Shamsher ALI Siddiquee

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ताजमहल भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है, ये रहे 10 सुबूत!

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संगीत सोम ने बिना सोचे समझे थोड़ी कहा है. उनका कहना है कि ताजमहल हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है.
 बवाल ताजमहल पर है तो आवाज ज्यादा ही होगी. दुनिया से लोग ताजमहल देखने ही तो आते हैं. जेएनयू के गंगा ढाबे पर चाय पीने तो आते नहीं. हमारे पास ऐसे सुबूत हैं जो साबित कर देंगे कि ताजमहल भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है.

1. भूमि अधिग्रहण नहीं हुआ

भारत में कोई भी निर्माण कार्य होने से पहले किसानों की जमीन अधिग्रहीत करनी पड़ती है. किसान छाती कूटते हैं कि हमारी 100 सोने की जमीन माटी मोल जा रही है. सरकार भरी दोपहर में उनके परिवार के एक आदमी को नौकरी और जमीन का पूरा दाम देने का वादा करती है. फिर वादे से मुकरते हुए जमीन हथिया लेती है. ये पहला स्टेप होता है जो ताजमहल बनने में फॉलो नहीं किया गया.

2. टेंडर जारी नहीं हुआ

टेंडर और टेंडर के चक्कर में मर्डर, ये दूसरा स्टेप होता है किसी भी निर्माण कार्य का. सरकार ने न तो इसके लिए टेंडर आमंत्रित किए. न ही अपने किसी आदमी को देकर बाकी सबको टिली लिली धुप किया. हमारी सांस्कृतिक विरासत बिना टेंडर थोड़ी बनेगी.

3. किस योजना के अंतर्गत बना

ये सवाल ताजमहल के बनने से आज तक अनुत्तरित है. आज कोई माई का लाल छाती ठोंककर बता दे कि किस सरकारी योजना के तहत इसका निर्माण कराया गया है? यहां गड्ढा भी मनरेगा स्कीम में खुदता है. अगर आज की सरकार ताजमहल बनवाती तो उस योजना का नाम होता “पंडित दीनदयाल उपाध्याय श्वेत गोलार्धीय भवन योजना.”

4. न मंत्री आए न फीता कटा

भारतीय संस्कृति के अनुसार कोई भवन निर्माण होता है तो उसके लिए मंत्री जी शिलान्यास करने या फीता काटने आते हैं. चुनाव सिर पर हों तो अकेले मुख्यमंत्री ऐसे 5000 भवनों का शिलान्यास कर देते हैं. सरकार जस्ट बनी हो तो शिलान्यास टलता रहता है. ऐसा कुछ ताजमहल बनने में तो हुआ नहीं फिर हम कैसे मान लें?

5. किसी ने पैसा नहीं खाया

ये कैसी संस्कृति का नमूना है जिसके बनने में न इंजीनियर्स ने पैसा खाया न बिल्डर्स ने. मुझे तो घिन आती है इसे सांस्कृतिक विरासत कहते हुए. कुछ मजदूरों के हाथ काटने का उल्लेख जरूर मिलता है लेकिन जब तक बनवाने वाले मालामाल न हो जाएं तब तक ये मजाक ही लगता है.

6. बनने के बीच में एक बार भी नहीं गिरा

यहां एक सड़ा सा पुल बनता है तो वो ट्रायल में भी एक बार गिरता जरूर है. बहुत बेशर्म हो तो भी बनने के 5-6 साल में जरूर गिर जाता है. लेकिन ताजमहल न तो बीच में गिरा न बनने के बाद गिरा. संगीत सोम ने बिल्कुल ठीक कहा है.

7. क्रेडिट लेने का झगड़ा नहीं

ऐसा भी नहीं था कि समाजवादी पार्टी के शासनकाल में बनना शुरू हुआ और बीजेपी वालों ने उसका उद्घाटन कर दिया. क्रेडिट लेने का कोई संघर्ष ताजमहल के बनने में दिखा ही नहीं तो कैसी संस्कृति आंय?

8. दूसरे स्टेट्स में ऐड नहीं निकला

ताजमहल पूर्ण रूप से उत्तर प्रदेश की परियोजना थी. लेकिन उसका प्रचार करने के लिए हरियाणा के अखबारों में ऐड नहीं निकला. ये ऐड्स दिखाने के लिए ही आजकल अखबार वाले तीन-तार फ्रंट पेज लगवा दे रहे हैं.

9. पान की पीक नहीं

चलो बन गया तो बन गया. अब उसे देखने के लिए टूरिस्ट भी आते हैं. अब तो शर्म आने लगी है ये कहते हुए कि ये बिल्डिंग यूपी में है. यार यूपी वाले मंदिर के बाहर पड़ी चप्पलों पर थूक देते हैं, इतना बड़ा ताजमहल कैसे बच गया? हटाओ इसको लिस्ट से.

10. इजहार ए मोहब्बत के निशान नहीं

कहते हैं प्यार की निशानी है ताजमहल. या तो कहने वाले भकुवा हैं या तो उन्होंने देखा नहीं है ताजमहल. वहां की एक भी दीवार पर जयप्रकाश+दिल चीरता तीर+प्रिया नहीं लिखा है. हमारी संस्कृति नहीं ये उसको चोट पहुंचाने की साजिश है.
लोगों का गुस्सा जायज है. अच्छी बात ये है कि संगीत सोम ने ताजमहल को तेजोमहालय नहीं कहा है. बाकी वो हमारी संस्कृति का हिस्सा न कभी था न कभी होगा.

एयरफोर्स डे: भारतीय वायुसेना की ये बातें जानकर गर्व और हैरत होगी

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आजादी के पहले भी और आजादी के बाद भी महत्वपू्र्ण रही है हमारी वायुसेना की भूमिका

देश 85वां एयरफोर्स डे मना रहा है. 8 अक्टूबर 1932 को इंडियन एयरफोर्स की स्थापना की गई थी. इस दिन को एयरफोर्स डे के तौर पर मनाया जाता है. 1 अप्रैल साल 1933 को इसके पहले दस्ते का गठन हुआ था जिसमें 6 RAF-ट्रेंड ऑफिसर और 19 हवाई सिपाहियों को शामिल किया गया था. इस दस्ते को 4 वेस्टलैंड वापिति IIA एयरक्राफ्ट जोकि सैन्य सहयोग विमान हैं मुहैया कराया गया था.
साल दर साल इंडियन एयरफोर्स की टेक्नॉलजी और क्षमता में लगातार सुधार किया गया. अब ये दुनिया की सबसे शक्तिशाली और बड़ी वायु सेनाओं में शुमार हैं. जानते हैं इंडियन एयरफोर्स से जुड़ी कुछ खास जानकारी:

एयरफोर्स के पहले चीफ, एयर मार्शल सर थॉमस डब्ल्यू एल्महर्स्ट

आजादी के बाद एयरफोर्स को आर्मी से 'आजाद' करने का श्रेय इंडियन एयरफोर्स के पहले कमांडर इन चीफ, एयर मार्शल सर थॉमस डब्ल्यू एल्महर्स्ट को जाता है. एल्महर्स्ट आजादी के बाद भारत के पहले चीफ बने. बता दें कि आजादी से पहले एयरफोर्स पर आर्मी का नियंत्रण होता था. एल्महर्स्ट 15 अगस्त 1947 से 22 फरवरी 1950 तक अपने पद पर बने रहे.

सुब्रतो मुखर्जी के तौर पर मिला भारतीय चीफ

1 अप्रैल 1954 को इंडियन एयरफोर्स से 'कमांडर इन चीफ' का पद खत्म हो गया और एयर मार्शल सुब्रोतो मुखर्जी को इंडियन एयरफोर्स के पहले भारतीय चीफ बनने का गौरव हासिल हुआ.

दुनिया का चौथा सबसे बड़ा एयरफोर्स

करीब 1,70,000 कर्मचारियों और 15 सौ एयरक्राफ्ट के साथ चौथी सबसे बड़ी वायुसेना है इंडियन एयरफोर्स. इससे पहले अमेरिका, चीन और रूस का नंबर आता है. वहीं अगर शक्तिशाली एयरफोर्सेज की बात करें तो ये दुनिया का सातवां सबसे शक्तिशाली एयरफोर्स माना जाता है.

एयरफोर्स का आदर्श वाक्य गीता से लिया गया है

'नभ: स्पृशं दीप्तम', एयरफोर्स का आदर्श वाक्य है जिसे गीता के ग्यारहवें अध्याय से लिया गया है.

