Shamsher ALI Siddiquee

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हैप्पी इंटरनॉट डे: इंटरनेट क्या था, क्या है और क्या होगा

    



इंटरनॉट, एक विशेषण होता है, जो अंतर्जाल के संसार से गहराई से जुड़े लोगों को दिया जाता है। कोई भी इंटरनॉट वर्षो के अनुभव के बाद तकनीकी रूप से दक्ष ऐसे व्यक्ति सर्च इंजन, सर्च स्ट्रिंग्स, इंटरनेट रिसोर्सेज, फोरम, न्यूजग्रुप्स और चैट रूम्स के प्रयोग में विशेष तौर पर पारंगत होते हैं। इस प्रकार जो व्यक्ति इंटरनेट के इतिहास, राजनीति के बारे में जितना अधिक ज्ञान रखता है, उसे उतना ही बड़ा इंटरनॉट कहा जाता है। इसके विपरीत, जिस व्यक्ति का इंटरनेट ज्ञान कुछ कम होता है, ऐसे व्यक्तियों के लिए अन्य विशेषण प्रयोग किए जाते हैं।

ऑनलाइन संसार यानी इंटरनेट के बारे में विशेष ज्ञान रखने वाले व्यक्तियों को साइबरनॉट भी कहा जाता है। लेकिन इंटरनॉट इंटरनेट की समस्त जानकारी रखने वालों को कहा जाता है और इंटरनॉट ऑनलाइन जगत से जुड़ा एक अकादमिक शब्द भी है। इसके विपरीत, साइबरनॉट ऑनलाइन खेल, वर्चुअल वर्ल्ड या अन्य ऑनलाइन कल्पना जगत का विशेषज्ञ होता है। इंटरनेट की दुनिया में यह केवल शब्द मात्र नहीं है। यह कहना उचित होगा कि साइबरनॉट वह व्यक्ति होते हैं जिनका विकास इंटरनेट के साथ-साथ होता है, लेकिन इंटरनॉट उन्हें कहा जाता है जिनका दखल इंटरनेट की समूची विकास प्रक्रिया में होता है, यानि वे इंटरनेट के विकास में भागी भी हो सकते हैं।

इसी तरह आम नेटिजन भी इंटरनेट से जुड़ी जानकारी रखता है। लेकिन इंटरनॉट या साइबरनॉट्स की तरह नेटिजन बहुत गहराई से इंटरनेट की जानकारी नहीं रखता है। इसका अर्थ ये हुआ, कि आवश्यक नहीं कि उसे इंटरनेट की स्थापना या गेमिंग आदि से जुड़ी कोई विशेष जानकारी हो ही। हालांकि, इंटरनॉट, साइबरनॉट और नेटिजन जैसे नाम इंटरनेट से जुड़े विशेषज्ञों को ही दिए जाते हैं, लेकिन इन्हें विशेष तौर पर लिया जाना आमफेहम वेब सरफर्स से अलग करता है। क्योंकि आम वेब सरफर्स में इंटरनेट पर अपने काम का डाटा खोजने वाले लगभग सभी लोग आते हैं।

23 अगस्त 2016 को डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू यानी वर्ल्ड वाइड वेब को अस्तित्व में आए 25 साल पूरे हो गए हैं. वर्ल्ड वाइड वेब को बनाने का श्रेय सर टिम बर्नर्स ली को जाता है जिन्होंने इस अवधारणा को मूर्त रूप प्रदान किया.

वर्ष 1983 में एक सर्वेक्षण के दौरान में उन लोगों से बात की गई थी जिन्होंने कंप्यूटर के ज़रिए किसी को संदेश भेजा था. इनमें से लगभग 50 प्रतिशत लोगों को यह तरीक़ा बहुत उपयोगी नहीं लगा था.

इसके बाद से प्यू रिसर्च सेंटर उन आंकड़ों को जुटाता रहा है जो बताते हैं कि गुजरे दशकों में अमरीकी इस तकनीक को किस तरह देखते रहे हैं.

आंकड़े बताते हैं कि 1983 में अमरीका में दस प्रतिशत लोगों के पास कंप्यूटर थे. लेकिन संदेश भेजने के लिए ज़्यादातर लोगों को यह तकनीक रास नहीं आई.

फिर लोगों को कंप्यूटर के ज़रिए ख़रीदारी का अनुभव हुआ.

सर्वेक्षण से पता चला था कि 1983 में कंप्यूटर का इस्तेमाल कर रहे दस में से सात लोग इससे ख़रीदारी करना सुविधाजनक पाते हैं.

इस बारे में उन्होंने जो संदेश भेजा था वो यह था, ''ऐसी बहुत सारी चीज़ें ख़रीदना बहुत आसान है, जो परिवार के बजट में नहीं हैं.''

नंबर वन तकनीक

1995 में प्यू रिसर्च सेंटर ने एक और सर्वेक्षण किया. इसमें पाया गया कि 42 प्रतिशत अमरीकियों ने इंटरनेट शब्द कभी सुना ही नहीं.

लेकिन ज़्यादातर लोगों ने माना कि कंप्यूटर के बिना रहना उनके लिए बड़ा मुश्किल है.

और फिर जब 2014 के आंकड़े देखे गए तो पता चला कि प्रत्येक दस में से एक व्यक्ति ऑनलाइन नहीं है.

प्यू रिसर्च की मानें तो आज वर्ल्ड वाइड वेब ही वह नंबर एक तकनीक है जिसे लोग छोड़ना नहीं चाहते हैं.

सर्वेक्षण में शामिल 67 प्रतिशत लोगों का मानना है कि संबंधों को मज़ूबत बनाने के लिए इंटरनेट अच्छा ज़रिया है.

यह विचार दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों में एक समान पाया गया है जिनमें स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े, अमीर-ग़रीब सभी तरह के लोग शामिल हैं.

ज़्यादातर लोगों का कहना है कि उन्हें 'इंफोर्मेशन सुपरहाइवे' पर सवारी करना मज़ेदार लगता है.

इंटरनेट के जन्म से आज तक, इसके स्वरूप में ज़मीन-आसमान का फ़र्क आ चुका है. गोपनीय सरकारी दस्तावेज़ों से लेकर आम लोगों के चैट रिकॉर्ड और ईमेल, सभी कुछ इंटरनेट की वर्चुअल ताकों पर रखा हुआ है.

सोचिए इसका मालिकाना हक अगर किसी व्यक्ति या देश के पास होता तो वह देश कितना माला-माल हो जाता. लेकिन सच यह है कि इंटरनेट का कोई एक मालिक नहीं है.

इंटरनेट की उत्पत्ति और उसमें रोज़ाना होने वाले इनोवेशनों के लिए सरकारों से लेकर निजी क्षेत्र, इंजीनियर्स, सिविल सोसाइटी के लोगों के अलावा और भी कई क्षेत्रों का सहयोग है.
पर स्थिति तब चिंताजनक हो जाती है जब इंटरनेट पर प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण रखने की बात की जाए.

इंटरनेट पर अमरीका का 'दबदबा'

इंटरनेट गवर्नेंस पर पिछले दो दशकों से बहस हो रही है और इसे नियंत्रित किए जाने और ना किए जाने के पक्षों में लगातार चर्चाएं हो रहीं हैं.

इंटरनेट डोमेन यानी वेबसाइट पता जारी करने वाली संस्था, आईकैन (इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर असाइंड नेम्स एंड नंबर्स) जैसी इंटरनेट की मूलभूत कंपनियां अमरीका में स्थित हैं, जिस वजह से ये माना जाता है कि इंटरनेट पर अमरीका का दबदबा है.

लेकिन इंटरनेट पर एकाधिकार की स्थिति से बचने के लिए इसे संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में लाए जाने की कोशिश की जा रही है.

कुछ देश चाहते हैं कि इंटरनेट गवर्नेंस की ऐसी व्यवस्था बने जिसमें इंटरनेट सरकारों के नियंत्रण में रहे.

ऐसी मांग के पीछे एक अहम कारण ये भी है कि देशों को साइबर सुरक्षा की चिंता भी है और सुरक्षा के क्षेत्र में इसके दुरुपयोग का डर भी. यही कारण है कि कई देश मन ही मन इसके नियंत्रण का हक पाना चाहते हैं.

संयुक्त राष्ट्र के कई सदस्य एक ऐसी बहुपक्षीय व्यवस्था चाहते हैं बने जिसमें इंटरनेट से जुड़े सभी पक्षों का हित संरक्षित हो.

भारत में भी इंटरनेट की आज़ादी पर चर्चा

भारत में भी इस बारे में व्यापक तौर पर चर्चा की जा रही है. बीते बुधवार दिल्ली में इंटरनेट और टेलिकॉम से जुड़ी संस्थाओं ने मिलकर एक गोलमेज़ बैठक का आयोजन किया जिसमें सरकारी, गैर-सरकारी वर्ग और सिविल सोसाइटी के लोगों ने हिस्सा लिया. इनमें अध्ययन, व्यापार, वकालत, तकनीक और सामाजिक कार्य से जुड़े लोग शामिल हुए.

