Shamsher ALI Siddiquee

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गाज़ी के डूबने का क्या था असली सच?

    


3 दिसंबर, 1971 की रात सवा बारह बजे विशाखापत्तनम बंदरगाह पर ज़बरदस्त धमाका सुनाई दिया.

धमाका इतना ज़ोरदार था कि बंदरगाह की इमारतों के शीशे टूट गए. हज़ारों लोग जो रेडियो पर प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के राष्ट्र के नाम संदेश का इंतज़ार कर रहे थे, ये सोचकर अपने घरों से बाहर निकल आए कि भूकंप आ गया है.
कुछ लोगों ने देखा कि तट से कुछ दूरी पर पानी की एक बड़ी लहर कई गज़ तक हवा में उठी और फिर गिर कर समुद्र में समाती चली गई.
बाद में जनरल जेएफ़आर जैकब ने अपनी किताब 'सरेंडर एट ढाका' में लिखा, "4 दिसंबर की सबह पूर्वी नौसेना कमान के प्रमुख एडमिरल कृष्णन ने मुझे फ़ोन किया कि कुछ मछुआरों को विशाखापत्तनम बंदरगाह के पास एक पाकिस्तानी पनडुब्बी के अवशेष मिले हैं."
उस समय विशाखापत्तनम पनडुब्बी ठिकाने के प्रमुख कैप्टेन के एस सुब्रमणियन अपनी किताब 'ट्रांज़िशन टू ट्रायंफ' में लिखते हैं, "4 दिसंबर की सुबह जब हमने घटनास्थल का मुआएना किया तो हमें डूबी हुई पनडुब्बी का पता चला. हमने अपने ग़ोताख़ोरों को समुद्र में उतारा तो पता चला की पाकिस्तानी पनडुब्बी उथले पानी में डूबी हुई है."
"हमने अनुमान लगाया कि गाज़ी विशाखापत्तनम बंदरगाह में बारूदी सुरंग लगा रही थी. तभी उसकी ही लगाई हुई सुरंग में विस्फोट हुआ और पनडुब्बी बरबाद हो गई."
पीएनएस गाज़ी वास्तव में एक अमरीकी पनडुब्बी थी, जिसका पुराना नाम यूएसएस डियाबलो था. इसे 1963 में अमरीका ने पाकिस्तान को दिया था.
जब 1971 का युद्ध छिड़ा तो इस पनडुब्बी को भारत के एकमात्र विमानवाहक पोत विक्रांत को डुबोने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. भारत को ये अंदाज़ा था, इसलिए तय ये किया गया कि विक्रांत को विशाखापत्तनम बंदरगाह से हटा कर किसी और स्थान पर ले जाया जाए, लेकिन पाकिस्तान को ये भास दिया जाए कि विक्रांत विशाखापत्तनम में ही है.
विशाखापत्तनम में खड़े एक पुराने विध्वंसक आईएनएस राजपूत से कहा गया कि वो विक्रांत के कॉल साइन इस्तेमाल करे और उसी रेडियो फ़्रीक्वेंसियों पर खूब सारी रसद की मांग करे जो कि विक्रांत जैसे विशालकाय पोत के लिए ज़रूरी होती हैं.
विशाखापत्तनम के बाज़ार से बहुत बड़ी मात्रा में राशन, मांस और सब्ज़ियाँ ख़रीदी गईं ताकि वहाँ मौजूद पाकिस्तानी जासूस ये ख़बर दे सकें कि विक्रांत इस समय विशाखापत्तनम में खड़ा है. इस बीच विक्रांत को बहुत गोपनीय तरीके से अंडमान भेज दिया गया.
पाकिस्तानी नौसेना ने गाज़ी को विक्रांत को डुबोने के लिए इस यकीन के साथ विशाखापत्तनम रवाना किया कि विक्रांत वहाँ डेरा डाले हुए है. इससे पहले कि वहाँ गाज़ी कुछ कर पाती, उसके ऊपर एक ज़बरदस्त विस्फोट हुआ और ये पनडुब्बी समुद्र की गहराइयों में डूब गई.
लेकिन एडमिरल कृष्णन अपनी किताब 'नो वे बट सरेंडर-एन अकाउंट ऑफ़ इंडो-पाकिस्तान वार इन द बे ऑफ़ बंगाल' में इस घटना का एक दूसरा ही विवरण देते हैं.
कृष्णन लिखते हैं, "मैंने आईएनएस राजपूत के कमांडर को आदेश दिए कि वो जल्द से जल्द पोत में ईधन भरवाएं और बंदरगाह छोड़ दे. राजपूत ने तीन दिसंबर की आधी रात से कुछ समय पहले ही बंदरगाह छोड़ दिया. जैसे ही उसे समुद्र में कुछ हलचल दिखाई दी, उसने डेप्थ चार्ज किया और आगे बढ़ता चला गया."
अगर एडमिरल कृष्णन की ये दलील सच मानी जाए तो संभावना बनती है कि राजपूत ने गाज़ी को डुबोया. दूसरी संभावना ये है कि गाज़ी अपनी ही बिछाई बारूदी सुरंग पर से गुज़र गई जिसकी वजह से उसमें विस्फोट हुआ. तीसरा अनुमान ये है कि जिन बारूदी सुरंगों को पनडुब्बी ले कर चल रही थी, उनमें अचानक विस्फोट हुआ और गाज़ी ने जलसमाधि ले ली.
चौथी संभावना ये व्यक्त की गई कि पनडुब्बी में ज़रूरत से ज़्यादा हाइड्रोजन गैस जमा हो गई जिसकी वजह से पनडुब्बी में विस्फोट हुआ. गाज़ी के अवशेषों की जांच कर अधिकतर भारतीय अफ़सर और ग़ोताख़ोर चौथी संभावना से अधिक सहमत दिखाई देते हैं.
गाज़ी के मलबे की जांच करने वाले लोग बताते हैं कि गाज़ी का ढ़ाँचा बीच से टूटा था न कि उस जगह से जहाँ टारपीडो रखे रहते हैं.. अगर टारपीडो या बारूदी सुरंग में विस्फोट हुआ होता तो नुक़सान पनडुब्बी के आगे वाले हिस्से में ज़्यादा होता. अगर गाज़ी अपनी ही बिछाई हुई बारूदी सुरंग से नष्ट हुई होती तो उसका बाहरी हिस्सा ज़्यादा क्षतिग्रस्त हुआ होता.
इसके अलावा गाज़ी के मैसेज लॉग बुक से जितने भी संदेश भेजे गए थे, उनमें से अधिकतर में ज़िक्र था कि पनडुब्बी के अंदर ज़रूरत से ज़्यादा हाइड्रोजन गैस बन रही है.
केएस सुब्रमणियन लिखते हैं, "संभवत: जब बनी हुई हाइड्रोजन गैस सभी सुरक्षा मानकों को पार कर गई तो एक ज़बरदस्त विस्फोटों की एक सिरीज़ शुरू हो गई जिसने पनडुब्बी में रखे सभी हथियारों, बारूदी सुरंगों और टारपीडोज़ को अपनी चपेट में ले लिया."
इस बात के सबूत बिल्कुल न के बराबर हैं कि भारतीय युद्धपोत आईएन एस राजपूत के डेप्थ चार्ज से गाड़ी डूबी थी.
इसकी पुष्टि करते हुए जनरल जैकब अपनी किताब 'सरेंडर एट ढाका' में लिखते हैं, "चार दिसंबर को मेरे पास एडमिरल कृष्णन का ये पूछने के लिए फ़ोन आया कि मैंने दिल्ली को ये ख़बर तो नहीं कर दी कि हमने गाज़ी को डुबो दिया है. मैंने कहा कि मैंने ये सोच कर दिल्ली को नहीं बताया कि आपने उन्हें पहले ही बता दिया होगा. ये सुनते ही कृषणन ने चैन की सांस ली और मुझेस कहा कि कल जो मेरी आपसे बात हुई थी, उसे आप भूल जाएं."
वाइस एडमिरल मिहिर बोस अपनी किताब वॉर इन इंडियन ओशन में लिखते हैं, "1971 की लड़ाई ख़त्म होने के बाद अमरीका और रूस दोनों ने अपने ख़र्चे से ग़ाज़ी को समुद्र के तल से ऊपर उठाने की पेशकश की थी, लेकिन भारत सरकार ने उसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया था."
"गाज़ी अभी भी अपने सारे रहस्यों के साथ विशाखपत्तनम बंदरगाह के बाहर समुद्री कीचड़ में धंसी हुई है. लोग सिर्फ अनुमान लगा सकते हैं कि उसके साथ ऐसा क्या हुआ होगा, जिसने उसे समुद्र के रसातल तक पहुंचा दिया."

जानिए क्यों मनाया जाता है वेलेंटाइंस डे, और इस दिन का क्या है महत्व

    


दुनिया के हर धड़कते दिल को आज के दिन यानि 14 फरवरी का बेसब्री से इंतजार रहता है। प्यार करने वाले इस दिन को अपने अपने ढंग से मनातें हैं। लेकिन क्या आपकों मालूम है कि आखिर क्यों मनाते है वैलेंटाइन डे और इस दिन का क्या महत्व हैं आज हम आपकों इसके बारे में बताने जा रहे है। 
 
माने तो प्यार करने वालों के लिए हर दिन खास होता है और अपने साथी से प्यार जताने के लिए दिन और तारीख मायने नहीं रखती लेकिन दौडती हुई जिंदगी के लिए आज का दिन मोहब्बत के नाम कर दिया गया। कई देशों में इस दिन को मनाया जाता हैं। 


