Shamsher ALI Siddiquee

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कारगिल विजय दिवस : जरा याद करो कुर्बानी

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‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌’।
(या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा।)

गीता के इसी श्लोक को प्रेरणा मानकर भारत के शूरवीरों नेमें दुश्मन को पाँव पीछे खींचने के लिए मजबूर कर दिया था। 

26 जुलाई 1999 के दिन भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर भारत भूमि को घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इसी की याद में ‘26 जुलाई’ अब हर वर्ष के रूप में मनाया जाता है।

यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हँसते-हँसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन समर्पित है उन्हें, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए बलिदान कर दिया।

कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि : कारगिल युद्ध जो कारगिल संघर्ष के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में मई के महीने में कश्मीर के कारगिल जिले से प्रारंभ हुआ था। 

इस युद्ध का कारण था बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों व पाक समर्थित आतंकवादियों का लाइन ऑफ कंट्रोल यानी भारत-पाकिस्तान की वास्तविक नियंत्रण रेखा के भीतर प्रवेश कर कई महत्वपूर्ण पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लेह-लद्दाख को भारत से जोड़ने वाली सड़क का नियंत्रण हासिल कर सियाचिन-ग्लेशियर पर भारत की स्थिति को कमजोर कर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरा पैदा करना।

पूरे दो महीने से ज्यादा चले इस युद्ध (विदेशी मीडिया ने इस युद्ध को सीमा संघर्ष प्रचारित किया था) में भारतीय थलसेना व वायुसेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे आक्रमणकारियों को मार भगाया था। स्वतंत्रता का अपना ही मूल्य होता है, जो वीरों के रक्त से चुकाया जाता है।


हिमालय से ऊँचा था साहस उनका : इस युद्ध में हमारे लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा शहीद व 1300 से ज्यादा घायल हो गए, जिनमें से अधिकांश अपने जीवन के 30 वसंत भी नही देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है। 

इन रणबाँकुरों ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था। वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्रध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था। 

भारत के वीर सपूत : 

‘ये दिल माँगे मोर’ - हिमाचलप्रदेश के छोटे से कस्बे पालमपुर के 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के कैप्टन विक्रम बत्रा उन बहादुरों में से एक हैं, जिन्होंने एक के बाद एक कई सामरिक महत्व की चोटियों पर भीषण लड़ाई के बाद फतह हासिल की थी।

यहाँ तक कि पाकिस्तानी लड़ाकों ने भी उनकी बहादुरी को सलाम किया था और उन्हें ‘शेरशाह’ के नाम से नवाजा था। मोर्चे पर डटे इस बहादुर ने अकेले ही कई शत्रुओं को ढेर कर दिया। सामने से होती भीषण गोलीबारी में घायल होने के बावजूद उन्होंने अपनी डेल्टा टुकड़ी के साथ चोटी नं. 4875 पर हमला किया, मगर एक घायल साथी अधिकारी को युद्धक्षेत्र से निकालने के प्रयास में माँ भारती का लाड़ला विक्रम बत्रा 7 जुलाई की सुबह शहीद हो गया। अमर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा को अपने अदम्य साहस व बलिदान के लिए मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैनिक पुरस्कार ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।


17 जाट रेजिमेंट के बहादुर कैप्टन अनुज नायर टाइगर हिल्स सेक्टर की एक महत्वपूर्ण चोटी ‘वन पिंपल’ की लड़ाई में अपने 6 साथियों के शहीद होने के बाद भी मोर्चा सम्भाले रहे। गम्भीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने अतिरिक्त कुमुक आने तक अकेले ही दुश्मनों से लोहा लिया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय सेना इस सामरिक चोटी पर भी वापस कब्जा करने में सफल रही। 

इस वीरता के लिए कैप्टन अनुज को मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े सैनिक सम्मान ‘महावीर चक्र’ से नवाजा गया। 

राजपूताना राइफल्स के मेजर पद्मपाणि आचार्य भी कारगिल में दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए। उनके भाई भी द्रास सेक्टर में इस युद्ध में शामिल थे। उन्हें भी इस वीरता के लिए ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।

1/11 गोरखा राइफल्स के लेफ्टिनेंट मनोज पांडेय की बहादुरी की इबारत आज भी बटालिक सेक्टर के ‘जुबार टॉप’ पर लिखी है। अपनी गोरखा पलटन लेकर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में ‘काली माता की जय’ के नारे के साथ उन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में लड़ते हुए मनोज पांडेय ने दुश्मनों के कई बंकर नष्ट कर दिए। 

गम्भीर रूप से घायल होने के बावजूद मनोज अंतिम क्षण तक लड़ते रहे। भारतीय सेना की ‘साथी को पीछे ना छोडने की परम्परा’ का मरते दम तक पालन करने वाले मनोज पांडेय को उनके शौर्य व बलिदान के लिए मरणोपरांत ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।

भारतीय वायुसेना भी इस युद्ध में जौहर दिखाने में पीछे नहीं रही, टोलोलिंग की दुर्गम पहाडियों में छिपे घुसपैठियों पर हमला करते समय वायुसेना के कई बहादुर अधिकारी व अन्य रैंक भी इस लड़ाई में दुश्मन से लोहा लेते हुए शहीद हुए। सबसे पहले कुर्बानी देने वालों में से थे कैप्टन सौरभ कालिया और उनकी पैट्रोलिंग पार्टी के जवान। घोर यातनाओं के बाद भी कैप्टन कालिया ने कोई भी जानकारी दुश्मनों को नहीं दी। 

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा का विमान भी दुश्मन गोलीबारी का शिकार हुआ। अजय का लड़ाकू विमान दुश्मन की गोलीबारी में नष्ट हो गया, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और पैराशूट से उतरते समय भी शत्रुओं पर गोलीबारी जारी रखी और लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता इस युद्ध में पाकिस्तान द्वारा युद्धबंदी बनाए गए। 

वीरता और बलिदान की यह फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती। भारतीय सेना के विभिन्न रैंकों के लगभग 30,000 अधिकारी व जवानों ने ऑपरेशन विजय में भाग लिया। 