इंटरनेट गवर्नेंस से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के विशेष समूह मैग (मल्टी-स्टेकहोल्डर एडवायज़री ग्रुप) के सदस्य कहते हैं, “इंटरनेट सरकार के प्रारूप से बाहर की उपलब्धि है. अभिव्यक्ति की आज़ादी, सार्वलौकिकता, इनोवेशन ये सभी इसके मूल सिद्धांत हैं. ऐसे में विचार इस बात पर करना है कि क्या यूएन के तहत ऐसा कोई मॉडल बन सकता है जिसमें समाज, सरकार और निजी क्षेत्र समेत सभी को बराबर का अधिकार मिले.”

उनका कहना है, “ट्यूनिस एजेंडा एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है जिसमें मल्टीस्टेकहोल्डर्स के बारे में विस्तार से चर्चा की गई थी लेकिन इसे लिखे गए नौ साल हो गए हैं और साल 2015 में इसे अपडेट किया जाना है.”

बीते साल जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र की कमीशन ऑन साइंस एंड टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट की बैठक में भारत ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा था कि इंटरनेट का अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन बहुपक्षीय, पारदर्शी और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए, जिसमें सरकार और दूसरे सहयोगियों की पूरी भागीदारी हो.

'अपनी जगह ब्राज़ील को दे रहा भारत'

हालांकि भारत ने इस बारे में अपने विचार दमदार तरीके से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के आगे नहीं रखे. कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने जानबूझकर इस बारे में मज़बूती से कदम नहीं उठाए और इस मामले पर विकासशील देशों के समूह का नेतृत्व ब्राज़ील को करने दिया.

विशेषज्ञ कहते हैं, “दूसरे विकासशील देशों के मुकाबले भारत की नुमाइंदगी काफ़ी कम है और इसके पीछे वजह आम जनमानस में इस मुद्दे पर जानकारी का अभाव है. इसीलिए सरकारें ऐसे मुद्दे प्रभावशाली तरीके से नहीं उठातीं.”

आने वाले समय में इंटरनेट की अगली एक अरब आबादी भारत, चीन और दक्षिण एशिया के देशों से ही आनी है. ऐसे में इस महत्वपूर्ण विषय पर भारत की भूमिका काफ़ी अहम हो जाती है.

फ़रवरी में यूएन-सीएसटीडी की बैठक में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश इंटरनेट गवर्नेंस और बहुपक्षीयता पर अपनी राय रखेंगे. ऐसे में ये देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत और अन्य विकासशील देश इस मुद्दे पर अपनी क्या राय रखते हैं.

रक्षाबन्धन: ऐसे हुयी इसकी सुरुआत

    


श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है। इसे आमतौर पर भाई-बहनों का पर्व मानते हैं लेकिन, अलग-अलग स्थानों एवं लोक परम्परा के अनुसार अलग-अलग रूप में रक्षाबंधन का पर्व मनाते हैं। वैसे इस पर्व का संबंध रक्षा से है। जो भी आपकी रक्षा करने वाला है उसके प्रति आभार दर्शाने के लिए आप उसे रक्षासूत्र बांध सकते हैं।
राखी या रक्षाबंधन भाई और बहन के रिश्ते की पहचान माना जाता है। राखी का धागा बांध बहन अपने भाई से अपनी रक्षा का प्रण लेती है। यहां हम आपको रक्षा बंधन का ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व बताने जा रहे हैं।


लक्ष्मीजी ने बांधी थी राजा बलि को राखी राजा बलि ने यज्ञ संपन्न कर स्वर्ग पर अधिकार जमाने की कोशिश की थी। बलि की तपस्या से घबराए देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णुजी वामन ब्राम्हण का रूप रखकर राजा बलि से भिक्षा अर्चन के लिए पहुंचे। गुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी बलि अपने संकल्प को नहीं छोड़ा और तीन पग भूमि दान कर दी।वामन भगवान ने तीन पग में आकाश-पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। बलि भक्ति के बल पर विष्णुजी से हर समय अपने सामने रहने का वचन ले लिया। इससे लक्ष्मीजी चिंतित हो गईं। नारद के कहने पर लक्ष्मीजी बलि के पास गई और रक्षासूत्र बांधकर उसे अपना भाई बनाया और संकल्प में बलि से विष्णुजी को अपने साथ ले आईं। उसी समय से राखी बांधने का क्रम शुरु हुआ जो आज भी अनवरत जारी है।


रक्षासूत्र बांधकर इंद्राणी ने दिलाई थी विजय रक्षाबंधन को लेकर दूसरी यह भी मान्यता है कि जब देवों और दानवों के बीच संग्राम हुआ और दानव विजय की ओर अग्रसर थे तो यह देख कर राजा इंद्र बेहद परेशान थे। इंद्र को परेशान देखकर उनकी इंद्राणी ने भगवान की अराधना की। उनकी पूजा से प्रसन्न हो भगवान ने उन्हें मंत्रयुक्त धागा दिया। इस धागे को इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर बांध दिया और इंद्र को विजय मिली। इस धागे को रक्षासूत्र का नाम दिया गया और बाद में यही रक्षा सूत्र रक्षाबंधन हो गया।


द्रौपती ने बांधी थी भगवान कृष्ण को राखी राखी का एक कथानक महाभारत काल से भी प्रसिद्ध है। भगवान श्रीकृष्ण ने रक्षा सूत्र के विषय में युधिष्ठिर से कहा था कि रक्षाबंधन का त्यौहार अपनी सेना के साथ मनाओ इससे पाण्डवों एवं उनकी सेना की रक्षा होगी। श्रीकृष्ण ने यह भी कहा था कि रक्षा सूत्र में अद्भुत शक्ति होती है।


खून रोकने के लिए बांधा साड़ी का कपड़ा शिशुपाल का वध करते समय कृष्ण की तर्जनी में चोट आ गई, तो द्रौपदी ने लहू रोकने के लिए अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दी थी। यह भी श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। भगवान ने चीरहरण के समय उनकी लाज बचाकर यह कर्ज चुकाया था। उसी समय से राखी बांधने का क्रम शुरु हुआ।

हुँमायू ने दिया राणा साँगा की विधवा को रक्षावचन मुग़ल काल के दौर में जब मुग़ल बादशाह हुमायूँ चितौड़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर रक्षा वचन ले लिया।  हुमायूँ ने इसे स्वीकार करके चितौड़ पर आक्रमण का ख़्याल दिल से निकाल दिया और कालांतर में मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज निभाने के लिए चितौड़ की रक्षा हेतु  बहादुरशाह के विरूद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्मवती और मेवाड़ राज्य की रक्षा की।

सुभद्राकुमारी चौहान ने शायद इसी का उल्लेख अपनी कविता, 'राखी' में किया है:

मैंने पढ़ा, शत्रुओं को भी
जब-जब राखी भिजवाई
रक्षा करने दौड़ पड़े वे
राखी-बन्द शत्रु-भाई॥

पुरू ने दिया सिकंदर को जीवनदान सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पुरूवास को राखी बाँध कर अपना मुँहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया । पुरूवास ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिये हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया।

ऐतिहासिक युग में भी सिकंदर व पोरस ने युद्ध से पूर्व रक्षा-सूत्र की अदला-बदली की थी। युद्ध के दौरान पोरस ने जब सिकंदर पर घातक प्रहार हेतु अपना हाथ उठाया तो रक्षा-सूत्र को देखकर उसके हाथ रुक गए और वह बंदी बना लिया गया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया।

चंद्रशेखर आज़ाद ने भेंट किये 5000₹ बात उन दिनों की है जब क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत थे और फ़िरंगी उनके पीछे लगे थे।

फिरंगियों से  बचने के लिए शरण लेने हेतु आज़ाद एक  तूफानी रात को एक घर में जा पहुंचे जहां  एक विधवा अपनी बेटी के साथ रहती थी। हट्टे-कट्टे आज़ाद को डाकू समझ कर पहले तो वृद्धा ने शरण देने से इनकार कर दिया लेकिन जब आज़ाद ने अपना परिचय दिया तो उसने उन्हें ससम्मान अपने घर में शरण दे दी। बातचीत से आज़ाद को आभास हुआ कि गरीबी के कारण विधवा की बेटी की शादी में कठिनाई आ रही है। आज़ाद ने महिला को कहा, 'मेरे सिर पर पाँच हजार रुपए का इनाम है, आप फिरंगियों को मेरी सूचना देकर मेरी गिरफ़्तारी पर पाँच हजार रुपए का इनाम पा सकती हैं जिससे आप अपनी बेटी का विवाह सम्पन्न करवा सकती हैं।

यह सुन विधवा रो पड़ी व कहा- "भैया! तुम देश की आज़ादी हेतु अपनी जान हथेली पर रखे घूमते हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है। मैं ऐसा हरगिज़ नहीं कर सकती।" यह कहते हुए उसने एक रक्षा-सूत्र आज़ाद के हाथों में बाँध कर देश-सेवा का वचन लिया। सुबह जब विधवा की आँखें खुली तो आज़ाद जा चुके थे और तकिए के नीचे 5000 रुपये पड़े थे। उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था- "अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट- आज़ाद।"
रक्षाबंधन का सही मायना धार्मिक त्यौहार एवम रीतिरिवाज कई अच्छी बातों को ध्यान में रखकर मनाये जाते हैं | नारी शारीरिक बल में पुरुषों से कमजोर होती हैं | इस कारण सुरक्षा की दृष्टी से इस सुंदर त्यौहार को बनाया गया पर कलयुग के दौर में परिपाठी बदलती ही जा रही हैं |