इंडियन एयरफोर्स के 7 कमांड

इंडियन एयफोर्स के फिलहाल 7 कमांड हैं, जिनमें से 5 ऑपरेशनल हैं वहीं 2 फंक्शनल कमांड हैं-
  • हेडक्वार्टर सेंट्रल एयर कमांड, इलाहाबाद
  • हेडक्वार्टर ईस्टर्न एयर कमांड, शिलॉन्ग
  • हेडक्वार्टर वेस्टर्न एयर कमांड, नई दिल्ली
  • हेडक्वार्टर साउदर्न एयर कमांड, तिरुअनंतपुरम
  • हेडक्वार्टर साउथ-वेस्टर्न एयर कमांड, गांधी नगर
  • हेडक्वार्टर मेंटिनेंस कमांड, नागपुर
  • हेडक्वार्टर ट्रेनिंग कमांड, बेंगलुरु

विदेशी जमीन पर एयरबेस

देश में एयरफोर्स के 50 से ज्यादा एयरबेस हैं जहां से दुश्मन की हर गतिविधियों पर नजर रखी जाती है और देश की सुरक्षा चाक चौबंद की जाती है. ये भी बता दें कि ताजिकिस्तान का फारखोर एयरबेस विदेशी सरजमीं पर भारत का पहला एयरबेस है. इस एयरबेस की जिम्मेदारी भारत-ताजिकिस्तान मिलकर संभालते हैं.

एयरफोर्स के 'सुपरहीरो'

फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों: 1971 के युद्ध में निर्मलजीत सिंह के बहादुरी के किस्से देश आज भी याद करता है. निर्मलजीत को इस युद्ध में शहादत हासिल हुई थी, लेकिन वो एयरफोर्स के पहले और आखिरी अधिकारी थे जिन्हें परमवीर चक्र हासिल हुआ है, उन्हें मरणोपरांत ये सम्मान दिया गया
मार्शल अर्जन सिंह: 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान मार्शल ऑफ द एयरफोर्स अर्जन सिंह ने दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए थे. कई पीढ़ियों के हीरो रहे मार्शल अर्जन सिंह एयरफोर्स के एकमात्र ऑफिसर हैं जिन्हें 5-स्टार रैंक से नवाजा गया था.
एयर मार्शल पद्मावती बंधोपाध्याय: इंडियन एयरफोर्स की पहली महिला एयर मार्शल होने का गौरव पद्मावती बंधोपाध्याय को हासिल है.
अली ज्ञान-
इसी साल एयरफोर्स में पहली महिला फायटर पायलटों का बैच शामिल हो जाएगा. इस बैच में देश की 3 बहादुर बेटियां हैं- अवनी चतुर्वेदी, भावना कंठ और मोहना सिंह

सिर्फ युद्ध में ही नहीं सहायता में भी नंबर वन

इंडियन एयरफोर्स ने जंग के मैदानों में अपना लोहा मनवाया है, ऑपरेशन मेघदूत, ऑपरेशन कैक्टस, ऑपरेशन पवन जैसे तमाम अभियान इसे दुनिया के सबसे खास फोर्सेज में शुमार करते हैं. सिर्फ इतना ही नहीं अगर नागरिकों के राहत की भी बात होती है तो एयरफोर्स सबसे आगे होता है. यमन से भारतवासियों को बाहर निकालने की बात हो या केदारनाथ में फंसे सैलानियों की हर बार एयरफोर्स ने अपने बेहतरीन काम से सबकी तारीफें कमाईं हैं.
आजादी के बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के साथ चार युद्धों में , चीन ते साथ एक युद्घ में अपना योगदान दे चुकी है । अब तक भारतीय वायुसेना जिन प्रमुख युद्ध में अपना कौशल दिखा चुकी हैं उसमेंआपरेशन विजय , गोवा का सैन्य अधिग्रहण , आपरेशन मेघदूत , आपरेशन कैक्टस व आपरेशन पुमलाई शामिल हैं । कई अवसरों पर संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति मिशन में भी भारतीय वायुसेना का प्रमुख योगदान रहा है ।
राष्ट्रीय सुरक्षा के प्राथमिक लक्ष्य के साथ भारतीयवायुसेना निभा रही है व्यापक जिम्मेदारी : 
भारतीय वायुसेना के दायित्व ओर उसके मिशन को सशस्त्र बल अधिनियम 1947 के द्वारा पारिभाषित किया गया है ।सभी सम्भावित खतरों से भारतीय हवाई क्षेत्र की रक्षा करना , सशस्त्र बलों की अन्य शाखाओं क् साथ सामंजस्य स्थापित करना और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा भारतीय वायुसेना की प्राथमिक जिम्मेदारी है  ।भारतीय वायुसेना युद्ध के मैदान में भारतीय सेना के सैनिकों को हवाई समर्थन तथा सामरिक और रणनीतिक एयरलिफ्ट करने की क्षमता भी प्रदान करती है । भारतीय वायुसेना एकीकृत अंतरिक्ष प्रकोष्ठ के साथ दो अन्य शाखाओं – भारतीय सशस्त्र बल अन्तरिक्ष विभाग और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के साथ अंतरिक्ष आधारित संपत्तियों के उपयोग  प्रभावी ढंग सेकरवेके लिये ,सैन्य दृष्टिकोण सेसेइस सम्पत्ति पर ध्यान देता है ।
 महामहिम राष्ट्रपति होते हैं सेना प्रमुख       
    भारत के राष्ट्रपति  भारतीय वायुसेना के कमाण्डर इन चीफ के रुप में काम करते हैं। वायु सेनाध्यक्ष ,एयर चीफ मार्शल , एक चार सितारा कमाण्डर होते हैं  और वायुसेना का नेतृत्व करते है।भारतीय वायुसेना  में किसी भी समय एक से अधिक एयर चीफ मार्शल नहीं होते हैं ।भारतीय वायुसेना का मुखयालय नई दिल्ली में है । संगठन की दृृ्ष्टि से भारतीय वायुसेना को चार भागों में बाँटा गया है  , एक – एयर स्टॉफ शाखा , दो – प्रशासनिक शाख़ा , और तीन – कमान तथा फौजी कार्रवाई ।
समृद्ध और गौरवशाली रहा है भारतीय वायुसेना का इतिहास 
भारतीय वायुसेना के गठन ब्रिटिश शासन काल में रॉयल एयरफोर्स की एक सहायक हवाई इकाई के रुप में किया गया था । द्वितीय विश्वयुद्ध में रॉयल इंडियन एयरफोर्स के रुप में भाग लिया था और उसी समय एयरफोर्स ने अराकन में जापानी सैन्य छावनी पर हमला किया था । इसी दौरान वायुसेना ने माई हंगसन और उत्तरी थाइलैंड के बैंग माई एवम् बेंग राए हवाई अड्डे पर भी हमले किये । आजादी के बाद भारत के विभाजन से जब पाकिस्तान बना तो रॉयल इंडियन एयरफोर्स को भी दो भागों में बाँट दिया रॉयल इंडियन एयरफोर्स और रॉयल  पाकिस्तान एयरफोर्स ।वर्ष 1950 में जब भारत एक गणतांत्रिक देश बना तो रॉयल शब्द हटा दिया गया ।
शुरुआती दौर में भी भारतीय वायुसेना ने कई उपलब्धियाँ हाँसिल की थी :
भारतीय वायुसेना ने शुरुआती दौर में भी काफी सफलताएँ अर्जित की थी । संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ मिलकर भारतीय वायुसेना ने बेल्जियम के कब्जे से काँगों की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और पुर्तगालियों के कब्जे से गोवा को आजाद करने में भी भारतीय वायुसेना की भूमिका महत्वपू्र्ण रही ।सन् 1962 में चीन के साथ और सन् 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में भी भारतीय वायुसेना का अवदान बेहद महत्वपू्र्ण रहा ।इसीप्रकार बाँग्लादेश मुक्ति युद्ध में भी भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान की सेना के आत्म समर्पण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।इसी क्रम में भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन मेघदूत के माध्यम से सियाचीन में उल्लेखनीय सफलता पाई ।श्रीलंका के गृहयुद्ध में भी मानवीय सहायता के लिये ऑपरेशन पुमलाई में भी भारतीय वायुसेना की भूमिका की सराहना हुई ।

जानिए, भारत वायुसेना से जुड़ी अहम बातें

1. भारतीय वायुसेना दुनिया की चौथी सबसे बड़ी वायुसेना है। दुनियाभर में सिर्फ अमेरिका, चीन और रूस के पास भारत से बड़ी वायुसेना मौजूद है।

