Shamsher ALI Siddiquee

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ठंड से बचे रहना है तो खाना शुरू कर दें ये चीजें

    



ठंड के मौसम में शरीर को सिर्फ गर्म कपड़ों से आराम नहीं मिलता। ऐसे में कुछ चीजें ऐसी हैं जिन्हें खाकर ठंड से बचा जा सकता है। शरीर में अगर अंदर से खुद को मौसम के हिसाब से ढालने की क्षमता हो तो ठंड कम लगेगी और कई बीमारियां भी नहीं होंगी। यही कारण है कि ठंड में खानपान पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

मूंगफली के हैं कई फायदे : 
100 ग्राम मूंगफली के भीतर कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं। इसमें प्रोटीन 25.3 ग्राम, फैट 40.1 ग्राम, मिनरल्स 2.4 ग्राम, फाइबर 3.1 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट 26.1 ग्राम, ऊर्जा 567 कैलरी, कैल्शियम 90 मिलीग्राम, फॉस्फोरस 350 मिलीग्राम, आयरन 2.5 मिलीग्राम, कैरोटीन 37 मिलीग्राम, थाइमिन 0.90 मिलीग्राम, फोलिक एसिड. 20 मिलीग्राम होता है।

ठंड से बचाता है बादाम : 
बादाम कई गुणों से भरपूर है। बादाम खाने से मेमरी बढ़ती है, साथ ही यह अन्य कई रोगों से हमारी रक्षा भी करता है। इसके सेवन से कब्ज की समस्या भी दूर हो जाती है।

अदरक से मिलती है गर्मी : 
रोजाना खाने में अदरक शामिल करने से बहुत सी छोटी-बड़ी बीमारियों से बचा जा सकता है। इससे शरीर को गर्मी मिलती है और डाइजेशन भी सही रहता है।

शहद रखेगा निरोग : 
शरीर को स्वस्थ, निरोग और ऊर्जावान बनाए रखने के लिए शहद को आयुर्वेद में अमृत भी कहा गया है। सर्दियों में इसके सेवन से पाचन क्रिया में सुधार होता है।

रसीले फल न खाएं : 
संतरा, रसभरी या मौसमी आपके शरीर को ठंडक देते हैं जिससे आपको सर्दी या जुकाम जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

साबुत लहसुन

अगर आप सर्दी से परेशान हो तो दिन में हर 3से 4 घंटे के अंतर पर कच्चा लहसुन का सेवन कर सकते है। आप चाहे तो लहसुन को थोड़ा सा भून भी सकते है, ये खाने में ठीक लगा है। साथ ही आप शहद के साथ इसका सेवन  कर सकते है। ये गले को भी आराम देता है। औऱ शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को बढता है। 

सर्दियों में खाये साग

सर्दियों में खान-पान का विशेष ध्‍यान रखना पड़ता है क्‍योंकि आपकी जरा सी लापरवाही से सर्दी-जुकाम और बुखार का खतरा बढ़ जाता है। इस मौसम में धूप न निकलने के कारण विटामिन डी की कमी हो जाती है और रक्‍त कोशिकायें संकुचित हो जाती हैं जिसके कारण रक्‍त का संचार ठीक से नहीं होता। इसलिए इस मौसम में साग खाने की सलाह दी जाती है, चना, बथुआ, सरसों, आदि के साग न केवल स्‍वादिष्‍ट होते हैं बल्कि आपको स्‍वस्‍थ रखकर बीमारियों से भी बचाते हैं।


विश्‍व मानवाधिकार दिवस: क्‍या है मानव अधिकार?

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इंसानी अधिकारों को पहचान देने और वजूद को अस्तित्व में लाने के लिए, अधिकारों के लिए जारी हर लड़ाई को ताकत देने के लिए हर साल 10 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस यानी यूनिवर्सल ह्यूमन राइट्स डे मनाया जाता है. पूरी दुनिया में मानवता के खिलाफ हो रहे जुल्मों-सितम को रोकने, उसके खिलाफ संघर्ष को नई परवाज देने में इस दिवस की महत्वूपूर्ण भूमिका है.