आइयें जानें की वैलेंटाइन की कहानी क्या है.
वैलेंटाइन डे की सच्ची कहानी ( Real Story Behind Valentine’s Day )
वैलेंटाइन डे की कहानी की शुरुआत रोम साम्राज्य में तीसरी शताब्दी से शुरू होती है जहाँ का शासक था कलाउडीयस 2. कलाउडीयस बहुत ही क्रूर और निर्दयी राजा था, साथ ही उसमें सत्ता और अपने साम्राज्य के विस्तार की बहुत भूख थी. जिसके लिए वो किसी भी हद तक जा सकता था. इसीलिए उसने उस वक़्त अनेक लड़ाईयां लड़ी और अनेक युद्ध जीते. किन्तु युद्ध में उसकी सेना के भी अधिक जवान शहीद होते चले गये. उसने नयी फ़ौज को तैयार करने के लिए देशवासियों को सामने आने का आदेश दिया. किन्तु कोई भी उसकी सेना में भर्ती होने नहीं आया.
राजा का नया कानून ( New Law by king )
राजा ने इसका कारण जानने की कोशिश की तो उसने पाया कि कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़कर युद्ध में मरने के लिए नही आना चाहता. इससे नाराज होकर कलाउडीयस ने ये नियम बना दिया कि अब रोम में की भी शादी नही करेगा. इससे जनता और रोम में समाज में अचानक से उथल पुथल मच गई और सभी परेशान हो गये क्योकि कोई भी शादी नही कर पा रहा था. राजा का आतंक और डर इतना था कि कोई इतनी हिम्मत नही कर पा रहा था कि वो राजा के सामने इसका विरोध कर सके या अपनी समस्या को जाकर बता सके.
संत वैलेंटाइन ( Saint Valentine )
इस स्थित में एक साधारण सा पादरी सामने आया और प्यार के लिए खड़ा हुआ, उस पादरी का नाम था संत वैलेंटाइन. उन्होंने राजा के नए कानून को जानते हुए भी दो प्यार करने वालों की छुप छुपकर शादी करनी शुरू कर दी. जैसे ही राजा कलाउडीयस को इस बारे में पता चला उसने वैलेंटाइन को कैद करने के लिए अपने कुछ सिपाहियों को भेजा और उसे जेल में डाल दिया.
अगले दिन उससे राजा के निर्णय या कानून की तौहीन करने की वजह पूछी तो उसने कहा कि प्यार वो खुबसूरत अहसास है जिसे किसी से नही छीनना चाहियें. उसने बताया कि स्त्री को ईश्वर ने इसीलिए बनाया है ताकि वो उसका सहारा और साहस बन सके. इन्ही के प्रेम की वजह से और उनसे दोबारा मिलने की चाह में ये युद्ध में अद्वितीय प्रदर्शन कर पाते है. साथ ही उन्होंने बताया कि बिना स्त्री के पुरुष अधुरा ही रहता है.
मृत्यु दंड ( Death Punishment )
राजा को वैलेंटाइन की बात समझ में तो जरुर आ गई किन्तु उसने अपने घमंड और अपने आदेश का पालन ना करने की वजह से वैलेंटाइन को फ़ासी की सजा मृत्यु दंड के रूप में सुना दी. उसे जेल में डाल दिया गया. जेल में वो अपनी मृत्यु की तारीख का इंतजार कर ही रहा था कि उसे वहां एक अंधी लड़की से प्यार हो गया. ये अंधी लड़की वहाँ के जेल अधिकारी की बेटी थी.
संत वैलेंटाइन्स का अंधी लड़की से प्रेम ( Saint Valentine’s Love with Blind Girl )
जिस दिन वैलेंटाइन की फांसी का समय आया तो उसने अपने आखरी शब्दों को लिखने की गुजारिश की, जिसे राजा ने मान्य कर दिया. वैलेंटाइन ने उस वक़्त लिखने के लिए स्याही के रूप में एक फुल के रस का इस्तेमाल किया. उसके बाद उसे फांसी पर लटका दिया गया. बाद में जब लड़की ने वैलेंटाइन के  आखरी शब्दों के रूप में लिखी कविता को सुना तो एक चमत्कार हुआ और उस अंधी लड़की को दिखाई देने लगा. वैलेंटाइन और उस अंधी लड़की के बीच के इस छोटी अवधि के प्रेम की चर्चा सब जगह हुई. इस तरह लोगो को प्यार की असली ताकत का पता चला.
वैलेंटाइन ने अपना सारा जीवन लोगो के बीच प्रेम बढ़ाने और प्रेम करने वाले लोगो को मिलाने में बिता दिया. उनका मानना था कि व्यक्ति के शरीर को मारा जा सकता है किन्तु उसकी आत्मा अमर है इसलिए आत्मा से किये सच्चे प्रेम को कभी मारा नही जा सकता. उनके इसी कार्य के लिए चर्च के सभी पादरियों ने उनके सम्मान के लिए एक शाही भोज रखा. उनके सम्मान में विशेष दिन को रखने के लिए उन्होंने 14 फ़रवरी को चुना क्योंकि रोम में माना जाता है कि ये दिन पक्षियों के प्यार की शुरुआत का दिन है. आज भी रोम में संत वैलेंटाइन का नाम उसी सम्मान के साथ लिया जाता है और इस दिन को उनके प्यार के लिए योगदान और समर्पण के लिए मनाया जाता है.
भारत में वैलेंटाइन डे ( Valentine in India )
भारत में भी अब वैलेंटाइन डे धूम – धाम से मनाया जानें लगा है. लड़के – लड़कियां इस दिन एक दुसरें को वैलेंटाइन डे का कार्ड देतें है. प्यार एक ऐसा अहसास है जिससें कोई परिचित नहीं है. प्यार के अहसास को महसूस करने के लिए प्यार का अधूरापन भी जरूरी है. अगर खुदा ने यह पूरा कर दिया होता तो इंसान को किसी चीज की जरूरत नहीं होती. कभी आपनें सोचा है कि क्यों किसी को खो देनें का दर्द किसी को पा लेने की खुसी से भी ज्यादा असर करता है. जब हम किसी से प्यार करतें है और जब हम अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच पाते तो इसका दर्द हमेशा हमारें अंदर जिंदा रहता है. दिलों को दिलों से जोड़ने वाला ये अहसास दिलों में नमी भी भर देता है. यह अहसास मिठे दर्द से शुरू होता है. इश्क ऐसा जज्बा है जिसमें डूबकर ही इसे समझा जा सकता है. ईश्वर ने हमें एक खूबसूरत सा दिल दिया है जिसका काम सिर्फ प्यार करना है. दिल प्यार करना जानता है, प्यार करता है, और प्यार चाहता है. इसलिए आप भी इस बार वैलेंटाइन डे पर अपने साथी को अपने प्यार का अहसास दिलाकर उनके साथ अपने जीवन की नयी शुरुआत करें.

फ्रेंडशिप डे: आखिर क्या हैं इस दिन के मायने

    


फ्रेंडशिप डे यानि दोस्ती का दिन. अब भला आप सोचेंगे कि आखिर यह दोस्ती के दिन को लोग इतना महत्व क्यूं देते हैं. भारत में तो हर दिन हर शाम लोगों को दोस्तों का साथ मिलता है. दरअसल
फ्रेंडशिप डे पश्चिमी सभ्यता की सोच और मांग है जहां के एकल जीवन में अकसर दोस्तों का महत्व बेहद कम हो जाता है.
भारत में तो प्राचीन सभ्यता से ही दोस्ती की कई मिसालें देखने को मिलती हैं. राम ने दोस्ती के वास्ते ही सुग्रीव की मदद की थी,
कृष्ण और सुदामा की दोस्ती की मिसाल तो जमाना आदि काल से देता आ रहा है. पश्चिम की तुलना में भारत में दोस्ती व्यापक पैमाने पर फैली हुई है. यहां समाज में लोग ज्यादा घुलमिल कर रहते हैं.


फ्रेंडशिप डे की शुरुआत
व्यक्ति के जीवन में दोस्तों की अहमियत को समझते हुए और दोस्तों के प्रति आभार और सम्मान व्यक्त करने के उद्देश्य से अमेरिकी कांग्रेस ने सन 1935 में फ्रेंडशिप डे मनाने की घोषणा कर दी थी. अमेरिकी कांग्रेस के इस घोषणा के बाद हर राष्ट्र में अलग-अलग दिन फ्रेंडशिप डे मनाया जाने लगा.
भारत में यह हर वर्ष अगस्त माह के पहले रविवार को मनाया जाता है. सन 2011 से संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस दिन को एकरूपता देने और पहले से अधिक हर्षोल्लास से मनाने के उद्देश्य से 30 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय फ्रेंडशिप डे घोषित कर दिया है. लेकिन इसके बावजूद इस वर्ष अधिकतर देशों में फ्रेंडशिप डे 06 अगस्त को मनाया जाता है यानि अगस्त के पहले रविवार को.
दोस्ती का एक रिश्ता ऐसा है जो हम बनाते हैं. दोस्त से हम अपने दिल की सारी बातें कह सकते है. प्रेम, विश्वास और आपसी समझदारी के इस रिश्ते को दोस्ती कहते हैं. दोस्ती का रिश्ता जात-पांत, लिंग भेद तथा देशकाल की सीमाओं को नहीं जानता. पर इन सबके बावजूद हमारे समाज में एक लड़का और एक लड़की की दोस्ती को लेकर अकसर सवाल खड़े किए जाते हैं. एक लड़के और लड़की की दोस्ती को सहजता से लेने की बजाय उन पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है.
एल लड़के और लड़की की दोस्ती पर प्रश्न उठाने वालों को अकसर यह डर सताता है कि कहीं दोनों प्यार ना कर बैठें, वह प्यार जिसे चाहते तो सभी हैं लेकिन जब यही प्यार कोई अपना कर ले तौबा-तौबा करने लगते हैं.
आज फ्रेंडशिप डे के दिन हम उम्मीद करते हैं समाज अपनी विचारधारा में बदलाव करेगा और संसार में दोस्ती की नई बयार बहेगी.
30 जुलाई को होता है इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे
दुनियाभर के अलग-अलग देशों में फ्रेंडशिप डे अलग-अलग दिन मनाया जाता है। 27 अप्रैल 2011 को संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा ने 30 जुलाई को आधिकारिक तौर पर इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे घोषित किया था। हालांकि भारत सहित कई दक्षिण एशियाई देशों में अगस्त के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है। ओहायो के ओर्बलिन में 8 अप्रैल को फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है।


इन 25 यारों से उपरवाला बचाए

सर्वज्ञानी: आपने आखिरी बार अपनी बात ऐसे दोस्त के सामने कब सही साबित किया था? याद नहीं है न? ऐसे दोस्तों को तो जरूर याद कर रहे होंगे आप।

म्यूजिक के ज्ञानी: ऐसे दोस्त, जो हर सिचुएशन में आपके लिए बढ़िया गाना सुझाते हैं, और कहते हैं-इसे सुन। मस्त हो जाएगा।

आंखों में फटाफट आंसू लाने वाले दोस्त: हमारे फ्रेंड सर्कल में कोई न कोई ऐसा दोस्त जरूर होता है, जो बात बात पर इमोशनल हो जाता है। कई बार तो वो आपको रुला भी देता है।

मोटिवेट करने वाला दोस्त: जब आपका समय खराब चल रहा हो, तभी दोस्त आकर कहे कि अबे, ये काम तो हमने कर लिया, तुम्हारे लिए तो छोटी बात है। परेशान मत हो, काम हो जाएगा। ऐसे खास दोस्तों के लिए ही फ्रेंडशिप डे बना है।

