Shamsher ALI Siddiquee

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सोते वक्त क्यों बहती है लार? जानिए कारण

    


अक्सर हम देखते है कि कई बच्चे जब सोकर उठते है तो उनकी मुंह से लार बह रही होती है। ये समस्या बच्चों में नहीं बल्कि बड़ो में भी देखी जाती है। अगर आप भी इस समस्या से जूझ रहे है तो हम आपको इसका कारण।

नींद और लार का क्या है संबंध?

जब कोई बच्चा गहरी नींद से सोकर उठता है तो उसके मुंह के किनारे से लार की पतली सी धार बह रही होती है। हालांकि सोते हुए लोगों के मुंह से लार बहना बहुत आम बात है लेकिन कई बार ये किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी होता है। आइए पहले जानते हैं कि आपकी नींद और लार बहने के बीच क्या संबंध है।

कब बहती है लार

जब आप नींद में होते हैं तो आप और आपकी चेहरे की नसें आराम के मूड में होती हैं। इसलिए ऐसे में जब आपके लार के ग्लैंड्स लार तैयार करते हैं तो वो बहने लग जाती है क्योंकि आप उसे निगलते नहीं हैं। अगर आपकी सोते हुए लार बहती है तो आपने देखा होगा कि लार आमतौर पर तभी बहती है जब आप करवट लेकर सोते हो। हम आपको बताते है कि लार बहने के क्या कारण होते है।

- एलर्जी

खाने पीने की चीजों से होने वाली एलर्जी और नाक से संबंधित एलर्जी की वजह से लार का अधिक निर्माण हो सकता है और वो बह सकती है। शरीर में लार बनाने वाले अलग से ग्लैंड्स होते हैं। सोते समय जागते समय की अपेक्षा अधिक लार का निर्माण होता है।

- एसीडिटी 

वैज्ञानिकों का मानना है कि एसिड रिफ्लक्स एपीसोड्स के कारण गेस्ट्रिक एसिड होता है। इससे एसोफागोसलाइवरी उत्तेजित होता है और बहुत अधिक लार बनने लगती है।

- साइनस इंफेक्शन

श्वास नलिका के संक्रमण आमतौर पर सांस लेने और निगलने की समस्याओं से जुड़े होते हैं। इन समस्याओं में लार जमा हो जाने से मुंह से बहने लगती है। फ्लू के कारण जब नाक बंद होती है तो आप खासतौर पर रात को अपने मुंह से सांस लेते हैं और ऐसे में आपके मुंह से लार बहने लगती है।

- टोंसिलाइटिस

टोंसिल्स ग्लैंड्स गले के पीछे मौजूद होते हैं, जिनमें सूजन आ जाने से टोंसिलाइटिस हो सकता है। सूजन की वजह से गले का रास्ता छोटा हो जाता है जिससे लार गले से उतर नहीं पाती और मुंह से बहने लग जाती है।

- सोते हुए डरना


कुछ लोगों को सोते हुए डर लगता है। इस समस्या का एक लक्षण लार बहना भी है। युवाओं में साइकोपैथोलॉजिकल कारण से ये समस्या होती हैं। ऐसा उनके भावनात्मक तनाव में होने के कारण, ड्रग्स या एल्कोहल लेने के कारण और नींद की कमी के कारण भी हो सका है। इसके इलावा कई बार नींद से जुड़ी अन्य समस्याओं जैसे नींद में चलना, नींद में बात करना आदि में भी लार बहती है।

- ड्रग्स और केमिकल्स

ड्रग्स और केमिकल्स के कारण भी लार का निर्माण होता है। अगर आप कोई दवाई या ड्रग्स ले रहे हैं तो सोते हुए लार बहना आपके लिए बहुत आम बात हो सकती है। कुछ एंटीडिप्रेसेंट और दवाएं जैसे कि मॉर्फिन, पिलोकार्पिन आदि लार का निर्माण बढ़ा देती हैं।


पोखरण टेस्ट 1: बुद्धा इज़ स्माइलिंग!

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18 मई, 1974 की सुबह आकाशवाणी के दिल्ली स्टेशन पर 'बॉबी' फ़िल्म का वो मशहूर गाना बज रहा था, "हम तुम एक कमरे में बंद हों और चाबी खो जाए."

ठीक नौ बजे गाने को बीच में ही रोक कर उद्घोषणा हुई, कृपया एक महत्वपूर्ण प्रसारण की प्रतीक्षा करें.
कुछ सेकंड बाद रेडियो पर उद्घोषक के स्वर गूंजे, "आज सुबह आठ बजकर पांच मिनट पर भारत ने पश्चिमी भारत के एक अज्ञात स्थान पर शांतिपूर्ण कार्यों के लिए एक भूमिगत परमाणु परीक्षण किया है."
इससे एक दिन पहले लंदन में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के प्रधान सचिव पीएन हक्सर बार-बार भारतीय उच्चायुक्त बीके नेहरू से सवाल कर रहे थे, "दिल्ली से कोई ख़बर आई?"
जैसे ही भारत के परमाणु परीक्षण की ख़बर मिली नेहरू ने हक्सर के चेहरे पर आई राहत को साफ़ पढ़ा.
वो समझ गए कि हक्सर क्यों बार-बार दिल्ली से आने वाली ख़बर के बारे में पूछ रहे थे.

किसका सिर काटा जाए

पाँच दिन पहले 13 मई को परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी सेठना की देखरेख में भारत के परमाणु वैज्ञानिकों ने परमाणु डिवाइस को असेंबल करना शुरू किया था.
14 मई की रात डिवाइस को अंग्रेज़ी अक्षर एल की शक्ल में बने शाफ़्ट में पहुंचा दिया गया था. अगले दिन सेठना ने दिल्ली के लिए उड़ान भरी. इंदिरा गाँधी से उनकी मुलाक़ात पहले से ही तय थी.
सेठना ने कहा, "हमने डिवाइस को शाफ़्ट में पहुंचा दिया है. अब आप मुझसे ये मत कहिएगा कि इसे बाहर निकालो क्योंकि ऐसा करना अब संभव नहीं है. अब आप हमें आगे जाने से नहीं रोक सकतीं."
इंदिरा का जवाब था, "गो अहेड. क्या तुम्हें डर लग रहा है?"
सेठना बोले, "बिल्कुल नहीं. मैं बस ये बताना चाह रहा था कि अब यहाँ से पीछे नहीं मुड़ा जा सकता." अगले दिन इंदिरा गाँधी की मंज़ूरी ले कर सेठना पोखरण वापस पहुँचे.
उन्होंने पूरी टीम को जमा किया और सवाल किया कि अगर ये परीक्षण असफल हो जाता है तो किसका सिर काटा जाना चाहिए? बम के डिज़ाइनर राजगोपाल चिदंबरम ने छूटते ही जवाब दिया, "मेरा."
टीम के उपनेता पी के आएंगर भी बोले, "किसी का सिर काटने की ज़रूरत नहीं है. अगर ये असफल होता है तो इसका मतलब है भौतिकी के सिद्धांत सही नहीं हैं." ( राजा रमन्ना, इयर्स ऑफ़ पिलग्रिमेज)