युद्ध के पश्चात पाकिस्तान ने इस युद्ध के लिए कश्मीरी आतंकवादियों को जिम्मेदार ठहराया था, जबकि यह बात किसी से छिपी नहीं थी कि पाकिस्तान इस पूरी लड़ाई में लिप्त था। बाद में नवाज शरीफ और शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पाक सेना की भूमिका को स्वीकार किया था। यह युद्ध हाल के ऊँचाई पर लड़े जाने वाले विश्व के प्रमुख युद्धों में से एक है। सबसे बड़ी बात यह रही कि दोनों ही देश परमाणु हथियारों से संपन्न हैं। 

पर कोई भी युद्ध हथियारों के बल पर नहीं लड़ा जाता है, युद्ध लड़े जाते हैं साहस, बलिदान, राष्ट्रप्रेम व कर्त्तव्य की भावना से और हमारे भारत में इन जज्बों से भरे युवाओं की कोई कमी नहीं है।

मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने वाले अमर बलिदानी भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर इनकी यादें हमारे दिलों में हमेशा- हमेशा के लिए बसी रहेंगी... 


‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा।

दो महीने तक चला था कारगिल युद्ध

पूरे दो महीने से भी अधिक समय तक चले इस युद्ध में भारतीय थलसेना व वायुसेना ने 'लाइन ऑफ कंट्रोल' पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे आक्रमणकारियों को मार भगाया था। दुश्मन पर मिली 26 जुलाई कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज अगर हम देश की सरहद के बीच सकून और सुरक्षित होने का एहसास कर पा रहे हैं तो वह हमारे वीर सैनिकों की वजह से है।

ऑपरेशन बद्र
1998-99 की सर्दियों में पाकिस्तानी सेना आतंकवादियों की मिलीभगत से नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार कर कारगिल क्षेत्र में भारतीय सीमा में घुस आई। सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण कारगिल पहाडिय़ों पर उन्होंने बेहद सर्दी के दिनों में ही कब्जा जमा लिया। उन्होंने घुसपैठ को ऑपरेशन बद्र नाम दिया।

मकसद
दुश्मन की मंशा कश्मीर को लद्दाख से जोडऩे वाली एकमात्र सड़क एनएच-1 पर कब्जा करने की थी। इससे सियाचिन ग्लेशियर पर भारतीय उपस्थिति पर विपरीत असर पड़ता और उसे कश्मीर की विवादित सीमा के मसले पर बातचीत के लिए विवश होना पड़ता। इसके जरिये पाकिस्तान का मकसद कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीकरण करना भी था।

युद्ध
मई, 1999 में भारतीय सेना को घुसपैठ का पता चलते ही सरकार ने ऑपरेशन विजय की घोषणा की। सेना ने हमला बोल दिया। दो महीने तक दोनों पक्षों में भीषण युद्ध हुआ। कई सैनिक शहीद हुए। पहाड़ की ऊंचाई पर कब्जा जमाने के चलते दुश्मनों को रणनीतिक लाभ मिला लेकिन हमारी सेना के तगड़े प्रहार के चलते जल्दी ही उनके पांव उखड़ गए। एक-एक कर कारगिल की सभी चोटियों पर भारतीय परचम फिर से लहराने लगा। 26 जुलाई, 1999 को विजय की घोषणा हुई।

साजिश
पाकिस्तानी सेना हमेशा अपनी घुसपैठ और युद्ध में शिरकत से इन्कार करती रही लेकिन माना जाता है कि अक्टूबर, 1998 में पाकिस्तानी सेना की कमान संभालने के बाद जनरल परवेज मुशर्रफ ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी किसी भी भूमिका से इन्कार करते हुए मुशर्रफ को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। मुशर्रफ के रिश्तेदार लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) शाहिद अजीज ने अपनी किताब 'ये खामोशी कहां तक' और पाकिस्तान सेना में कर्नल रहे अशफाक हुसैन ने भी अपनी किताब 'विटनेस टू ब्लंडर-कारगिल स्टोरी अनफोल्ड्स' में मुशर्रफ की कुटिल चालों और उनके झूठ को बेनकाब करते हुए कहा है कि उस युद्ध में पाकिस्तान सेना ने भी हिस्सा लिया था।

कारगिल जंग
मई-जुलाई 1999
नुकसान (भारतीय आधिकारिक आंकड़े)
  • शहीद-527
  • घायल-1363
  • युद्धबंदी-1
  • लड़ाकू विमान गिराया गया-1
  • लड़ाकू विमान क्रैश-1
  • हेलीकाप्टर मार गिराया-1
पाकिस्तानी आधिकारिक आंकड़े
  • मारे गए सैनिक-357-453
  • घायल-665 से अधिक
  • युद्धबंदी-8