हमेशा भरोसा दिलाने वाला दोस्त: आप जब भी कभी खुद को अकेला महसूस कर रहे हों, तो ऐसे दोस्त आपको हमेशा हंसाने की कोशिश करते रहते हैं। आप उनके रहते कभी खुद को अकेला महसूस कर ही नहीं सकते।

कॉमन फ्रेंड: एक ही लड़की पर दो के दोनों दोस्तों का फ्लैट हो जाना। पर, नजरअंदाज करते हुए एक-दूसरे से उसके बारे में इन्फॉमेशन निकलवाना। ऐसे दोस्त हर किसी की लाइफ में जरूर होते हैं।

असली दोस्त: ऐसे दोस्त, जो हमेशा काम आते हैं। हर जरूरत में साथ खड़े होते हैं।

जीत की खुशी दिलाने वाला दोस्त: जब आप कोई काम कर रहे हों, या मुश्किल के दौर से गुजर रहे हों। तब आपकी जीत पर सबसे पहले बधाई देने वाला दोस्त आपका सच्चा दोस्त होता है। जीत मिलते ही वो दोस्त गले से लगा लेता है।

बात बात पर नुक्श निकालने वाला दोस्त: सबकी लाइफ में कोई न कोई ऐसा दोस्त होता है, जो हर बात में टांग खींचता है। आपकी हर बात को काटता है।

हमेशा दोस्ती पर अफसोस जाहिर करने वाला दोस्त: छोटी मोटी बात पर ये कहना कि तुझसे दोस्ती करके गलती कर दी। याद आया ऐसा कोई दोस्त?

आपको कभी न समझ पाने वाला दोस्त: ऐसे भी दोस्त खास होते हैं। जो हर बात पे कहते हैं, अरे-मुझे लगता था कि ये काम तुम कर ही नहीं पाओगे।

इमोशनल अत्याचारी दोस्त: जी हां, काम करो तो ठीक है। नहीं करो, तो आगे से बात मत करना वाले दोस्त। ऐसे दोस्तों का खूब मजाक भी उड़ता है। अक्सर फ्रेंड सर्कल में ऐसे दोस्तों को नौटंकी बोला जाता है।

चौंक जाने वाले दोस्त: आप कोई काम कर रहे हों, और वो हो जाने पर जो दोस्त चौंक कर कहते हैं कि अरे, ये काम हो गया? दरअसल, उन्हें भरोसा ही नहीं होता कि ये काम आप कर भी सकते हैं। ऐसे भी दोस्त हमारे सर्कल में होते ही होते हैं।

भुलक्कड़ दोस्त: ऐसे दोस्त, जो आपका जन्मदिन तक भूल जाएं। और फिर कहें कि याद क्यों नहीं दिलाया। आगे बोलें कि सॉरी यार, मुझे कुछ याद ही नहीं रहता। याद आई ऐसे बदमाश दोस्त की?

क्या सोचा था, क्या निकले: ऐसे भी दोस्त आपकी लाइफ में होते हैं, जो छोटी सी गलती होते ही चीखते हैं। और फिर कहते है कि तुझे अच्छा समझा था, पर तू तो धोखेबाज निकला।

सबसे अलग और सबसे खास दोस्त: आपके सबसे करीब वाला दोस्त। जो हर बात में आपकी अहमियत जताता हो।

सच्चे प्यार पर यकीन करने वाला दोस्त: याद करें, आपकी फ्रेंड सर्कल में कोई न कोई मजनू निकल ही आएगा। और अगर आप किसी को पसंद करते हैं, तो ये कहकर वो आपको बचाएगा कि सच्चा प्यार होगा, तो जरूर मिलेगा।

सीक्रेट क्रश: जी हां, आपके फ्रेंड सर्कल में कोई ऐसा भी होता है, जो मन से तो आपको चाहता है। पर कभी कहता नहीं। ऐसे दोस्तों के राज काफी समय बाद खुलते हैं।

कही भी खाने का मौका ढूंढने वाले दोस्त: याद करिए, हॉस्टल लाइफ में आप किन दोस्तों के साथ बिन बुलाए ही शादी-पार्टियों में घुस जाते थे?

पागल दोस्त: अगर आप किसी पार्टी में गए हों, और वापस लौटते ही दोस्त सवाल पूछे। कोई मिली क्या? ऐसे दोस्त तो होंगे ही आपके पास।

इंस्पायर्ड करने वाला दोस्त: अरे, उसे देख न। कल तक लफंगई करता था, आज कहां पहुंच गया। अब से हम सभी मेहनत करेंगे और उसके जैसा बनेंगे। ऐसा कहने वाले दोस्त भी सबकी लाइफ में होते हैं।

फिलॉसफी झाड़ने वाले दोस्त: हर बात का कोई न कोई लॉजिक निकाल देने वाले दोस्त भी लाइफ में होते हैं। इनके बिना लाइफ बोरियत लगने लगती है।

आपको अपनी ओर खींचने वाले दोस्त: ऐसे भी दोस्त हर किसी की लाइफ में होते होंगे, जिनके पास आप हमेशा न भी जाना चाहें, तो वे आपको खींच ही लाते हैं।

आपकी गलती निकालने वाला दोस्त: आप कोई भी काम कितने ही सही ढंग से न कर लें। पर इस तरह के दोस्त आपकी हर बात में कोई न कोई गलती निकाल ही देते हैं।


असली 
असली दोस्त: ऐसे दोस्त, जो हमेशा काम आते हैं। हर जरूरत में साथ खड़े होते हैं।

30 जनवरी 1948: महात्मा गांधी का आख़िरी दिन!?

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जनवरी से गांधी का जुड़ाव और भी कई स्तरों पर है। जनवरी में ही गांधी ने अपने जीवन का आख़िरी उपवास किया। जनवरी ख़त्म होने को ही थी कि गाँधी की ज़िंदगी ख़त्म कर दी गई। इसलिए गांधी और भारत के बीच के रिश्ते को समझने के लिहाज़ से जनवरी एक महत्वपूर्ण महीना है।

इसकी शुरुआत भारत और गांधी के प्रेम प्रसंग से हुई जो बत्तीस साल तक चला। उसके बाद शुरू हुआ गांधी के साथ भारत का संघर्ष। वे अपने ही मुल्क से लड़ रहे थे और हारा हुआ महसूस कर रहे थे।

इसका अंत हुआ गाँधी की भारत से निराशा के साथ। कम से कम भारत के बड़े हिस्से के हिंदू उनसे अधिक निराश हो चुके थे। उनके मुताबिक़ गांधी उनके लिए न सिर्फ़ ग़ैरज़रूरी हो गए थे, बल्कि उनको लगने लगा था कि गांधी का जीवित रहना भारत के लिए ख़तरनाक हो सकता था।

चूल्हा नहीं जला

इसलिए जब नाथूराम गोडसे ने उन्हें गोली मारकर उनकी इहलीला समाप्त कर दी तो एक तरफ़ कई घरों में चूल्हा नहीं जला, लेकिन दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों और समर्थकों ने मिठाइयाँ बांटी और दीवाली मनाई। आज जब वह संघ भारत की सत्ता पर क़ाबिज़ है। तो यह एक मौक़ा हो सकता है यह विचार करने का कि क्या अंतिम रूप से गाँधी के विचारों को विदाई दे दी गई है।

12 जनवरी,1948 को गांधी ने अपनी शाम की प्रार्थना सभा में अगले दिन से बेमियादी उपवास का ऐलान किया। गाँधी 78 साल के हो चुके थे। वे उपवास करने में माहिर थे, लेकिन इस थकी देह और उम्र में इस फ़ैसले ने पूरे देश को चिंता और हैरानी में डाल दिया।

गांधी की मांग इस बार अपने ही लोगों से थी और वे भी ख़ासकर हिंदुओं से। वे हिंदुओं, सिखों और मुसलमानों के दिलों के मिलने की मांग कर रहे थे।

दो मुल्क
1946-47 गाँधी ही नहीं देश के सभी नेताओं के लिए बेहद थकान भरे साल थे। आज़ादी क़रीब आ रही थी, लेकिन यह दो मुल्कों के बनने का वक़्त भी था। पूरे देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अकल्पनीय हिंसा भड़क उठी थी।

दोनों ही अमानवीयता की चरम को छूने को बेताब थे। जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन (सीधी कार्रवाई) के ऐलान ने कलकत्ते में क़त्लोग़ारत की शुरुआत कर दी थी।

गांधी वहां गए और उपवास पर बैठ गए। तभी हिंसा के दोषी माने जाने वाले सुहरावर्दी वहां आए और उन्होंने माफ़ी माँगी। इस प्रकार कलकत्ते में अमन क़ायम हुआ।

12 जनवरी को गांधी ने कहा, “जब मैं नौ सितंबर को कलकत्ते से दिल्ली लौटा तो इरादा पश्चिम पंजाब जाने का था, लेकिन ऐसा न हो सका। उस समय ख़ुशदिल दिल्ली मुर्दों का शहर लग रही थी। मैं जब ट्रेन से उतरा तो हर चेहरे पर उदासी पुती थी। सरदार प्लेटफ़ॉर्म पर मौजूद थे। उन्होने बिना वक़्त गँवाए मुझे इस महानगर की गड़बड़ियों के बारे में बताया।

मैंने फ़ौरन समझ लिया कि मुझे दिल्ली में ही रहना है और ‘करना है या मरना है'। उन्होंने आगे कहा, "हालांकि फ़ौज और पुलिस की वजह से ऊपरी अमन था, लेकिन दिलों में तूफ़ान था। वह कभी भी फूट सकता था।

"इससे मेरा ‘करने’ का संकल्प पूरा नहीं होता था और वही मुझे मौत से अलग रख सकता था, मौत जो अतुलनीय मित्र है। जिस दिल्ली में ज़ाकिर हुसैन इत्मीनान से न चल-फिर सकें, वह उनकी नहीं हो सकती थी।

मौत की ओर क़दम

गांधी ने अपने प्रयासों को नाकाफ़ी मानकर मौत की तरफ़ क़दम बढ़ाने का फ़ैसला किया। गांधी ने कहा, "जब तक आज तक मिलकर रहने वाले हिंदू और मुसलमान उन्हें यक़ीन न दिला दें कि उन्होंने आपसी रंजिश मिटा दी है और साथ-साथ रहने को तैयार हैं, तब तक वे उपवास नहीं तोड़ेंगे।"