क्या है 'मानव अधिकार'
किसी भी इंसान की जिंदगी, आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार है मानवाधिकार है. भारतीय संविधान इस अधिकार की न सिर्फ गारंटी देता है, बल्कि इसे तोड़ने वाले को अदालत सजा देती है.
भारत में 28 सितंबर 1993 से मानव अधिकार कानून अमल में आया. 12 अक्टूबर, 1993 में सरकार ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया.
आयोग के कार्यक्षेत्र में नागरिक और राजनीतिक के साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार भी आते हैं. जैसे बाल मजदूरी, एचआईवी/एड्स, स्वास्थ्य, भोजन, बाल विवाह, महिला अधिकार, हिरासत और मुठभेड़ में होने वाली मौत, अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकार.

शुरुआत
10 दिसम्बर, 1948 को ' संयुक्त राष्ट्र महासभा ' ने विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र जारी कर प्रथम बार मानवाधिकार व मानव की बुनियादी मुक्ति पर घोषणा की थी। वर्ष 1950 में 'संयुक्त राष्ट्र' ने हर वर्ष की 10 दिसम्बर की
तिथि को 'विश्व मानवाधिकार दिवस' तय किया। 65 वर्ष से पहले हुआ पारित 'विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र' एक मील का पत्थर है, जिसने समृद्धि, प्रतिष्ठा व शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के प्रति मानव की आकांक्षा प्रतिबिंबित की है। आज यही घोषणा पत्र 'संयुक्त राष्ट्र संघ' का एक बुनियादी भाग है।

क्या है 'मानव अधिकार'
किसी भी इंसान की ज़िंदगी, आज़ादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार है- "मानवाधिकार"। ' भारतीय संविधान ' इस अधिकार की न सिर्फ़ गारंटी देता है, बल्कि इसे तोड़ने वाले को अदालत सजा देती है। भारत में
28 सितंबर , 1993 से मानव अधिकार क़ानून अमल में आया। 12 अक्टूबर , 1993 में सरकार ने 'राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग' का गठन किया। आयोग के कार्यक्षेत्र में नागरिक और राजनीतिक के साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार भी आते हैं, जैसे- बाल मज़दूरी, एचआईवी/एड्स, स्वास्थ्य, भोजन, बाल विवाह , महिला अधिकार, हिरासत और मुठभेड़ में होने वाली मौत, अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकार आदि।
'विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र' का मुख्य विषय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगारी, आवास,
संस्कृति, खाद्यान्न व मनोरंजन से जुड़ी मानव की बुनयादी मांगों से संबंधित है। विश्व के बहुत से क्षेत्र गरीबी से पीड़ित है, जो बड़ी संख्या वाले लोगों के प्रति बुनियादी मानवाधिकार प्राप्त करने की सबसे बड़ी बाधा है। उन क्षेत्रों में बच्चे, वरिष्ठ नागरिकों व महिलाओं के बुनियादी हितों को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। इस के अलावा नस्लवाद व नस्लवाद भेद मानवाधिकार कार्य के विकास को बड़ी चुनौती दे रहा है।