कैसे आगाज से अंजाम तक पहुंचा कारगिल युद्ध
  • 3 मई- स्थानीय गड़रियों ने कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ की सूचना दी।
  • 5 मई- भारतीय सेना का गश्ती दल भेजा गया। पांच भारतीय सैनिकों को बंधक बनाकर यातनाएं देकर मार दिया गया।
  • 9 मई- पाकिस्तानी सेना की भारी गोलीबारी में कारगिल में रखे भारतीय गोला-बारुद तबाह हुए।
  • 10 मई- द्रास, काकसर और मुश्कोह सेक्टरों में सबसे पहले घुसपैठ का पता चला।
  • मध्य मई- कारगिल सेक्टर में भारतीय सेना का जमावड़ा।
  • 26 मई- घुसपैठियों पर भारतीय वायुसेना (आइएएफ) ने हमला बोला।
  • 27 मई- आइएएफ के दो लड़ाकू विमान मार गिराए गए। फ्लाइट लेफ्टिनेंच नचिकेता को युद्धबंदी बनाया गया।
  • 28 मई- पाकिस्तान ने आइएएफ एमआइ-17 को मार गिराया। चालक दल के चार सदस्य मारे गए।
  • 1 जून- पाकिस्तान ने एनएच-1 पर बम बरसाने शुरू किए।
  • 5 जून- तीन पाकिस्तानी सैनिकों से मिले कागजात को भारतीय सेना ने जारी किए। ये पाकिस्तानी के शामिल होने की कहानी कह रहे थे।
  • 6 जून- भारतीय सेना ने जोरदार जवाबी हमला शुरू किया।
  • 9 जून- बाल्टिक सेक्टर कीदो अहम चौकियों पर भारत ने दोबारा कब्जा जमाया।
  • 11 जून- भारत ने चीन दौरे पर गए पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख परवेज मुशर्रफ की रावलपिंडी में अपने चीफ ऑफ जनरल स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल अजीज खान से बातचीत को जारी किया। इसमें पाकिस्तानी सेना के शामिल होने की पुष्टि हो रही थी।
  • 13 जून- द्रास में तोलोलिंग पर कब्जा जमाया गया।
  • 15 जून- तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को फोन पर कारगिल से सेना को पीछे हटने को कहा।
  • 29 जून- भारतीय सेना ने दो अहम चौकियों प्वाइंट 5060 और प्वाइंट 5100 पर कब्जा जमाया।
  • 2 जुलाई- भारतीय सेना ने कारगिल में तिहरा हमला शुरू किया।
  • 4 जुलाई- 11 घंटों की मशक्कत के बाद टाइगर हिल पर भारत का कब्जा।
  • 5 जुलाई- द्रास पर भारत का कब्जा, क्लिंटन से मुलाकात के बाद शरीफ ने पाकिस्तानी सेना को वापस बुलाने की घोषणा की।
  • 7 जुलाई- बटालिक में जुबार चोटी पर भारत ने कब्जा जमाया।
  • 11 जुलाई- पाकिस्तानी सेना के पांव उखडऩे शुरू, बटालिक की प्रमुख चोटियों पर भारत का कब्जा।
  • 14 जुलाई- तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री ने कारगिल को घुसपैठियों से मुक्त कराने के लिए चलाए गए ऑपरेशन विजय को सफल घोषित किया।
  • 26 जुलाई- आधिकारिक रूप से कारगिल युद्ध समाप्त हुआ।

चंद्रशेखर आजाद : भारत मां के महान सपूत

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का जन्म 23 जुलाई, को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी एवं माता का नाम जगदानी देवी था। आजाद का जन्म स्थान भाबरा अब 'आजादनगर' के रूप में जाना जाता है। आजाद आजीवन ब्रह्मचारी रहे। 

वे 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की। वहां उन्होंने कानून भंग आंदोलन में योगदान दिया था। 

1920-21 के वर्षों में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े। वे गिरफ्तार हुए और जज के समक्ष प्रस्तुत किए गए, जहां उन्होंने अपना नाम 'आजाद', पिता का नाम 'स्वतंत्रता' और 'जेल' को उनका निवास बताया। 

उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई। हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने,
'वन्दे मातरम्' और 'महात्मा गांधी की जय' का स्वर बुलंद किया।
इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाए।
जब क्रांतिकारी आंदोलन उग्र हुआ, तब आजाद उस तरफ खिंचे और
'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट आर्मी' से जुड़े। रामप्रसाद बिस्मिल के
नेतृत्व में आजाद ने काकोरी षड्यंत्र (1925) में सक्रिय भाग लिया
और पुलिस की आंखों में धूल झोंककर फरार हो गए।
17 दिसंबर, 1928 को चंद्रखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने शाम
के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेर लिया और
ज्यों ही जे.पी. साण्डर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल
पर बैठकर निकले, तो राजगुरु ने पहली गोली दाग दी, जो
साण्डर्स के माथे पर लग गई वह मोटरसाइकिल से नीचे गिर पड़ा।
फिर भगत सिंह ने आगे बढ़कर 4-6 गोलियां दाग कर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया।

जब साण्डर्स के अंगरक्षक ने उनका पीछा किया, तो चंद्रशेखर

आजाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया।
इतना ना ही नहीं लाहौर में जगह-जगह परचे चिपका दिए गए, जिन
पर लिखा था- लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया
गया है। उनके इस कदम को समस्त भारत के क्रांतिकारियों खूब
सराहा गया।
अलफ्रेड पार्क, इलाहाबाद में 1931 में उन्होंने रूस की बोल्शेविक
क्रांति की तर्ज पर समाजवादी क्रांति का आह्वान किया।
उन्होंने संकल्प किया था कि वे न कभी पकड़े जाएंगे और न
ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी दे सकेगी।
इसी संकल्प को पूरा करने के लिए इसी पार्क में 27 फरवरी, 1931
को उन्होंने स्वयं को गोली मारकर मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दी।


आजाद की एक खासियत थी न तो वे दूसरों पर जुल्म कर सकते थे और न स्वयं जुल्म सहन कर सकते थे। 1919 में अमृतसर के जलियांवाला बाग कांड ने उन्‍हें झकझोर कर रख दिया था। चन्द्रशेखर उस समय पढ़ाई कर रहे थे। तभी से उनके मन में एक आग धधक रही थी। महात्‍मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन खत्‍म किये जाने पर सैंकड़ों छात्रों के साथ चन्द्रशेखर भी सड़कों पर उतर आये। छात्र आंदोलन के वक्‍त वो पहली बार गिरफ्तार हुए। तब उन्‍हें 15 दिन की सजा मिली।
सन 1922 में गाँधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन को अचानक बंद कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आ गया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ गये। तभी वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन के सक्रिय सदस्य बन गये। आज़ाद ने क्रांतिकारी बनने के बाद सबसे पहले 1 अगस्‍त 1925 को काकोरी कांड को अंजाम दिया।
इसके बाद 1927 में बिसमिल के साथ मिलकर उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया। भगत सिंह व उनके साथियों ने लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला संडर्स को मार कर लिया। फिर दिल्‍ली असेम्बली में बम धमाका भी आजाद ने किया।
आजाद का कांग्रेस से जब मन भंग हो गया आजाद ने अपने संगठन के सदस्‍यों के साथ गाँव के अमीर घरों में डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाया जा सके। इस दौरान उन्‍होंने व उनके साथियों ने एक भी महिला या गरीब पर हाथ नहीं उठाया। डकैती के वक्‍त एक बार एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन ली तो अपने उसूलों के चलते हाथ नहीं उठाया। उसके बाद से उनके संगठन ने सरकारी प्रतिष्‍ठानों को ही लूटने का फैसला किया।
अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके लेकिन बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ एवं ठाकुररोशन सिंह को 19 दिसम्बर 1927 तथा उससे 2 दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को फाँसी पर लटकाकर मार दिया। एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी को छुड़ाने की योजना भी बनायी, लेकिन आजाद उसमें सफल नहीं हो पाये।
4 क्रान्तिकारियों को फाँसी और 16 को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर 8 सितम्बर 1928 को दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। सभी ने एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया - "हमारी लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत।" दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड के आरोपियों भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी की सजा सुनाये जाने पर भगत सिंह काफी आहत हुए। आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया।
27 फरवरी 1931 को वे इलाहाबाद गये और जवाहरलाल नेहरू से मिले और आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र-कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। नेहरू जी ने जब आजाद की बात नहीं मानी तो आजाद ने उनसे काफी देर तक बहस भी की। इस पर नेहरू जी ने क्रोधित होकर आजाद को तत्काल वहाँ से चले जाने को कहा तो वे अपने भुनभुनाते हुए बाहर आये और अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क चले गये।
अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मिले और इस बारे में चर्चा कर ही रहे थे कि सीआईडी का एसएसपी नॉट बाबर भारी पुलिस बल के साथ जीप से वहाँ आ पहुंचा। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी हुई और इसी मुठभेड़ में चंद्रशेखर आजाद शहीद हो गये। पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था।