दिल्ली पाकिस्तान से आए शरणार्थियों से भरी हुई थी। उनके साथ पाकिस्तान में हिंदुओं पर हुए ज़ुल्म की भयानक कहानियां भी आ रहीं थीं। यहाँ मुसलमानों पर हमले हो रहे थे, वे अपने इलाक़ों को छोड़ने पर मजबूर थे। मस्जिदों को तोड़ा और मंदिरों में बदला जा रहा था। महरौली के ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन के मज़ार पर हिन्दुओं का क़ब्ज़ा हो गया था।

गांधी की मांग थी कि शरणार्थी हिंदू और सिख, मुस्लिम घरों और पूजा स्थलों से निकलें। ये पाकिस्तान से अपना सब कुछ खो कर आए थे और यहाँ उनसे जनवरी की कड़ाके की ठंड को झेलने को कहा जा रहा था। वे गाँधी के उपवास से बेहद नाराज़ थे। दिल्ली में ‘मरता है तो मरने दो’ के नारे लग रहे थे। गाँधी अविचलित थे।

वे पाकिस्तान जाना चाहते थे और वहां मुसलमानों को वही कहना चाहते थे जो यहाँ हिन्दुओं को कह रहे थे। आख़िर नोआखाली के हमलावर मुसलमानों की नफ़रत झेलकर भी उन्होंने उन्हें हिंसा के रास्ते से अलग कर लिया था, लेकिन अगर यहाँ मुसलमानों पर हमले होते रहे तो वे किस मुंह से पाकिस्तान जाएंगे।

इंसाफ़ और उदारता की माँग

उन्होंने बँटवारे की वजह से संसाधनों के बँटवारे में भी भारत से इंसाफ़ और उदारता की माँग की और पाकिस्तान को उसका हिस्सा देने को कहा। गाँधी के बेटे ने कहा कि वे उपवास करके ग़लत कर रहे थे। उनके जीवित रहने पर लाखों जानें बच सकती थीं। गाँधी ने बेटे की अपील भी ठुकरा दी।

गाँधी का यह उपवास सत्रह तारीख़ तक चला। दिल्ली और भारत ही नहीं पूरी दुनिया की निगाहें इस विचित्र उपवास पर लगी थीं। एक सनातनी हिंदू अपने ही धर्मवालों से इस उपवास के ज़रिए बहस कर रहा था। वह उन्हें अपने ह्रदय को जागृत करने को कह रहा था। यह तक़रीबन नामुमकिन माँग थी।

गाँधी मुसलमानों से किसी भी वफ़ादारी के ऐलान की मांग के ख़िलाफ़ थे। जिन मुसलमानों ने यहाँ रहने का फ़ैसला किया था, उनपर शक करना गुनाह था। भारत को धर्म-निरपेक्ष होना था। क्या यह प्रयोग नाकामयाब हो जाएगा? फिर गाँधी के बचे रहने का भी कोई मतलब न था।

17 जनवरी को राजेन्द्र प्रसाद के घर पर करोल बाग़, पहाडगंज, सब्ज़ी मंडी और दूसरे इलाक़ों के अगुओं की बैठक हुई। शरणार्थी शिविरों के हिन्दुओं और सिखों ने इस वादे पर दस्तख़त किए कि वे मुस्लिम मिल्कियत वाली जगहों को और मस्जिदों को ख़ाली कर देंगे।

शुक्रवार 30 जनवरी 1948 की शुरुआत एक आम दिन की तरह
हुई. हमेशा की तरह महात्मा गांधी तड़के साढ़े तीन बजे उठे.
प्रार्थना की, दो घंटे अपनी डेस्क पर कांग्रेस की नई
ज़िम्मेदारियों के मसौदे पर काम किया और इससे पहले कि दूसरे लोग उठ पाते, छह बजे फिर सोने चले गए.
काम करने के दौरान वह अपनी सहयोगियों आभा और मनु का बनाया नींबू और शहद का गरम पेय और मीठा नींबू पानी पीते रहे.
दोबारा सोकर आठ बजे उठे. दिन के अख़बारों पर नज़र दौड़ाई और फिर ब्रजकृष्ण ने तेल से उनकी
मालिश की. नहाने के बाद उन्होंने बकरी का दूध, उबली
सब्ज़ियां, टमाटर और मूली खाई और संतरे का रस भी पिया.
शहर के दूसरे कोने में पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में नाथूराम गोडसे, नारायण आप्टे और विष्णु करकरे अब भी गहरी नींद में थे.
डरबन के उनके पुराने साथी रुस्तम सोराबजी सपरिवार गांधी से मिलने आए. इसके बाद रोज़ की तरह वह दिल्ली के मुस्लिम नेताओं
से मिले. उनसे बोले, ''मैं आप लोगों की सहमति के बग़ैर वर्धा नहीं जा सकता.''
गांधी जी के नज़दीकी सुधीर घोष और उनके सचिव प्यारेलाल ने नेहरू और पटेल के बीच मतभेदों पर लंदन टाइम्स में छपी एक टिप्पणी पर उनकी राय मांगी.
इस पर गांधी ने कहा कि वह यह मामला पटेल के सामने उठाएंगे जो चार बजे उनसे मिलने आ रहे हैं और फिर वह नेहरू से भी बात करेंगे
जिनसे शाम सात बजे उनकी मुलाक़ात तय थी.
उधर, बिरला हाउस के लिए निकलने से पहले नाथूराम गोडसे ने कहा कि उनका मूंगफली खाने को जी चाह रहा है. आप्टे उनके लिए
मूंगफली ढूंढने निकले लेकिन थोड़ी देर बाद आकर बोले- ''पूरी दिल्ली में कहीं भी मूंगफली नहीं मिल रही. क्या काजू या
बादाम से काम चलेगा?''
लेकिन गोडसे को सिर्फ़ मूंगफली ही चाहिए थी. आप्टे फिर बाहर निकले और इस बार मूंगफली का बड़ा लिफ़ाफ़ा लेकर वापस लौटे.
गोडसे मूंगफलियों पर टूट पड़े. तभी आप्टे ने कहा कि अब चलने का समय हो गया है.
चार बजे वल्लभभाई पटेल अपनी पुत्री मनीबेन के साथ गांधी से मिलने पहुंचे और प्रार्थना के समय यानी शाम पांच बजे के बाद तक उनसे मंत्रणा करते रहे.
सवा चार बजे गोडसे और उनके साथियों ने कनॉट प्लेस के लिए एक तांगा किया. वहां से फिर उन्होंने दूसरा तांगा किया और बिरला हाउस से दो सौ गज पहले उतर गए.
उधर पटेल के साथ बातचीत के दौरान गांधी चरखा चलाते रहे और आभा का परोसा शाम का खाना बकरी का दूध, कच्ची गाजर, उबली सब्ज़ियां और तीन संतरे खाते रहे.
आभा को मालूम था कि गांधी को प्रार्थना सभा में देरी से
पहुँचना बिल्कुल पसंद नहीं था. वह परेशान हुई, पटेल को टोकने की उनकी हिम्मत नहीं हुई, आख़िरकार वह भारत के लौह पुरुष थे. उनकी
यह भी हिम्मत नहीं हुई कि वह गांधी को याद दिला सकें कि उन्हें देर हो रही है.
बहरहाल उन्होंने गांधी की जेब घड़ी उठाई और धीरे से हिलाकर
गांधी को याद दिलाने की कोशिश की कि उन्हें देर हो रही है.
अंतत: मणिबेन ने हस्तक्षेप किया और गांधी जब प्रार्थना सभा में जाने के लिए उठे तो पांच बज कर 10 मिनट होने को आए थे.
गांधी ने तुरंत अपनी चप्पल पहनी और अपना बायां हाथ मनु और दायां हाथ आभा के कंधे पर डालकर सभा की ओर बढ़ निकले.
रास्ते में उन्होंने आभा से मज़ाक किया.
गाजरों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज तुमने मुझे
मवेशियों का खाना दिया. आभा ने जवाब दिया, ''लेकिन बा
इसको घोड़े का खाना कहा करती थीं.'' गांधी बोले, ''मेरी
दरियादिली देखिए कि मैं उसका आनंद उठा रहा हूँ जिसकी कोई परवाह नहीं करता.''
आभा हँसी लेकिन उलाहना देने से भी नहीं चूकीं, ''आज आपकी घड़ी सोच रही होगी कि उसको नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.''
गांधी बोले, ''मैं अपनी घड़ी की तरफ़ क्यों देखूं.'' फिर गांधी गंभीर हो गए, ''तुम्हारी वजह से मुझे 10 मिनट की देरी हो गई है. नर्स का
यह कर्तव्य होता है कि वह अपना काम करे चाहे वहां ईश्वर भी
क्यों न मौजूद हो. प्रार्थना सभा में एक मिनट की देरी से भी मुझे चिढ़ है.''
यह बात करते-करते गांधी प्रार्थना स्थल तक पहुँच चुके थे. दोनों बालिकाओं के कंधों से हाथ हटाकर गांधी ने लोगों के अभिवादन के जवाब में उन्हें जोड़ लिया.
बाईं तरफ से नाथूराम गोडसे उनकी तरफ झुका और मनु को लगा कि वह गांधी के पैर छूने की कोशिश कर रहा है. आभा ने चिढ़कर कहा
कि उन्हें पहले ही देर हो चुकी है, उनके रास्ते में व्यवधान न उत्पन्न किया जाए. लेकिन गोडसे ने मनु को धक्का दिया और उनके हाथ से माला और पुस्तक नीचे गिर गई.
वह उन्हें उठाने के लिए नीचे झुकीं तभी गोडसे ने पिस्टल निकाल ली और एक के बाद एक तीन गोलियां गांधीजी के सीने और पेट में उतार दीं.
उनके मुंह से निकला, "राम.....रा.....म." और उनका जीवनहीन शरीर नीचे की तरफ़ गिरने लगा.
आभा ने गिरते हुए गांधी के सिर को अपने हाथों का सहारा
दिया. बाद में नाथूराम गोडसे ने अपने भाई गोपाल गोडसे को
बताया कि दो लड़कियों को गांधी के सामने पाकर वह थोड़ा
परेशान हुए थे.
उन्होंने बताया था, ''फ़ायर करने के बाद मैंने कसकर पिस्टल को पकड़े हुए अपने हाथ को ऊपर उठाए रखा और पुलिस....पुलिस
चिल्लाने लगा. मैं चाहता था कि कोई यह देखे कि यह योजना
बनाकर और जानबूझकर किया गया काम था. मैंने आवेश में आकर ऐसा नहीं किया था. मैं यह भी नहीं चाहता था कि कोई कहे कि मैंने घटनास्थल से भागने या पिस्टल फेंकने की कोशिश की थी.
लेकिन यकायक सब चीज़ें जैसे रुक सी गईं और कम से कम एक मिनट तक कोई इंसान मेरे पास तक नहीं फटका.'
नाथूराम को जैसे ही पकड़ा गया वहाँ मौजूद माली रघुनाथ ने अपने खुरपे से नाथूराम के सिर पर वार किया जिससे उनके सिर से ख़ून
निकलने लगा. लेकिन गोपाल गोडसे ने अपनी किताब 'गांधी वध और मैं' में इसका खंडन किया. बकौल उनके पकड़े जाने के कुछ मिनटों
बाद किसी ने छड़ी से नाथूराम के सिर पर वार किया था, जिससे उनके सिर से ख़ून बहने लगा था.
गांधी की हत्या के कुछ मिनटों के भीतर वायसरॉय लॉर्ड
माउंटबेटन वहां पहुंच गए. किसी ने गांधी का स्टील रिम का चश्मा उतार दिया था. मोमबत्ती की रोशनी में गांधी के निष्प्राण
शरीर को बिना चश्मे के देख माउंटबेटन उन्हें पहचान ही नहीं पाए.
किसी ने माउंटबेटन के हाथों में गुलाब की कुछ पंखुड़ियाँ पकड़ा दीं. लगभग शून्य में ताकते हुए माउंटबेटन ने वो पंखुड़ियां गांधी के
पार्थिव शरीर पर गिरा दीं. यह भारत के आख़िरी वायसराय की
उस व्यक्ति को अंतिम श्रद्धांजलि थी जिसने उनकी परदादी के
साम्राज्य का अंत किया था.
मनु ने गांधी का सिर अपनी गोद में लिया हुआ था और उस माथे को सहला रही थीं जिससे मानवता के हक़ में कई मौलिक विचार फूटे थे.
बर्नाड शॉ ने गांधी की मौत पर कहा, ''यह दिखाता है कि
अच्छा होना कितना ख़तरनाक होता है.''
दक्षिण अफ़्रीका से गांधी के धुर विरोधी फ़ील्ड मार्शल जैन
स्मट्स ने कहा, ''हमारे बीच का राजकुमार नहीं रहा.''
किंग जॉर्ज षष्टम ने संदेश भेजा, ''गांधी की मौत से भारत ही नहीं संपूर्ण मानवता का नुक़सान हुआ है.''
सबसे भावुक संदेश पाकिस्तान से मियां इफ़्तिखारुद्दीन की तरफ़ से आया, ''पिछले महीनों, हममें से हर एक जिसने मासूम मर्दों, औरतों
और बच्चों के ख़िलाफ़ अपने हाथ उठाए हैं या ऐसी हरकत का समर्थन किया है, गांधी की मौत का हिस्सेदार है.''
मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने शोक संदेश में कहा, ''वह हिंदू समुदाय के महानतम लोगों में से एक थे.''
जब जिन्ना के एक साथी ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि
गांधी का योगदान एक समुदाय से कहीं ऊपर उठकर था, जिन्ना अपनी बात पर अड़े रहे और बोले, ''देट इज़ वॉट ही वाज़- अ ग्रेट हिंदू.''
जब गांधी के पार्थिव शरीर को अग्नि दी जी रही थी, मनु ने
अपना चेहरा सरदार पटेल की गोद में रख दिया और रोती चली गईं. जब उन्होंने अपना चेहरा उठाया तो उन्होंने महसूस किया कि
सरदार अचानक बुज़ुर्ग हो चले हैं.