रक्षाबंधन का आधुनिकरण आज के समय में यह एक त्यौहार की जगह लेन देन का व्यापार हो चूका हैं |बहने अपने भाई से गिफ्ट या रूपये ऐसी चीजों की मांग करती हैं | शादी हो जाने पर मायके से ससुराल गिफ्ट्स एवं मिठाइयाँ भेजी जाती हैं | मान परम्परा का नहीं अब लेन देन का होता हैं | पिछले वर्ष इतना दिया इस वर्ष कम क्यूँ दिया | आज यह त्यौहार हिसाब किताब का रक्षाबंधन हो चूका हैं | ऐसी महंगाई में कहीं ना कहीं यह त्यौहार भाइयों पर बोझ बनते जा रहे हैं | रक्षा और कामना से परे हट यह एक व्यापार का रूप बनते जा रहा है|

अगर आज रक्षाबंधन की श्रद्धा सभी के भीतर उतनी ही प्रबल होती जितनी की वास्तव में इतिहास में हुआ करती थी तो आये दिन औरतों पर होने वाले अत्याचार इस तरह दिन दोगुनी रात चौगुनी रफ्तार से ना बढ़ते | यह त्यौहार बस एक दिखावे का रूप हो गया हैं |

कैसे मनाये रक्षाबंधन अगर असल मायने में इसे मनाना हैं तो इसमें से सबसे पहले लेन देन का व्यवहार खत्म करना चाहिये | साथ ही बहनों को अपने भाई को हर एक नारी की इज्जत करे, यह सीख देनी चाहिये | जरुरी हैं कि व्यवहारिक ज्ञान एवम परम्परा बढे तब ही समाज ऐसे गंदे अपराधो से दूर हो सकेगा |

रक्षाबंधन का यह त्यौहार मनाना हम सभी के हाथ में हैं और आज के युवावर्ग को इस दिशा में पहला कदम रखने की जरुरत हैं | इसे एक व्यापार ना बनाकर एक त्यौहार ही रहने दे | जरूरत के मुताबिक अपनी बहन की मदद करना सही हैं लेकिन बहन को भी सोचने की जरुरत हैं कि गिफ्ट या पैसे पर ही प्यार नहीं टिका हैं | जब यह त्यौहार इन सबके उपर आयेगा तो इसकी सुन्दरता और भी अधिक निखर जायेगी |

कई जगह पर पत्नी अपने पति को राखी बांधती हैं | पति अपनी पत्नी को रक्षा का वचन देता हैं | सही मायने में यह त्यौहार नारी के प्रति रक्षा की भावना को बढ़ाने के लिए बनाया गया हैं | समाज में नारी की स्थिती बहुत गंभीर हैं क्यूंकि यह त्यौहार अपने मूल अस्तित्व से दूर हटता जा रहा हैं | जरुरत हैं इस त्यौहार के सही मायने को समझे एवम अपने आस पास के सभी लोगो को समझायें | अपने बच्चो को इसे लेन देन से हटकर इस त्यौहार की परम्परा को समझायें तब ही आगे जाकर यह त्यौहार अपने एतिहासिक मूल को प्राप्त कर सकेगा |

15 August 2016: भारतीय स्वतंत्रता दिवस

    


भारतीय स्वतंत्रता दिवस


प्रत्येक वर्ष भारत में 15 अगस्त को स्वन्त्रता दिवस के रुप में मनाया जाता है। भारत के लोगों के लिये ये दिन बहुत महत्वपूर्ण होता है। वर्षों की गुलामी के बाद ब्रिटिश शासन से इसी दिन भारत को आजादी मिली। 15 अग्स्त 1947 को ब्रिटिश साम्राज्य से देश की स्वतंत्रता को सम्मान देने के लिये पूरे भारत में राष्ट्रीय और राजपत्रित अवकाश के रुप में इस दिन को घोषित किया गया है।
हालाँकि अंग्रेजों से आजादी पाना भारत के लिये आसान नहीं था; लेकिन कई महान लोगों और स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे सच कर दिखाया। अपने सुख, आराम और आजादी  की चिंता किये बगैर उन्होंने अपने भावी पीढ़ी की आजादी के लिये अपना जीवन बलिदान कर दिया। पूर्ण स्वराज प्राप्त करने के लिये हिंसात्मक और अहिंसात्मक सहित इन्होंने कई सारे स्वतंत्रता आंदोलन को आयोजित किये तथा उस पर कार्य किया। आजादी के बाद भारत से पाकिस्तान अलग बँट गया जो कि हिंसात्मक दंगों को भी साथ लाया। अपने घरों से लोगों का विस्थापन (15 लाख लोगों से अधिक) और बड़ी संख्या में जनहानि का कारण ये डरावना दंगा था।
इस दिन पर, सभी राष्ट्रीय, राज्य तथा स्थानीय सरकार के कार्यालय, बैंक, पोस्ट ऑफिस, बाजार, दुकानें, व्यापार, संस्थान आदि बंद रहते है। हालाँकि, सार्वजनिक परिवहन बिल्कुल प्रभावित नहीं होता है। इसे बहुत उत्साह के साथ भारत की राजधानी दिल्ली में मनाया जाता है जबकि स्कूल, कॉलेज और सार्वजनिक समुदाय तथा समाज सहित दूसरे शिक्षण संस्थानों में भी मनाया जाता है।



सोमवार, 15 अगस्त 2016 को पूरे भारत के लोगों द्वारा भारत के स्वतंत्रता दिवस को मनाया जा रहा है। इस साल 2016 में भारत अपना 70वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। 15 अगस्त 1947 को भारत में प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था।

भारत के स्वतंत्रता दिवस का इतिहास

17वीँ शताब्दी के दौरान कुछ यूरोपियन व्यापारियों द्वारा भारतीय उपमहाद्वीप के सीमा चौकी पर प्रवेश किया गया। अपने विशाल सैनिक शक्ति की वजह से ब्रिटीश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भारत को गुलाम बना लिया गया। 18 शताब्दी के दौरान पूरे भारत में अंग्रेजों ने अपना स्थानीय साम्राज्य और असरदार ताकत स्थापित कर लिया था। 1857 में ब्रिटीश शासन के खिलाफ भारत के लोगों द्वारा एक बहुत बड़े स्वतंत्रता क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी। उस गदर को महान गदर कहा जाता है, 1857 का विद्रोह, भारतीय बगावत, 1857 का पठान और सिपाहीयों का विद्रोह। 10 मई 1857 में बंगाल प्रांत में ब्रिटीश ईस्ट इंडिया कंपनी आर्मी के खिलाफ इसकी शुरुआत हो गई। उस विद्रोह के द्वारा (1858 का अधिनियम भारत सरकार), भारत को नियंत्रण मुक्त करने का एहसास ब्रिटीश राज को भारतीय स्वतंत्रता सेनानीयों ने दिलाया।
1857 की बगावत एक  असरदार विद्रोह था जिसके बाद पूरे भारत से कई सारे नगरीय समाज उभरे। उनमें से एक भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी थी जिसका निर्माण वर्ष 1885 हुआ। पूरे राष्ट्र में असंतोष और उदासी के काल ने अहिंसात्मक आंदोलनों (असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन) को बढ़ावा दिया जिसका नेतृत्व गाँधी जी ने किया।
लाहौर में 1929 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस अधिवेशन में, भारत ने पूर्ण स्वराज की घोषणा की। इसके पहले, 1930 से 1947 के बीच भारतीय स्वतंत्रता दिवस के रुप में 26 जनवरी को घोषित किया गया। सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिये भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस द्वारा भारतीय नागरिकों से निवेदन किया गया था साथ ही साथ भारत के पूर्ण स्वतंत्रता तक आदेशों का पालन समय से करने के लिये भी कहा गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1947 में ब्रिटिश सरकार आश्वस्त हो चुकी थी कि वो लंबे समय तक भारत को अपनी शक्ति नहीं दिखा सकती। भारतीय स्वतंत्रता सेनानी लगातार लड़ रहे थे और तब अंग्रेजों ने भारत को मुक्त करने का फैसला किया हालाँकि भारत की आजादी (15 अगस्त 1947) के बाद हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए जिसने भारत और पाकिस्तान को अलग कर दिया। मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल बने जबकि पंडित जवाहर लाल नेहरु आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री। दिल्ली, देश की राजधानी में एक आधिकारिक समारोह रखा गया जहाँ सभी बड़े नेता और स्वतंत्रता सेनानियों (अबुल कलाम आजद, बी.आर.अंबेडकर, मास्टर तारा सिंह, आदि) ने इसमें भाग लेकर आजादी का पर्व मनाया।
बँटवारे की हिंसा के दौरान बड़ी संख्या में दोनों तरफ से लोग मरे जबकि दूसरे क्षेत्र के लोगों ने स्वतंत्रता दिवस मनाया था। संवैधानिक हॉल, नई दिल्ली में राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के नेतृत्व में 14 अगस्त को 11 बजे रात को संवैधानिक सभा की 5वीं मीटींग रखी गई थी जहाँ जवाहर लाल नेहरु ने अपना भाषण दिया था।
15 अगस्त 1947 की मध्यरात्री, जवाहर लाल नेहरु ने भारत को स्वतंत्र देश घोषित किया जहाँ उन्होंने “ट्रीस्ट ओवर डेस्टिनी” भाषण दिया था। उन्होंने अपने भाषण के दौरान कहा कि “बहुत साल पहले हमने भाग्यवधु से प्रतिज्ञा की थी और अब समय आ गया है जब हम अपने वादे को पूरा करेंगे, ना ही पूर्णतया या पूरी मात्रा में बल्कि बहुत मजबूती से। मध्यरात्री घंटे के स्पर्श पर जब दुनिया सोती है, भारत जीवन और आजादी के लिये जागेगा। एक पल आयेगा, जो आयेगा, लेकिन इतिहास में कभी कभार, जब हम पुराने से नए की ओर बढ़ते है, जब उम्र खत्म हो जाती है और राष्ट्र की आत्मा जो लंबे समय से दवायी गयी थी उसको अभिव्यक्ति मिल गयी है। आज हमने अपने दुर्भाग्य को समाप्त कर दिया और और भारत ने खुद को फिर से खोजा”।
इसके बाद, असेंबली सदस्यों ने पूरी निष्ठा से देश को अपनी सेवाएँ देने के लिये कसम खायी। भारतीय महिलाओं के समूह द्वारा असेंबली को आधिकारिक रुप से राष्ट्रीय ध्वज प्रस्तुत किया था। अतत: भारत आधिकारिक रुप से स्वतंत्र देश हो गया, और नेहरु तथा वाइसराय लार्ड माउंटबेटन, क्रमश: प्रधानमंत्री और गवर्नर जनरल बने। महात्मा गाँधी इस उत्सव में शामिल नहीं थे। वो कलकत्ता में रुके थे और हिन्दु तथा मुस्लिम के बीच शांति को बढ़ावा देने केलिये 24 घंटे का व्रत रखा था।