आज़ाद के ख़िलाफ़ थाना कर्नलगंज में बरतानवी पुलिस ने
धारा-307 लगाते हुए पुलिस पार्टी पर जानलेवा हमला करने का
केस दर्ज किया था. उर्दू में दर्ज यही अपराध रजिस्टर अकेला
दस्तावेज़ है, जिससे कोई जानकारी मिलती है. प्रतिवादी के तौर
पर चंद्रशेखर आज़ाद और एक अज्ञात व्यक्ति का ज़िक्र है.
पुलिस आज भी मुठभेड़ को उसी तरह दर्ज करती है जिस तरह
बरतानवी पुलिस करती थी.
इलाहाबाद संग्रहालय से जो जानकारी मिलती है उसके
मुताबिक़ 27 फ़रवरी 1931 को जब एल्फ़्रेड पार्क में चंद्रशेखर
आज़ाद, जामुन के पेड़ के नीचे एक साथी के साथ कुछ बातचीत कर
रहे थे, तभी एक मुखबिर की सूचना पर डिप्टी एसपी ठाकुर
विश्ववेश्वर सिंह और पुलिस अधीक्षक सर जॉन नॉट बावर ने पूरे
पार्क को घेर लिया था. बावर ने पेड़ की आड़ लेकर चंद्रशेखर
आज़ाद पर गोली चलाई जो उनकी जांघ को चीरकर निकल गई.
दूसरी गोली विश्ववेश्वर सिंह ने चलाई, जो उनकी दाहिनी बांह
में लगी. घायल होने के बाद आज़ाद लगातार बाएं हाथ से गोली
चलाते रहे. आज़ाद ने जवाबी हमले में जो गोली चलाई वह
विश्ववेश्वर सिंह के जबड़े में लगी. आज़ाद ने किसी पुलिसकर्मी
को निशाना नहीं बनाया.
आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले में
हुआ था. पढ़ाई के लिए वह वाराणसी आ गए थे और 1921 में बनारस
के सत्याग्रह आंदोलन के दमन ने उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल
दी.
इलाहाबाद संग्रहालय के निदेशक राजेश पुरोहित भी मान्यता
को सही ठहराते हैं लेकिन वो ये भी मानते हैं कि इस बारे में तथ्यों
का अभाव है.
संग्रहालय में रखी किताब "अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद" के लेखक
विश्वनाथ वैशंपायन आज़ाद के साथी रहे थे. वह लिखते हैं, "मेरी
गिरफ़्तारी के 15 दिन बाद आज़ाद एल्फ़्रेड पार्क में शहीद हुए थे.
उस समय मैं बाहर नहीं था. इसलिए जो समाचारों में प्रकाशित
हुआ, उसी के आधार पर लिख रहा हूँ."
सुखदेव राज के हवाले से वैशंपायन लिखते हैं कि "जिस दिन यह
वारदात हुई तब आज़ाद हिंदुस्तान से बर्मा जाने के बारे में चर्चा कर
रहे थे, तभी वीरभद्र जाता हुआ दिखाई दिया. दोनों लोग (सुखदेव
और आज़ाद) वीरभद्र के बारे में चर्चा कर ही रहे थे कि एक मोटर
कार आकर रुकी और उसमें से उतरकर एक अंग्रेज़ अफ़सर आया और उसने
नाम पूछा. उसके नाम पूछते ही दोनों लोगों ने गोली चला दी.
अंग्रेज़ अफ़सर ने भी गोली चलाई. इस बीच घायल होने के बाद
आज़ाद ने सुखदेव को वहां से निकल जाने के लिए कहा और सुखदेव
वहां से किसी तरह निकलने में कामयाब हुए."
इसी किताब में वैशंपायन ने नॉट बावर का प्रेस को दिया बयान
दर्ज किया है. "नॉट बावर ने अपने बयान में कहा है कि ठाकुर
विश्वेश्वर सिंह (डिप्टी एसपी) से मुझे संदेश आया कि उसने एक
व्यक्ति को एल्फ़्रेड पार्क में देखा, जिसका हुलिया आज़ाद से
मिलता है, जो क्रांतिकारी मफ़रूर है. मैं अपने साथ जमान और
गोविंद कांस्टेबल को साथ लेता गया. लगभग दस गज के फ़ासले पर
खड़ा होकर मैंने पूछा कौन है? उत्तर में उन्होंने पिस्तौल निकालकर
गोलियां चला दीं. मेरी पिस्तौल तैयार ही थी. जैसे ही मैंने देखा
कि मोटा आदमी पिस्तौल निकाल रहा है, मैंने उसके गोली चलाने
के क्षण भर पहले गोली चला दी. मेरे साथ जो तीन आदमी थे
उन्होंने भी गोलियां कुछ मोटे आदमी तो और कुछ दूसरे व्यक्ति पर
चलाईं. जब मैं मैगज़ीन निकालकर दूसरी भर रहा था, मुझे मोटे
व्यक्ति ने गोली मारी, जिससे मैगज़ीन गिर पड़ी जो मेरे बाएं
हाथ में थी. मोटे आदमी ने गोली चलाई जो विश्वेश्वर सिंह के मुँह
पर लगी."
वो आगे लिखते हैं, "मै पिस्टल न भर सका. जब-जब मैं दिखाई देता
मोटा व्यक्ति मुझ पर गोली चलाता रहा. मैं कह नहीं सकता कि
उस पर किसी ने गोली चलाई या वह पहले जख्मों से मर गया. इस
बीच लोग जमा हो गए. इसी बीच एक व्यक्ति गन लेकर आया जो
भरी हुई थी. मै नहीं जानता था कि मोटा आदमी सचमुच मरा है
या बहाना कर रहा है. इसलिए मैंने उस आदमी से उसके पैरों पर
निशाना मारने को कहा. उस आदमी ने बंदूक चलाई. उसके बाद मैं
उस मोटे आदमी के पास चला गया तो वह मरा पड़ा था. उसका