2. ताकत के मामले में भी वायुसेना किसी भी देश से पीछे नहीं है। दुनियभर में भारतीय वायुसेना सातवीं सबसे शक्तिशाली सेना मानी जाती है।

3. भारतीय वायुसेना के 60 से ज्यादा एयरबेस हैं जोकि भारत के हर कोने में स्थित हैं।

4. वायुसेना का वेस्टर्न कमांड सबसे बड़ा एयर कमांड है जहां 16 एयरबेस स्टेशन मौजूद हैं।

5. सियाचिन ग्लेशियर पर मौजूद एयरफोर्स स्टेशन भारतीय एयरफोर्स का सबसे उंचाई पर मौजूद एयरबेस है जोकि जमीन से 22000 फीट की उंचाई पर मौजूद है।

6. तजाकिस्तान के पास फर्कहोर एयरबेस स्टेशन भारत का पहला ऐसा एयरफोर्स स्टेशन है जोकि विदेशी जमीन पर मौजूद है।

7. साल 1990 में पहली बार महिलाओं को भी सशस्त्र बल में शामिल किया गया लेकिन उन्हें शार्ट सर्विस कमीशन ऑफिसर के तौर पर सिर्फ 14 से 15 साल तक ही सर्विस दी गई। इसके अलावा महिलाओं को समुंद्र में होने वाली लड़ाईयों में जाने की या फिर गोलीबारी करने वाले दल में शामिल होने की इजाजत नहीं दी गई थी।

8. साल 1990 में ही पहली बार चॉपर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट उड़ाने वाले दल में महिलाओं को शामिल किया गया।

9. भारतीय वायुसेना का मानना था कि महिलाएं फाइटर पायलट बनने के लिए शारीरिक तौर पर फिट नहीं हैं खासकर जब वो गर्भवती होती हैं या फिर जब उन्हें दूसरी स्वास्थ संबंधी परेशानियां होती हैं।

10. इंडियन एयरफोर्स के लडाकू पायलट विंग में शामिल होने के लिए तीन चरणों से होकर गुजरना पड़ता है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक ट्रेनिंग इन तीन चरणों से होकर गुजरती है।

- पहला स्टेज में एयरफोर्स अकादमी दुंगदीगुल हैदराबाद में 6 महीने में कम से कम 55 घंटों का स्विस पिलाटुस पी-7 बेसिक ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट उड़ाने का अनुभव होना चाहिए।
- दूसरे स्टेज में तेलंगाना के हकीमपेट में 6 महीने के भीतर 87 घंटे तक किरेन एयरक्राफ्ट उड़ाने का अनुभव होना चाहिए।
- तीसरे स्टेज में बिदर या कलाईकांडु में एक साल के भीतर 145 घंटे तक हाक एडवांस्ड ट्रेनर जेट उडा़ने का अनुभव होना चाहिए।

राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस "करें रक्तदान सवारें ज़िन्दगी"

    


राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस के बारे में
भारत में राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस हर साल 1 अक्टूबर को व्यक्ति के जीवन में रक्त की आवश्यकता और महत्व को साझा करने के लिये मनाया जाता है। ये पहली बार साल 1975 में 1 अक्टूबर को इंडियन सोसायटी ऑफ ब्लड ट्रॉसफ्यूजन एण्ड इम्यूनोहैमेटोलॉजी द्वारा मनाया गया। इंडियन सोसायटी ऑफ ब्लड ट्रॉसफ्यूजन एण्ड इम्यूनोहैमेटोलॉजी की स्थापना 22 अक्टूबर 1971 में डॉ. जे.जी.जौली और मिसीज के. स्वरुप क्रिसेन के नेतृत्व में हुई।

राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस का उद्देश्य

  • देश भर में सभी लोगों को स्वैच्छिक रक्तदान के महत्व के बारे में जागरूक करना।
  • सफलतापूर्वक जरूरतमंद रोगियों की तत्काल जरूरत को पूरा करने के लिए स्वैच्छिक रक्तदान के लक्ष्य को प्राप्त करना।
  • किसी भी तत्काल और गंभीर आवश्यकता के लिए ब्लड बैंक में रक्त का संग्रह करके रखना।
  • बहुत सारे धन्यवाद के माध्यम से रक्तदाताओं को प्रोत्साहित करना और उनके आत्मसम्मान को महत्व देना।
  • उन लोगों को रक्त देने के लिये प्रेरित और प्रोत्साहित करना जो स्वस्थ्य होने के बाद भी रक्तदान में रुचि नहीं ले रहे हैं।
  • उन लोगों को स्वेच्छा से रक्त दान करने के लिये प्रोत्साहित करना जो केवल अपने मित्रों और रिश्तेदारों को रक्त दान करते हैं।
जरूरतमंद व्यक्ति को रक्तदान या उसके घटकों का दान आधुनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में मानवता का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कि रक्त देने वाला और रक्त पाने वाला कौन है, भविष्य में ये भी सम्भव है कि रक्तदाता रक्त पाने वाला बन जाये और आने वाले समय में रक्त पाने वाला स्वस्थ्य रक्तदारा बन जाये। इसलिये बिना किसी भी इच्छा के रक्तदान करना जीवन बचाने की प्रक्रिया में मानवता का महान और महत्वपूर्ण भाग है। केवल अपने मित्रों और रिश्तेदारों को ही रक्तदान नहीं करना चाहिये, बल्कि स्वैच्छिक रक्तदान ही किसी भी मनुष्य के लिये वास्तविक मानवता है क्योंकि ये बहुत से जीवन को बचा सकती है।
रक्त आधान के समय रक्त संचरण के माध्यम से रोगों से बचाने के लिये, एकत्र रक्त की प्रत्येक इकाई की सावधानी पूर्वक जाँच (उन्नत परीक्षण तकनीकों के माध्यम से जैसे: न्यूक्लिक अम्ल परीक्षण) जीवन को भयावह रोगों जैसे: एड्स, उपदंश, हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी, मलेरिया और अन्य बहुत से रोगों से बचाने के लिये बहुत अनिवार्य हो जाती है। रक्तदान के लिये स्वैच्छिक रक्त दाताओँ को प्रोत्साहित करना चाहिये क्योंकि पेशेवर या वेतन पर रक्तदान करने वालों के बजाय स्वैच्छिक रक्त दाताओँ का रक्त सुरक्षित होता है। स्वैच्छिक रक्त दाता कभी झूठ नहीं बोलते और अपने रक्त के उन्नत तकनीक से परीक्षण के लिये सहमत होते है क्योंकि वो सही में किसी का अनमोल जीवन बचाना चाहते है।
राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस के अवसर पर सभी राज्यों में लोगों को रक्तदान के बारे में जागरुक करने के लिये, विभिन्न किस्म के जागरूकता कार्यक्रम, शिविरों और अनुपूरक प्रचार गतिविधियों का आयोजन किया जाता है। औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940 के अनुसार रक्त दाताओं के लिए विभिन्न मानदंड हैं। रक्तदाता की उम्र 18-60 के बीच में होनी चाहिये, वजन कम से कम 45 या इससे अधिक, नाड़ी दर रेंज 60 से 100/मिनट, बी.पी. सामान्य, एचबी 12.5gm/100 एमएल और शरीर का तापमान 37.5 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक नहीं होना चाहिये।

राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस का महत्त्व

रक्त मनुष्य के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण तत्व है क्योंकि यह शरीर के ऊतकों और अंगों के लिए महत्वपूर्ण पोषण प्रदान करता है। राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस समाज में महान परिवर्तन लाने, जीवनरक्षी उपायों का अनुसरण करने और हिंसा और चोट के कारण गंभीर बीमारी, बच्चे के जन्म से संबंधित जटिलताओं, सड़क यातायात दुर्घटनाओं और कई आकास्मिक परिस्थितियों से निकलने के लिए मनाया जाता है।
सुरक्षित रक्तदान हर साल सभी उम्र के और सभी स्तर के लोगों का जीवन बचाता है। स्वैच्छिक रक्त दाताओं के रूप में त्रिपुरा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र राज्यों को राष्ट्रीय स्तर पर माना जाता है। भारत में स्वैच्छिक रक्त दाता के रुप में त्रिपुरा, देश का एक उत्तर पूर्वी राज्य, 93% के साथ उच्चतम स्तर पर माना जाता है, साथ ही साथ ही मणिपुर देश में सबसे कम स्तर पर माना जाता है।
स्वैच्छिक रक्तदान अभियान के प्रति आम जनता की अज्ञानता, भय और गलत धारणाओं को दूर करने के लिए इस दिन को एक महान स्तर पर मनाना बहुत आवश्यक है। स्वैच्छिक संगठनों को अपने बहुमूल्य समय का भुगतान और अपने संसाधनों का उपयोग देश के छात्रों/युवाओं, कॉलेजों, संस्थानों, क्लबों अथवा गैर सरकारी संगठनों आदि को प्रोत्साहित करने के लिये कर रहे हैं।

इस्लामोफोबिया और हम

    


जब भारत अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, उस वक्त देश में सामाजिक स्थिति बहुत बुरी थी. सती प्रथा जैसी क्रूरता समाज में मौजूद थी जिसे देखकर अंग्रेजों ने भारत को बहुत पिछड़ा घोषित कर दिया था. फिर जाति प्रथा को देखकर उन्होंने समां बांधा कि भारत को सुधारना हमारी जिम्मेदारी है. सुधारने लगे. तमाम कानून लगाने लगे. लोगों को बेइज्जत करने लगे. इसके तमाम उदाहरण हैं. वो अपने सामने हिंदुस्तानियों को कुछ समझते ही नहीं थे. तो हिंदुस्तानियों ने क्या किया?