गांधीजी वो शख्शियत जिन्होंने भारत देश को आजादी दिलाई। अहिंसा के पथ पर चलकर बड़ी से बड़ी बाधाओं को पार करने वाले राष्ट्रपिता ने ब्रिटिश सरकार के समक्ष अपने मजबूत इरादों के दम पर ही नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया। स्वतंत्रता पाने के बाद बापू में जीने की इच्छा ही खत्म हो गई थी। देश के माहौल ने उनके मन को झकझोर कर रख दिया था जिससे वे बेहद दुखी थे।
' 68 साल पहले आज ही के दिन अहिंसा की प्रतिमूर्ति हिंसा की शिकार हुई थी। 30 जनवरी, 1948 का वह दिन भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के महासंग्राम के महानायक मोहनदास करमचंद गांधी का अंतिम दिन था और मुख से निकला हे राम' अंतिम शब्द था। गांधीजी ने अपने जीवन के 12 हजार 75 दिन स्वतंत्रता संग्राम में लगाए, परंतु उन्हें आजादी का सुकून मात्र 168 दिनों का ही मिला। 

26 जनवरी: जानिए क्यों मनाया जाता है गणतंत्र दिवस

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Republic Day: 26 जनवरी 1950 भारतीय इतिहास में इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि भारत का संविधान, इसी दिन अस्तित्व मे आया था.
गणतंत्र दिवस हर भारतीय के लिए बहुत मायने रखता है। यह दिन हम सभी के लिए बहुत महत्व का दिन है जिसे हम बेहद ही उत्साह के साथ मनाते हैं। भारत एक महान देश है और सिर्फ भारत में ही विविधता में ही एकता देखने को मिलती है। जहां विभिन्न जाति और धर्म के लोग प्यार से रहते हैं। 26 जनवरी और 15 अगस्त दो ऐसे राष्ट्रीय दिवस हैं जिन्हें हर भारतीय खुशी और उत्साह के साथ मनाता है।
26 जनवरी 1950 भारतीय इतिहास में इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि भारत का संविधान, इसी दिन अस्तित्व मे आया था और भारत दिन पूर्ण गणतंत्र देश बना। भारत का संविधान लिखित सबसे बङा संविधान है। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में 2 वर्ष, 11 महिना, 18 दिन लगे थे। भारतीय संविधान के वास्तुकार डॉ. भीमराव अम्बेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने विश्व के अनेक संविधानों के अच्छे लक्षणों को अपने संविधान में आत्मसात करने का प्रयास किया है। इस दिन भारत एक सम्पूर्ण गणतांत्रिक देश बन गया था । देश को गौरवशाली गणतंत्र राष्ट्र बनाने में जिन देशभक्तों ने अपना बलिदान दिया उन्हें 26 जनवरी दिन याद किया जाता और उन्हें श्रद्धाजंलि दी जाती है।


गणतंत्र दिवस से जुड़े कुछ तथ्य:

पूर्ण स्वराज दिवस (26 जनवरी 1930) को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान 26 जनवरी को लागू किया गया था।26 जनवरी 1950 को 10.18 मिनट पर भारत का संविधान लागू किया गया।गणतंत्र दिवस की पहली परेड 1955 को दिल्ली के राजपथ पर हुई थी।भारतीय संविधान की दो प्रत्तियां जो हिन्दी और अंग्रेजी में हाथ से लिखी गई।भारतीय संविधान की हाथ से लिखी मूल प्रतियां संसद भवन के पुस्तकालय में सुरक्षित रखी हुई हैं।भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने गवर्नमैंट हाऊस में 26 जनवरी 1950 को शपथ ली थी।गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति तिरंगा फहराते हैं और हर साल 21 तोपों की सलामी दी जाती है।29 जनवरी को विजय चौक पर बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी का आयोजन किया जाता है जिसमें भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना के बैंड हिस्सा लेते हैं। यह दिन गणतंत्र दिवस के समारोह के समापन के रूप में मनाया जाता है। गणतंत्र दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री अमर ज्योति पर शहीदों को श्रद्धाजंलि देते हैं जिन्होंने देश के आजादी में बलिदान दिया।

211 विद्वानों द्वारा 2 महीने और 11 दिन में तैयार भारत के संविधान को लागू किए जाने से पहले भी 26 जनवरी का बहुत महत्व था। 26 जनवरी एक विशेष दिन के रूप में चिन्हित किया गया था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1930 के लाहौर अधिवेशन में पहली बार तिरंगे झंडे को फहराया गया था। साथ-साथ एक और महत्वपूर्ण फैसला इस अधिवेशन के दौरान लिया गया।  

इस दिन सर्वसम्मति से यह फैसला लिया गया था कि प्रतिवर्ष 26 जनवरी का दिन 'पूर्ण स्वराज दिवस' के रूप में मनाया जाएगा।  इस दिन सभी स्वतंत्रता सेनानी पूर्ण स्वराज का प्रचार करेंगे। इस तरह 26 जनवरी अघोषित रूप से भारत का स्वतंत्रता दिवस बन गया था। 

25 नवंबर 1949 को देश के संविधान को मंजूरी मिली। 26 जनवरी 1950 को सभी सांसदों और विधायकों ने इस पर हस्ताक्षर किए और इसके दो दिन बाद यानी 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू कर दिया गया।  

भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को इंडियन स्टैंडर्ड टाइम के अनुसार 10 बजकर 18 मिनट पर लागू हो गया।

लिखित संविधान में कई बार संशोधन होने के बाद इसे अपनाने में 2 साल, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा।

26 जनवरी 1950 को डॉ.राजेन्द्र प्रसाद ने गवर्नमेंट हाउस के दरबार हाल में भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। इर्विन स्टेडियम में झंडा फहराया गया। यही पहला गणतंत्र दिवस समारोह था।   मुख्य अतिथि थे इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो।  

गणतंत्र दिवस मनाने का वर्तमान तरीका 1955 में शुरू हुआ। इसी साल पहली बार राजपथ पर परेड हुई। राजपथ परेड के पहले मुख्य अतिथि पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद थे।  

संविधान में संघ एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन कनाडा के संविधान से लिया गया है।  

सोवियत संघ के संविधान से मूल कर्तव्य और आस्ट्रेलिया के संविधान से समवर्ती सूची ली गई है।

गणतंत्र दिवस के मौके पर राजपथ पर तिरंगा फहराया जाता है। फिर राष्ट्रगान गाया जाता है और 21 तोपों की सलामी होती है।  
भारतीय संविधान में आपात उपबंध व्यवस्था जर्मनी के संविधान की गई है।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में बनाया गया भारतीय संविधान 395 अनुच्छेदों और 8 अनुसूचियों के साथ दुनिया में सबसे बड़ा लिखित संविधान था जो और भी विस्तृत हो चुका है।