साथी भाग गया था."

मॉनसून: बीमारियां, परहेज और उनका इलाज

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मॉनसून झमाझम बारिश और गर्मागर्म चाय-पकौड़ों का मौसम है। अपनी सेहत को लेकर हम जरा लापरवाह हो जाएं तो यह मौसम परेशानी का सबब भी बन जाता है। बरसात के दिनों में होने वालीं आम बीमारियों और उनकी रोकथाम पर डालते हैं एक नजर:

नजर न लग जाए...

बरसात के दिनों में आंखों की बीमारियां होना आम है। आंखों की बीमारियों में सबसे कॉमन कंजंक्टिवाइटिस है:

कंजंक्टिवाइटिस

आंख के ग्लोब पर (बीच के कॉर्निया एरिया को छोड़कर) एक महीन झिल्ली चढ़ी होती है, जिसे कंजंक्टाइवा कहते हैं। कंजंक्टाइवा में किसी भी तरह के इंफेक्शन या एलर्जी होने पर सूजन आ जाती है, जिसे कंजंक्टिवाइटिस कहा जाता है। इसे आई फ्लू या पिंक आई नाम से भी जाना जाता है। यह बीमारी आम वायरल की तरह है। जब भी मौसम बदलता है, इसका असर देखा जाता है। कंजंक्टिवाइटिस 3 तरह का होता है: वायरल, एलर्जिक और बैक्टीरियल।


कैसे पहचानें?

कंजंक्टिवाइटिस का पता आमतौर पर लक्षणों से ही लग जाता है। फिर भी यह किस टाइप का है, इसकी जांच के लिए स्लिट लैंप माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल किया जाता है और बैक्टीरियल इंफेक्शन के कई मामलों में कल्चर टेस्ट भी किया जाता है।

क्या है बचाव?

बचाव के लिए साफ-सफाई रखना सबसे जरूरी है। इस सीजन में किसी से भी (खासकर जिसे कंजंक्टिवाइटिस हो) हाथ मिलाने से भी बचें क्योंकि हाथों के जरिए इंफेक्शन फैल सकता है। दूसरों की चीजों का भी इस्तेमाल न करें। आंखों को दिन में 5-6 बार ताजे पानी से धोएं। बरसात के मौसम में स्विमिंग पूल में जाने से बचें। गर्मी के मौसम में अच्छी क्वॉलिटी का धूप का चश्मा पहनना चाहिए। चश्मा आंख को तेज धूप, धूल और गंदगी से बचाता है, जो एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस के कारण होते हैं।


इलाज

सुबह के वक्त आंख चिपकी मिलती है और कीचड़ आने लगता है, तो यह बैक्टिरियल कंजंक्टिवाइटिस का लक्षण हो सकता है। इसमें ब्रॉड स्पेक्ट्रम ऐंटिबायॉटिक आई-ड्रॉप्स जैसे सिप्रोफ्लॉक्सोसिन (Ciprofloxacin), ऑफ्लोक्सेसिन (Ofloxacin), स्पारफ्लोक्सेसिन (Sparfloxacin) यूज कर सकते हैं। एक-एक बूंद दिन में तीन से चार बार डाल सकते हैं। दो से तीन दिन में अगर ठीक नहीं होते तो किसी आंखों के डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

अगर आंख लाल हो जाती है और उससे पानी गिरने लगता है, तो यह वायरल और एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस हो सकता है। वायरल कंजंक्टिवाइटिस अपने आप 5-7 दिन में ठीक हो जाता है लेकिन इसमें बैक्टीरियल इंफेक्शन न हो, इसलिए ब्रॉड स्पेक्ट्रम (Spectrum) ​ ऐंटिबायॉटिक आई-ड्रॉप का इस्तेमाल करते रहना चाहिए। आराम न मिले तो डॉक्टर से सलाह लें।

आंख में चुभन महसूस होती है, तेज रोशनी में चौंध लगती है, आंख में तेज खुजली होती है, तो यह एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस हो सकती है। क्लोरफेनेरामिन (Chlorphenaramine) और सोडियम क्रोमोग्लाइकेट (Sodium Cromoglycate) जैसी ऐंटिएलर्जिक आई-ड्रॉप्स दिन में तीन बार एक-एक बूंद डाल सकते हैं। 2-3 दिन में आराम न मिले तो डॉक्टर की सलाह लें।

ध्यान रखें
आंखों को दिन में 5-6 बार साफ पानी से धोएं। आंखों को मसलें नहीं, क्योंकि इससे रेटिना में जख्म हो सकता है। ज्यादा समस्या होने पर खुद इलाज करने के बजाय डॉक्टर की सलाह लें।

कंजंक्टिवाइटिस में स्टेरॉयड वाली दवा जैसे डेक्सामिथासोन (Dexamethasone), बीटामिथासोन (Betamethasone) आदि का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। अगर जरूरी है, तो सिर्फ डॉक्टर की सलाह से ही आई-ड्रॉप्स डालें और उतने ही दिन, जितने दिन आपके डॉक्टर कहें। स्टेरॉयड वाली दवा के ज्यादा इस्तेमाल से काफी नुकसान हो सकता है।