मानवाधिकार - औचित्य और स्वरूप
मानव के जन्म लेने के साथ ही उसके अस्तित्व को बनाये रखने के लिए कुछ अधिकार उसको स्वतः मिल जाते हैं और वह उनका जन्मसिद्ध अधिकार होता है। इस दुनिया में प्रत्येक मनुष्य के लिए अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिकार एक मनुष्य होने के नाते प्राप्त हो जाता है। चाहे वह अपने हक के लिए बोलना भी जानता हो या नहीं। एक नवजात शिशु को दूध पाने का अधिकार होता है और तब वह बोलना भी नहीं जानता। लेकिन माँ उसको स्वयं देती है और अगर नहीं देती है तो उसके घरवाले, डॉक्टर सभी उसको इसके लिए कहते हैं, क्योंकि ये उस बच्चे का हक है और ये उसे मिलना ही चाहिए। एक बच्चे के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए ये जरूरत सबसे अहम् होती है। लेकिन उसके बड़े होने के साथ-साथ उसके अधिकार भी बढ़ने लगते हैं। बच्चे के पढ़ने-लिखने और अपनी परवरिश आदि के लिए उसको समुचित सुविधाएँ और वातावरण देना भी जरूरी अधिकारों में आता है। उन्हें आत्म-सम्मान के साथ जीने के लिए, अपने विकास के लिए और आगे बढ़ने के लिए कुछ हालात ऐसे चाहिए, जिससे की उनके रास्ते में कोई व्यवधान न आये। पूरे विश्व में इस बात को अनुभव किया गया है और इसीलिए मानवीय मूल्यों की अवहेलना होने पर वे सक्रिय हो जाते हैं। इसके लिए हमारे संविधान में भी उल्लेख किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 14,15,16,17,19,20,21,23,24,39,43,45 देश में मानवाधिकारों की रक्षा करने के सुनिश्चित हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, इस दिशा में आयोग के अतिरिक्त कई एनजीओ भी काम कर रहे हैं और साथ ही कुछ समाजसेवी लोग भी इस दिशा में अकेले ही अपनी मुहिम चला रहे हैं।

मानव अधिकार से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारी :-
1829 - राजा राममोहन राय द्वारा चलाए गए हिन्दू सुधार आंदोलन के बाद भारत में ब्रिटिश राज के दौरान सती प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
1929 - नाबालिगों को शादी से बचाने के लिए बाल विवाह निरोधक कानून पास हुआ।
1947 - ब्रिटिश राज की गुलामी से भारतीय जनता को आजादी मिली।
1950 - भारतीय गणतंत्र का संविधान लागू हुआ।
1955 - भारतीय परिवार कानून में सुधार। हिन्दू महिलाओं को मिले और ज्यादा अधिकार।
1973 - केशवानंद भारती वाद में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि संविधान संशोधन द्वारा संविधान के मूलभूत ढांचे में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। (जिसमें संविधान द्वारा प्रदत्त कई मूल अधिकार भी शामिल हैं)
1989 - अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचारों से सुरक्षा) एक्ट 1989 पास हुआ।
1992 - संविधान में संशोधन के जरिए पंचायत राज की स्थापना, जिसमें महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण लागू हुआ। अजा-अजजा के लिए भी समान रूप से आरक्षण लागू।
1993 - प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स एक्ट के तहत
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना।
2001 - खाद्य अधिकारों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त आदेश पास किया।
2005 - सूचना का अधिकार कानून पास।
2005 - रोजगार की समस्या हल करने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट पास।
2005 - भारतीय पुलिस के कमजोर मानव अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के निर्देश दिए।

एड्स जागरूकता दिवस: जानकारी ही बचाव है।

    


दुनिया में आज जो बीमारियां महामारी का रूप ले चुकी हैं उनमें से सबसे खतरनाक है एड्स. एड्स एक ऐसी बीमारी है जिसका नाम तो छोटा है लेकिन इसका परिणाम काफी भयावह है. यह बीमारी कईयों को मजे के रूप में मिलती है तो कई इसका शिकार गलती से हो जाते हैं. यह बीमारी इंसान को धीमी मौत मारती है. पर इसकी मौत इतनी भयावह होती है कि लोग इसके खौफ से ही मर जाते हैं. आज दुनिया भर में 40 करोड़ से ज्यादा लोग इसकी चपेट में हैं.