#. कॉलोनियल शासकों नीतियों से हम आज तक नहीं उबर पाए हैं
हथियार उठाया. कभी छोटी तो कभी बड़ी लड़ाइयां लड़ीं. कॉलोनियल शासकों ने लड़ने वाले हिंदुस्तानियों को क्या कहा? आतंकवादी. भगत सिंह को भी ब्रिटेन आज भी टेररिस्ट ही लिखता है. इसको लेकर भारत में कई बार बवाल भी हो चुका है.
ये बात जरूर थी कि भारतीय समाज में बहुत कमियां थीं जो यूरोपियन समाज की आधुनिकता के आगे नहीं ठहरती थीं. पर इसका क्या मतलब था कि हिंदुस्तानियों को हर जगह बेइज्जत किया जाए? यहां का धन लूटकर ब्रिटेन ले जाया जाए? अपने हक के लिए लड़नेवालों को आतंकवादी कहा जाए? जलियांवाला बाग जैसी घटनाएं की जाएं? और विक्टिम इसका जवाब अहिंसा से दे तभी बेहतर है? तभी वो उनकी गुड बुक्स में आ।
जब भारत अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, उस वक्त देश में सामाजिक स्थिति बहुत बुरी थी. सती प्रथा जैसी क्रूरता समाज में मौजूद थी जिसे देखकर अंग्रेजों ने भारत को बहुत पिछड़ा घोषित कर दिया था. फिर जाति प्रथा को देखकर उन्होंने समां बांधा कि भारत को सुधारना हमारी जिम्मेदारी है. सुधारने लगे. तमाम कानून लगाने लगे. लोगों को बेइज्जत करने लगे. इसके तमाम उदाहरण हैं. वो अपने सामने हिंदुस्तानियों को कुछ समझते ही नहीं थे. तो हिंदुस्तानियों ने क्या किया?
#. कॉलोनियल शासकों नीतियों से हम आज तक नहीं उबर पाए हैं
हथियार उठाया. कभी छोटी तो कभी बड़ी लड़ाइयां लड़ीं. कॉलोनियल शासकों ने लड़ने वाले हिंदुस्तानियों को क्या कहा? आतंकवादी. भगत सिंह को भी ब्रिटेन आज भी टेररिस्ट ही लिखता है. इसको लेकर भारत में कई बार बवाल भी हो चुका है.
ये बात जरूर थी कि भारतीय समाज में बहुत कमियां थीं जो यूरोपियन समाज की आधुनिकता के आगे नहीं ठहरती थीं. पर इसका क्या मतलब था कि हिंदुस्तानियों को हर जगह बेइज्जत किया जाए? यहां का धन लूटकर ब्रिटेन ले जाया जाए? अपने हक के लिए लड़नेवालों को आतंकवादी कहा जाए? जलियांवाला बाग जैसी घटनाएं की जाएं? और विक्टिम इसका जवाब अहिंसा से दे तभी बेहतर है? तभी वो उनकी गुड बुक्स में आ पाएगा?
कॉलोनियल शासकों ने भारत पर कैसे शासन किया और जब छोड़ के गए तो कैसे छोड़ कर गए? फूट डालो और राज करो. साधारण परंतु बेहद ताकतवर नीति. जाते समय भी देश को दो क्या बल्कि तीन हिस्सों में बांट के गये. इसके मुख्य जिम्मेदार वही थे. हिंदुस्तानी नेता तो लाचार थे.
भारत  में आज तक कॉलोनियल शासन को यहां की कमियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है. ये सच भी है. कोई भी समाज खुद से विकास करे तभी आत्मसम्मान रह पाता है. अगर उसे मजबूर किया जाए तो हीनता का बोध होता है. जो गुस्से के रूप में कहीं ना कहीं निकलता है. ये हिंदुस्तान में भी होता है.
#. उस वक्त के इस्लामिक क्षेत्रों की स्थिति देखते हैं
1798 में फ्रांस के शासक नेपोलियन ने इजिप्ट को अपने कब्जे में कर लिया. सोचा कि स्वेज के पास ताकत मिलने पर ब्रिटिश लोगों को इंडिया जाने से रोका जा सकेगा. ज्ञात रहे कि ब्रिटेन ने इंडिया के दम पर ही पूरी दुनिया की नाक में दम कर रखा था. नेपोलियन ने इसके लिए इजिप्ट में फ्रेंच पढ़ाई और कल्चर को थोपना शुरू कर दिया था. फिर सीरिया में भी कोशिश की. पर उसके दोनों प्रयास असफल रहे. फिर ब्रिटेन ने ईरान समेत बाकी जगहों पर नजर भिड़ानी शुरू कर दी.
पूरा यूरोप ही उस समय पूरी दुनिया को तरबूज की तरह काटकर आपस में बांट रहा था. फ्रांस ने 1830 में अल्जीरिया पर कब्जा किया. दस साल बाद ब्रिटेन ने अदन पर. इसी तरह 1880 के बाद ट्यूनीशिया, इजिप्ट, सूडान, लीबिया और मोरक्को सब पर कब्जा कर लिया गया. इसी वक्त रूस ने भी सेंट्रल एशिया के देशों पर नजर जमानी शुरू कर दी. उधर 1915 में साइक्स पाइकोट एग्रीमेंट हुआ और मुसलमानों के महान ओटोमन साम्राज्य को आपस में बांट लिया गया. ख्याल रहे कि उस वक्त ईरान और इराक में तेल की खोज नहीं हुई थी. सिर्फ राजनीतिक वजहों से ये चीजें हो रही थीं. किसी और देश को एशिया में फायदा नहीं उठाने दिया जाएगा. एशिया बोले तो मुख्यतया इंडिया और चीन.
फिर दो विश्वयुद्ध हुए. ये यूरोपियन देशों ने ही लड़ा. एशिया और इस्लामिक देश तो मजबूरी में लड़े. ये लड़ाई कॉलोनियलिज्म का ही रिजल्ट थी. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ही भारत समेत ये सारे मुस्लिम देश आजाद हुए.
अब सोचिए कि भारत को आजाद करते वक्त ये शासक दो भागों में बांटकर गए, तो बाकी देशों के साथ क्या किया? 56 मुस्लिम देश हैं पूरी दुनिया में. इनमें से ज्यादातर में दो या दो से अधिक समुदायों में जर-जमीन और ताकत को लेकर झगड़ा है. ये बिल्कुल वही स्थिति है, जो भारत के साथ हुई थी.
#. अमेरिका ने कॉलोनियां तो नहीं बनाई पर इस्लामिक देशों में तानाशाही और आतंकवाद इसकी ही देन है
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद कई मुस्लिम देशों में तेल की खोज हो गई और तेल का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा. अब दुनिया की व्यापारिक लड़ाई समुद्र के रास्तों पर कब्जे से हटकर तेल पर आ गई थी. अमेरिका अब ब्रिटेन की जगह नया दादा बना था. अमेरिका ने कभी भी किसी देश को कॉलोनियल सत्ता के अधीन लाने की कोशिश नहीं की. पर तेल पर नियंत्रण के लिए उसने तकरीबन हर इस्लामिक देश में तानाशाही को फंड किया. इसका सबसे बड़ा उदाहरण ईरान है. ईरान में 60 के दशक में लड़कियां हाफ पैंट पहन के घूमती थीं. 1979 में वहां इस्लामिक क्रांति हुई और सत्ता कठमुल्लों के हाथ जा पहुंची. अमेरिका ही इसका सूत्रधार था. बाकी देशों में भी ऐसा ही हुआ. अफगानिस्तान पर कब्जे को लेकर अमेरिका और रूस ने वहां का बंटाधार कर दिया. अब सोचिए कि क्या वहां के मुसलमान इन देशों से खुश होंगे?
दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात. यूरोपियन देशों और अमेरिका ने इन इस्लामिक देशों को टेक्नॉल्जी से मरहूम रखा. अपनी जरूरत की रेल बिछाई बस. मतलब विकास भी इन देशों में सिर्फ तेल के दम पर हो रहा था. जब टेक्नॉल्जी नहीं आएगी तो समाज में सुधार कैसे होगा? टेक्नाॉल्जी आने से ही तो औरत और मर्द में बराबरी आती है.