ये सभी दवाएं जेनरिक हैं। दवाएं बाजार में अलग-अलग ब्रैंड नामों से उपलब्ध हैं।

स्किन की समस्या

बारिश के दिनों में स्किन से जुड़ी कई समस्याएं बढ़ जाती हैं। इनमें खास हैं:

फंगल इन्फेक्शन

बारिश में रिंगवॉर्म यानी दाद-खाज की समस्या बढ़ जाती है। पसीना ज्यादा आने, नमी रहने या कपड़ों में साबुन रह जाने से ऐसा हो सकता है। इसमें रिंग की तरह रैशेज़ जैसे नजर आते हैं। ये अंदर से साफ होते जाते हैं और बाहर की तरफ फैलते जाते हैं। इनमें खुजली होती है और एक से दूसरे शख्स में फैलते हैं।

इलाज

ऐंटिफंगल क्रीम क्लोट्रिमाजोल (Clotrimazole) लगाएं। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से ग्राइसोफुलविन (Griseofulvin) या टर्बिनाफिन (Terbinafine) टैबलट ले सकते हैं। ये जेनेरिक नेम हैं। फंगल इन्फेक्शन बालों या नाखूनों में है तो खाने के लिए भी दवा दी जाती है। फ्लूकोनाजोल (Fluconazole) ऐसी ही एक दवा है।

फोड़े-फुंसी/दाने

इन दिनों फोड़े-फुंसी, बाल तोड़ के अलावा पस वाले दाने भी हो सकते हैं। आमतौर पर माना जाता है कि ऐसा आम खाने से होता है, लेकिन यह सही नहीं है। असल में यह नमी में पनपने वाले बैक्टीरिया से होता है।

इलाज

दानों पर ऐंटिबायॉटिक क्रीम लगाएं, जिनके जेनेरिक नाम फ्यूसिडिक एसिड (Fusidic Acid) और म्यूपिरोसिन (Mupirocin) हैं। परेशानी बढ़ने पर क्लाइंडेमाइसिन (Clindamycin) लोशन लगा सकते हैं। यह लोशन मार्केट में कई ब्रैंड नेम से मिलता है। ऐंटिऐक्ने साबुन एक्नेएड (Acne-Aid), एक्नेक्स (Acnex), मेडसोप (Medsop) आदि भी यूज कर सकते हैं। ये ब्रैंड नेम हैं। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर ऐंटिबायॉटिक टैबलट देते हैं।

घमौरियां/रैशेज़

स्किन में ज्यादा मॉइस्चर रहने से कीटाणु आसानी से पनपते हैं। इससे रैशेज और घमौरियां हो जाती हैं। ये ज्यादातर उन जगहों पर होती हैं, जहां स्किन फोल्ड होती है, जैसे जांघ या बगल में। पेट और कमर पर भी हो जाती हैं।

इलाज

ठंडे वातावरण, यानी एसी और कूलर में रहें। दिन में एकाध बार बर्फ से प्रॉबल्म एरिया की सिकाई कर सकते हैं और घमौरियों और रैशेज पर कैलेमाइन (Calamine) लोशन लगाएं। खुजली ज्यादा है तो डॉक्टर की सलाह पर खुजली की दवा ले सकते हैं।

ऐथलीट्स फुट

जो लोग लगातार जूते पहने रहते हैं, उनके पैरों की उंगलियों के बीच की स्किन गल जाती है। समस्या बढ़ जाए तो इन्फेक्शन नाखून तक फैल जाता है और वह मोटा और भद्दा हो जाता है।

इलाज

हवादार जूते-चप्पल पहनें। जूते पहनना जरूरी हो तो पहले पैरों पर पाउडर डाल लें। बीच-बीच में जूते उतार कर पैरों को हवा लगाएं। जहां इन्फेक्शन हो, वहां क्लोट्रिमाजोल (Clotrimazole) क्रीम या पाउडर लगाएं। इलाज खुद करना सही नहीं है। फौरन डॉक्टर को दिखाएं। वह जरूरत पड़ने पर ऐंटिबायॉटिक या ऐंटिफंगल मेडिसिन देगा।

बाल न बनें बवाल

मौसम बदलने पर बाल थोड़ा ज्यादा झड़ते हैं। बारिश के मौसम में अगर बालों को साफ और सूखा रखें तो झड़ने की शिकायत नहीं होगी:

फंगल इंफेक्शन

बारिश में बालों में पानी रहने से फंगल इन्फेक्शन हो सकता है। बच्चों के बालों में फंगल इन्फेक्शन ज्यादा होता है। डैंड्रफ भी एक किस्म का फंगल इन्फेक्शन ही है। हालांकि थोड़ी-बहुत डैंड्रफ होना सामान्य है लेकिन ज्यादा होने पर यह बालों की जड़ों को कमजोर कर देती है।

कैसे करें बचाव

बाल कटवाते वक्त हाइजीन का खास ख्याल रखें। देखें कि कंघी साफ हो। हो सके तो अपनी कंघी साथ लेकर जाएं।

इलाज

डैंड्रफ से छुटकारे के लिए इटोकोनाजोल (Etoconazole), जिंक पायरिथिओनाइन (Zinc Pyrithionine यानी ZPTO) या सिक्लोपिरॉक्स ऑलोमाइन (Ciclopirox Olamine) शैंपू का इस्तेमाल करें। बालों के बीच में फंगल इन्फेक्शन हो तो क्लोट्रिमाजोल (Clotrimazole) लगा सकते हैं। यह जेनरिक नेम है। तेल न लगाएं वरना इन्फेक्शन फैल सकता है। फौरन डॉक्टर को दिखाएं।

ध्यान दें

बाल प्रोटीन से बनते हैं, इसलिए हाई प्रोटीन डाइट जैसे कि दूध, दही, पनीर, दालें, अंडा (सफेद हिस्सा), फिश, चिकन आदि खूब खाएं।