एक नजर इस खौफनाक रोग के साम्राज्य पर
हाल ही में जारी हुए यूएन एड्स की रिपोर्ट में साफ हो गया है कि 2001 से लेकर 2015 तक दुनिया भर में एड्स रोगियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है. दुनिया भर में करीब 40 करोड़ लोग आज इस भयावह बीमारी के शिकार हैं.

इसके साथ ही हर साल इस बीमारी से करीब 2 करोड़ लोग जिंदगी की जंग हार जाते हैं. सहारा अफ्रीका और मध्य अफ्रीका में इस बीमारी का प्रकोप सबसे ज्यादा है. साथ ही इस बीमारी से महिलाएं ज्यादा पीड़ित हैं. एशिया में भी यह बीमारी दिनों-दिन अपने पांव पसार रही है. भारत में एड्स तेजी से फैल रहा है. भारत में 25 लाख लोग इससे पीड़ित हैं. इसके साथ ही इस रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि भारत में अधिकतर लोग एड्स की चपेट में होने के बाद भी बिना इस बीमारी का इलाज करवाए जिंदगी जी रहे हैं जिससे उन्हें काफी खतरा है.

एड्स क्या‍ है?
एड्स का पूरा नाम ‘एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिसिएंशी सिंड्रोम’ है और यह बीमारी एच.आई.वी. वायरस से होती है. यह वायरस मनुष्य की प्रतिरोधी क्षमता को कमज़ोर कर देता है. एड्स एच.आई.वी. पाजी़टिव गर्भवती महिला से उसके बच्चे को, असुरक्षित यौन संबंध से या संक्रमित रक्त या संक्रमित सूई के प्रयोग से हो सकता है.

एच.आई.वी. पाजी़टिव होने का मतलब है, एड्स वायरस आपके शरीर में प्रवेश कर गया है. हालांकि  इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको एड्स है. एच.आई.वी. पाजीटिव होने के 6 महीने से 10 साल के बीच में कभी भी एड्स हो सकता है.

एड्स फैलने के कारण
एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित संभोग करना इस मर्ज के प्रसार का एक प्रमुख कारण है. ऐसे संबंध समलैंगिक भी हो सकते हैं. अन्य कारण हैं:

* ब्लड-ट्रांसफ्यूजन के दौरान शरीर में एच.आई.वी. संक्रमित रक्त के चढ़ाए जाने पर.
* एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति पर इस्तेमाल की गई इंजेक्शन की सुई का इस्तेमाल करने से.
* एचआईवी पॉजिटिव महिला की गर्भावस्था या प्रसव के दौरान या फिर स्तनपान कराने से भी नवजात शिशु को यह मर्ज हो सकता है.
* इसके अलावा रक्त या शरीर के अन्य द्रव्यों जैसे वीर्य के एक दूसरे में मिल जाने से. दूसरे लोगों के ब्लेड, उस्तरा और टूथ ब्रश का इस्तेमाल करने से भी एचआईवी का खतरा रहता है.

एड्स के लक्षण
एड्स होने पर मरीज का वजन अचानक कम होने लगता है और लंबे समय तक बुखार हो सकता है. काफी समय तक डायरिया बना रह सकता है. शरीर में गिल्टियों का बढ़ जाना व जीभ पर भी काफी जख्म आदि हो सकते हैं.

एड्स संबंधित जांचें
* एलीसा टेस्ट
* वेस्टर्न ब्लॉट टेस्ट
* एचआईवी पी-24 ऐंटीजेन (पी.सी.आर.)
* सीडी-4 काउंट

एड्स का उपचार
* एचआईवी संक्रमित लोगों के लिए आशावान होना अत्यंत महत्वपूर्ण है. ऐसे भी लोग हैं जो एचआईवी/एड्स से पीड़ित होने के बावजूद पिछले 10 सालों से जी रहे हैं. अपने डॉक्टरों के निर्देशों पर पूरा अमल करें. दवाओं को सही तरीके से लेते रहना और एक स्वस्थ जीवनचर्या बनाये रखने से आप इस रोग को नियंत्रित कर सकते हैं.
* एच.ए.ए.आर.टी. (हाइली एक्टिव ऐंटी रेट्रो वायरस थेरैपी) एड्स सेंटर पर नि:शुल्क उपलब्ध है. यह एक नया साधारण व सुरक्षित उपचार है.

