वनर इन काउंसिल के शासन वाला
राज्य घोषित कर दिया। इसके बाद 22 मार्च 1912
को की गयी उद्घोषणा के द्वारा बंगाल से अलग कर
बिहार को नए राज्य का दर्ज मिला । जिसमें
भागलपुर, मुंगेर, पूर्णिया एवं भागलपुर प्रमंडल के
संथाल परगना के साथ-साथ पटना, तिरहुत, एवं
छोटानागपुर को शामिल किया गया। सर चाल्र्स
स्टूबर्स बेले, के.सी.एस.आई. राज्य के प्रथम राज्यपाल
तथा उपराज्यपाल नियुक्त किए गए। 29 दिसंबर 1920
को बिहार राज्य को राज्यपाल वाला प्रांत बनने
का गौरव प्राप्त हुआ। महामहिम रायपुर वासी
सत्येन्द्र प्रसन्नो सिन्हा राज्य के प्रथम भारतीय
राज्यपाल नियुक्त किए गए। मार्च 1920 में
लेजिस्लेटिव काउंसिल भवन की स्थापना की गयी।
सात फरवरी 1921 को सर मुडी की अध्यक्षता में
प्रथम बैठक आयोजित की गयी जो आज बिहार
विधानसभा कहलाता है। बिहार के अंतिम
राज्यपाल सर जेम्स डेविड सिफटॉन हुए। वर्ष 1935 में
बिहार विधान परिषद भवन का निर्माण शुरू किया
गया। गर्वमेंट आफ इंडिया एक्ट 1935 में निहित
प्रावधानों के अनुसार एक अप्रैल 1937 को प्रांतीय
स्वायत्ता का श्रीगणोश हुआ। जिसके तहत
द्विसदनीय व्यवस्था की शुरूआत हुई। इसके तहत
बिहार विधानसभा व विधान परिषद प्रस्थापित
किया गया। इसके तहत 22-29 जनवरी 1937 की
अवधि में बिहार विधानसभा का चुनाव संपन्न हुआ।
20 जुलाई 1937 को डा. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में
प्रथम सरकार का गठन हुआ। उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में
चुना गया। 22 जुलाई 1937 को विधानमंडल का
प्रथम अधिवेशन हुआ। स्वाधीनता के बाद 15 अगस्त
1947 को श्री जयरामदास दौलत राम प्रथम
राज्यपाल नियुक्त किए गए। पुन: बिहार
विधानसभा के चुनाव के बाद 29 अप्रैल 1952 को
श्रीकृष्ण सिंह मुख्यमंत्री के रूप में चुने गए।
यहाँ एक रोचक तथ्य बतलाना चाहूँगा की
"बंगाल से अलग होने के बाद जब पटना को बिहार
की राजधानी बनाने का फैसला लिया गया,
तो इस शहर में आधारभूत संरचनाओं का घोर
अभाव था। इसे तैयार करने में समय लगता, जबकि
सरकार पटना से चलना था। ऐसे में दरभंगा के
महाराजा रामेश्वर सिंह ने पटना के छज्जू बाग
को खरीदा और वहां अस्थायी तौर पर
विधानसभा और सचिवालय का निर्माण
कराया। उस वक्त अगर ऐसा नहीं किया जाता
तो बिहार-उडीसा की संयुक्त राजधानी पटना
की जगह कटक बन सकता था। उस अस्थाई भवन में
विधानसभा तक तक चला जब तक नया भवन
तैयार नहीं हो गया। उस अस्थाई विधानसभा
भवन में आज पटना उच्च न्यायालय के प्रधान
न्यायधीश का आवास है।" आज जब बिहार बदल
रहा हैं और बिहारी भी तो दुख की बात यह है
कि बिहार की राजधानी पटना बनाने में अहम
भूमिका निभानेवाले रामेश्वर सिंह को सौ
साल गुजर जाने के बाद भी न तो बिहार याद
करता है और न ही राजधानी पटना।
बिहार अलग हुआ और अपने आप पर इतराता चाणक्य
के कदमो पर चलता दिन-दुनी रात तरक्की करने लगा।
इस बीच बहुत से उतार चढ़ाव आये। कई राजनीती
समीकरण बदले, कई बार इमरजेंसी हुई। जगन्नाथ और
लालू ने मिलकर कई बार राज्य का बलात्कार
किया। राज्य कई बार गर्त में गिरा और कई बार
बुलंदी को छुआ। लालू राज के बुरे साल को झेलने के
बाद नितीश का सुशासन भी बिहार ने देखा।
बिहार हमेशा से एक ऐसे प्रदेश के रूप में पहचाना जा
रहा हैं जो अपने आप को बदलने की बजाय देश और
दुनिया को बदलने में तल्लीन रहता हैं। आज जब
बिहार बदल रहा हैं, बिहार और बिहारी के बारे में
सोच रहा हैं, कृषि से ज्यादा उधोग धंधे के बारे में
सोच रहा हैं, चाणक्य को छोड़कर चार्वाक के बारे
में सोचने लगा हैं, बिहारी संस्कृति को भुलाकर
पश्चिमी रंग में रंगने लगा हैं उस समय बस एक ही टीस
दिल में उठती हैं ... क्या सचमुच ये वही नालंदा
विश्वविद्यालय वाला बिहार हैं जिसने आज बिहार
को शिक्षा मित्र के चुंगल में धकेल दिया हैं।

रेफरेंस -:
द जर्नल आफ बिहार रिसर्च सोसाइटी