1950 से 1954 के बीच गणतंत्र दिवस का समारोह कभी इर्विन स्टेडियम, किंग्सवे, लाल किला तो कभी रामलीला मैदान में हुआ था न कि राजपथ पर।  

1950 से 1954 के बीच गणतंत्र दिवस का समारोह कभी इर्विन स्टेडियम, किंग्सवे, लाल किला तो कभी रामलीला मैदान में हुआ था न कि राजपथ पर।  

वर्ष 1950 से 1970 के दौरान गुट निरपेक्ष आंदोलन और पूर्वी ब्लॉक या कम्युनिस्ट ब्लॉक के सदस्य देशों के प्रतिनिधियों की मेजबानी करवाई गई तो शीत-युद्घ के पश्चात पश्चिम देशों को न्यौता दिया गया। 

2017 का गणतंत्र दिवस 26 जनवरी गुरूवार को मनाया जा रहा है। इस साल 2017 में भारत अपना 68वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। भारत ने अपना पहला गणतंत्र दिवस 1950 में मनाया था।

गणतंत्र दिवस 2017 के मुख्य अतिथि

भारत के गणतंत्र दिवस, 2017 के, मुख्य अतिथि अबु धाबी के क्राउन प्रिंस शेख मोहमद बिन ज़ायेद अल नाह्यान है। भारत के 68वें गणतंत्र दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर अबु धाबी के क्राउन प्रिंस को आमंत्रित किया गया था और उन्होंने इस आमंत्रण को स्वीकार किया।


गणतंत्र दिवस 2017 की निम्नलिखित विशेषताएं हैं:

गणतंत्र दिवस २०१७ पर अबु धाबी के क्राउन प्रिंस (शेख मोहमद बिन ज़ायेद अल नाह्यान) मुख्य अतिथि होंगे।यूएई (UAE) से अतिथि के सम्मान में, गणतंत्र दिवस परेड का स्थल, राजपथ, डेट पाम के पौधों से सजाया जायेगा। खजूर यूएई का राष्ट्र फल है जिसके उपलक्ष में हर साल यूएई, इंटरनेशनल डेट पाम फेस्टिवल, मनाता है।स्किल इंडिया (कौशल विकास) और बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ, 68वाँ गणतंत्र दिवस झांकी के मुख्य बिषय हैं।इंडिया के नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (NSG) टीम के द्वारा पहली बार राजपथ पर कुछ आश्चर्यजनक प्रदर्शन दिखाया जायेगा जैसे की NSG एंथम (NSG anthem) गान (गुलज़ार के द्वारा लिखा गया), एंटी-हाईजैक टीम, एंटी-सेबोटेज टीम, कॉम्बैट फ्री-फॉलर्स, CBRNE टीम (केमिकल, बायोलॉजिकल, रेडियोलॉजिकल एंड नुक्लेअर डिफेंस टीम) और डीप डाइवर्स टीम के द्वारा प्रदर्शन।पहली बार राजपथ पर NSG वेहिकल (जिसका नाम है - Sherpa - बुलेट प्रूफ वेहिकल) का भी प्रदर्शन होगा। यह खुद एक कमांडो है जो की शक्तिशाली बिस्फोट को रोक सकता है और पानी के अंदर भी जा सकता है।

चूँकि भारत में स्वतंत्रता दिवस ब्रिटिश शासन से भारत की आजादी की खुशी के लिये मनाया जाता है, उसी तरह भारत में गणतंत्र दिवस को उसके अपने संविधान को लागू करने के लिये मनाया जाता है। अधिकारिक रुप से इसे भारत के राष्ट्रपति के समक्ष भारत की राजधानी नयी दिल्ली के राजपथ पर हर वर्ष मनाया जाता है। देश के राष्ट्रीय झंडे को फहराने के द्वारा राज्य के राज्यपाल की मौजूदगी में राज्य की राजधानी में एक छोटा उत्सव मनाया जाता है।

भारतीय सरकार द्वारा पूरे देश में राजपत्रित अवकाश के रुप में 26 जनवरी को घोषित किया गया था। स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और दूसरे शैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थियों और शिक्षकों के द्वारा पूरे उत्साह के साथ पूरे भारत भर में इसे मनाया जाता है।

नयी दिल्ली में इंडिया गेट के सामने राजपथ पर सैनिकों के द्वारा एक उत्कृष्ट परेड और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

गणतंत्र दिवस कैसे मनाया जाता है।

राजधानी में गणतंत्र दिवस को मनाने के लिये पहले से ही भारतीय सरकार द्वारा अच्छे प्रयास के साथ कार्यक्रम और उत्सव आयोजित किया जाता है। राज्यों की राजधानी के साथ ही नयी दिल्ली के राजपथ पर एक बड़ा और भव्य परेड का आयोजन किया जाता है। परेड में पारंपरिक डाँस समूह, जल सेना, वायु सेना और थल सेना से प्रतिभागी भाग लेते हैं।

नयी दिल्ली में रखा गया परेड खासतौर से शुरुआत किया जाता है जब इंडिया गेट के अमर ज्योति जवान पर भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा पुष्पमाला भेंट की जाती है। अपने देश की रक्षा करते हुए भारतीय सेना के सैनिकों के सभी बलिदानों को याद करने के लिये ऐसा किया जाता है। राजधानी में परेड के दौरान भारतीय राष्ट्रपति द्वारा सेना की सलामी ली जाती है जबकि राज्यों में राज्यपाल द्वारा सेना की सलामी ली जाती है। इस खास अवसर पर, राज्य के प्रमुख राष्ट्रपति के मुख्य अतिथि बनते हैं।

सशस्त्र बलों के सैनिकों, आम जन, और स्कूलों के विद्यार्थियों को इस खास दिन पर राष्ट्रीय पुरस्कार (महावीर चक्र, अशोक चक्र, परम वीर चक्र, वीर चक्र) और बहादुरी मेडल भी वितरित किये जाते हैं। दर्शको पर गुलाब की पंखुड़ियों की बरसात के लिये इंडिया गेट के आसपास के क्षेत्रों में सेना बलों के हेलिकॉप्टर परेड करते हैं। स्कूलों के बच्चों के द्वारा देशभक्ति गीत पर डाँस परेड के द्वारा प्रस्तुति भी जाती है। राष्ट्रपति को सम्मानीय सलामी देने के लिये सैन्य बलों द्वारा मोटर साईकिलों पर करतब दिखाये जाते हैं जबकि फाईटर प्लेन (धुएँ द्वारा भारतीय झंडे तीन रंग बनाती है) द्वारा वायु सेना करतब दिखाती है।

देश के इतिहास और संस्कृति पर ध्यानाकर्षण करने के लिये विभिन्न राज्यों से पेशेवरों द्वारा विभिन्न पारंपरिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी जाती है। भव्य उत्सव के दौरान, 24 जनवरी से 29 जनवरी तक प्रधानमंत्री की एक रैली और लोक तरंग राष्ट्रीय फोक नृत्य उत्सव भी रखा जाता है।

इस दिन, पोस्ट ऑफिस और बैंक सहित देश के सभी सरकारी और गैर सरकारी कार्यालय बंद रहते हैं। बड़ी भीड़ के कारण इस दिन पर खास सुरक्षा व्यवस्था रहती है जो किसी भी समस्या से आमजन की रक्षा करती है।

गणतंत्र दिवस मनाने का इतिहास

वर्ष 1947 में 15 अगस्त को अंग्रेजी शासन से भारत को आजादी मिली थी। उस समय देश का कोई स्थायी संविधान नहीं था। पहली बार, वर्ष 1947 में 4 नवंबर को राष्ट्रीय सभा को ड्राफ्टिंग कमेटी के द्वारा भारतीय संविधान का पहला ड्राफ्ट प्रस्तुत किया गया था। वर्ष 1950 में 24 जनवरी को हिन्दी और अंग्रेजी में दो संस्करणों में राष्ट्रीय सभा द्वारा भारतीय संविधान का पहला ड्राफ्ट हस्ताक्षरित हुआ था।

तब 26 जनवरी 1950 अर्थात् गणतंत्र दिवस को भारतीय संविधान अस्तित्व में आया। तब से, भारत में गणतंत्र दिवस के रुप में 26 जनवरी मनाने की शुरुआत हुई थी। इस दिन भारत को पूर्णं स्वराज देश के रुप में घोषित किया गया था अत: पूर्णं स्वराज के वर्षगाँठ के रुप में हर वर्ष इसे मनाये जाने की शुरुआत हुई।

भारतीय संविधान ने भारत के नागरिकों को अपनी सरकार चुनने का अधिकार दिया। सरकारी हाऊस के दरबार हॉल में भारत के पहले राष्ट्रपति के रुप में डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद द्वारा शपथ लिया गया था। गणतंत्र दिवस मनाने के पीछे भारत के पास एक बड़ा इतिहास है।

26 जनवरी मनाने का महत्व

गणतंत्र दिवस स्वतंत्र भारत के लिये सच्चे साहस का प्रतीक है जहाँ सैन्य परेड, सैन्य सामानों की प्रदर्शनी, भारतीय राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय झंडे को सलामी और इस दिन विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन होता है। भारतीय झंडे में क्षैतिज दिशा में तीन रंग होते हैं (सबसे ऊपर केसरिया, मध्य में सफेद तथा अंत में हरा, सभी रंग बराबर अनुपात में होता है) और बीच में एक चक्र होता है (नीले रंग में 24 तिलियों के साथ) जो अशोका की राजधानी सारनाथ के शेर को दिखाता है।

भारत एक ऐसा देश है जहाँ विभिन्न संस्कृति, समाज, धर्म और भाषा के लोग सद्भावपूर्णं ढंग से एक साथ रहते हैं। भारत के लिये स्वतंत्रता बड़े गर्व की बात है क्योंकि विभिन्न मुश्किलों और बाधाओं को पार करने के वर्षों बाद ये प्राप्त हुई थी।

बहु-संस्कृति स्वतंत्र भारत में जीने के लिये भारतीय लोगों को गर्व महसूस कराने के लिये इस दिन को हर वर्ष मनाया जाता है। वर्ष के उत्सव को यादगार और महत्वपूर्णं बनाने के लिये गणतंत्र दिवस को बहुत ही रंग-बिरंगे और आनन्दपूर्णं तरीके से मनाते हैं। उत्सव में शामिल लोगों के द्वारा राष्ट्र-गान गाया जाता है। ये उत्सव सभी भारतीयों को एक स्थान पर ले आने का कार्य करता है।