एड्स को लेकर भ्रम
कई लोग सोचते हैं कि एड्स रोगी के साथ उठने बैठने से यह रोग फैलता है तो यह गलत है. यह बीमारी छुआछूत की नहीं है. इस बीमारी को लेकर समाज में कई भ्रम हैं जिन्हें दूर करना बहुत जरूरी है. जैसे:

एड्स इन सब कारणों से नहीं फैलता:
* घर या ऑफिस में साथ-साथ रहने से.
* हाथ मिलाने से.
* कमोड, फोन या किसी के कपड़े से.
* मच्छर के काटने से.

एड्स एक रोग नहीं बल्कि एक अवस्था है. एड्स का फैलाव छूनेहाथ से हाथ का स्पर्शसाथ-साथ खानेउठने और बैठनेएक-दूसरे का कपड़ा इस्तेमाल करने से नहीं होता है. एड्स पीड़ित व्यक्ति के साथ नम्र व्यवहार जरुरी है ताकि वह आम आदमी का जीवन जी सके.




कल एड्स का मतलब था जिंदगी का अंत, पर आज इसे एक स्थाई संक्रमण समझा जाता है, जिसे नियंत्रित किया जा सकता है. भविष्य में हो सकता है एड्स का इलाज संभव हो जाए इसलिए इस संदर्भ में होने वाली हर गतिविधि की जानकारी प्राप्त करते रहना हम सभी के लिए जरूरी है. वैवाहिक जीवन की मर्यादा और एक-दूसरे के प्रति विश्वास को बनाए रखना और सावधानी ही इस रोग से बचाव का एकमात्र उपाय है. एड्स की रोकथाम “दुर्घटना से सावधानी बेहतर” की तर्ज पर ही मुमकिन है.

ठंड के इस मौसम में बीमार न पड़ें आप, खायें इन फलों को।

    


ठंड का मौसम सेहत के लिए अच्छा माना जाता है। इस मौसम में शरीर को ज्यादा कैलरी की जरूरत होती है। ऐसे में जरूरी है कि हाई कैलरी वाली चीजें खाई जाएं जिससे सेहत अच्छी रहे। अच्छी सेहत के लिए रोज खाएं ये चीजें...


अखरोट
इसमें मौजूद ओमेगा 3 फैटी एसिड्स मेल ऑर्गेन्स में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाने में मददगार होते हैं।


अंगूर
ये ऐंटी-ऑक्सिडेंट से भरपूर फल है। स्किन को यंग रखता है। रोज एक कटोरी अंगूर खाएं या एक गिलास अंगूर का जूस पिएं।


लाल अंगूर

लाल अंगूर में विटामिन सी, ए और बी6 काफी मात्रा में होता है। साथ ही इसमें बहुत सारा फोलेट, पोटैशियम, आयरन, कैल्‍शियम आदि भी पाया जाता है। इसे खाने से आपको कब्‍ज, थकान और पेट से संबधित समस्याएं नहीं होती हैं। 

अमरूद
इसमें विटामिन सी होता है जो लंबे समय तक यंग रखता है। रोज सुबह और शाम एक पके अमरूद में काला नमक और काली मिर्च छिड़ककर खाएं।


लहसुन
इसमें मौजूद एलिसिन कम्पाउंड मेल ऑर्गेन में ब्लड फ्लो बढ़ाता है। रोज सुबह लहसुन की 3-4 कलियां चबाकर खाने ठंड लगने का डर नहीं होता