ऐसा नहीं है कि ये पहली बार इस्लाम के साथ ही हो रहा था. पूरे यूरोप में यहूदियों को प्रताड़ित किया जा रहा था पिछले 2000 सालों से. बाद में हिटलर ने इस प्रताड़ना की इंतिहा कर दी. अपने अपराध से मुक्ति पाने के लिए यूरोप ने यहूदियों को इजराइल दे दिया. वो जगह जहां अरब रहते थे. ये मुस्लिम समाज के आत्मसम्मान पर बहुत बड़ा दाग था. इस चीज से वो आजतक मुक्त नहीं हो पाए हैं. अमेरिका और इंग्लैंड भी आज भी अपने अपने क्षेत्रों को लेकर इमोशनल रहते हैं. रूस ने तो 3 साल पहले क्रीमिया को हड़प लिया. चीन सबको धमकी देते रहता है जमीन को लेकर. तो अरब कहां गलत हैं?
#. अब बात आती है इस्लाम के पूरी दुनिया का दुश्मन बनने की
ये सही है कि इस्लामिक देशों में सामाजिक बुराइयां बहुत हैं. पर इसका मतलब ये नहीं है कि उनके साथ कुछ भी कर दिया जाए. अमेरिका ने अफगानिस्तान में रूस को हराने के लिए जिन मुजाहिदीनों को बढ़ावा दिया उन्होंने ही 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर गिरा दिया. ये अमेरिका पर इस्लाम का हमला नहीं था. ये हमला था उन आतंकवादियों का जिनको अमेरिका ने बढ़ावा दिया था और बाद में पैसा देना बंद कर दिया था
इसके बाद शुरू हुआ प्रोपेगैंडा का दौर. इस्लामोफोबिया एक नया शब्द गढ़ा गया. मतलब लोग इस्लाम से डरने लगे. क्योंकि रोज ही नई खबरें आतीं कि इस्लामिक देशों के लोग कितने क्रूर होते हैं. पर इसमें एक चीज छुपा ली जाती कि लोग क्रूर नहीं होते, बल्कि सैनिक क्रूर होते हैं. वो सैनिक जो तानाशाहों और गैंग के लीडरों के अंडर काम करते हैं. जैसे कि अमेरिका के सैनिक जिन्होंने इंटरोगेशन के नाम पर ग्वांटानामो बे में प्रताड़ना की सीमा पार कर दी. पर इस्लामिक देशों के पास उतनी पावरफुल मीडिया नहीं थी. क्योंकि ज्यादातर देश या तो तानाशाही में थे या फिर गरीब थे. उनके यहां पुराने जमाने की विद्वत्ता तो थी पर आधुनिकता के हिसाब से विद्वत्ता नहीं आ पाई थी. कोई बोलने वाला भी नहीं था.
#. अब 2017 में इस्लाम को समझने के लिए इन 5 घटनाओं का सहारा लेंगे:
1.  
जॉर्ज बुश का कहना कि या तो आप हमारे साथ हैं या फिर उनके साथ हैं
अफगानिस्तान पर हमला करने से पहले बुश ने ये कहा था. पर ये आतंकवादियों के खिलाफ था. प्रोपेगैंडा मीडिया ने इसे इस्लाम के खिलाफ बना दिया. तुरंत चारों ओर संदेश गया कि मुसलमान यूरोप के खिलाफ हैं. लेकिन ऐसा नहीं था.
2. ISIS  का उदय
इस संगठन के उदय ने ये जताया कि सारे मुसलमान इतने हिंसक होते हैं. लोगों को मुसलमान सुनते ही इस संगठन का खयाल आने लगा. पर ऐसा भी नहीं था. दुनिया के हर देश के मुसलमानों ने कहा है कि ये लोग इस्लाम के प्रतिनिधि नहीं हैं. इन लोगों के पास हथियार कहां से आते हैं, ये अलग उत्सुकता का विषय है. क्योंकि इन देशों में हथियार नहीं बनते, यूरोपीय और अमेरिकी देशों में ही बनते हैं. लेकिन मीडिया ने बाकी मुसलमानों को दिखाने के बजाय इस संगठन को ही इस्लाम के प्रतिनिधि के तौर पर दिखाना शुरू किया.
3. शार्ली हेब्दो हमला
फ्रांस की मैगजीन शार्ली हेब्दो ने मुहम्मद का कार्टून छापा. छापने वाले भी अल्जीरियाई मूल के थे, जहां कभी फ्रांस का कब्जा हुआ करता था. उनको मारने वाले भी अल्जीरियाई मूल के ही थे. तो ये इस्लाम का मामला नहीं था. ये बस उसी पुराने झंझट की पैदाइश थी जिसे कॉलोनियलिज्म ने पैदा किया था. पर तुरंत कोई शिकार मिला तो वो था इस्लाम.
4. फ्रांस का बुर्कीनी मोमेंट
फ्रांस ने दुनिया को फ्रीडम से जुड़ी बहुत चीजें दी हैं. पर अपने यहां बीच पर एक औरत का बुर्का पहन के बैठना उनको भारी पड़ गया. पुलिस ने बुर्का उतरवा दिया. इससे ये संदेश गया  कि इस्लाम की औरतें भी कट्टर हैं और वो उन्हीं प्रथाओं का पालन करती हैं जिनको वेस्ट का समाज पिछड़ा मानता है. पर ये घटना इस्लाम के बजाय पुलिस शासन की कट्टरता दिखाती है. फ्रांस यहां पर गलती कर बैठा. लेकिन ताकतवर प्रोपेगैंडा ने इसे भी इस्लाम की कमी ही बना दिया.
5. रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या
इस समस्या को बौद्ध बनाम इस्लाम बनाने की कोशिश की जा रही है. इसको चीन में हो रहे मुस्लिम समस्या और श्रीलंका की मुस्लिम माइनॉरिटी समस्या से जोड़ा जा रहा है. पर लोग ये भूल रहे हैं कि तीनों ही जगहों पर इस्लाम माइनॉरिटी में है. और तीनों का आपस में कोई संबंध नहीं है. पर दुनिया में तेजी से फैल रहे इस्लामोफोबिया ने तीनों को जोड़ने का काम किया है.
#. पहले जो हाल कॉलोनियों का था, अब वही हाल इस्लाम का हो गया है
इस लेख का मतलब ये नहीं कि इस्लाम के नाम पर किया जाने वाला आतंकवाद सही है. ये बिल्कुल ही गलत है. पर इस गलती को सही करने के नाम पर जो किया जा रहा है, वो और भी गलत है. ये वही गलती है जो कॉलोनियलिज्म ने 200 सालों तक दुनिया के साथ किया था. और अब इस्लाम को टार्गेट बनाकर कर रहे हैं. क्योंकि ये 56 देश अभी भी वहीं फंसे हैं, जहां 19वीं शताब्दी के देश फंसे हुए थे.  ये सारे देश अपनी कोशिशों से आगे आ सकते हैं. लेकिन लगातार इनकी भर्त्सना करने और इनपर हमले करने से तो कुछ नहीं होगा. अभी तो ऐसा हो गया है कि मुसलमान पर कोई भी ब्लेम लगाया जा सकता है. तमाम तरह की फेक न्यूज़ एजेंसीज़ आ चुकी हैं. जो उनपर नित नये आरोप लगाती हैं. लगातार ऐसा प्रचारित किया जाता है जैसे सारे मुसलमान दिन रात नमाज पढ़ते हैं और बाकी वक्त बॉम्ब ब्लास्ट की प्लानिंग करते हैं. उनके बारे में सही चीजें बताई ही नहीं जातीं.
#. बहस करने वाले आधे से ज़्यादा लोगों को मुद्दो की पूरी समझ भी नहीं है
अगर हिंदुस्तान की बात करें तो सच्चर कमिटी की ही रिपोर्ट पढ़ लें. इससे साफ साफ पता चलता है कि मुस्लिम समाज का शैक्षणिक स्तर इतना नीचे है कि बामियान में बुद्ध के गिरने की ये भर्त्सना ही नहीं कर सकते. क्योंकि इनको समझ ही नहीं आएगा. ये थोड़ी क्रूर बात लग सकती है. लेकिन ये सच्चाई है कि मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर, ये किसी को समझ नहीं आएगा.
हिंदू समाज के साथ भी यही हाल है, बाबरी मुद्दे का सच किसको समझ आया है? ठीक इसी तरह रोहिंग्या मुसलमान और भी नीचे हैं. उस स्तर पर कोई खाने, पीने और सोने के अलावा कुछ और सोच ही नहीं पाएगा. उनके यहां कोई विद्वान नहीं बैठा है, जो हर चीज की आलोचना कर सके.  अगर वाकई में कोई मुसलमानों का भला चाहता है तो सबसे पहले उनपर आरोप लगाना बंद कर दे. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है बॉलीवुड. यहां कोई जजमेंट पास नहीं किया गया और भारत को तीन खान मिले. सोचिए कि इस्लाम के नाम पर प्रताड़ित किया जाता तो क्या होता? रोज कहा जाता कि तुम्हारे समाज में तो ये होता है, वो होता है तो क्या आमिर खान तीन साल मेहनत करके एक फिल्म बना सकते?