स्वतंत्रता दिवस उत्सव

भारत के राष्ट्रीय अवकाश के रुप में पूरे भारत में स्वतंत्रता दिवस को मनाया जाता है। इसे हर साल प्रत्येक राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों में पूरे उत्सुकता से देखा जाता है। स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले की शाम को “राष्ट्र के नाम संबोधन” में हर साल भारत के राष्ट्रपति भाषण देते है। 15 अगस्त को देश की राजधानी में पूरे जुनून के साथ इसे मनाया जाता है जहाँ दिल्ली के लाल किले पर भारत के प्रधानमंत्री झंडा फहराते है। ध्वजारोहण के बाद, राष्ट्रगान होता है, 21 तोपों की सलामी दी जाती है तथा तिरंगे और महान पर्व को सम्मान दिया जाता है।
स्वतंत्रता  सेनानियों और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओँ जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी थी को श्रद्धांजलि देने के बाद, स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण के दौरान भारत के प्रधानमंत्री पिछले साल की उपलब्धियों, महत्पूर्ण सामाजिक मुद्दे और उनके हल, देश के आगे का विकास, शिक्षा आदि को रेखांकित करते है। पैरामिलीट्री फोर्सेस और भारतीय सैनिकों द्वारा भव्य मार्च पास्ट किया जाता है। विभिन्न सांस्कृतिक परंपरा के अलग-अलग राज्य में स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाया जाता है जहाँ हर राज्य का मुख्यमंत्री राष्ट्रीय झंडे को फहराता है जोकि प्रतिभागियों द्वारा विभिन्न सांस्कृतिक क्रिया-कलापों द्वारा लहराया जाता है।
ध्वजारोहण, राष्ट्रगान, परेड समारोह, दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रम सहित लगभग सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थान, शिक्षण संस्थान, कुछ निजी संस्थान आदि पूरे देश में होता है। स्कूल तथा कॉलेजों में प्रधानाचार्य द्वारा झंडा फहराया जाता है और फिर वहाँ के विद्यार्थियों द्वारा परेड और सांस्कृतिक कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जाता है। इस दिन पर, सरकारी कार्यालय, बिल्डिंग आदि को रोशनी, फूलों और दूसरे सजावटी समानों से सजाया जाता है। अलग अलग लंबाई के झंडे के द्वारा लोग देश के प्रति अपने समर्पण और प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते है।
स्वतंत्रता दिवस को मनाने के दौरान आतंकवादी हमलों का बड़ा खतरा रहता है खासतौर से दिल्ली, मुम्बई तथा जम्मु-कश्मीर जैसे बड़े शहरों में। इसी वजह से इस अवसर पर हवाई हमलों से बचने के लिये लाल किले के आस-पास के क्षेत्र को “नो फ्लाई जोन” घोषित कर दिया जाता है। सुरक्षा कारणों से पूरे शहर में अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की जाती है। पूरे देश के लोगों के लिये इस कार्यक्रम का टेलीविजन पर सजीव प्रसारण किया जाता है।
इस अवसर को लोग अपने दोस्त, परिवार, और पङोसियों के साथ फिल्म देखकर, पिकनिक मनाकर, समाजिक कार्यक्रमों में भाग लेकर मनाते है। इस दिन पर बच्चे अपने हाथ में तिरंगा लेकर ‘जय जवान जय जय किसान’ और दूसरे प्रसिद्ध नारे लगाते है।

भारत में स्वतंत्रता दिवस का महत्व और प्रतीक

स्वतंत्रता दिवस प्रतीक है भारत में पतंग उड़ाने के खेल का। अनगिनत विभिन्न आकार, प्रकार और स्टाईल के पतंगों से भारतीय आकाश पट जाता है। इनमें से कुछ तिरंगे के तीन रंगो में भी होता है जो राष्ट्रीय ध्वज को प्रदर्शित करता है। स्वतंत्रता दिवस का दूसरा प्रतीक नई दिल्ली का लाल किला है जहाँ 15 अगस्त 1947 को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने तिरंगा फहराया था।
1947 में ब्रिटीश शासन से भारत की आजदी को याद करने के लिये हम स्वतंत्रता दिवस को मनाते है। 15 अगस्त भारत के पुनर्जन्म जैसा है। ये वो दिन है जब अंग्रेजों ने भारत को छोड़ दिया और इसकी बागडोर हिन्दूस्तानी नेताओं के हाथ में आयी। ये भारतियों के लिये बेहद महत्वपूर्ण दिन है और भारत के लोग इसे हर साल पूरे उत्साह के साथ मनाते है।

15 अगस्त: ये दस बातें आपको पता हैं?

भारत के स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया था. लेकिन जब देश को 15 अगस्त, 1947 को आज़ादी मिली तो वे इसके जश्न में शामिल नहीं हुए।
भारत की आज़ादी से जुड़ी दस दिलचस्प बातें।
1. महात्मा गांधी आज़ादी के दिन दिल्ली से हज़ारों किलोमीटर दूर बंगाल के नोआखली में थे, जहां वे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन पर थे।
2. जब तय हो गया कि भारत 15 अगस्त को आज़ाद होगा तो जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी को ख़त भेजा। इस ख़त में लिखा था, "15 अगस्त हमारा पहला स्वाधीनता दिवस होगा। आप राष्ट्रपिता हैं, इसमें शामिल हो अपना आशीर्वाद दें।"
3. गांधी ने इस ख़त का जवाब भिजवाया, "जब कलकत्ते में हिंदु-मुस्लिम एक दूसरे की जान ले रहे हैं, ऐसे में मैं जश्न मनाने के लिए कैसे आ सकता हूं। मैं दंगा रोकने के लिए अपनी जान दे दूंगा।"
4. जवाहर लाल नेहरू ने ऐतिहासिक भाषण 'ट्रिस्ट विद डेस्टनी' 14 अगस्त की मध्यरात्रि को वायसराय लॉज (मौजूदा राष्ट्रपति भवन) से दिया था। तब नेहरू प्रधानमंत्री नहीं बने थे। इस भाषण को पूरी दुनिया ने सुना, लेकिन गांधी उस दिन नौ बजे सोने चले गए थे।
5. 15 अगस्त, 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने अपने दफ़्तर में काम किया। दोपहर में नेहरू ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल की सूची सौंपी और बाद में इंडिया गेट के पास प्रिसेंज गार्डेन में एक सभा को संबोधित किया।
6. हर स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय प्रधानमंत्री लाल किले से झंडा फहराते हैं। लेकिन 15 अगस्त, 1947 को ऐसा नहीं हुआ था। लोकसभा सचिवालय के एक शोध पत्र के मुताबिक नेहरू ने 16 अगस्त, 1947 को लाल किले से झंडा फहराया था।
7. भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन के प्रेस सचिव कैंपबेल जॉनसन के मुताबिक़ मित्र देश की सेना के सामने जापान के समर्पण की दूसरी वर्षगांठ 15 अगस्त को पड़ रही थी, इसी दिन भारत को आज़ाद करने का फ़ैसला हुआ।
8. 15 अगस्त तक भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा रेखा का निर्धारण नहीं हुआ था। इसका फ़ैसला 17 अगस्त को रेडक्लिफ लाइन की घोषणा से हुआ।
9. भारत 15 अगस्त को आज़ाद जरूर हो गया, लेकिन उसका अपना कोई राष्ट्र गान नहीं था. रवींद्रनाथ टैगोर जन-गण-मन 1911 में ही लिख चुके थे, लेकिन यह राष्ट्रगान 1950 में ही बन पाया।
10. 15 अगस्त भारत के अलावा तीन अन्य देशों का भी स्वतंत्रता दिवस है। दक्षिण कोरिया जापान से 15 अगस्त, 1945 को आज़ाद हुआ। ब्रिटेन से बहरीन 15 अगस्त, 1971 को और फ्रांस से कांगो 15 अगस्त, 1960 को आज़ाद हुआ।

मुकम्मल है इबादत और मैं वतन ईमान रखता हूँ,
वतन के शान की खातिर हथेली पे जान रखता हूँ !!
क्यु पढ़ते हो मेरी आँखों में नक्शा पाकिस्तान का ,
मुस्लमान हूँ मैं सच्चा, दिल में हिंदुस्तान रखता हूँ !!