अंडा
अंडे में प्रोटीन, कैल्शियम और आयरन होता है। ठंड के दिनों में ये शरीर को एनर्जी देता है। रोज ब्रेकफास्ट में दो उबले अंडे खाएं। फायदा होगा।


खजूर
खजूर में मौजूद विटमिन और मिनरल्स ताकत और एनर्जी देते हैं। ये नजर कमजोर होने से भी बचाता है। रात में एक गिलास गर्म दूध में 5 खजूर डालकर पिएं, फायदा होगा।


गाजर
इसके विटमिन और ऐंटी-ऑक्सिडेंट सेहत के लिए अच्छे माने जाते हैं। इसे स्किन अच्छी होती है और कमजोरी नहीं होती।


सेब
इसके ढेरों विटमिन्स और मिनरल्स सर्दियों में हेल्दी रखते हैं। इसमें मौजूद फेनिलएथिलामाइन मूड अच्छा रखता है। रोज सुबह शाम एक सेब खाएं


अनार
इसमें ऐंटी-ऑक्सिडेंट होते हैं, जो बुढ़ापे के प्रॉसेस को स्लो करते हैं। रोज एक अनार खाएं या जूस पीएं। इससे खून भी बनता है।


आंवला
इसमें आयरन और विटमिन सी होता है। ये बुढ़ापे को रोकता है और बालों को काला रखता है। रोज सुबह-शाम आंवले का मुरब्बा खाएं या एक चम्मच आंवले का रस पिएं।


स्वीट पोटैटो
अगर आपको आलू खाना पसंद नहीं तो स्वीट पोटैटो अर्थात शकरकंद खाएं। इसकेसेवन से शरीर में विटामिन ए और सी के स्तर  बढ़ता है। क्योंकि ये शरीर को गर्म रखते हैं, इसलिये सर्दियों में जड़ों वाली चीजें खाना बेहत फायदेमंद होता है। साथ ही शकरकंद डायट्री फाइबर और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होती है। 

संतरा
संतरा में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में होता है। इसके सेवन से सर्दी-जुखाम जैसी समस्याएं नहीं होती और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है। लोग तो यह भी कहते हैं कि यदि रोज संतरा खाया जाए तो आपको घर में एंटीबायॉटिक दवाएं रखने की जरुरत नहीं पड़ेगी।

सिंघाड़ा
मखाने की तरह पानी में पैदा होने वाले तिकोनाकार फल सिंघाड़ा सर्दियों के मौसम में अक्सर आपने सब्जी के बाजार में देखा होगा। सिघाड़े में साइट्रिक एसिड, एमिलोज, कर्बोहाइड्रेट, टैनिन, बीटा-एमिलेज, प्रोटीन, फैट, निकोटेनिक एसिड, रीबोफ्लेविन, थायमाइन, विटामिन्स-ए, सी, मैगनीज तथा फास्फोराइलेज आदि होते हैं। ये सर्दियों में खाये जाना वाला एक अच्छा फल है। 


अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस: पुरुषों का भी एक दिन होता है

    



अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस की शुरुआत 1999 में त्रिनिदाद एवम टोबैको से हुयी थी।
तब से प्रत्येक वर्ष 19 नवम्बर को ”अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस” दुनिया के 30 से अधिक देशों में मनाया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इसे मान्यता देते हुए इसकी आवश्यकता को बल दिया और पुरजोर सराहना एवं सहायता दी है। 
भारत में यह दिन सर्वप्रथम 19 नवंबर 2007 को मनाया गया था।
पुरुष अपने समुदाय के लिए और अपने देश के लिए, अपने दोस्तों के लिए और अपने परिवारों के लिए, पति, बेटे और पिता के रूप में, अपनी अनेक भूमिका में प्रत्येक दिन बलिदान करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस समाज में पुरुषों द्वारा किये जा रहे त्याग व बलिदान की सराहना का दिवस है। 

अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस का उद्देश्य, लिंग संबंधों में सुधार, लैंगिक समानता को बढ़ावा देने, और सकारात्मक पुरुष मॉडल की भूमिका पर प्रकाश डालना है। पुरुषों और लड़कों के स्वास्थ्य पर ध्यान देना इसमें शामिल है। इस दिवस का उद्देश्य पुरुषों के खिलाफ भेदभाव पर प्रकाश डालना है।

क्यो ज़रूरी है Men’s Day- 
'पुरुष प्रधान समाज' या पैट्रीआर्की जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके हमारे देश में पुरुषों को काफी कोसा जाता है. रूढ़ीवादी और दकियानूसी सोच सिर्फ पुरुषों की नहीं होती, महिलाओं की भागीदारी भी बराबर की है. हम जेंडर इक्वेलिटी की बात करते हैं पर क्यों भूल जाते हैं कि पुरुषों से जुड़े मामले और उनकी परेशानियां भी उतनी ही गंभीर होती हैं. सिर्फ महिलाएं नहीं हैं जो हमेशा प्रताड़ित होती या की जाती हैं, ऐसे पुरुषों की संख्या भले ही कम हो, लेकिन प्रताड़ित वो भी कम नहीं किए जाते, मेंटली भी, फिजीकली भी और सैक्सुअली भी. सिर्फ महिलाएं ही नहीं हैं जो घर और रिश्ते निभाने की जिम्मेदारी उठाती हैं. घर चलाने और घरवालों को खुश रखने के लिए पुरुष भी उतनी ही मेहनत करते हैं. एडजस्टमेंट अगर महिलाएं करती हैं तो पुरुष भी जिम्मेदारी के नाम पर अपनी इच्छाओं को अकसर मार दिया करते हैं. महिलाएं फिर भी रो गाकर अपनी कह लेती हैं, ‘Real men don't cry’ कहकर ये अधिकार भी उनसे छीन लिया गया है. दर्द का अहसास उन्हें भी बराबर होता है. तो अगर बात बराबरी है, तो जिस तरह महिलाओं को ये समाज उनके खास दिन पर स्पेशल बताता है, प्रेरित करने वाले मैसेज भेजकर उनके हौसले बढ़ाता है, तो पुरुषों को भी वैसे ही हौसले और स्नेह की जरूरत है.
पुरुषों से जुड़ी 15 रोचक बातें:

दिन में 2 हजार शब्द

महिलाएं दिन में 7,000 शब्द बोलती हैं, तो पुरुष औसतन 2,000 शब्द।

रास्ता पूछते रहते हैं

पुरुष अपने जीवन के 3 महीने केवल रास्ता पूछने में लगाते हैं।

काले बटन ज्यादा पसंद

पुरुषों को काले बटन वाले गैजेट ज्यादा पसंद होते हैं।

महिलाओं को घूरने में 1 साल

पुरुष अपने जीवन में एक साल महिलाओं को घूरने में बिता देते हैं।

लैपटॉप से रहें सावधान

अगर आप पुरुष हैं तो लैपटॉप जांघ पर मत रखें, नपुंसकता के शिकार हो सकते हैं।

दिन में 6 बार झूठ

पुरुष दिन में औसतन 6 बार झूठ बोलते हैं, महिलाएं 3 बार।

6 महीने केवल शेविंग

पुरुष अपने जीवन के 6 महीने केवल शेविंग करने में गुजार देते हैं।

फैट कम होता है

महिलाओं की तुलना में वयस्क पुरुषों में 50 फीसदी कम फैट होता है।

मसल्स ज्यादा होती हैं

महिलाओं की तुलना में वयस्क पुरुषों की मसल्स 50 प्रतिशत अधिक होती हैं।

5 महिलाओं की ओर आकर्षण

एक दिन में औसतन 5 मतहिलाओं को देख पुरुष मन ही मन कुछ अलग सोचते हैं।

डेटिंग और शादी में फर्क

पुरुष डेटिंग किसी के भी साथ कर लेंगे, लेकिन शादी वर्जिन से ही करना पसंद करते हैं।