हज और उनसे जुड़े कुछ सवाल

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हज वाला महीना चल रहा है. दुनियाभर के लाखों मुसलमान सऊदी अरब में हैं. क्योंकि मुसलमानों के लिए जिंदगी में एक बार हज करना अनिवार्य है. अगर वो सक्षम हैं तो. और ये हज सऊदी अरब में ही होता है. हमारे एक दोस्त हैं  नाम है जयप्रकाश. कह रहे हैं कि ख़बरें छप रही हैं, इतने लाख मुसलमान मक्का पहुंचे, हमारे यहां तो दो लोग ही पूरे खेत में मक्का बो देते हैं. हज के बारे में उनके ऐसे ही ये 10 सवाल हैं. 8वां सवाल बहुत ख़ास है. हो सकता है आप भी जानना चाहें. तो समझ लीजिए. कोई आपसे पूछे तो बता देना.
सबसे पहले दोस्त को बता दूं कि ये मक्का वो नहीं है, जो उनके यहां खेतों में बोया जाता है. और बाद में आप कॉर्न (मक्का) वाला पिज़्ज़ा या बर्गर खाते हैं या फिर सिनेमाघर में बैठे हुए फुल्ले खाते हैं. बल्कि ये ‘मक्का’ सऊदी अरब का एक शहर है. ये वो शहर है जहां पर मुसलमानों के सबसे बड़े नबी यानी अल्लाह के भेजे गए दूत मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था. ये वही शहर है जहां पर एक काले रंग की इमारत है. और उसे मुसलमान अल्लाह का घर बताते हैं. उसकी तरफ मुंह करके दुनियाभर के मुस्लिम नमाज़ पढ़ते हैं. बाकी जानकारी दोस्त जयप्रकाश के सवालों में है. पढ़िए.

1. हज होता क्या है? जब Hutch का मोबाइल सिम खरीदा तो लोग उसे भी हज कहते थे.

जवाब : अरे दोस्त आप भी न. ये वो हच सिम वाला नहीं है. ये हज होता है. इसका मतलब होता है धार्मिक यात्रा. इसी से एक शब्द बना है जो है हिजरत. इसके मानी होता है प्रवास. जब सन 622 में मुहम्मद साहब को पता चला कि मक्का शहर में उनके क़त्ल की साजिश रची जा रही है तो वो सऊदी अरब का ही एक और शहर है मदीना. वहां प्रवास कर गए थे. हां तो आपको हज के बारे में बता रहा था. हज साल में एक बार होता है. इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक ये 12वें महीने ज़िलहिज या ईद-उल-अज़हा की 8 से 12 तारीख के दौरान होता है. इस महीने के बाद इस्लाम का नया साल मुहर्रम के महीने से शुरू होता है. हज यात्रा सऊदी अरब के शहर मक्का में होती है.

2. अच्छा ये बताओ जाते किस सवारी से हैं? और कितना खर्च आता है?

जवाब : बहुत पहले लोग मक्का पानी के जहाज़ से जाते थे, लेकिन 1995 से समुद्री मार्ग से ये यात्रा बंद है. लोग अब हवाई जहाज़ से जाते हैं. हवाई जहाज़ से जाने के लिए पहले आपको दिल्ली से सऊदी अरब के शहर जद्दा जाना होगा. क्योंकि वहां एअरपोर्ट है. दिल्ली से जद्दा 3 हज़ार 894 किलोमीटर दूर है. जहां हवाई जहाज़ से पहुंचने में करीब 4 घंटे लगते हैं. जद्दा पहुंचने के बाद आपको मक्का या मदीना शहर जाने के लिए बस या फिर ट्रेन पकड़नी होगी.

ग्रीन कैटेगरी वालों के लिए

मक्का में रुकने का खर्च 81,000 रुपये
मदीना में रुकने का खर्च 9,000 रुपये
एयरलाइन्स का टिकट 45,000 रुपये
अन्य खर्च 76,320 रुपये
कुल खर्च 21,1320 रुपये

अजीजिया कैटेगरी

मक्का में रुकने का खर्च 47,340 रुपये
मदीना में रुकने का खर्च 9,000 रुपये
एयरलाइन्स का टिकट 45,000 रुपये
अन्य खर्च 76,320 रुपये
कुल खर्च 17,7660 रुपये
साल 2017 में ये यात्रा करीब 20 हजार रुपए महंगी हो गई. यानी दोनों के टोटल में 20 हज़ार रुपए जोड़ लिए जाएं.

3. अगर दुनियाभर के मुसलमान हज पर पहुंच जाएं तो क्या वो मक्का में आ जाएंगे. क्या इतना बड़ा है मक्का?

जवाब : दोस्त क बात समझ लो. हर मुसलमान हज यात्रा पर नहीं जा सकता. क्योंकि सऊदी अरब ने हर देश का एक कोटा तय कर रखा है कि वो हर साल अपने यहां से कितने हाजी भेज सकते हैं. क्योंकि मक्का शहर है देश नहीं. और दुनिया में इतने मुसलमान हैं कि कई देशों में आएंगे. सारे मुसलमान पहुंच गए तो रहेंगे कहां, इसलिए कोटा बना दिया गया. इंडोनेशिया का कोटा सबसे ज्यादा है. यहां से 2,20,000 लोग हर साल हज के लिए सऊदी जा सकते हैं. हज के कोटे का ये 14 फीसदी हिस्सा है.
इसके बाद पाकिस्तान (11 फीसदी), भारत (11फीसदी) और बांग्लादेश (8 फीसदी) की बारी आती है. इस लिस्ट में नाइजीरिया, ईरान, तुर्की, मिस्र जैसे देश भी शामिल हैं.
इस बार सऊदी सरकार ने भारत के हज कोटे में 34,500 की बढ़ोतरी की है. पिछले साल यानि 2016 मे देश भर के 21 केन्द्रों से 99,903 हाजियों ने हज कमेटी ऑफ इंडिया के जरिए हज किया और 36 हजार हाजियों ने प्राइवेट टूर ऑपरेटर्स के जरिए हज की अदायगी की थी.

4.  मान लो मेरे एक मिलने वाले हैं. मुसलमान हैं. उन्हें हज पर जाना है क्या करना होगा?

जवाब : हवाई यात्रा करने से पहले आपके पास पासपोर्ट होना चाहिए. जो भारत सरकार की तरफ से बनता है. फिर आपके पास सऊदी अरब का वीज़ा होना चाहिए जो सऊदी सरकार देगी कि आप उनके देश जा सकते हो या नहीं. दूसरा अब तो जगह-जगह ऐसी कमेटियां हैं जो हज पर ले जाने का बंदोबस्त कर देती हैं. बस थोड़ा सा चार्ज लेती हैं. इनके पास पैकेज होते हैं. इस पैकेज में सऊदी अरब में रुकने का इंतजाम. हवाई किराया. वहां खाने पीने का इंतजाम सब शामिल होता है. आप इनको अपना पासपोर्ट बनवाकर दे दीजिए और पैसों की बात कर लीजिए. एक से ही नहीं दो-चार एजेंट से पता कर लीजिए तो खर्चे का अंदाजा लग जाता है. जब आपकी इनसे डील हो जाएगी तो बाकी काम ये करा देते हैं. वीज़ा लगाने तक का काम.
दूसरा तरीका सरकारी है. आप फॉर्म भर दीजिए. अगर आपका नसीब तेज़ हुआ तो आपका नंबर आ जाएगा. फिर सरकार अपने वही दो पैकेज सामने रख देगी जो पहले बताए जा चुके हैं. आप उनमें से एक चुन लीजिये और चले जाइए हज करने.