संस्कार और संस्कृति की शान मिले ऐसे,
हिन्दू मुस्लिम और हिंदुस्तान मिले ऐसे
हम मिलजुल के रहे ऐसे की
मंदिर में अल्लाह और मस्जिद में राम मिले जैसे.

दे सलामी इस तिरंगे को
जिस से तेरी शान हैं,
सर हमेशा ऊँचा रखना इसका
जब तक दिल में जान हैं..!!

गंगा यमुना यहाँ नर्मदा,
मंदिर मस्जिद के संग गिरजा,
शांति प्रेम की देता शिक्षा,
मेरा भारत सदा सर्वदा..!!

ये पेड़ ये पत्ते ये शाखें भी परेशान हो जाएं !
अगर परिंदे भी हिन्दू और मुस्लमान हो जाएं….!

न मस्जिद को जानते हैं , न शिवालों को जानते हैं
जो भूखे पेट होते हैं, वो सिर्फ निवालों को जानते हैं.
मेरा यही अंदाज ज़माने को खलता है.
की मेरा चिराग हवा के खिलाफ क्यों जलता है……
में अमन पसंद हूँ, मेरे शहर में दंगा रहने दो…
लाल और हरे में मत बांटो, मेरी छत पर तिरंगा रहने दो….!

मैं भारत बरस का हरदम अमित सम्मान करता हूँ
यहाँ की चांदनी मिट्टी का ही गुणगान करता हूँ,
मुझे चिंता नहीं है स्वर्ग जाकर मोक्ष पाने की,
तिरंगा हो कफ़न मेरा, बस यही अरमान रखता हूँ।

ज़माने भर में मिलते हे आशिक कई ,
मगर वतन से खूबसूरत कोई सनम नहीं होता ,
नोटों में भी लिपट कर, सोने में सिमटकर मरे हे कई ,
मगर तिरंगे से खूबसूरत कोई कफ़न नहीं होता…|

ऊंची हुई मशाल हमारी
आगे कठिन डगर है
शत्रु हट गया, लेकिन उसकी
छायाओं का डर है
शोषण से है मृत समाज
कमज़ोर हमारा घर है
किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी
यह विश्वास अमर है
जन-गंगा में ज्वार,
लहर तुम प्रवहमान रहना
पहरुए! सावधान रहना।।


HAPPY FRIENDSHIP DAY by SHAFAR

    


दोस्त ना मिल सकें वो शोहरतों- सामाँ ना हो  द्वारिका क्या है जहां कोई सुदामा ना हो  बात करो रूठे यारों से! सन्नाटे से डर जाते है.......प्यार अकेला ही ज़ी सकता है.... दोस्त अकेले मर जाते हैं!


दोस्ती दुनिया का सबसे हसीन रिश्ता
है। एक सच्चा दोस्त हमारी जिंदगी को
नई राह दे सकता है। लेकिन अक्सर हम
लोग छोटी - छोटी गलतियों या भूलों की
वजह से अपना बेशकीमती दोस्त खो देते हैं।
आज फ्रेंडशिप डे के मौके पर हम आपको बता रहे हैं ऐसी ही चंद भूलों के बारे में , जिनसे आपको बचना
चाहिए। पूरी जानकारी शमशेर अली से...

किसी के भी हाथ में एक बेल्ट बांध दिया और हो गई दोस्ती पक्क‍ी, बन गए फ्रेंड्‍स। पर वास्तव में यह एक झूठ है जो कुछेक पल के लिए अपने दिल को तसल्ली तो दे सकता है लेकिन वास्तव में आपको उस गहरी दोस्ती का अहसास नहीं कराता।
दोस्ती से मतलब यह कहीं नहीं निकलता कि सालों पहले की गई दोस्ती ही कहलाती है। ऐसा नहीं है दोस्ती वह हो जो चाहे एक दिन पहले, एक साल पहले या कई वर्षों पहले की हो। दोस्ती वह ‍जिसमें आप अपने दोस्तों के प्रति पूरी तरह समर्पित हो। 
यह बात सिर्फ किसी भी सहाय‍ता के लिए नहीं है। लेकिन हर समय, हर सुख-दुख और हर पल दिल को उस इंसान का खयाल रहे, चाहे सुख हो दुख, हर पहलू में वह सामने वाले को एक ही नजर से देखें, उसमें परखने की, या फिर इस उम्मीद कि मैंने तो उसकी दुख में मदद की थी, लेकिन जब आज मैं दुख से गुजर रहा हूं तब वहीं दोस्त मेरे काम नहीं आया। ऐसी कोई भी भावना दोस्ती के आड़े नहीं आनी चाहिए।
दोस्ती करते और निभाते समय दिल में अहंकार, ईर्ष्या और बदले की भावना कभी भी लेकर दोस्त नहीं बनाने चाहिए। ऐसी दोस्त‍ी बनाने पर आपके मन का अहंकार समय आने पर उस दोस्त से बदला लेने पर उतारू हो जाएगा। और जब मन अहंकार, ईर्ष्या तले जलने लगे‍गा तब दोस्ती दोस्ती न रखकर एक मजाक बन जाएगी। 

इसलिए हमेशा दोस्त बनाते समय अपने मन के आंगन से उस दोस्त के लिए अहंकार का त्याग कर क्षमा के रूप में आगे बढ़ते हुए दोस्ती का हाथ बढ़ाएं। तभी आपकी दोस्ती बनाने का किया गया प्रयत्न सफल होगा।
स्कूल-कॉलेज हो या ऑफिस लाइफ हो ‍दोस्ती का यह रिश्ता ऐसा कभी भी ना बनाए जो जरा-सी भूल से आपकी दोस्ती के बीच दरार आ जाए। 

दोस्ती का यह रिश्ता इतना गहरा हो कि चाहे उसमें लोग कमल खिलाएं या कांटे उगाएं... कहने का तात्पर्य यह है कि आज के जमाने में हर इंसान का दूसरे इंसान को देखने का नजरिया, अंदाज अलग-अलग होता है और ऐसे में आपके द्वारा की गई दोस्ती और वह भी एक मेल की फीमेल से की गई दोस्ती को दुनिया वाले किस अंदाज में लेंगे। यह बताना बहुत मुश्किल है।

ऐसे समय दोस्त बनाते समय आपका दोस्त सच्चाई का साथ देते हुए अपने दोस्ती के अटल वादे पर काम रहे। किसी भी रिश्ते को निभाने में विश्वास क‍ी मजबूत डोर ही उसे आखिरी अंजाम तक पहुंचाती है। 

अत: दोस्त जरूर बनाएं, दोस्ती भी जरूर करें लेकिन उस रिश्ते को किसी भी तरह दरकने न दें। 

हमेशा ऐसे दोस्त चुनें या बनाएं ‍जो हर नजरिये से दोस्ती करने लायक हो


दोस्ती में 10 भूलें

सुनना नहीं , सलाह देना
दोस्ती की नींव है बातचीत , लेकिन
ध्यान रखें कि इस बातचीत में जितना
जरूरी अपनी बात सामनेवाले को सुनाना
है , उससे ज्यादा जरूरी है उसकी बात
सुनना। दोस्त को बिना टोके अपनी बात
पूरी करने दें। खुद भी अपने बारे में जो भी
बताएं , पूरी ईमानदारी और खुलेपन के
साथ। साथ ही , लोग दोस्त की बात
सुनकर उसे सलाह देने लगते हैं। यह सही
नहीं है। अक्सर सामने वाला सिर्फ आपसे
बातें शेयर कर रहा होता है। वह आपसे
सलाह नहीं चाहता। इसलिए जब तक
आपका दोस्त आपसे सलाह न मांगे , आप
सलाह न दें। दोस्तों के बीच बहस भी खूब
होती है। पारिवारिक रिश्तों में हम
जिस तरह खुलकर बातें नहीं कर पाते ,
दोस्ती में वह छूट हमारे पास होती है ,
लेकिन यहां भी लिमिट ध्यान रखें और
आपसी बहस को हेल्दी डिबेट तक ही रखें।
अपनी बात को साबित करने के लिए दोस्त
को हर्ट करने की कोशिश न करें।

बदलने की कोशिश

हम किसी से दोस्ती अक्सर उसकी किसी
खासियत से इम्प्रेस होकर करते हैं। ऐसे में
हम सिर्फ उसकी पॉजिटिव चीजें देख रहे
होते हैं। लेकिन वक्त के साथ उसकी
खामियां भी नजर आने लगती हैं , बल्कि कई
बार हम उन्हीं पर फोकस करने लगते हैं।
जान लें कि दुनिया में कोई भी परफेक्ट
नहीं है। आप भी नहीं। फिर दूसरे से ऐसा
होने की उम्मीद क्यों ? हमें अपने दोस्त को
उसकी कमियों और कमजोरियों के साथ
स्वीकार करना चाहिए। साथ ही , उसकी
निंदा न करें। आलोचना तो अक्सर
परिवार वाले भी करते हैं। दोस्ती का तो
मतलब ही है कि जैसा है , उसे वैसे ही
स्वीकार करें और बदलने की कोशिश न करें।
अगर दोस्त की कोई बात पसंद नहीं आती
तो उस पर ध्यान लगाने की बजाय उसे
इग्नोर करें। इससे आपका मन भी शांत
रहेगा और रिश्ता भी कायम रहेगा। यहां
यह भी जरूरी है कि हम दोस्ती के साथ -
साथ दोस्त की भी कद्र करें।