विटामिन-सी (मौसमी, संतरा, आंवला आदि), ऐंटिऑक्सिडेंट (सेब, नट्स, ड्राइ-फ्रूट्स) के अलावा सी फूड और हरी सब्जियां खूब खाएं।

बाल ज्यादा देर गीले न रहें। ऐसा होने पर बाल गिर सकते हैं।

बालों को साफ रखें और हफ्ते में दो बार जरूर धोएं। जरूरत पड़ने पर ज्यादा बार भी धो सकते हैं।

बाल नहीं धोने हैं तो नहाते हुए शॉवर कैप से बालों को अच्छी तरह ढक लें।

बाल धोने के बाद अच्छी तरह सुखाएं। पंखे या ड्रायर को थोड़ा दूर रखकर बाल सुखा लें।

मॉनसून के दिनों में बालों में तेल कम लगाएं क्योंकि मौसम में पहले ही नमी काफी होती है।

पेट की गड़बड़ी

बरसात में दूषित खाने और पानी के इस्तेमाल से पेट में इन्फेक्शन यानी गैस्ट्रोइंटराइटिस हो जाता है। ऐसा होने पर मरीज को बार-बार उलटी, दस्त, पेट दर्द, शरीर में दर्द या बुखार हो सकता है।

डायरिया

डायरिया गैस्ट्रोइंटराइटिस का ही रूप है। इसमें अक्सर उलटी और दस्त दोनों होते हैं, लेकिन ऐसा भी मुमकिन है कि उलटियां न हों, पर दस्त खूब हो रहे हों। यह स्थिति खतरनाक है। डायरिया आमतौर पर 3 तरह का होता है :

वायरल

वायरस के जरिए ज्यादातर छोटे बच्चों में होता है। यह सबसे कम खतरनाक होता है। इसमें पेट में मरोड़ के साथ लूज मोशंस और उलटी आती है। काफी कमजोरी भी महसूस होती है।

इलाज

वायरल डायरिया में मरीज को ओआरएस का घोल या नमक और चीनी की शिकंजी लगातार देते रहें। उलटी रोकने के लिए डॉमपेरिडॉन (Domperidone) और लूज मोशंस रोकने के लिए रेसेसाडोट्रिल (Racecadotrill) ले सकते हैं। पेट में मरोड़ हैं तो मैफटल स्पास (Maflal spas) ले सकते हैं। 4 घंटे से पहले दोबारा टैबलट न लें। एक दिन में उलटी या दस्त न रुकें तो डॉक्टर के पास ले जाएं।

बैक्टीरियल

इस तरह के डायरिया में तेज बुखार के अलावा पॉटी में पस या खून आता है।

इलाज

इसमें ऐंटिबायॉटिक दवाएं दी जाती हैं। अगर किसी ने बहुत ज्यादा ऐंटिबायॉटिक खाई हैं, तो उसे साथ में प्रोबायॉटिक्स भी देते हैं। दही प्रोबायॉटिक्स का बेहतरीन नेचरल सोर्स है।

प्रोटोजोअल

इसमें भी बैक्टीरियल डायरिया जैसे ही लक्षण दिखाई देते हैं।

इलाज

प्रोटोजोअल इन्फेक्शन में ऐंटि-अमेबिक दवा दी जाती है।

ध्यान रखें

यह गलत धारणा है कि डायरिया के मरीज को खाना-पानी नहीं देना चाहिए। मरीज को लगातार पतली और हल्की चीजें देते रहें, जैसे कि नारियल पानी, नींबू पानी (हल्का नमक और चीनी मिला), छाछ, लस्सी, दाल का पानी, ओआरएस का घोल, पतली खिचड़ी, दलिया आदि। सिर्फ तली-भुनी चीजों से मरीज को परहेज करना चाहिए।

मॉनसून में रखें ख्याल
1. हवादार कपड़े पहनें

मॉनसून में ढीले, हल्के और हवादार कपड़े पहनें। टाइट और ऐसे कपड़े न पहनें, जिनका रंग निकलता हो। ध्यान रखें कि कपड़े धोते हुए उनमें साबुन न रहने पाए, वरना स्किन इन्फेक्शन हो सकता है। अगर बारिश में कपड़े भीग गए हैं तो फौरन बदल लें ताकि सर्दी-जुकाम न हो।

2. शरीर को साफ रखें

इन दिनों शरीर की साफ-सफाई का ज्यादा ध्यान रखें। जितना मुमकिन हो, शरीर को सूखा और फ्रेश रखें। बारिश में बार-बार भीगने से बचें। ऐंटिबैक्टीरियल साबुन जैसे मेडसोप (Medsoap), सेट्रिलैक (Cetrilak) आदि से दिन में दो बार नहाएं। बरसात में नहाने के बाद साफ पानी में डिसइन्फेक्टेंट (डिटॉल, सेवलॉन आदि) मिलाकर अच्छी तरह नहाएं। दूसरे का टॉवल या साबुन शेयर न करें। बाहर से आकर हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल जरूर करें। खाना खाने से पहले हाथ जरूर धोएं।

3. बाहर न खाएं

इस मौसम में खाने में बैक्टीरिया जल्दी पनपता है। बाहर जाकर पानी पूरी, भेल पूरी, चाट, सैंडविच आदि खाने से बचें। कटे फल और सब्जियां खाने से भी इन्फेक्शन का खतरा रहता है। इनसे बचें। बाहर का जूस या पानी ना पिएं। बोतलबंद पानी या उबले हुए पानी को ही पीने की आदत डालें। इस दौरान तेल-भुने के बजाय हल्का खाना खाने की आदत डालें, जो आसानी से पच सके क्योंकि बरसात में गैस, अपच जैसी पेट की समस्याएं ज्यादा होती हैं। अपने पाचन तंत्र को बेहतर बनाने के लिए लहसुन, काली मिर्च, अदरक, हल्दी और धनिया का सेवन करें। बासी खाना खाने से भी बचें।