जीप ने दिया धोखा

18 मई की सुबह पोखरण के रेगिस्तान में गर्मी कुछ ज़्यादा ही थी. विस्फोट को देखने के लिए वहाँ से पाँच किलोमीटर दूर एक मचान-सा बनाया गया था.
वहाँ पर होमी सेठना, राजा रमन्ना, तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल बेवूर, डीआरडीओ के तत्कालीन अध्यक्ष बीडी नाग चौधरी, टीम के उपनेता पी के आयंगर और लेफ़्टिनेंट कर्नल पीपी सभरवाल मौजूद थे.
नाग चौधरी के गले में कैमरा लटक रहा था और वो लगातार तस्वीरें खींच रहे थे. चिदंबरम और एक दूसरे डिज़ाइनर सतेंद्र कुमार सिक्का कंट्रोल रूम के पास एक दूसरे मचान पर थे.
श्रीनिवासन और इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेशन टीम के प्रमुख प्रणव दस्तीदार कंट्रोल रूम के अंदर थे. परीक्षण के लिए सुबह आठ बजे का समय निर्धारित किया गया था.
लेकिन इससे एक घंटे पहले अंतिम जाँच करने गए वैज्ञानिक वीरेंद्र सिंह सेठी की जीप परीक्षण स्थल पर स्टार्ट होने का नाम ही नहीं ले रही थी. समय निकलता जा रहा था. आख़िरकार सेठी ने जीप वहीं छोड़ी और दो किलोमीटर पैदल चल कर कंट्रोल रूम पहुँचे.
सेठना ने वहाँ मौजूद थल सेनाध्यक्ष जनरल बेवूर से पूछा कि जीप का क्या किया जाए जो परीक्षण स्थल के बिल्कुल पास खड़ी थी. जनरल बेवूर का जवाब था, "ओह यू कैन ब्लो द डैम थिंग अप."
ऐसा करने की नौबत नहीं आई क्योंकि इस बीच भारतीय सेना के जवान एक जीप ले कर वहाँ पहुंच गए और ख़राब जीप को टो करके सुरक्षित जगह पर लाया गया. लेकिन इस चक्कर में परीक्षण का समय पाँच मिनट और बढ़ा दिया गया.

वी विल प्रोसीड

अंतत: मचान के पास मौजूद लाउड स्पीकर से उल्टी गिनती शुरू हुई. सेठना और रमन्ना ने ट्रिगर दबाने का गौरव प्रणव दस्तीदार को दिया.
जैसे ही पाँच की गिनती हुई प्रणव ने हाई वोल्टेज स्विच को ऑन किया. दस्तीदार के पैरों से ज़मीन निकल गई जब उन्होंने अपनी बाईं तरफ़ लगे इलेक्ट्रीसिटी मीटर को देखा.
मीटर दिखा रहा था कि निर्धारित मात्रा का सिर्फ़ 10 फ़ीसदी वोल्टेज ही परमाणु डिवाइस तक पहुँच पा रहा था. उनके सहायकों ने भी ये देखा. वो घबराहट में चिल्लाए, "शैल वी स्टॉप ? शैल वी स्टॉप?" हड़बड़ी में गिनती भी बंद हो गई.
लेकिन दस्तीदार का अनुभव बता रहा था कि शॉफ्ट के अंदर अधिक आद्रता की वजह से ग़लत रीडिंग आ रही है. वो चिल्लाए, "नो वी विल प्रोसीड."
जॉर्ज परकोविच अपनी किताब 'इंडियाज़ न्यूकिल्यर बॉम्ब' में लिखते हैं आठ बज कर पाँच मिनट पर दस्तीदार ने लाल बटन को दबाया.

कृष्ण ने पर्वत को अपनी उंगली पर उठाया

उधर मचान पर मौजूद सेठना और रमन्ना ने जब सुना कि गिनती बंद हो गई है तो उन्होंने समझा कि विस्फोट को रोक दिया गया है.
रमन्ना 'इयर्स ऑफ़ पिलग्रिमेज' में लिखते हैं कि उनके साथी वैंकटेशन ने जो इस दौरान लगातार विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रहे थे, अपना जाप रोक दिया था.
अभी सब सोच ही रहे थे कि उनकी सारी मेहनत बेकार गई है कि अचानक धरती से रेत का एक पहाड़-सा उठा और लगभग एक मिनट तक हवा में रहने के बाद गिरने लगा. बाद में पी के आएंगर ने लिखा, "वो ग़ज़ब का दृश्य था. अचानक मुझे वो सभी पौराणिक कथाएं सच लगने लगी थीं जिसमें कहा गया था कि कृष्ण ने एक बार पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया था."
उनके बग़ल में बैठे सिस्टम इंटिगरेशन टीम के प्रमुख जितेंद्र सोनी को लगा जैसे उनके सामने रेत की क़ुतुब मीनार खड़ी हो गई हो.