सुख में साथ , दुख में दूर

दोस्ती का मतलब लोग मौज - मस्ती ,
पार्टी , सेलिब्रेशन ही समझते हैं। यह
गलत है। अगर आप सच्चे दोस्त हैं तो अपने
दोस्त की खुशी में शरीक न भी हो पाएं ,
लेकिन उसके गम का हिस्सा जरूर बनेंगे।
अगर वह तकलीफ में है और आपसे कुछ शेयर
करता है तो आप उसे महसूस करें। सिर्फ
हमदर्दी के कुछ बोल बोलकर अपना काम
खत्म न समझें , उसकी मदद करें। कहा भी
जाता है कि असली दोस्ती की परख
मुसीबत में ही होती है। अगर वह आपसे कुछ
शेयर नहीं करना चाहता तो पूछने की
कोशिश जरूर करें ताकि उसका मन हल्का
हो सके लेकिन कुरेद - कुरेद कर कभी न पूछें।
लेकिन अगर आपको लगता है कि आपका
दोस्त किसी गलत राह पर जा रहा है तो
उसे समझा - बुझाकर उधर जाने से जरूर
रोकें। आमतौर पर लोग दोस्तों की बातें
सुनते और मानते हैं। यह न सोचें कि इससे
दोस्ती खतरे में पड़ जाएगी। समझ आने पर
आपका दोस्त आपके और करीब आ जाएगा।

बांध कर रखना

अपने दोस्त को कभी भी बांधने की कोशिश
न करें। यह न सोचें कि वह हमेशा सिर्फ
मेरा ही दोस्त बना रहेगा। अपने दोस्त
की लिमिटेशन को समझें और उम्मीदों को
सच की कसौटी पर आंकें। मानें कि उसका
भी परिवार है , दूसरे दोस्त हैं , ऑफिस है ,
उन तमाम चीजों के लिए उसे वक्त चाहिए।
यह सोचने की बजाय कि वह आपसे मिला
नहीं , सोचें कि हो सकता है कि वह वाकई
बिजी हो। दोस्ती में सामनेवाले को स्पेस
देना बहुत जरूरी है। रिश्ते में एक सेफ
फासला देना चाहिए। अगर आप दोस्त को
वक्त - बेवक्त डिस्टर्ब करते रहेंगे तो यह
आपकी दोस्ती को डिस्टर्ब कर सकता है।
अपनी दोस्ती की तुलना अपने या दोस्त के
बाकी दोस्तों से न करें। दोस्त और उसके
दोस्तों से किसी भी चीज को लेकर जलन न
करें। अगर मन में कोई बात आती है तो उसे
दिल खोलकर दोस्त के साथ शेयर कर लें ,
पर उसे ऐसा न लगे कि आपकी निगाह
उसकी किसी चीज पर है।

भावनाएं न जताना

किसी भी रिश्ते में इजहार बहुत जरूरी है।
दोस्ती पर भी यह बात लागू होती है।
इसका मतलब यह नहीं कि आप हर वक्त
सामनेवाले को जताते रहें कि आप उसकी
कितनी कद करते हैं लेकिन बीच - बीच में ,
खासकर उसकी जिंदगी के खास मौकों
मसलन जन्मदिन , शादी की सालगिरह
आदि पर ऐसा करने का मौका न चूकें। इन
मौकों के अलावा बीच - बीच में भी दोस्तों
को कोई सरप्राइज देना चाहिए। उसे
अच्छा लगेगा। इसी तरह अगर दोस्त से
कोई वादा किया है , तो उसे जरूर पूरा
करें। यहां यह ध्यान रखना भी जरूरी है
कि इमोशनल डिस्प्ले जरूरत से ज्यादा न
हो। दोस्त से अपनी बातें ईमानदारी से
शेयर करना जरूरी है , लेकिन ध्यान रखें कि
आप हमेशा अपनी परेशानियों और तकलीफों
का रोना ही न रोते रहें। भावनाओं का
इजहार करते वक्त भी बैलेंस्ड होना जरूरी
है।

अपनी मर्जी चलाना

अक्सर हम दोस्त की पसंद - नापसंद को
नजरअंदाज कर देते हैं। दोस्तों के बीच
कॉमन इंट्रेस्ट शेयर करना बहुत जरूरी है।
ध्यान रखें कि दोस्त के साथ छुट्टियां या
फिल्म आदि प्लान करते वक्त उसकी पसंद -
नापसंद का भी ध्यान रखें। उससे पूछें कि
उसे क्या पसंद है और क्या नापसंद। कभी
उसकी पसंद की जगह पर जाएं , कभी आपकी
पसंद पर। बातचीत में भी सामनेवाली की
पसंद के ठीक उलट टॉपिक पर बार - बार
चर्चा से बचें , वरना आपका साथ उसके लिए
बोरिंग साबित होगा। दोस्ती में पैसा
भी काफी मायने रखता है। अक्सर एक ही
हैसियत के लोगों में दोस्ती होती है।
हालांकि इसके अपवाद भी मिलते हैं ,
लेकिन पैसे को लेकर नजरिया जरूर मायने
रखता है। ध्यान रखें कि ऐसा न हो कि
कोई एक ही खर्च करता रहे और दूसरा
चुपचाप बैठा रहे।

मतभेद को मनभेद बनाना

कॉमन फ्रेंड्स में या किसी से भी अपने
दोस्त की बुराई न करें। आमतौर पर लोग
दूसरे से कोई बात शेयर करते हुए कहते हैं कि
किसी से न कहना लेकिन वे भूल जाते हैं कि
सामनेवाला भी इस बात को दूसरे से शेयर
करते हुए यही करेगा। इस तरह एक की
कही बात पूरे सर्कल में फैल जाती है।
कॉमन दोस्तों के बीच कही कोई बात
अक्सर दोस्ती के लिए दरार साबित
होती है। दोस्त को लेकर कोई गलतफहमी
हो गई है , तो उसे गांठ न बनाएं। उस मसले
पर डिस्कस करके हल कर लें। अपनी बात
कहने के साथ - साथ दूसरे को भी अपनी
बात कहने का मौका दें। आपसी दिक्कत को
हल करने के लिए किसी तीसरे की मदद न
लें। खुद ही हल निकालें। किसी भी रिश्ते
में ट्रांसपैरंसी बहुत जरूरी है। इसी तरह ,
दोस्त की कोई बात बुरी लगी तो उसे
माफ करना सीखें।

फैमिली से न घुलना

शादी के बाद कई बार अच्छे दोस्तों की
दोस्ती भी खत्म हो जाती है। इससे
निपटने के लिए दो चीजें जरूरी हैं। सबसे
पहले आप अपने दोस्त को छूट दें कि वह
अपनी नई लाइफ में थोड़ा बिजी हो
सकता है। उसकी जिम्मेदारियां बढ़ गई
हैं। नए रिश्तों में एडजस्टमेंट के लिए वक्त
की जरूरत होती है। ऐसे में आप आगे बढ़कर
दोस्त के साथ कॉन्टैक्ट कर लें। अपने दोस्त
के पार्टनर व बच्चों आदि के साथ भी
रिश्ता बढ़ाने की कोशिश करें। इससे
दोस्ती भी बनी रहेगी और मजा भी
ज्यादा आएगा। अगर आपका पार्टनर आपके
दोस्त के साथ रिश्ता न रखना चाहता हो
तो उसे मजबूर न करें। स्वीकार करें कि
उसकी अपनी पसंद - नापसंद है , उसका
अपना दोस्तों का सर्कल है लेकिन अपनी
दोस्ती की अहमियत उसे बताएं और अपने
दम पर रिश्ते को बनाए रखें।

वर्चुअल दोस्ती में बिजी

यह सही है कि आजकल हर कोई बिजी है।
ऐसे में लंबे वक्त तक लोग सोशल नेटवर्किंग
साइट या फोन के जरिए ही दोस्तों के टच
में रहते हैं। अक्सर उन्हें लगता है कि
दोस्ती के लिए हमेशा मिलना - जुलना
जरूरी थोड़े ही है। यह बात काफी हद तक
सही भी है लेकिन पूरी तरह नहीं। आपस में
मिलने - जुलने और पर्सनल टच बनाए रखने से
रिश्ते मजबूत होते हैं। जितना वक्त आप
वर्चुअल दुनिया में देते हैं , अगर उसमें से कुछ
वक्त निकालकर सामने जाकर मिलेंगे तो
दोस्त के साथ का मजा भी लेंगे और रिश्ते
भी मजबूत होंगे। अब यह मिलना - जुलना
बेशक कुछ दिनों या महीने में ही क्यों न हो
, पर ऐसा करना आपके रिश्ते को नई
ताजगी से भर देगा।

नाप - तोल करना

दोस्ती में कभी भी स्वार्थी न बनें। यह न
सोचें कि इस दोस्ती से मुझे फलां फायदा
होगा। इससे आनेवाले वक्त में आपको तो
झटका लगेगा ही , असलियत पता लगने पर
आप एक अच्छा दोस्त भी खो देंगे। दोस्ती
में नाप - तोल न करें। यह न सोचें कि उसने
मेरे लिए जो किया , मैं भी उतना ही करूं।
वह मेरे घर नहीं आया तो मैं ही क्यों जाऊं ?
उसने कॉल नहीं किया तो मैं क्यों करूं ?
दोस्ती आपने इसलिए की कि आपको फलां
शख्स पसंद है तो फिर एक कदम आगे बढ़ाने में
आपको संकोच क्यों ? दोस्त के लिए कुछ
करके आपको भी खुशी मिलेगी और दोस्त को
भी , फिर नाप - तोल क्यों ? इसी तरह
अगर कोई दोस्त आपसे ज्यादा कॉन्टैक्ट
नहीं कर पा रहा तो यह न सोचें कि वह
आपसे दोस्ती नहीं रखना चाहिए , यानी
मन में खुद ही कुछ न गढ़ लें।
Happy Friendship day!