4. सब्जियों को अच्छी तरह धोएं

फल और सब्जियों को अच्छी तरह धोएं, खासकर पत्तेदार सब्जियों को क्योंकि इस मौसम में उनमें कई तरह के लारवा और कीड़े आदि होते हैं। हल्के गर्म पानी से धोएं। फिर उन्हें आधे घंटे तक नमक मिले पानी में भिगोकर रखें। सब्जियों को पकाने से पहले 5 मिनट उबाल लें तो और भी अच्छा है। इससे कीटाणु तो खत्म होंगे ही, फल-सब्जियों पर लगे आर्टिफिशल कलर और केमिकल भी हट जाएंगे। इसके अलावा सब्जियों को अच्छी तरह पकाएं। कच्चा या अधपका खाने का मतलब है कि आप बीमारियों को दावत दे रहे हैं।

5. पानी उबाल कर पिएं

मानसून में सिर्फ फिल्टर्ड और उबला हुआ पानी ही पिएं। ध्यान रहे कि पानी को उबाले हुए 24 घंटे से ज्यादा न हुए हों। अपने फ्रिज की बोतलों को बदलने और हर तीसरे-चौथे दिन साफ करने की आदत डालें। इस मौसम में कई बार प्यास नहीं लगती फिर भी दिन में 8-10 गिलास पानी जरूर पिएं, वरना शरीर में पानी की कमी हो सकती है।

6. घर को साफ-सुथरा रखें

बारिश के दिनों में मक्खी-मच्छर आदि पनपने लगते हैं। ऐसे में घर को पेस्ट फ्री बनाना जरूरी है। कॉकरोच, मक्खी-मच्छर आदि को दूर रखने के लिए पेस्ट कंट्रोल वाला स्प्रे कराएं। खिड़कियों पर जाली लगवाएं ताकि बाहर से कीट अंदर न आ सकें। बालकनी या छत आदि पर पानी जमा न होने दें, वरना मच्छर पैदा हो सकते हैं और मलेरिया या डेंगू फैला सकते हैं। घर में कपूर जलाएं। इससे मक्खियां दूर भागती हैं।

7. एक्सर्साइज जरूर करें

बारिश की वजह से इन दिनों कई बार मॉर्निंग वॉक पर नहीं जा पाते इसलिए घर पर ही एक्सरसाइज जरूर करें। एक्सरसाइज करने से इम्युनिटी बढ़ती है इसलिए बीमारी आसानी से अटैक नहीं कर पाती। साथ ही, पसीना निकलने से शरीर की सफाई हो जाती है।

8. बच्चों का रखें ख्याल

बच्चों को बारिश में ज्यादा न भीगने दें। उन्हें इस मौसम में इनडोर गेम्स खेलने के लिए प्रेरित करें। घर से बाहर भेजें तो पूरे कपड़े (पूरी बाजू की शर्ट और फुल पैंट) पहना कर भेजें। इससे मच्छर के काटने से बच जाएंगे। बच्चों को स्विमिंग पूल न ले जाएं क्योंकि उसके पानी के जरिए एक से दूसरे को इन्फेक्शन होने का खतरा होता है।

9. ​पहनें खुले फुटवेयर

बरसात के दिनों में अपने जूतों का खास ख्याल रखें। इन दिनों बंद जूते न पहनें क्योंकि ऐसा करने से पैरों में ज्यादा मॉइस्चर जमा हो सकता है, जो यह इन्फेक्शन की वजह बन सकता है। इन दिनों लेदर के शूज पहनने से भी बचें। खुले फुटवियर पहनें लेकिन बारिश या कीचड़ में गंदा होने पर पैरों को फौरन धो लें, वरना गंदगी से भी इन्फेक्शन हो सकता है। ध्यान रखें कि फुटवेयर फिसलने वाले न हों।

10. ​छाते से करें दोस्ती

हर घर में छाता होता है और अक्सर लोग तेज धूप में छाता लेकर चलते भी हैं लेकिन मॉनसून में अक्सर छाता घर भूल जाते हैं। जब भी घर से निकलें, छाता या रेनकोट साथ लेकर निकलें, फिर चाहे आसमान में बादल हों या न हों। दरअसल, इन दिनों अचानक बारिश हो जाती है इसलिए पहले से छाता अपने साथ रखना जरूरी है। बच्चों के स्कूल बैग में भी रेन कोट या छाता रखना न भूलें।

मॉनसून में पेट केयर

अगर आपके घर में कोई पालतू जानवर (पेट) है तो मॉनसून में उसकी देखभाल की खास जरूरत है:

1. साफ-सफाई

जब भी बाहर से घुमाकर लाएं, गुनगुने पानी में एंटी-सेप्टिक डालकर अपने डॉगी के पंजों को अच्छी तरह धोएं। फिर पंजों के बीच के स्पेस को टॉवल से अच्छी तरह पोंछें ताकि फंगल इन्फेक्शन न हो। मॉनसून में भीगने पर बालों से भी बदबू आने लगती है इसलिए उसे मेडिकेटिड पाउडर लगाएं। रोजाना कंघी भी करें ताकि फालतू बाल निकल जाएं।

2. कीड़ों की काट

अपने डॉगी को पेट में होनेवाले कीड़ों की दवा जरूर दिलाएं क्योंकि इन दिनों पेट में कीड़े होने की आशंका ज्यादा होती है। महीने में डी-वॉर्मिंग की एक गोली दें। बालों में जुएं न हों, इसके लिए एंटी-टिक्स पाउडर लगाएं।

3. पैक्ड फूड पर जोर

बेहतर है कि रेग्युलर मीट के बजाय इस सीजन में रेडी-टु-ईट खाना खिलाएं। हो सकता है कि आप जो मीट मार्केट से खरीद कर लाएं, वह दूषित हो। ऐसे में आपके डॉगी को डायरिया होने के चांस होते हैं। पानी भी साफ पिलाएं। उसके खाने और पानी का बाउल रोजाना कम-से-कम 2 बार साफ करें।

4. जादू की झप्पी

आंधी-तूफान और बिजली की गड़गड़ाहट से कई बार जानकर डर जाते हैं। अगर आपका डॉगी भी डरा दिखे, कांपने लगे, छुपने या काटने की कोशिश करे तो वह डरा हो सकता है। उसे प्यार से पुचकारें और गले लगाएं। देर तक उसकी कमर पर हाथ फेरें और उसे सहलाएं। इससे डर कम होगा और वह अच्छा महसूस करेगा।