औंधे मुंह गिरे

तभी सभी ने महसूस किया मानो एक ज़बरदस्त भूचाल आया हो. सेठना को भी लगा कि धरती बुरी तरह से हिल रही है. लेकिन उन्होंने सोचा कि विस्फोट की आवाज़ क्यों नहीं आ रही? या उन्हें ही सुनाई नहीं पड़ रहा ? (रीडिफ़.कॉम से बातचीत- 8 सितंबर 2006)
लेकिन एक सेकेंड बाद विस्फोट की दबी हुई आवाज़ सुनाई पड़ी. चिदंबरम, सिक्का और उनकी टीम ने एक दूसरे को गले लगाना शुरू कर दिया. चिदंबरम ने बाद में लिखा, ''ये मेरे जीवन का सबसे बड़ा क्षण था.'' जोश में सिक्का मचान से नीचे कूद पड़े और उनके टख़ने में मोच आ गई.
कंट्रोल रूम में मौजूद श्रीनिवासन को लगा जैसे वो ज्वार भाटे वाले समुद्र में एक छोटी नाव पर सवार हों जो बुरी तरह से डगमगा रही हो. रमन्ना ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मैंने अपने सामने रेत के पहाड़ को ऊपर जाते हुए देखा मानो हनुमान ने उसे उठा लिया हो."
लेकिन वो इस उत्तेजना में भूल गए थोड़ी देर में धरती कांपने वाली है. उन्होंने तुरंत ही मचान से नीचे उतरना शुरू कर दिया. जैसे ही धरती हिली मचान से उतर रहे रमन्ना अपना संतुलन नहीं बरक़रार रख पाए और वो भी ज़मीन पर आ गिरे.
ये एक दिलचस्प इत्तेफ़ाक़ था कि भारत के परमाणु बम का जनक, इस महान उपलब्धि के मौक़े पर पोखरण की चिलचिलाती गर्म रेत पर औंधे मुँह गिरा पड़ा था.

बुद्धा इज़ स्माइलिंग

अब अगली समस्या थी कि इस ख़बर को दिल्ली इंदिरा गाँधी तक कैसे पहुँचाया जाए?
सिर्फ़ इसी मक़सद से सेना ने वहाँ पर प्रधानमंत्री कार्यालय के लिए ख़ास हॉट लाइन की व्यवस्था की थी. पसीने में नहाए सेठना का कई प्रयासों के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क स्थापित हुआ.
दूसरे छोर पर प्रधानमंत्री के निजी सचिव पी एन धर थे. सेठना बोले, "धर साहब, एवरी थिंग हैज़ गॉन..." तभी लाइन डेड हो गई.
सेठना ने समझा कि धर को लगा होगा कि परीक्षण फ़ेल हो गया है. उन्होंने सेना की जीप उठाई और लेफ़्टिनेंट कर्नल पीपी सभरवाल के साथ बदहवासों की तरह ड्राइव करते हुए पोखरण गाँव पहुँचे जहाँ सेना का एक टेलिफ़ोन एक्सचेंज था.
वहाँ पहुँच कर सेठना ने अपना माथा पीट लिया जब उन्होंने पाया कि वो धर का डाएरेक्ट नंबर भूल आए हैं.
यहाँ सभरवाल उनकी मदद को आगे आए. उन्होंने अपनी सारी अफ़सरी अपनी आवाज़ में उड़ेलते हुए टेलिफ़ोन ऑपरेटर से कहा, "गेट मी द प्राइम मिनिस्टर्स ऑफ़िस. "
ऑपरेटर पर उनके इस आदेश का कोई असर नहीं हुआ. उसने ठेठ हिंदी में पूछा आप हैं कौन?
काफ़ी मशक्क़त और हील हुज्जत के बाद आख़िरकार प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क हुआ.
बहुत ख़राब लाइन पर लगभग चीखते हुए सेठना ने वो मशहूर कोड वर्ड कहा, "बुद्धा इज़ स्माइलिंग. "

प्रधानमंत्री निवास

उस घटना के 29 वर्षों बाद तक पी एन धर ने ये बात किसी को नहीं बताई कि सेठना के ये सारे प्रयास बेकार साबित हुए थे क्योंकि दस मिनट पहले ही थलसेनाध्यक्ष जनरल बेवूर का फ़ोन उन तक पहुँच चुका था.
धर उनसे सीधा सवाल नहीं कर सकते थे क्योंकि टेलिफ़ोन लाइन पर बातचीत सुनी जा सकती थी. धर ने उनसे पूछा था ' क्या हाल है?' बेवूर का जवाब था,' सब आनंद है.'
धर को उसी समय लग गया कि भारत का परमाणु परीक्षण सफल रहा है. उन्होंने तुरंत प्रधानमंत्री निवास का रुख़ किया. उस समय इंदिरा गाँधी अपने लॉन में आम लोगों से मिल रही थीं.
जब उन्होंने धर को आते हुए देखा तो वो लोगों से बात करना बंद उनकी तरफ़ दौड़ीं. उखड़ी हुई साँसों के बीच उन्होंने पीएन धर से पूछा, "क्या हो गया."
धर का जवाब था, "सब ठीक है मैडम."
धर ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मुझे अभी भी याद है कि ये सुनते ही इंदिरा गाँधी की बाँछे खिल गई थीं. एक जीत की मुस्कान को उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ा जा सकता था."

मदर्स डे: कब, कैसे और क्यों शुरू हुआ!

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एक मुद्दत से मेरी माँ नहीं सोई 'अली'
मैंने इक बार कहा था मुझे डर लगता है।




मां, दुनिया के हर बच्चे के लिए सबसे खास सबसे प्यारा रिश्ता। उस मां को सम्मानित करने के लिए मई माह के दूसरे रविवार को विशेष दिवस मनाया जाता है। 

लेकिन अलग-अलग देशों में इस दिन को मनाने की अलग-अलग कहानी है। आइए जानते हैं मदर्स डे पर संजोई गई यह स्पेशल जानकारियां

मदर्स डे ग्राफटन वेस्ट वर्जिनिया में एना जॉर्विस द्वारा समस्त माताओं और उनके गौरवमयी मातृत्व के लिए तथा विशेष रूप से पारिवारिक और उनके परस्पर संबंधों को सम्मान देने के लिए आरंभ किया गया था। यह दिवस अब दुनिया के हर कोने में अलग-अलग दिनों में मनाया जाता हैं। इस दिन कई देशों में विशेष अवकाश घोषित किया जाता है। 

कुछ विद्वानों का दावा है कि मां के प्रति सम्मान यानी मां की पूजा का रिवाज पुराने ग्रीस से आरंभ हुआ है। कहा जाता है कि स्य्बेले ग्रीक देवताओं की मां थीं, उनके सम्मान में यह दिन मनाया जाता था। 

यह दिन त्योहार की तरह मनाने की प्रथा थी। एशिया माइनर के आस-पास और साथ ही साथ रोम में भी वसंत के आस-पास इदेस ऑफ मार्च 15 मार्च से 18 मार्च तक मनाया जाता था। 