भारतीय गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथियों की सूची

हर साल की तरह, मुख्य अतिथि के रुप में दूसरे देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को अपने गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित करके उनका स्वागत के द्वारा “अतिथि देवो भव:” की महान भारतीय परंपरा और संस्कृति का अनुसरण भारत करता रहा है। इस वर्ष, 2016 के गणतंत्र दिवस पर, भारत ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर मुख्य अतिथि के रुप में फ्राँस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का दिल से स्वागत किया है। यहाँ नीचे आपको भारत के पहले गणतंत्रता दिवस से लेकर 2016 तक के गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथियों की सूची उपलब्ध करायी जा रही है।

वर्ष मुख्य अतिथि देश
2017क्राउन प्रिंस, शेख मोहमद बिन ज़ायेद अल नाह्यान अबु धाबी
2016राष्ट्रपति, फ्रांस्वा ओलांद फ्राँस
2015 राष्ट्रपति, बराक ओबामा यूएसए
2014 प्रधानमंत्री, शिंजों आबे जापान
2013 राजा, जिग्मे केसर नामग्याल वाँगचुक भूटान
2012 प्रधानमंत्री, यिंगलुक शिनवात्रा थाईलैंड
2011 राष्ट्रपति, सुसीलो बमबंग युद्धोयुनो इंडोनेशिया
2010 राष्ट्रपति, ली म्यूंग बक कोरिया गणराज्य
2009 राष्ट्रपति, नूरसुलतान नजरबयेव कज़ाकिस्तान
2008 राष्ट्रपति, निकोलस सरकोजी फ्रांस
2007 राष्ट्रपति, व्लादिमीर पुतिन रुस
2006 राजा, अब्दुल्ला बिन अब्दुल्लाजिज़ अल-सऊद सऊदी अरेबिया
2005 राजा, जिग्मे सिंघे वाँगचुक भूटान
2004 राष्ट्पति, लूइज़ इनैसियो लूला दा सिल्वा ब्राजील
2003 राष्ट्पति, मोहम्मदम खतामी इरान
2002 राष्ट्पति, कसाम उतीम मॉरीशस
2001 राष्ट्पति, अब्देलाज़िज बुटेफ्लिका अलजीरीया
2000 राष्ट्पति, ओलूसेगुन ओबाझाँजो नाइजीरिया
1999 राजा बिरेन्द्र बीर बिक्रम शाह देव नेपाल
1998 राष्ट्रपति, जैक्स चिराक फ्रांस
1997 प्रधानमंत्री, बासदियो पांडेय त्रिनीनाद और टोबैगो
1996 राष्ट्रपति, डॉ फरनॉनडो हेनरिक कारडोसो ब्राजील
1995 राष्ट्रपति, नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रिका
1994 प्रधानमंत्री, गोह चोक टोंग सिंगापुर
1993 प्रधानमंत्री, जॉन मेजर यूके
1992 राष्ट्रपति, मारियो सोर्स पुर्तगाल
1991 राष्ट्रपति, मौमून अब्दुल गयूम मालदीव
1990 प्रधानमंत्री, अनिरुद्ध जुगनौत मॉरीशस
1989 गुयेन वैन लिंह वियतनाम
1988 राष्ट्रपति, जुनियस जयवर्द्धने श्रीलंका
1987 राष्ट्रपति, ऐलेन गार्सिया पेरु
1986 प्रधानमंत्री, एँड्रियास पपनड्रीयु ग्रीस
1985 राष्ट्रपति, रॉल अलफोन्सिन अर्जेन्टीना
1984 राजा जिग्मे सिंघे वाँगचुक भूटान
1983 राष्ट्रपति, सेहु शगारी नाइजीरिया
1982 राजा, जॉन कार्लोस प्रथम स्पेन
1981 राष्ट्रपति, जोस लोपेज़ पोरेटील्लो मेक्सिको
1980 राष्ट्रपति, वलेरी गिस्कार्ड द इस्टेइंग फ्रांस
1979 प्रधानमंत्री, मलकोल्म फ्रेज़र ऑस्ट्रेलिया
1978 राष्ट्रपति, पैट्रीक हिलेरी ऑयरलौंड
1977 प्रथम सचिव, एडवर्ड गिरेक पौलैण्ड
1976 प्रधानमंत्री, जैक्स चिराक फ्रांस
1975 राष्ट्रपति, केनेथ कौंडा जांबिया
1974 राष्ट्रपति, जोसिप ब्रौज टीटो यूगोस्लाविया
प्रधानमंत्री, सिरीमावो रतवत्ते दियास बंदरनायके श्रीलंका
1973 राष्ट्रपति, मोबुतु सेस सीकोजैरे
1972 प्रधानमंत्री, सीवुसागर रामगुलाम मॉरीशस
1971 राष्ट्रपति, जुलियस नीयरेरे तंजानिया
1970-1969 प्रधानमंत्री, टोडर ज़िकोव बुल्गारिया
1968 प्रधानमंत्री, एलेक्सी कोज़ीगिन सोवियत यूनियन राष्ट्रपति, जोसिप ब्रोज टीटो यूगोस्लाविया
1967-1966-1965 खाद्य एवं कृषि मंत्री, राना अब्दुल हामिद पाकिस्तान
1964-1963 राजा, नोरोदम शिनौक कंबोडिया
1962-1961 रानी, एलिज़ाबेथ द्वितीय यूके
1960 राष्ट्रपति, क्लिमेंट वोरोशिलोव सोवियत संघ
1959-1958 मार्शल यि जियानयिंग चीन
1957-1956-1955 गर्वनर जनरल, मलिक गुलाम मोहम्मद पाकिस्तान
1954 राजा, जिग्मे दोरजी वाँगचुक भूटान
1953-1952-1951-1950 राष्ट्रपति, सुकर्नोंइंडोनेशिया

गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) परेड

जाड़े के उत्सव संबंधी ड्रेस पहने, राष्ट्रपति आवास से बाहर आते हुए राष्ट्रपति के अंग-रक्षकों द्वारा राजपथ पर गणतंत्र दिवस परेड की ये वास्तविक तस्वीर है। घुड़सवार रेजीमेंट में से एक खास चुनी हुयी भारतीय सेना की सबसे वरिष्ठ ईकाई भारत के राष्ट्रपति के अंगरक्षक बनते है। भारत के राष्ट्रपति की सुरक्षा और राह दिखाने के लिये उनके अंग-रक्षक पूरी तरह जिम्मेदार होते हैं। वो पूरी तरह हथियारों, बीटीआर-60 गाड़ियाँ से लैस होते हैं जो किसी भी परिस्थिति में इस्तेमाल किये जा सकते हैं साथ ही घोड़ें भी चलाते हैं।


एयर फ़ोर्स वन कि खूबियाँ!

    


दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क के मुखिया अमेरिकी राष्ट्रपति  हैं।  जानिए उनके सुरक्षा दस्ते के तीन सबसे महत्वपूर्ण हिस्से प्लेन एयरफोर्स वन, हेलीकॉप्टर मरीन वन और कार कैडिलैक...द बीस्ट की खूबियां।
एयरफोर्स वन

एयरफोर्स वन यानी नीले-सफेद रंग का वो विमान जिसके जितने अफसाने, उससे कहीं ज्यादा फसाने हैं। एयरफोर्स वन यानी वो विमान जिसे खासतौर से अमेरिकी राष्ट्रपति के हवाई सफर के लिए बनाया गया है। सबसे ताकतवर मुल्क का वो शख्स जिस पर 24 घंटे खतरा मंडराता रहता है, क्योंकि वो अमेरिकी ताकत का केंद्र होता है। ये महज विमान नहीं है, बल्कि अमेरिकी सत्ता, ताकत, प्रतिष्ठा और दुनिया पर उसके असर का प्रतीक भी है। माना जाता है कि ये विमान दुनिया का सबसे महंगा विमान है। इस विमान पर एक घंटे की उड़ान का खर्च करीब 68 हजार डॉलर बैठता है। नीले और सफेद रंग का ये विमान देखने में तो खूबसूरत है ही, इसमें ऐशो-आराम और सुरक्षा के भी ऐसे इंतजाम हैं जिसे जानकर कोई भी हैरान रह जाए।
इसके बारे में किंवदंतियां ऐसी हैं जिन्हें सुनकर यकीन करना मुश्किल है, मसलन-हवा में उड़ता किला एयरफोर्स वन घातक लेजर से लैस है, जो उसके लिए खतरा बने विमान पर हमले के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर दुश्मन विमान नजदीक आ जाए तो एयरफोर्स वन अपनी मिसाइलों से उसे मार गिरा सकता है। दुश्मन विमान मिसाइल से बच निकले तो उसे सबक सिखाने के लिए एयरफोर्स वन के डैनों में छुपी मशीनगन भी हैं। इतना सबकुछ होने के बावजूद अगर कोई दुश्मन विमान एयरफोर्स वन को नुकसान पहुंचा ही दे, तब राष्ट्रपति को बचाने के लिए जहाज में एक इस्केप पॉड यानी बचाव के लिए खास तरह का कैप्सूल भी मौजूद है। हॉलीवुड की मशहूर फिल्म एयरफोर्स वन में इस बचाव कैप्सूल का इस्तेमाल दिखाया गया था तभी से ये माना जाने लगा है कि एयरफोर्स वन में इस्केप पॉड भी है।
हालांकि ये एक बड़ा बोइंग 747-200B जेट ही है, जिसे खास राष्ट्रपति की जरूरत के मुताबिक ढाला गया है। इनकी संख्या दो है। इन दोनों ही विमान को नाम दिया गया है VC-25A। तकनीकी रूप से एयरफोर्स वन, राष्ट्रपति के विमान का रेडियो संदेश में पुकारा जाने वाला नाम है। हवा में उड़ते हुए ओबामा का पूरा दफ्तर इस विमान से संचालित होता है। आम तौर पर कुल 70 यात्री और 23 चालक दल एयरफोर्स वन पर सफर कर सकते हैं। किसी भी बोइंग-747 की तरह ये भी तीन मंजिला विमान है। आमतौर पर ओबामा जब एयरफोर्स वन से हाथ हिलाते हुए नीचे उतरते हैं, तो वो बीच की मंजिल से निकल रहे होते हैं लेकिन उससे ऊपर और नीचे के दरवाजों का इस्तेमाल भी जहाज पर सवार होने या उतरने के लिए किया जा सकता है।
इसमें हवा में ईंधन भरा जा सकता है। इसमें कॉकपिट, कम्युनिकेशन रूम, राष्ट्रपति का दफ्तर, डाइनिंग रूम , अफसरों का कमरा, 85 टेलीफोन लाइन, 19 टीवी, दफ्तर और मीडिया की जगह है। एयरफोर्स वन में बुलेट प्रूफ खिड़कियां, सुरक्षा अधिकारी हमेशा तैनात रहते हैं। न्यूक्लियर धमाके से सुरक्षा, छुपा इंफ्रारेड गाइडेंस सिस्टम, वरिष्ठ अधिकारियों का मीटिंग कक्ष, राष्ट्रपति की सुरक्षा टीम, मेडिकल सुविधाएं राष्ट्रपति कक्ष, जिम और ड्रेसिंग रूम भी है।
इतनी सुविधाओं और इतने लोगों को खाना खिलाने के लिए एयरफोर्स वन में करीब 2000 लोगों का खाना हमेशा पैक रहता है, हालांकि एक वक्त पर इस पर सिर्फ 100 लोगों को खाना खिलाया जा सकता है। बेशक, एयरफोर्स वन में हमलावर क्षमताएं तो नहीं हैं, लेकिन दुश्मन से हमले के बचाव के लिए इसमें कई खूबियां हैं। एयरफोर्स वन एक बार में पूरी दुनिया का चक्कर काट सकता है। इसके शीशों से लेकर पूरी बॉडी परमाणु धमाके से निकलने वाली शॉक वेब तक सह सकती है। इसके पिछले हिस्से में दुनिया भर के रडारों को जाम कर देने वाला जैमर मौजूद हैं। सबसे अहम ताकत है इसकी निचली मंजिल में मौजूद हथियारों का जखीरा और अमेरिकी जमीन पर मौजूद परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के लिए रिमोट कंट्रोल रूम।
जी हां, अमेरिकी राष्ट्रपति एयरफोर्स वन पर बैठे-बैठे अमेरिकी परमाणु हथियारों को दागने का आदेश भी दे सकते हैं। हमले से बचाव के लिए इसमें राडार जाम करने वाले इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और मिसाइलों को भटकाने के लिए आग के गोले छोड़ने की भी व्यवस्था है। जबकि दुश्मन के विमान पर हमला करने की जिम्मेदारी एयरफोर्स वन को आसमान पर सुरक्षा देते लड़ाकू जहाज निभाते हैं। फिर भी एयरफोर्स वन को इस तरह के कम्युनिकेशन प्रणाली से लैस किया गया है कि आप इसे उड़ता हुआ व्हाइट हाउस भी कह सकते हैं। साल 2010 में जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत दौरे पर आए थे तब दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट पर खड़े उनके विमान को एक सेकेंड के लिए भी बंद नहीं किया गया था। दो दिन के दौरान एयरफोर्स वन ने करीब डेढ़ सौ करोड़ का ईंधन फूंक डाला। एयरफोर्स में कुल जगह की बात की जाए तो इसमें करीब 4000 वर्गफुट जगह है।
मरीन वन