5. करना क्या-क्या होता है वहां?

जवाब : अल्लाह की इबादत. इबादत. इबादत और कुछ नहीं. इस दौरान कुछ रस्में निभानी होती हैं. जिन्हें मुस्लिम अल्लाह का हुक्म कहते हैं. सब कुछ त्याग कर सिर्फ सफेद रंग की दो चादरों से अपने जिस्म को ढंकना होता है. औरतों के लिए रंग की छूट होती है.
हां उन्हें अलग से एक कपड़े से सिर भी ढकना होता है. फिर वहां काबा की परिक्रमा करनी होती है. बकरे, भेड़ या ऊंट की कुर्बानी करानी होती है. नमाज़े पढ़नी होती हैं. अपने सिर के बाल कटाने होते हैं. ये समझ लो पूरा टाइम अल्लाह की इबादत करनी होती है.

6. औरतें और मर्द क्या एक साथ हज करते हैं?

जवाब : मर्द और औरतें दोनों ही एक साथ हज करते हैं. लेकिन नमाज़ अलग-अलग पढ़ते हैं. वहां कोई रिश्ता नहीं रहता. बस सब अल्लाह के बंदे होते हैं. अगर मियां-बीवी साथ गए हैं तो वो उस वक़्त मियां बीवी का ख्याल नहीं ला सकते. बस अल्लाह का ध्यान लगाना होता है.

7. क्या मैं भी वहां जा सकता हूं?

जवाब : जद्दा से जब आप मक्का या मदीने की तरफ चलोगे तो आपको वहां कुछ साइनबोर्ड लगे नज़र आएंगे. जिनपर अरबी और इंग्लिश में निर्देश लिखे नज़र आएंगे. इनपर ये भी लिखा होता है कि मक्का और मदीने में गैर मुस्लिम का प्रवेश वर्जित है. यानी आप वहां नहीं जा सकते. हिंदू ही नहीं बल्कि यहूदी, ईसाई या फिर किसी और धर्म के मानने वाले भी नहीं जा सकते. बस वो ही जा सकते हैं मुसलमान हैं. ला इलाहा (कलमा) पढ़ते हैं. गैर मुस्लिमों के जाने पर बैन है. वैसे ही जैसे आज भी आप सुनते होंगे कि पीरियड के दौरान औरत मंदिर में नहीं जा सकती. या फिर मस्जिद में नहीं जा सकती. बैन है तो बैन. उनकी सरकार है. उनका कानून है.
इसे ऐसे समझिए कि जैसे सभी लोगों को कन्टोन्मेंट एरिया (सैनिक छावनी) में जाने की इजाज़त नहीं होती, वैसे ही हर देश में कुछ न कुछ ऐेसे इलाके ज़रूर होते हैं जहां सभी लोगों को जाने की इजाज़त नहीं होती. सैनिक छावनी में केवल वही लोग जा सकते हैं जो सेना या फिर उससे जुड़े हों. इसी तरह सऊदी अरब के दो शहर मक्का और मदीना हैं. इन शहरों में उन्हें ही एंट्री मिलती है जो इस्लाम में यकीन रखते हैं. मान लो अगर आपको सैनिक छावनी में जाना है तो उसके लिए कुछ डॉक्युमेंट तैयार कराने पड़ेंगे. किसी की इजाज़त लेनी पड़ेगी. वैसे ही यहां जाने के लिए शर्त है कि आप इस्लाम को स्वीकार करें.

8. कई बार सुना है कि काबा में शिव की मूर्ति है, और अगर कोई हिंदू उसपर गंगाजल चढ़ा दे तो सारे मुस्लिम भस्म हो जाएंगे, तो क्या इसलिए हिंदुओं को नहीं जाने देते?

जवाब : मैंने भी सुना है कि चांद पर एक बुढ़िया सूत कात रही है. मगर सच क्या है विज्ञान बताता है और मैं विज्ञान को इसलिए नहीं मानता, क्योंकि मैं बहुत धार्मिक हूं. ऐसे ही अगर मैं कहूंगा कि ये शिव की मूर्ति की बात झूठ है, क्योंकि वहां पर मेरे जानने वाले बहुत लोग गए हैं. तो आप मानोगे नहीं क्योंकि आप हिंदू हो. और तुम्हें मेरी बात वैसे ही सच नहीं लगेगी जैसे मुझे चांद के बारे में विज्ञान की बात सच नहीं लगती, क्योंकि मैंने अपने सुने पर ही विश्वास कर रखा है. अब कोई कितने भी तर्क पेश कर दे.
हां इतना सच ज़रूर है कि मुहम्मद साहब के पहले तक काबा में बुत रखे हुए थे, जिनकी पूजा यहूदी किया करते थे. जब मुहम्मद साहब का दौर आया तो मनात नाम के बुत तोड़ दिए गए. क्योंकि इस्लाम में मूर्ति पूजा नहीं होती. हो सकता है शिव की मूर्ति वाली बात को इससे ही बल मिला हो. लेकिन भस्म वाली बात तो छोड़ ही दो. एकता कपूर का कोई टीवी सीरियल या बॉलीवुड की फिल्म थोड़े ही न है कि गंगाजल छिड़कने से इनसान भस्म हो जाएंगे.

9. अच्छा ये बताओ कि वो शैतान कौन है जिसे कंकड़ मारने के दौरान भगदड़ मच जाती है और लोग मर जाते हैं.

जवाब : ये शैतान इबलीस है. ये पहले शैतान नहीं था. बल्कि अल्लाह का एक फ़रिश्ता (एंजल) था. बड़ी इबादत करता था अल्लाह की. एक बार क्या हुआ कि अल्लाह ने मिट्टी से एक पुतला बनाया जिसे आदम का नाम दिया. अब अल्लाह ने सारे फरिश्तों से कहा कि आदम के सामने सजदा करो. उसके सम्मान में झुको. इबलीस को ये पसंद नहीं आया और बगावत कर बैठा. उसने कहा कि ऐ अल्लाह तूने इसे मिट्टी से बनाया. और हम एंजल है. ये तो हमसे छोटा है तो क्यों सजदा करें. अल्लाह ने कहा ये मेरा हुक्म है. इबलीस ने कहा मैं इसे सजदा नहीं कर सकता. तो अल्लाह ने कहा अगर मेरा हुक्म नहीं मानेगा तो तू मेरा फ़रिश्ता नहीं है. इबलीस ने कहा कि अगर तू सबको छूट दे दे तो कोई तेरा हुक्म नहीं मानेगा. अल्लाह ने कहा छूट दी. जो मेरा बंदा होगा वो भटकेगा नहीं. मेरा हुक्म मानेगा. इबलीस ने कहा मुझे भी आज़ाद कर दे. फिर देख मैं कैसे लोगों को तेरे हुक्म मानने से भटकाता हूं. तब से अल्लाह ने इबलीस को अपने हुक्म से आज़ाद कर दिया. और इबलीस लोगों को भटकाने लगा.
इस्लाम के मुताबिक ये इबलीस अल्लाह के नबी (दूत) हजरत इब्राहीम को उस वक़्त भी बहकाने आया, जब उन्होंने ख्वाब में देखा कि वो अपने बेटे इस्माइल को अल्लाह की राह में कुर्बान कर रहे हैं. और जब इब्राहीम बेटे को ज़िबाह करने मक्का के मीना मैदान में लेकर पहुंचे तो इबलीस ने बहकाया कि क्यों अपने बेटे को मार रहे हो. ये तो तुम्हारे बुढ़ापे का सहारा है. तब इब्राहीम ने कंकड़ उठाकर उसे मारे कि दूर हो जा मेरी नज़रों से. तू अल्लाह के हुक्म को पूरा करने में रुकावट पैदा कर रहा है. तू शैतान है. तब से ही हज के दौरान कंकड़ मारने की रस्म हो रही है. जहां शैतान ने बहकाया था उस जगह तीन पिलर खड़े हैं जिन्हें हाजी पत्थर मारते हैं. हर कोई पहले पत्थर मारना चाहता है. इस वजह से भगदड़ का माहौल बन जाता है अगर व्यवस्था ठीक नहीं होती है तो हादसा भी हो जाता है और लोग मर जाते हैं. लेकिन ये हर बार नहीं होता. उस जगह काफी लोगों को सऊदी सरकार तैनात करती है ताकि कोई अनहोनी न हो.