यूरोप और ब्रिटेन में मां के प्रति सम्मान दर्शाने की कई परंपराएं प्रचलित हैं। उसी के अंतर्गत एक खास रविवार को मातृत्व और माताओं को सम्मानित किया जाता ा। जिसे मदरिंग संडे कहा जाता था। मदरिंग संडे फेस्टिवल, लितुर्गिकल कैलेंडर का हिस्सा है। यह कैथोलिक कैलेंडर में लेतारे संडे, लेंट में चौथे रविवार को वर्जिन मेरी और 'मदर चर्च' को सम्मानित करने के लिए मनाया जाता हैं। 

परंपरानुसार इस दिन प्रतीकात्मक उपहार देने तथा मां का हर काम परिवार के सदस्य द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है।

अमेरिका में सर्वप्रथम मदर डे प्रोक्लॉमेशन जुलिया वॉर्ड होवे द्वारा मनाया गया था। होवे द्वारा 1870 में रचित "मदर डे प्रोक्लामेशन" में अमेरिकन सिविल वॉर (युद्घ) में हुई मारकाट संबंधी शांतिवादी प्रतिक्रिया लिखी गई थी। यह प्रोक्लामेशन होवे का नारीवादी विश्वास था जिसके अनुसार महिलाओं या माताओं को राजनीतिक स्तर पर अपने समाज को आकार देने का संपूर्ण दायित्व मिलना चाहिए। 

गूगल से जानकारी ढूंढने जाएं तो मदर्स डे के दो प्राथमिक परिणाम सामने आते हैं, वो है,लेंट में मदरिंग संडे, ब्रिटिश कैलेंडर के चौथे संडे के रूप में और मई के दूसरे संडे के रूप में।

बाद में यह तारीखें कुछ इस तरह बदली कि वि‍भिन्न देशों में प्रचलित धर्मों की देवी के जन्मदिन या पुण्य दिवस को इस रूप में मनाया जाने लगा। जैसे कैथोलिक देशों में वर्जिन मैरी डे और इस्लामिक देशों में पैगंबर मुहम्मद की बेटी फातिमा के जन्मदिन की तारीखों से इस दिन को बदल लिया गया। 

वैसे कुछ देश 8 मार्च वुमंस डे को ही मदर्स डे की तरह मनाते हैं। यहां तक कि कुछ देशों में अगर मदर्स डे पर अपनी मां को विधिव‍त सम्मानित नहीं किया जाए तो उसे अपराध की तरह देखा जाता है। 

चीन में मातृ दिवस बेहद लोकप्रिय है और इस दिन उपहार के रूप में गुलनार के फूल सबसे अधिक बिकते हैं। 1997 में चीन में यह दिन गरीब माताओं की मदद के लिए निश्चित किया गया था। खासतौर पर उन गरीब माताओं के लिए जो ग्रामीण क्षेत्रों, जैसे पश्चिम चीन में रहती हैं। 

जापान में मातृ दिवस शोवा अवधि के दौरान महारानी कोजुन (सम्राट अकिहितो की मां) के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता था। आज कल इसे अपनी मां के लिए ही लोग मनाते हैं। बच्चे गुलनार और गुलाब के फूल उपहार के रूप में मां को अवश्य देते हैं। 
थाईलैंड में मातृत्व दिवस थाइलैंड की रानी के जन्मदिन पर मनाया जाता है।
भारत में इसे कस्तुरबा गांधी के सम्मान में मनाए जाने की परंपरा है।
ईश्वर ने जब कायनात की तामीर कर इंसान को ज़मीं पर बसाने का तसव्वुर किया होगा...यक़ीनन उस वक़्त मां का अक्स भी उसके ज़हन में उभर आया होगा... जिस तरह सूरज से यह कायनात रौशन है...ठीक उसी तरह मां से इंसान की ज़िन्दगी में उजाला बिखरा है...तपती-झुलसा देने वाली गर्मी में दरख़्त की शीतल छांव है मां...तो बर्फ़ीली सर्दियों में गुनगुनी धूप का अहसास है मां...एक ऐसी दुआ है मां, जो अपने बच्चों को हर मुसीबत से बचाती है... मां, जिसकी कोख से इंसानियत जनमी...जिसके आंचल में कायनात समा जाए...जिसकी छुअन से दुख-दर्द दूर हो जाएं...जिसके होठों पर दुआएं हों... जिसके दिल में ममता हो और आंखों में औलाद के लिए इंद्रधनुषी  सपने सजे हों...ऐसी ही होती है मां...बिल्कुल ईश्वर के प्रतिरूप जैसी...ईष्वर के बाद मां ही इंसान के सबसे क़रीब होती है...

सभी नस्लों में मां को बहुत अहमियत दी गई है. इस्लाम में मां का बहुत ऊंचा दर्जा है. क़ुरआन की सूरह अल अहक़ाफ़ में अल्लाह फ़रमाता है-"हमने मनुश्य को अपने मां-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करने की ताक़ीद की. उसकी मां ने उसे (पेट में) तकलीफ़ के साथ उठाए रखा और उसे तकलीफ़ के साथ जन्म भी दिया। उसके गर्भ में पलने और दूध छुड़ाने में तीस माह लग गए." हज़रत मुहम्मद सलल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि "‘मां के क़दमों के नीचे जन्नत है." आपने एक हदीस में फ़रमाया है-"‘मैं वसीयत करता हूं कि इंसान को मां के बारे में कि वह उसके साथ नेक बर्ताव करे." एक हदीस के मुताबिक़ एक व्यक्ति ने हज़रत मुहम्मद साहब से सवाल किया कि- इंसानों में सबसे ज़्यादा अच्छे बर्ताव का हक़दार कौन है? इस पर आपने जवाब दिया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने दोबारा वही सवाल किया. आपने फ़रमाया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने तीसरी बार फिर वही सवाल किया. इस बार भी आपने फ़रमाया कि तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने चौथी बार फिर भी यही सवाल किया. आपने कहा कि तुम्हारा पिता. यानी इस्लाम में मां को पिता से तीन गुना ज़्यादा अहमियत दी गई है. इस्लाम में जन्म देने वाली मां के साथ-साथ दूध पिलाने और परवरिश करने वाली मां को भी ऊंचा दर्जा दिया गया है. इस्लाम में इबादत के साथ ही अपनी मां के साथ नेक बर्ताव करने और उसकी ख़िदमत करने का भी हुक्म दिया गया है. कहा जाता है कि जब तक मां अपने बच्चों को दूध नहीं बख़्शती तब तक उनके गुनाह भी माफ़ नहीं होते.