सावधान! ज्यादा जम्हाई आने के हैं ये खतरे

    


ज्यादा जम्हाई लेने की आदत पर अक्सर बोला जाता है कि नींद पूरी नहीं हुई है लेकिन लेकिन जम्हाई आने के और भी कई कारण हो सकते हैं। हमारी ब्रेन ऐक्टिविटी से इसका सीधा कनेक्शन होता है। इसके अलावा हार्ट प्रॉब्लम जैसी सीरियस डिजीज से भी जम्हाई का रिलेशन हो सकता है। जानें क्या हो सकते हैं कारण:-

हार्ट प्रॉब्लम 

बहुत ज्यादा जम्हाई आने का संबंध हार्ट प्रॉब्लम से हो सकता है। शरीर में ऑक्सिजन की कमी होने पर ब्लड पंप करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। इससे हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है।


थाइरॉयड

बार-बार जम्हाई आना हाईपोथाइरॉयड डिस्म की निशानी हो सकती है। शरीर में थाइरॉयड हॉर्मोन कम बनने पर ऐसा होता है।


कान का दर्द

प्लेन या लिफ्ट में ऊपर जाने पर हवा का दबाव कम होने से कान बंद होने की समस्या होती है। जम्हाई आने से कान में हवा दबाव सही होता है।


स्ट्रेस

कई रिसर्च दावा करती हैं कि स्ट्रेस बढ़ने पर ब्रेन टेम्प्रेचर बढ़ता है। ऐसे में जम्हाई आती है। इस प्रोसेस के दौरान हमें ऑक्सिजन की पर्याप्त मात्रा मिलती है, जिससे दिमाग ठंडा होता है।


लंग्स की समस्या

 ब्रेन में ऑक्सिजन का फ्लो कम और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा ज्यादा होने पर लंग्स प्रॉब्लम हो सकती है। ऐसे में जम्हाई आने पर ब्रेन में ऑक्सिजन का फ्लो बढ़ता है और लंग्स से खराब हवा निकालने में मदद मिलती है।

दवाइयों के साइड इफेक्ट्स से

कई बार कुछ दवाइयों के साइड इफेक्ट्स की वजह से बहुत ज्यादा जम्हाई आती है।


एनर्जी की कमी

एनर्जी की कमी होने पर थकान होती है। इस स्थिति में बॉडी में एनर्जी लेवल बढ़ाने के लिए ज्यादा ऑक्सिजन की जरूरत पड़ती है, इसलिए जम्हाई आती है।


नींद की समस्या 

नींद पूरी न होने या स्लीप एप्निया नामक डिसऑर्डर होने पर ज्यादा जम्हाई आने की समस्या होती है।


नर्वस सिस्टम 

नर्वस सिस्टम के फंक्शन में गड़बड़ी होने पर बार-बार जम्हाई आने की समस्या हो सकती है। इसे नकारा नहीं जा सकता है।


अन्‍य संभावित कारण 

उपरोक्त कारणो के अलावा, कुछ अन्‍य कम आम कारण भी बहुत ज्‍यादा जम्हाई का कारण बन सकते हैं। इसमें मिरगी, ब्रेन ट्यूमर या स्ट्रोक, मल्टीप्ल स्क्लेरोसिस और लीवर फेलियर शामिल हैं। बहुत अधिक जम्‍हाई महसूस होने पर इसके कारणों पर ध्‍यान दें और अपने डॉक्‍टर से संपर्क करें।

कारगिल विजय दिवस : जरा याद करो कुर्बानी

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‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌’।
(या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा।)

गीता के इसी श्लोक को प्रेरणा मानकर भारत के शूरवीरों नेमें दुश्मन को पाँव पीछे खींचने के लिए मजबूर कर दिया था। 

26 जुलाई 1999 के दिन भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर भारत भूमि को घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इसी की याद में ‘26 जुलाई’ अब हर वर्ष के रूप में मनाया जाता है।

यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हँसते-हँसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन समर्पित है उन्हें, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए बलिदान कर दिया।

कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि : कारगिल युद्ध जो कारगिल संघर्ष के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में मई के महीने में कश्मीर के कारगिल जिले से प्रारंभ हुआ था। 

इस युद्ध का कारण था बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों व पाक समर्थित आतंकवादियों का लाइन ऑफ कंट्रोल यानी भारत-पाकिस्तान की वास्तविक नियंत्रण रेखा के भीतर प्रवेश कर कई महत्वपूर्ण पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लेह-लद्दाख को भारत से जोड़ने वाली सड़क का नियंत्रण हासिल कर सियाचिन-ग्लेशियर पर भारत की स्थिति को कमजोर कर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरा पैदा करना।

पूरे दो महीने से ज्यादा चले इस युद्ध (विदेशी मीडिया ने इस युद्ध को सीमा संघर्ष प्रचारित किया था) में भारतीय थलसेना व वायुसेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे आक्रमणकारियों को मार भगाया था। स्वतंत्रता का अपना ही मूल्य होता है, जो वीरों के रक्त से चुकाया जाता है।


हिमालय से ऊँचा था साहस उनका : इस युद्ध में हमारे लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा शहीद व 1300 से ज्यादा घायल हो गए, जिनमें से अधिकांश अपने जीवन के 30 वसंत भी नही देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है। 

इन रणबाँकुरों ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था। वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्रध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था। 

भारत के वीर सपूत : 

‘ये दिल माँगे मोर’ - हिमाचलप्रदेश के छोटे से कस्बे पालमपुर के 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के कैप्टन विक्रम बत्रा उन बहादुरों में से एक हैं, जिन्होंने एक के बाद एक कई सामरिक महत्व की चोटियों पर भीषण लड़ाई के बाद फतह हासिल की थी।

यहाँ तक कि पाकिस्तानी लड़ाकों ने भी उनकी बहादुरी को सलाम किया था और उन्हें ‘शेरशाह’ के नाम से नवाजा था। मोर्चे पर डटे इस बहादुर ने अकेले ही कई शत्रुओं को ढेर कर दिया। सामने से होती भीषण गोलीबारी में घायल होने के बावजूद उन्होंने अपनी डेल्टा टुकड़ी के साथ चोटी नं. 4875 पर हमला किया, मगर एक घायल साथी अधिकारी को युद्धक्षेत्र से निकालने के प्रयास में माँ भारती का लाड़ला विक्रम बत्रा 7 जुलाई की सुबह शहीद हो गया। अमर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा को अपने अदम्य साहस व बलिदान के लिए मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैनिक पुरस्कार ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।


17 जाट रेजिमेंट के बहादुर कैप्टन अनुज नायर टाइगर हिल्स सेक्टर की एक महत्वपूर्ण चोटी ‘वन पिंपल’ की लड़ाई में अपने 6 साथियों के शहीद होने के बाद भी मोर्चा सम्भाले रहे। गम्भीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने अतिरिक्त कुमुक आने तक अकेले ही दुश्मनों से लोहा लिया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय सेना इस सामरिक चोटी पर भी वापस कब्जा करने में सफल रही। 

इस वीरता के लिए कैप्टन अनुज को मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े सैनिक सम्मान ‘महावीर चक्र’ से नवाजा गया। 

राजपूताना राइफल्स के मेजर पद्मपाणि आचार्य भी कारगिल में दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए। उनके भाई भी द्रास सेक्टर में इस युद्ध में शामिल थे। उन्हें भी इस वीरता के लिए ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।

1/11 गोरखा राइफल्स के लेफ्टिनेंट मनोज पांडेय की बहादुरी की इबारत आज भी बटालिक सेक्टर के ‘जुबार टॉप’ पर लिखी है। अपनी गोरखा पलटन लेकर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में ‘काली माता की जय’ के नारे के साथ उन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में लड़ते हुए मनोज पांडेय ने दुश्मनों के कई बंकर नष्ट कर दिए। 

गम्भीर रूप से घायल होने के बावजूद मनोज अंतिम क्षण तक लड़ते रहे। भारतीय सेना की ‘साथी को पीछे ना छोडने की परम्परा’ का मरते दम तक पालन करने वाले मनोज पांडेय को उनके शौर्य व बलिदान के लिए मरणोपरांत ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।