10. हज वहीं क्यों होता है? कहीं और क्यों नहीं किया जा सकता?

जवाब : काबा की वजह से कहीं और नहीं हो सकता. पहले भी बताया कि मक्का मुहम्मद साहब का पैदाइशी शहर है. इस्लाम की शुरुआत वहीं से है. और सबसे पहले जो काबा की नींव रखी वो हज़रत इब्राहीम ने ही रखी. यानी दूसरा काबा नहीं बन सकता. क्योंकि अब कोई नबी नहीं है. आखिरी नबी मुहम्मद साहब थे. इसे ऐसे समझो जैसे अयोध्या में राम मंदिर का शोर है. लोग कहते हैं कि राम मंदिर कहीं और नहीं बन सकता, दलील दी जाती है कि राम वहीं पैदा हुए हैं. इसी तरह काबा का है. इसलिए हज वहीं होता है.

इंसानी पाद के बारे में सबसे महत्वपूर्ण जानकारियां

    


पाद होती क्या है?
हवा होती है. वो, जो आप खाते-खाते निकल जाते हैं या दूसरी वजहों से फेफड़ों की जगह पेट में चली जाती है. इसके अलावा आपका खाया खाना जब पचते हुए आंत में पहुंचता है, तो उस पर बैक्टीरिया काम करने लगते हैं. ये बैक्टीरिया हानिकारक नहीं होते, हमारे दोस्त होते हैं, उस स्टार्च और शक्कर को पचाते हैं जिसे हमारा शरीर आसानी से नहीं पचा पाता. इस दौरान भी गैस निकलती है. आमतौर पर इस प्रक्रीया में दो से छह कप तक गैस पैदा होती है. अब गैस शरीर के अंदर जाएगी (और पैदा होगी) तो वो बाहर भी निकलेगी. ये गैस आपके ‘गुदा द्वार’ (अंग्रेज़ी में एनस बेहतर शब्द जानते हों तो बताएं) से बाहर निकलती है. यही पाद है.
पादना बुरी आदत है क्या?
ऐसा लोग कहिते हैं. बचपन से आपको सिखा दिया गया है कि बुरा है तो आपने मान लिया कि बुरा होता है. और ऐसा पीढ़ी दर पीढ़ी हुआ है. (इसलिए आज तक किसी महापुरुष की जीवनी में उनके किए तमाम गैरज़रूरी कामों के ज़िक्र के बावजूद उनके पादने का ज़िक्र नहीं मिलता) इसलिए आपने मान लिया है कि पादना बुरा है. लेकिन सच इससे बिलकुल उलट है. पादना अच्छी सेहत की निशानी है. ये बताता है कि आप पर्याप्त मात्रा में फाइबर खा रहे हैं और आपके शरीर में पाचक बैक्टीरिया की अच्छी संख्या मौजूद है.
पादने पर बदबू क्यों आती है?
कुछ खाने-पीने की चीज़ें ऐसी होती हैं जिनमें सल्फर होता है. जब शरीर इस सल्फर को तोड़ती है (पचाना तोड़ना ही होता है), तो हाइड्रोजन सल्फाइड निकलती है. इसका फॉर्म्यूला होता है H2S. इसकी गंध होती है सड़े हुए अंडे जैसी (या उस से कुछ बुरी, आप जानते ही हैं.) तो अगर आपके खाने में सल्फर है, तो आपकी पाद से बदबू आएगी. जान लीजिए कि टूथपेस्ट में नमक हो न हो, खाने में सल्फर ज़रूर होना चाहिए.
कई सेहतमंद चीज़ों के पचने पर हाइड्रोजन सल्फाइड पैदा होती है- जैसे रेड मीट, पत्तागोभी, डेरी उत्पाद, बीन्स और हरी गोभी. इसलिए पाद में थोड़ी गंध हो, तो ये बुरा या अनचाहा कतई नहीं है. एक बात और है, H2S ज्वलनशील होती है. बाकी हम आपकी इमैजिनेशन पर छोड़ रहे हैं.
और ये बदबू सूंघना सेहत के लिए अच्छा होता है
पाद में हाइड्रोजन सल्फाइड की वजह से बदबू होती है. हाइड्रोजन सल्फाइड ज़्यादा मात्रा में हानिकारक हो सकती है. लेकिन 2014 में मेडिसिनल केमिस्ट्री कम्यूनिकेशन्स नाम के एक जर्नल में छपी यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सटर की रिसर्च में ये दावा किया गया कि बहुत छोटी मात्रा में (मिसाल के लिए जितनी पादने में निकलती है) हाइड्रोजन सल्फाइड माइटोकॉन्ड्रिया को होने वाले नुकसान से बचा सकती है. माइटोकॉन्ड्रिया हमारे शरीर में मौजूद सेल का पावरहाउस होता है.
इस आधार पर रीसर्च में संभावना जताई गई कि हाइड्रोजन सल्फाइड के माइटोकॉन्ड्रिया पर असर के बारे में और जानकारी इकट्ठा होने पर लकवे, अर्थराइटिस और दिल की बीमारी का बेहतर इलाज हो पाएगा. इस खोज का ज़िक्र टाइम मैगज़ीन के जुलाई 2014 अंक में भी था.
लेकिन ज़्यादा गंध भी ठीक नहीं
पाद वो गैस है जो आपके शरीर में कुछ देर रह कर निकली है. इसलिए वो आपकी सेहत का इंडिकेटर भी होती है. अगर आपकी पाद बेहद बदबूदार है तो आपकी सेहत खराब है, या डाइट पटरी से उतरी हुई है. यहां बात हाज़मा खराब होने से आगे जा सकती है. बेहद बदबूदार पाद लैक्टोस एलर्जी (लैक्टोस डेरी उत्पादों में पाया जाने वाला कंपाउंड) की निशानी हो सकती है. गंभीर मामलों में बात कोलॉन कैंसर तक जा सकती है.
बिना गंध वाली पाद
कभी-कभी शरीर सिर्फ वो हवा बाहर निकाल रहा होता है, जो खाते-खाते शरीर में चली गई. तो इसमें हाइड्रोजन सल्फाइड नहीं होती. तो इस तरह की पाद में गंध नहीं होती. ये डकार की तरह ही होती है, बस शरीर की दूसरी तरफ से निकल रही होती है.
कितनी बार पादना सेहतमंद है?
एक इंसान रोज़ औसतन 20 बार तक पादता है. वेजिटेरियन लोगों के शरीर में नॉन वेज खाने वालों से ज़्यादा गैस बनती है. ऐसा वेजिटेरियन डाइट में मौजूद कार्बोहाइड्रेट की वजह से होता है. कई सारी सब्ज़ियों में सल्फर भी होता है.
यदि आप बहुत ही कम पादते हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी डाइट में फाइबर की कमी है. इसी तरह पाद की अति भी खराब सेहत की निशानी होती है.
आवाज़ और बेआवाज़ पाद
पादते वक्त गैस की मात्रा और शरीर के पॉश्चर के आधार पर तय होता है पादने में आवाज़ होगी कि नहीं. तो दोनों तरह की पादें नॉर्मल हैं. पादने में ये अकेली चीज़ है, जिसका आपकी सेहत से ताल्लुक नहीं है. बस इतना है कि आवाज़ के डर से जो लोग पाद को कंट्रोल करते हैं, उन्हें ज़्यादा देर तक ऐसा नहीं करना चाहिए.
लड़कियां भी पादती हैं?
पादना एक बेहद सामान्य क्रिया है. लेकिन साफ सफाई के कुलीन कॉन्सेप्ट के तहत इसे ‘शर्म’ से जोड़ दिया गया है. इसलिए लड़के तो एकबारगी मान भी लें, लड़कियों से यही अपेक्षित होता है कि वो ‘लाज-शर्म रखें’, पादने जैसी ‘छिछली’ बातें करने से झिझकें. या फिर ये कह दें कि नहीं, हमारे शरीर में तो गैस बनती ही नहीं.
विज्ञान कहता है लड़कों की तरह लड़कियां भी पादती हैं और उनके जितना ही पादती हैं. लेकिन उनकी कंडीशनिंग इस तरह की कर दी गई है कि वो लड़कों जितना खुल कर इस बारे में कुछ कहती नहीं.
हम ये नहीं कह रहे कि माथे पर लिख लिया जाए कि मैं पादता/पादती हूं. लेकिन इसे लेकर डिनायल मोड से बाहर आ जाने से मानव जाति का भला ही होगा.
तो अब आप जान गए हैं कि पाद हल्की ज़रूर होती है लेकिन उसे हल्के में लेने की ज़रूरत कतई नहीं है.