भारत में मां को शक्ति का रूप माना गया है. हिन्दू धर्म में देवियों को मां कहकर पुकारा जाता है. धन की देवी लक्ष्मी, ज्ञान की देवी सरस्वती और शक्ति की देवी दुर्गा को माना जाता है. नवरात्रों में मां के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना का विधान है. वेदों में मां को पूजनीय कहा गया है. महर्षि मनु कहते हैं-दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्या होता है, सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हज़ार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण मां होती है। तैतृयोपनिशद्‌ में कहा गया है-मातृ देवो भव:. इसी तरह जब यक्ष ने युधिष्ठर से सवाल किया कि भूमि से भारी कौन है तो उन्होंने जवाब दिया कि माता गुरुतरा भूमे: यानी मां इस भूमि से भी कहीं अधिक भारी होती है. रामायण में श्रीराम कहते हैं- जननी जन्मभूमिश्च  स्वर्गादपि गरीयसी यानी जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया जाता है.

यहूदियों में भी मां को सम्मान की दृश्टि से देखा जाता है. उनकी धार्मिक मान्यता के मुताबिक़ कुल 55 पैग़म्बर हुए हैं, जिनमें सात महिलाएं थीं. ईसाइयों में मां को उच्च स्थान हासिल है. इस मज़हब में यीशु की मां मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है. गिरजाघरों में ईसा मसीह के अलावा मदर मैरी की प्रतिमाएं भी विराजमान रहती हैं. यूरोपीय देशों में मदरिंग संडे मनाया जाता है. दुनिया के अन्य देशों में भी मदर डे यानी मातृ दिवस मनाने की परंपरा है. भारत में मई के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता है. चीन में दार्शनिक मेंग जाई की मां के जन्मदिन को मातृ दिवस के तौर पर मनाया जाता है, तो इज़राईल में हेनेरिता जोल के जन्मदिवस को मातृ दिवस के रूप में मनाकर मां के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है. हेनेरिता ने जर्मन नाज़ियों से यहूदियों की रक्षा की थी. नेपाल में वैशाख के कृष्ण पक्ष में माता तीर्थ उत्सव मनाया जाता है. अमेरिका में मई के दूसरे रविवार को मदर डे मनाया जाता है. इस दिन मदर डे के लिए संघर्ष करने वाली अन्ना जार्विस को अपनी मुहिम में कामयाबी मिली थी. इंडोनेशिया में 22 दिसंबर को मातृ दिवस मनाया जाता है. भारत में भी मदर डे पर उत्साह देखा जाता है.

मां बच्चे को नौ माह अपनी कोख में रखती है. प्रसव पीड़ा सहकर उसे इस संसार में लाती है. सारी-सारी रात जागकर उसे सुख की नींद सुलाती है. हम अनेक जनम लेकर भी मां की कृतज्ञता प्रकट नहीं कर सकते. मां की ममता असीम है, अनंत है और अपरंपार है. मां और उसके बच्चों का रिश्ता अटूट है. मां बच्चे की पहली गुरु होती है. उसकी छांव तले पलकर ही बच्चा एक ताक़तवर इंसान बनता है. हर व्यक्ति अपनी मां से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. वो कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, लेकिन अपनी मां के लिए वो हमेशा  उसका छोटा-सा बच्चा ही रहता है. मां अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्यौछावर करने के लिए हमेशा तत्पर रहती है. मां बनकर ही हर महिला ख़ुद को पूर्ण मानती है.

कहते हैं कि एक व्यक्ति बहुत तेज़ घुड़सवारी करता था. एक दिन ईश्वर ने उस व्यक्ति से कहा कि अब ध्यान से घुड़सवारी किया करो. जब उस व्यक्ति ने इसकी वजह पूछी तो ईश्वर ने कहा कि अब तुम्हारे लिए दुआ मांगने वाली तुम्हारी ज़िन्दा नहीं है. जब तक वो ज़िन्दा रही उसकी दुआएं तुम्हें बचाती रहीं, मगर उन दुआओं का साया तुम्हारे सर से उठ चुका है. सच, मां इस दुनिया में बच्चों के लिए ईश्वर का ही प्रतिरूप है, जिसकी दुआएं उसे हर बला से महफ़ूज़ रखती हैं.

ज़िंदगी की बुनियाद एक कोशिका पर!

    


क्या आपको पता है कि धरती पर ज़िंदगी की बुनियाद एक कोशिका या सेल पर टिकी है? ये तो पता ही होगा कि क़ुदरत के खेल भी निराले हैं?