भारतीय वायुसेना भी इस युद्ध में जौहर दिखाने में पीछे नहीं रही, टोलोलिंग की दुर्गम पहाडियों में छिपे घुसपैठियों पर हमला करते समय वायुसेना के कई बहादुर अधिकारी व अन्य रैंक भी इस लड़ाई में दुश्मन से लोहा लेते हुए शहीद हुए। सबसे पहले कुर्बानी देने वालों में से थे कैप्टन सौरभ कालिया और उनकी पैट्रोलिंग पार्टी के जवान। घोर यातनाओं के बाद भी कैप्टन कालिया ने कोई भी जानकारी दुश्मनों को नहीं दी। 

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा का विमान भी दुश्मन गोलीबारी का शिकार हुआ। अजय का लड़ाकू विमान दुश्मन की गोलीबारी में नष्ट हो गया, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और पैराशूट से उतरते समय भी शत्रुओं पर गोलीबारी जारी रखी और लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता इस युद्ध में पाकिस्तान द्वारा युद्धबंदी बनाए गए। 

वीरता और बलिदान की यह फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती। भारतीय सेना के विभिन्न रैंकों के लगभग 30,000 अधिकारी व जवानों ने ऑपरेशन विजय में भाग लिया। 

युद्ध के पश्चात पाकिस्तान ने इस युद्ध के लिए कश्मीरी आतंकवादियों को जिम्मेदार ठहराया था, जबकि यह बात किसी से छिपी नहीं थी कि पाकिस्तान इस पूरी लड़ाई में लिप्त था। बाद में नवाज शरीफ और शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पाक सेना की भूमिका को स्वीकार किया था। यह युद्ध हाल के ऊँचाई पर लड़े जाने वाले विश्व के प्रमुख युद्धों में से एक है। सबसे बड़ी बात यह रही कि दोनों ही देश परमाणु हथियारों से संपन्न हैं। 

पर कोई भी युद्ध हथियारों के बल पर नहीं लड़ा जाता है, युद्ध लड़े जाते हैं साहस, बलिदान, राष्ट्रप्रेम व कर्त्तव्य की भावना से और हमारे भारत में इन जज्बों से भरे युवाओं की कोई कमी नहीं है।

मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने वाले अमर बलिदानी भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर इनकी यादें हमारे दिलों में हमेशा- हमेशा के लिए बसी रहेंगी... 


‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा।

दो महीने तक चला था कारगिल युद्ध

पूरे दो महीने से भी अधिक समय तक चले इस युद्ध में भारतीय थलसेना व वायुसेना ने 'लाइन ऑफ कंट्रोल' पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे आक्रमणकारियों को मार भगाया था। दुश्मन पर मिली 26 जुलाई कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज अगर हम देश की सरहद के बीच सकून और सुरक्षित होने का एहसास कर पा रहे हैं तो वह हमारे वीर सैनिकों की वजह से है।

ऑपरेशन बद्र
1998-99 की सर्दियों में पाकिस्तानी सेना आतंकवादियों की मिलीभगत से नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार कर कारगिल क्षेत्र में भारतीय सीमा में घुस आई। सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण कारगिल पहाडिय़ों पर उन्होंने बेहद सर्दी के दिनों में ही कब्जा जमा लिया। उन्होंने घुसपैठ को ऑपरेशन बद्र नाम दिया।

मकसद
दुश्मन की मंशा कश्मीर को लद्दाख से जोडऩे वाली एकमात्र सड़क एनएच-1 पर कब्जा करने की थी। इससे सियाचिन ग्लेशियर पर भारतीय उपस्थिति पर विपरीत असर पड़ता और उसे कश्मीर की विवादित सीमा के मसले पर बातचीत के लिए विवश होना पड़ता। इसके जरिये पाकिस्तान का मकसद कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीकरण करना भी था।

युद्ध
मई, 1999 में भारतीय सेना को घुसपैठ का पता चलते ही सरकार ने ऑपरेशन विजय की घोषणा की। सेना ने हमला बोल दिया। दो महीने तक दोनों पक्षों में भीषण युद्ध हुआ। कई सैनिक शहीद हुए। पहाड़ की ऊंचाई पर कब्जा जमाने के चलते दुश्मनों को रणनीतिक लाभ मिला लेकिन हमारी सेना के तगड़े प्रहार के चलते जल्दी ही उनके पांव उखड़ गए। एक-एक कर कारगिल की सभी चोटियों पर भारतीय परचम फिर से लहराने लगा। 26 जुलाई, 1999 को विजय की घोषणा हुई।

साजिश
पाकिस्तानी सेना हमेशा अपनी घुसपैठ और युद्ध में शिरकत से इन्कार करती रही लेकिन माना जाता है कि अक्टूबर, 1998 में पाकिस्तानी सेना की कमान संभालने के बाद जनरल परवेज मुशर्रफ ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी किसी भी भूमिका से इन्कार करते हुए मुशर्रफ को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। मुशर्रफ के रिश्तेदार लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) शाहिद अजीज ने अपनी किताब 'ये खामोशी कहां तक' और पाकिस्तान सेना में कर्नल रहे अशफाक हुसैन ने भी अपनी किताब 'विटनेस टू ब्लंडर-कारगिल स्टोरी अनफोल्ड्स' में मुशर्रफ की कुटिल चालों और उनके झूठ को बेनकाब करते हुए कहा है कि उस युद्ध में पाकिस्तान सेना ने भी हिस्सा लिया था।

कारगिल जंग
मई-जुलाई 1999
नुकसान (भारतीय आधिकारिक आंकड़े)
  • शहीद-527
  • घायल-1363
  • युद्धबंदी-1
  • लड़ाकू विमान गिराया गया-1
  • लड़ाकू विमान क्रैश-1
  • हेलीकाप्टर मार गिराया-1
पाकिस्तानी आधिकारिक आंकड़े
  • मारे गए सैनिक-357-453
  • घायल-665 से अधिक
  • युद्धबंदी-8

कैसे आगाज से अंजाम तक पहुंचा कारगिल युद्ध
  • 3 मई- स्थानीय गड़रियों ने कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ की सूचना दी।
  • 5 मई- भारतीय सेना का गश्ती दल भेजा गया। पांच भारतीय सैनिकों को बंधक बनाकर यातनाएं देकर मार दिया गया।
  • 9 मई- पाकिस्तानी सेना की भारी गोलीबारी में कारगिल में रखे भारतीय गोला-बारुद तबाह हुए।
  • 10 मई- द्रास, काकसर और मुश्कोह सेक्टरों में सबसे पहले घुसपैठ का पता चला।
  • मध्य मई- कारगिल सेक्टर में भारतीय सेना का जमावड़ा।
  • 26 मई- घुसपैठियों पर भारतीय वायुसेना (आइएएफ) ने हमला बोला।
  • 27 मई- आइएएफ के दो लड़ाकू विमान मार गिराए गए। फ्लाइट लेफ्टिनेंच नचिकेता को युद्धबंदी बनाया गया।
  • 28 मई- पाकिस्तान ने आइएएफ एमआइ-17 को मार गिराया। चालक दल के चार सदस्य मारे गए।
  • 1 जून- पाकिस्तान ने एनएच-1 पर बम बरसाने शुरू किए।
  • 5 जून- तीन पाकिस्तानी सैनिकों से मिले कागजात को भारतीय सेना ने जारी किए। ये पाकिस्तानी के शामिल होने की कहानी कह रहे थे।
  • 6 जून- भारतीय सेना ने जोरदार जवाबी हमला शुरू किया।
  • 9 जून- बाल्टिक सेक्टर कीदो अहम चौकियों पर भारत ने दोबारा कब्जा जमाया।
  • 11 जून- भारत ने चीन दौरे पर गए पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख परवेज मुशर्रफ की रावलपिंडी में अपने चीफ ऑफ जनरल स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल अजीज खान से बातचीत को जारी किया। इसमें पाकिस्तानी सेना के शामिल होने की पुष्टि हो रही थी।
  • 13 जून- द्रास में तोलोलिंग पर कब्जा जमाया गया।
  • 15 जून- तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को फोन पर कारगिल से सेना को पीछे हटने को कहा।
  • 29 जून- भारतीय सेना ने दो अहम चौकियों प्वाइंट 5060 और प्वाइंट 5100 पर कब्जा जमाया।
  • 2 जुलाई- भारतीय सेना ने कारगिल में तिहरा हमला शुरू किया।
  • 4 जुलाई- 11 घंटों की मशक्कत के बाद टाइगर हिल पर भारत का कब्जा।
  • 5 जुलाई- द्रास पर भारत का कब्जा, क्लिंटन से मुलाकात के बाद शरीफ ने पाकिस्तानी सेना को वापस बुलाने की घोषणा की।
  • 7 जुलाई- बटालिक में जुबार चोटी पर भारत ने कब्जा जमाया।
  • 11 जुलाई- पाकिस्तानी सेना के पांव उखडऩे शुरू, बटालिक की प्रमुख चोटियों पर भारत का कब्जा।
  • 14 जुलाई- तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री ने कारगिल को घुसपैठियों से मुक्त कराने के लिए चलाए गए ऑपरेशन विजय को सफल घोषित किया।
  • 26 जुलाई- आधिकारिक रूप से कारगिल युद्ध समाप्त हुआ।