जिस तरह से लंबी दूरी की हवाई यात्रा के लिए एयरफोर्स वन अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए उड़ते हुए व्हाइट हाउस का किरदार निभाता है। ठीक उसी तरह से अमेरिका और बाकी देशों में छोटी दूरी के सुरक्षित सफर के लिए इस्तेमाल किया जाता है मरीन वन। एयरफोर्स वन के रनवे पर उतरते ही अगर एयरपोर्ट से मंजिल की दूरी दस किलोमीटर से ज्यादा हो तो मिस्टर प्रेसिडेंट सड़क की बजाय मरीन वन में सवार हो जाते हैं यानी वो हेलीकॉप्टर जो एयरफोर्स वन की तरह ही बेहद खास है।
सुरक्षा उपाय के तहत मरीन वन हमेशा एक जैसे दिखने वाले पांच हेलीकॉप्टरों के ग्रुप के तौर पर आसमान पर उड़ता है। पांच हेलीकॉप्टर में से किसी एक में अमेरिकी राष्ट्रपति होते हैं, लेकिन पांच हेलीकॉप्टरों के दल के वजह से ये पहचानना मुश्किल होता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति किस हेलीकॉप्टर में सफर कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति किस मरीन वन में उड़ रहे होते हैं, इसका पता सिर्फ चुनिंदा अफसरों और सीक्रेट सर्विस के एजेंट्स को ही होता है, लेकिन इस हेलीकॉप्टर की सुविधाओं और ताकत के बारे में कोई सस्पेंस नहीं है।
ओबामा जिस मरीन वन में उड़ते हैं, वो वीएच-थ्री की पीढ़ी का हेलीकॉप्टर है। इस शानदार हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल अमेरिकी नौसेना करती है। मरीन वन में भी अमेरिकी राष्ट्रपति का छोटा सा दफ्तर है। इस उड़ते हुए दफ्तर में वो दो-चार लोगों के साथ मीटिंग भी कर सकते हैं। इस हेलीकॉप्टर में करीब 14 लोग सफर कर सकते हैं। मरीन वन को यूएस मरीन कॉर्प्स की मरीन हेलीकॉप्टर्स की नाइट हॉक्स स्क्वाड्रन ऑपरेट करती है। इसे समंदर का राजा कहा जाता है। 1957 में इसका प्रयोग शुरू हुआ था। इसे उड़ाने से पहले मरीन एविएटर्स को एक सख्त जांच प्रक्रिया से गुजरना होता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति अमेरिका या विदेश में जब विशेष दौरे पर होते हैं तब उनके पहुंचने से पहले ही C-17 या C-5 मालवाहक विमान के जरिए मरीन वन और कैडिलेक को वहां पहुंचा दिया जाता है। अमेरिका में जब भी नया राष्ट्रपति सत्ता संभालता है तब प्रेसिडेंशियल इनॉगरेशन की परंपरा के मुताबिक रिटायर हो रहे राष्ट्रपति को कैपिटॉल से एंड्रेयू एयरबेस तक पहुंचाने की परंपरा मरीन वन हेलीकॉप्टर ही निभाता है।
मरीन वन की खासियतों की बात करें तो मरीन वन फौजी ग्रेड का हेलीकॉप्टर है। इस ताकतवर हेलीकॉप्टर के कवच को गोली या मिसाइल नहीं भेद सकती। मरीन वन थर्मल गाइडेड मिसाइल काउंटर वार फेयर से भी लैस है यानी गर्मी के आधार पर टारगेट तय करने वाली मिसाइलों को ये गच्चा दे सकता है। इसके काउंटर राडार सिस्टम दुश्मन के राडार को जाम कर सकते हैं।
कैडिलेक...बीस्ट

अमेरिकी राष्ट्रपति जिस कार में सफर करते हैं वो कैडिलेक वन है, जिसे बीस्ट भी कहा जाता है। बीस्ट में किसी विशालकाय जानवर से भी ज्यादा ताकत है। 18 फीट लंबी, साढ़े सात टन भारी और 60 मील प्रतिघंटे की रफ्तार से दौड़ सकने वाली बुलेट प्रूफ बीस्ट में ऐसे कई सिस्टम लगे हुए हैं, जिनकी वजह से ये कार बड़े आतंकी हमले के वक्त भी अमेरिकी राष्ट्रपति को बचाने में सक्षम है।
बीस्ट की खूबियों के तर्ज पर दुनिया के तमाम देशों ने अपने राष्ट्राध्यक्षों के लिए ऐसी ही कार का इंतजाम किया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति की कार उन सबमें सबसे सुरक्षित और सबसे अनोखी है। एक निगाह में अगर इसमें मौजूद सुविधाओं पर नजर डालें तो बीस्ट का बुलेट प्रूफ पेट्रोल टैंक इसे बड़ी सुरक्षा देता है। इसे एक विशेष फोम से सील किया जाता है, जिससे इसमें आग लगने की सूरत में धमाका नहीं होता।
बीस्ट में चार लोगों के बैठने की जगह है। बुलेट प्रूफ 8 इंच मोटे दरवाजे की वजह से इस कार को बम से निशाना नहीं बनाया जा सकता। इसका ड्राइवर CIA का प्रशिक्षित सीक्रेट एजेंट होता है। उसके लिए सिर्फ 3 इंच खुलने वाला शीशा भी कार में है, जिससे वो बाहर मौजूद एजेंट से बात करता है। अत्याधुनिक स्टीयरिंग और ट्रेनिंग की बदौलत ड्राइवर बीस्ट को हर खतरे से बचाने में सक्षम है। GPS ट्रैकिंग डिवाइस और पंक्चर न होने वाले स्टील रिम टायर इसे खास ताकत देते हैं। रात में देखने वाला कैमरा, आंसू गैस उपकरण भी बीस्ट का हिस्सा हैं।
बीस्ट को दुनिया की सबसे सुरक्षित कार कहा जाए तो गलत नहीं होगा। कार का खोल-बख्तरबंद फौजी गाड़ियों जैसा है। इसे स्टील, एल्मुनियम, टाइटेनियम और सिरेमिक से बनाया गया है। इस पर आम रॉकेट लांचर का असर नहीं होता। दरवाजे आठ इंच मोटे होते हैं, कार की चेसिस पांच इंच मजबूत स्टील की है, जो बारूदी सुरंग के फटने पर भी सलामत रहती है। कार के टायर केवलर से बने हैं, जिन पर गोली असर नहीं करती। टायर पंचर हो जाए तब भी इसके रिम इतने ताकतवर हैं कि वो कार को तेज रफ्तार से भगाते रहते हैं। कार के सामने का शीशा इतना मजबूत है कि बख्तरबंद भेदने वाली गोलियां भी इसे नहीं भेद सकतीं। कार का ड्राइवर इतना ट्रेंड होता है कि किसी भी सूरत में वो कार को बचाकर निकाल ले जा सकता है। कार में ड्राइवर और राष्ट्रपति के बैठने का चेंबर एक शीशे से अलग-अलग रहता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा कार मैं बैठे-बैठे वाई फाई, सैटेलाइट फोन और डायरेक्ट लाइन से चौबीसों घंटे उप राष्ट्रपति और अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के संपर्क में रहते हैं।
वैसे तो बीस्ट किसी भी तरह के आतंकी हमले में अमेरिकी राष्ट्रपति को बचाने में सक्षम है, लेकिन इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति के घायल हो जाने की सूरत में उन्हें बचाने के भी भरपूर इंतजाम हैं। कार के अगले हिस्से में राष्ट्रपति के ब्लड ग्रुप वाला खून रहता है, ताकि मुसीबत में उन्हें खून दिया जा सके। यही नहीं कार के पिछले हिस्से में ऑक्सीजन सप्लाई करने का भी इंतजाम रहता है।