आप भी सोच रहे होंगे कि आज हम क्या अजीबो-ग़रीब बातें कर रहे हैं. अजी हम कोई अजीबो-ग़रीब बात नही कर रहे. हमने जो तीन जुमले आपकी नज़र किए, असल में इन तीनों का आपस में गहरा ताल्लुक़ है.
चलिए बात को तरतीब से रखते हैं.
हम ये बात तो बरसों से सुनते आए हैं कि क़ुदरत के खेल निराले हैं. अब देखिए न, वैज्ञानिक कहते हैं कि इस क़ायनात की बुनियाद एक कोशिका या सेल पर टिकी है. यानी छोटे से छोटा जीव हो या बड़े से बड़ा, सबकी शुरुआत एक कोशिका से होती है.
हम ये भी सुनते आए हैं कि ये कोशिकाएं इतनी छोटी होती हैं कि इन्हें नंगी आंखों से देखना मुमकिन है. मगर, अंडा जो आप देखते हैं. फिर वो चाहे मुर्गी का हो या किसी और जानवर का, वो एक कोशिका ही है.
भरी-पूरी ज़िंदगी अपने में समाए हुए. उसी से आख़िर में एक जीव निकलता है. बशर्ते, उस अंडे को ठीक से सेया जाए और आप उसे न खाएं. ये अंडा असल में सेक्स सेल या कोशिका होता है, जिसमें आने वाली नस्ल का रंग-रूप ढल रहा होता है.
क़ुदरत का कारोबार सेक्स से चलता है. मतलब ये कि सेक्स सेल्स यानी वो कोशिकाएं, जिनके मेल से नई ज़िंदगी पैदा होती है.
आम तौर पर ज़्यादातर जीवों में नर और मादा सेक्स सेल अलग-अलग होती हैं. इन सेक्स सेल्स का काम आपसी मेल से नई पीढ़ी को जन्म देना होता है.
जहां मादा सेक्स सेल का काम होता है, नई ज़िंदगी को भरपूर खाना-पानी और सुरक्षा देना. वहीं नर सेक्स सेल का काम होता है, ज़्यादा से ज़्यादा तादाद में पैदावार करना.
हिंदी में मादा सेक्स सेल आम तौर पर अंडाणु या अंडे के तौर पर जानी जाती हैं. वहीं नर सेक्स सेल को शुक्राणु कहते हैं.
क़ुदरत में जितने तरह के जीव होते हैं, उतने तरह की सेक्स सेल देखने को मिलती हैं.
आम तौर पर माना ये जाता है कि जानवर जितना बड़ा होता है, उसकी सेक्स कोशिकाएं उतनी ही बड़ी होंगी. मगर ऐसा होता नहीं. ख़ास तौर से नर सेक्स सेल या शुक्राणु के बारे में तो ये बात बिल्कुल लागू नहीं होती.
आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि दुनिया का सबसे बड़ा शुक्राणु मक्खी की एक नस्ल का होता है. जिसका वैज्ञानिक नाम ड्रॉसोफिला बाइफरका है.
इसका शुक्राणु रस्सी की लटों की तरह आपस में ही गुंथा हुआ रहता है. जब इसे सीधा करके इसे नापा गया तो ड्रॉसोफिला का शुक्राणु 6 सेंटीमीटर का निकला. जबकि ख़ुद मक्खी की लंबाई इस शुक्राणु के बीसवें हिस्से के ही बराबर होती है.
दुनिया का सबसे छोटा शुक्राणु एक ततैये का होता है, जिसका वैज्ञानिक नाम कोटेसिया कांग्रेगाटा है.
ब्रिटेन की शेफील्ड यूनिवर्सिटी की रोंडा स्नूक ने सेक्स सेल्स के बारे में काफ़ी रिसर्च की है. स्नूक कहती हैं कि शुक्राणु और अंडाणु के आकार में इतने फ़र्क़ की कई वजहें होती हैं.
इसकी पहली और सबसे बड़ी वजह तो ये होती है कि मादा सेक्स सेल या अंडाणु, सबसे अच्छे शुक्राणु से ही मेल करना चाहते हैं.
इसके लिए ज़रूरी है कि शुक्राणु सेहतमंद हों, ताक़तवर हों, फ़ुर्तीले हों. हर जीव का प्रजनन अंग अलग होता है.
शुक्राणुओं को कई बार लंबा सफ़र तय करना होता है. जैसे इंसान में, तो शुक्राणु छोटे और फ़ुर्तीले होना ज़रूरी है, तभी वो लंबा सफ़र करके अंडाणु तक पहुंच सकेंगे. लंबे सफ़र में कई बार शुक्राणुओं का ख़ात्मा हो सकता है. इसलिए उनका छोटे और फ़ुर्तीले होना क़ुदरती तौर पर कारगर होता है.
स्नूक इसकी तुलना खेल की पिच से करती हैं. वो कहती हैं कि पिच बड़ी हो तो ज़्यादा खिलाड़ियों की ज़रूरत होती है. फिर शुक्राणुओं को आपस में भी मुक़ाबला करना होता है.
इसमें अपने प्रतिद्वंदी शुक्राणु को रोकने के लिए नर सेक्स सेल कई तरह के नुस्खे आज़माती हैं.
जैसे वो मेटिंग प्लग जैसी चीज़ का इस्तेमाल करते हैं, जिससे वो अंडाणु से जुड़ जाते हैं, तो दूसरा शुक्राणु फिर जुड़ नहीं पाता. कई बार शुक्राणु, ज़हरीला केमिकल छोड़ते हैं, ताकि उनके मुक़ाबले में दौड़ रहे शुक्राणु मर जाएं.
सिर्फ़ नर सेक्स सेल या शुक्राणु ही तरह-तरह के नहीं होते. मादा सेक्स सेल या अंडाणु भी तरह-तरह के होते हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक़, दुनिया की सबसे बड़ी मादा सेक्स सेल, शुतुरमुर्ग का अंडा होती है.
शुतुरमुर्ग का अंडा, मुर्गी के अंडे से बीस गुना ज़्यादा भारी होता है. ये पंद्रह सेंटीमीटर लंबा और तेरह सेंटीमीटर चौड़ा होता है. वहीं परिंदों में सबसे छोटा अंडा हमिंगबर्ड का होता है, मटर के दाने के बराबर का.
शेफील्ड यूनिवर्सिटी के टिम बिर्कहेड कहते हैं कि परिंदों के अंडों के आकार में काफ़ी फ़र्क देखने को मिलता है. बिर्कहेड कहते हैं कि परिंदों के अंडों का आकार इस बात पर निर्भर करता है कि उन अंडों से निकलने वाले चूज़े पूरी तरह विकसित होकर निकलेंगे या उन्हें और देखभाल की ज़रूरत होगी.
इसीलिए कई बार एक ही साइज़ के परिंदों के अंडे अलग-अलग होते हैं.
असल में अंडे की परिभाषा बड़ी व्यापक है. जैसे कि इंसान की मादा सेक्स सेल को भी अंडा ही कहते हैं. अब चूंकि इंसान में बच्चे का विकास मां के गर्भ में होता है, इसलिए उसके विकास की सारी ज़रूरत की चीज़ें गर्भनाल के ज़रिए अंडे को मिलती रहती हैं. मां विकसित बच्चे को जन्म देती है.
मगर बहुत से जानवर हैं जो अंडे देते हैं, जिनके अंदर बच्चे का विकास होता है. उस बच्चे के विकास के लिए अंडे के अंदर खाना, पानी और सुरक्षा का इंतज़ाम होना चाहिए. इसी वजह से अंडे देने वाले जानवरों की मादा सेक्स सेल या अंडे बड़े होते हैं.
तो, इंसानों के अंडाणु या अंडे जहां 0.12 मिलीमीटर के होते हैं. वहीं मुर्गी का अंडा 55 मिलीमीटर का और शुतुरमुर्ग का अंडा 15 सेंटीमीटर का.
तो, अब समझे आप! हमने क्यों कहा था कि क़ुदरत के खेल निराले होते हैं.
दुनिया के सबसे बड़े मादा सेक्स सेल या अंडे को तो हम नंगी आंखों से देख सकते हैं. मगर दुनिया के सबसे बड़े शुक्राणु को देखने के लिए भी हमें सूक्ष्मदर्शी या माइक्रोस्कोप की ज़रूरत होगी.
शुक्र है, इंसान के दिमाग़ की कोशिकाओं ने इतनी तरक़्क़ी कर ली है, कि हम ज़िंदगी की बुनियादी सेल्स या कोशिकाओं को देखने के लिए माइक्रोस्कोप बना सके.

गर्मी में बुखार हो जाए तो बरतें ये सावधानियां

    


तेज गर्मी कभी-कभार बुखार की वजह भी बन सकती हैं। अगर बुखार 102 डिग्री तक है और कोई और खतरनाक लक्षण नहीं हैं तो मरीज की देखभाल घर पर ही कर सकते हैं। मरीज के शरीर पर सामान्य पानी की पट्टियां रखें। पट्टियां तब तक रखें, जब तक शरीर का तापमान कम न हो जाए। अगर इससे ज्यादा तापमान है तो फौरन डॉक्टर को दिखाएं। मरीज को एसी में रख सकते हैं, तो बहुत अच्छा है, नहीं तो पंखे में रखें। कई लोग बुखार होने पर चादर ओढ़कर लेट जाते हैं और सोचते हैं कि पसीना आने से बुखार कम हो जाएगा, लेकिन इस तरह चादर ओढ़कर लेटना सही नहीं है।


टैबलट देते वक्त ध्यान रखें
मरीज को हर 6 घंटे में पैरासेटामॉल (Paracetamol) की एक गोली दे सकते हैं। यह मार्केट में क्रोसिन (crocin), कालपोल (calpol) आदि ब्रैंड नेम से मिलती है। दूसरी कोई गोली डॉक्टर से पूछे बिना न दें। दो दिन तक बुखार ठीक न हो तो मरीज को डॉक्टर के पास जरूर ले जाएं। मरीज को पूरा आराम करने दें, खासकर तेज बुखार में। आराम भी बुखार में इलाज का काम करता है।

पेट की गड़बड़ी
गर्मियों में खाने में किटाणु जल्दी पनपते हैं। ऐसे में खाना जल्दी खराब हो जाता है। खराब खाना या उलटा-सीधा खाने से गर्मियों में कई बार डायरिया यानी उल्टी-दस्त की शिकायत भी होती है। लू लगने पर भी यह समस्या हो सकती है। डायरिया में अक्सर उल्टी और दस्त दोनों होते हैं, लेकिन ऐसा भी मुमकिन है कि उलटियां न हों, पर दस्त खूब हो रहे हों।

डायरिया आमतौर पर 3 तरह का होता है...

वायरल
यह वायरस के जरिए ज्यादातर छोटे बच्चों में होता है। पेट में मरोड़ के साथ लूज मोशंस और उलटी आती है। काफी कमजोरी भी महसूस होती है लेकिन यह ज्यादा खतरनाक नहीं होता।
इलाज: वायरल डायरिया में मरीज को ओआरएस का घोल या नमक और चीनी की शिकंजी लगातार देते रहें। उलटी रोकने के लिए डॉमपेरिडॉन (Domperidone) और लूज मोशंस रोकने के लिए रेसेसाडोट्रिल (Racecadotrill) ले सकते हैं। पेट में मरोड़ हैं तो मैफटल स्पास (Maflal spas) ले सकते हैं। 4 घंटे से पहले दोबारा टैब्लट न लें। एक दिन में उलटी या दस्त न रुकें तो डॉक्टर के पास ले जाएं।

बैक्टीरियल
इसमें तेज बुखार के अलावा पॉटी में पस या खून आता है।
इलाज: एंटी-बायॉटिक दवाएं दी जाती हैं। साथ में प्रोबायॉटिक्स भी देते हैं। दही प्रोबायॉटिक्स का बेहतरीन नेचरल सोर्स है। एंटी-बायोटिक डॉक्टर की सलाह के बिना न लें।

प्रोटोजोअल
इसमें भी बुखार के साथ पॉटी में पस या खून आता है।
इलाज: प्रोटोजोअल इन्फेक्शन में एंटी-अमेबिक दवा दी जाती है।

नोट: यह गलत धारणा है कि डायरिया के मरीज को खाना-पानी नहीं देना चाहिए। मरीज को लगातार पतली और हल्की चीजें देते रहें, जैसे कि नारियल पानी, नींबू पानी (हल्का नमक और चीनी मिला), छाछ, लस्सी, दाल का पानी, ओआरएस का घोल, पतली खिचड़ी, दलिया आदि। सिर्फ तली-भुनी चीजों से मरीज को परहेज करना चाहिए।

बौद्ध धर्म का इतिहास और महत्‍वपूर्ण तथ्‍य

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गौतम बुद्ध का जन्म, 563 ईसा पूर्व-निर्वाण 483 ईसा पूर्व को हुआ। वह विश्व महान दार्शनिक, वैज्ञानिक, धर्मगुरु और उच्च कोटी के समाज सुधारक के रूप में अवन्तरित हुए थे। बुद्ध भगवान बौद्ध धर्म के संस्थापक थे। उनका जन्म राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था, उनकी माता का नाम महामाया था, सात दिन बाद ही उनकी मां की मृत्यु हो गई थी जिसके बाद महाप्रजापती गौतमी ने उनका पालन किया।
शादी के बाद वह संसार को दुखों से मुक्ति का मार्ग दिलाने के लिए पत्नी और बेटे को छोड़कर निकल गए थे। सालों कठोर साधना करने के बाद वह बोध गया (बिहार) में बोधी वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वह सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध बन गए। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। वर्षा ऋतु की शुरुआत में गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है। इस दिन से अगले चार महीने तक साधु-सन्त एक जगह पर ठहरकर अपने ज्ञान की गंगा को बहाते हैं।

बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है. इसके प्रस्थापक महात्मा बुद्ध शाक्यमुनि (गौतम बुद्ध) थे. वे 563 ईसा पूर्व से 483 ईसा पूर्व तक रहे. ईसाई और इस्लाम धर्म से पहले बौद्ध धर्म की उत्पत्ति हुई थी. दोनों धर्म के बाद यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है. इस धर्म को मानने वाले ज्यादातर चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, कंबोडिया, श्रीलंका, नेपाल, भूटान और भारत जैसे कई देशों में रहते हैं:
(1) बौद्ध धर्म के संस्थापक थे गौतम बुद्ध. इन्हें एशिया का ज्योति पुंज कहा जाता है.

(2) गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई. पूर्व के बीच शाक्य गणराज्य की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी, नेपाल में हुआ था.

(3) इनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के मुखिया थे.

(4) सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद ही उनकी मां मायादेवी का देहांत हो गया था.

(5) सिद्धार्थ की सौतेली मां प्रजापति गौतमी ने उनको पाला.

(6) इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था.

(7) सिद्धार्थ का 16 साल की उम्र में दंडपाणि शाक्य की कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुआ.

(8) इनके पुत्र का नाम राहुल था.

(9) सिद्धार्थ जब कपिलावस्तु की सैर के लिए निकले तो उन्होंने चार दृश्यों को देखा:
(i) बूढ़ा व्यक्ति
(ii) एक बिमार व्यक्ति
(iii) शव
(iv) एक संयासी

(10) सांसारिक समस्याओं से दुखी होकर सिद्धार्थ ने 29 साल की आयु में घर छोड़ दिया. जिसे बौद्ध धर्म में महाभिनिष्कमण कहा जाता है.

(11) गृह त्याग के बाद बुद्ध ने वैशाली के आलारकलाम से सांख्य दर्शन की शिक्षा ग्रहण की.

(12) आलारकलाम सिद्धार्थ के प्रथम गुरू थे.

(13) आलारकलाम के बाद सिद्धार्थ ने राजगीर के रूद्रकरामपुत्त से शिक्षा ग्रहण की.

(14) उरूवेला में सिद्धार्थ को कौण्डिन्य, वप्पा, भादिया, महानामा और अस्सागी नाम के 5 साधक मिले.

(15) बिना अन्न जल ग्रहण किए 6 साल की कठिन तपस्या के बाद 35 साल की आयु में वैशाख की पूर्णिमा की रात निरंजना नदी के किनारे, पीपल के पेड़ के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ.

(16) ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जाने जाने लगे. जिस जगह उन्‍हें ज्ञान प्राप्‍त हुआ उसे बोधगया के नाम से जाना जाता है.

(17) बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया जिसे बौद्ध ग्रंथों में धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है.

(18) बुद्ध ने अपने उपदेश कोशल, कौशांबी और वैशाली राज्य में पालि भाषा में दिए.

(19) बुद्ध ने अपने सर्वाधिक उपदेश कौशल देश की राजधानी श्रीवस्ती में दिए.

(20) इनके प्रमुख अनुयायी शासक थे: 
(i)
 बिंबसार
(ii) प्रसेनजित
(iii) उदयन

(21) बुद्ध की मृत्यु 80 साल की उम्र में कुशीनारा में चुन्द द्वारा अर्पित भोजन करने के बाद हो गई. जिसे बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा गया है.

(22) मल्लों ने बेहद सम्मान पूर्वक बुद्ध का अंत्येष्टि संस्कार किया.

(23) एक अनुश्रुति के अनुसार मृत्यु के बाद बुद्ध के शरीर के अवशेषों को आठ भागों में बांटकर उन पर आठ स्तूपों का निर्माण कराया गया.

(24) बुद्ध के जन्म और मृत्यु की तिथि को चीनी पंरपरा के कैंटोन अभिलेख के आधार पर निश्चित किया गया है.

(25) बौद्ध धर्म के बारे में हमें विशद ज्ञान पालि त्रिपिटक से प्राप्त होता है.

(26) बौद्ध धर्म अनीश्वरवादी है और इसमें आत्मा की परिकल्पना भी नहीं है.

(27) बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है.

(28) तृष्णा को क्षीण हो जाने की अवस्था को ही बुद्ध ने निर्वाण कहा है.

(29) बुद्ध के अनुयायी दो भागों मे विभाजित थे: 
(i)
 भिक्षुक- बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जिन लोगों ने संयास लिया उन्हें भिक्षुक कहा जाता है.
(ii) उपासक- गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए बौद्ध धर्म अपनाने वालों को उपासक कहते हैं. इनकी न्यूनत्तम आयु 15 साल है.

(30) बौद्धसंघ में प्रविष्‍ट होने को उपसंपदा कहा जाता है.

(31) प्रविष्ठ बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं-
(i) बुद्ध
(ii) धम्म
(iii) संघ

(32) चतुर्थ बौद्ध संगीति के बाद बौद्ध धर्म दो भागों में विभाजित हो गया:
(i) हीनयान
(ii) महायान

(33) धार्मिक जुलूस सबसे पहले बौद्ध धर्म में ही निकाला गया था.

(34) बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र त्यौहार वैशाख पूर्णिमा है जिसे बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है.

(35) बुद्ध ने सांसारिक दुखों के संबंध में चार आर्य सत्यों का उपदेश दिया है. ये हैं
(i) दुख
(ii) दुख समुदाय
(iii) दुख निरोध
(iv) दुख निरोधगामिनी प्रतिपदा

(36) सांसारिक दुखों से मुक्ति के लिए बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग की बात कही. ये साधन हैं.
(i) सम्यक दृष्टि
(ii) सम्यक संकल्प
(iii) सम्यक वाणी
(iv) सम्यक कर्मांत
(v) सम्यक आजीव
(vi) सम्यक व्यायाम
(vii) सम्यक स्मृति
(viii) सम्यक समाधि

(37) बुद्ध के अनुसार अष्टांगिक मार्गों के पालन करने के उपरांत मनुष्य की भव तृष्णा नष्ट हो जाती है और उसे निर्वाण प्राप्त होता है.

(38) बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति के लिए 10 चीजों पर जोर दिया है:
(i) अहिंसा
(ii) सत्य
(iii) चोरी न करना
(iv) किसी भी प्रकार की संपत्ति न रखना
(v) शराब का सेवन न करना
(vi) असमय भोजन करना
(vii) सुखद बिस्तर पर न सोना
(viii) धन संचय न करना
(ix) महिलाओं से दूर रहना
(X) नृत्य गान आदि से दूर रहना.

(39) बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया.

(40) अनीश्वरवाद के संबंध में बौद्धधर्म और जैन धर्म में समानता है.

(41) जातक कथाएं प्रदर्शित करती हैं कि बोधिसत्व का अवतार मनुष्य रूप में भी हो सकता है और पशुओं के रूप में भी.

(42) बोधिसत्व के रूप में पुनर्जन्मों की दीर्घ श्रृंखला के अंतर्गत बुद्ध ने शाक् मुनि के रूप में अपना अंतिम जन्म प्राप्त किया.

(43) सर्वाधिक बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण गंधार शैली के अंतर्गत किया गया था. लेकिन बुद्ध की प्रथम मूर्ति मथुरा कला के अंतर्गत बनी थी.