गर्म होते हैं पुरुष

पुरुषों के शरीर का तापमान महिलाओं के शरीर के तापमान से अधिक होता है।

भुलक्कड़ होते हैं पुरुष

85 प्रतिशत पुरुष भुलक्कड़ होते हैं, जो दिन में कम से कम तीन चीजें भूलते हैं।
ये जानना भी ज़रूरी
1. सेव इंडिया फैमिली फाउंडेशन के अनुसार भारत में आत्महत्या के मामलों में पुरुषों की संख्या महिलाओं से दुगनी है. NCRB के आंकड़े भी यही बताते हैं कि शादीशुदा महिलाओं की तुलना में शादीशुदा पुरुष ज्यादा आत्महत्या करते हैं. सच्चाई ये भी है कि शादीशुदा महिला द्वारा आत्महत्या किए जाने पर बिना किसी जांच पड़ताल के तुरंत पति और उसके घरवालों को हिरासत में ले लिया जाता है, जबकि पुरुष भले ही सुसाइड नोट में लिख दे कि सुसाइड की वजह पत्नी है, फिर भी इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता.
2. आईपीसी की धारा-497 के तहत जो व्यक्ति अपनी पत्नी के अलावा किसी अन्य विवाहित महिला से शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे सजा मिलती है लेकिन अवैध संबंधों के लिए महिला को सजा नहीं दी जाती.
3. घरेलू हिंसा और दहेज प्रताड़ना के खिलाफ बनाए कानून का फायदा जितना महिलाओं को मिला उससे कहीं ज्यादा फायदा महिलाओं ने इसका दुरुपयोग करके उठाया है. पत्नियों द्दारा प्रताड़ित किए गए पुरुषों के कई संघ बन रहे हैं. और इनकी बढ़ती हुई संख्या ही इस बात का सुबूत है
4. NCRB के आंकड़े भी बताते हैं कि अपहरण, जबरन शादी और यौन शोषण के मामलों में प्रताड़ित पुरुषों की संख्या भी कम नहीं है.
तो भले ही ये पुरुष इंपॉर्टेंट डेट्स भूल जाते हों लेकिन अपनी जिंदगी में हमें इनकी इंपॉर्टेंस हमेशा याद रखनी चाहिए

विश्व की डरावनी जगहें जहां पहुंचने के बाद आपकी धड़कन रुक सकती है

    



1. नरक द्वार - तुर्कमेनिस्तान

नरक द्वार के नाम से पूरी दुनिया में प्रचलित यह जगह दरअसल एक गैस फील्ड थी, जिसे रूस के वैज्ञानिकों ने आग लगा दी थी. तब से इसे 40 साल हो चुके हैं और यह लगातार जल रहा है. आश्चर्य तो यह है कि समय-समय पर न जाने कहां से हजारों की संख्या में मकड़ियां यहां घूमने चली आती हैं.

2. ऑकिगहरा जंगल – माउंट फूजी, जापान (आत्महत्या जंगल)

जंगली समंदर के नाम से कुख्यात यह 35 वर्ग कि.मी. इलाका जहां सघन जंगल है, जापान के माउंट फूजी के उत्तर पश्चिम में स्थित है. यह पूरी दुनिया में (गोल्डन गेट पुल) के बाद दूसरी ऐसी कुख्यात जगह है, जहां लोग आत्महत्या के लिए स्पेशली आते हैं. हर साल लगभग 100 लोग इस रास्ते पर कभी न लौटने के लिए चले आते हैं. सालों से चले आ रहे इस सिलसिले की वजह से यहां कंकालों और खोपड़ियों का अंबार लग गया है. अब तो यहां सालाना सफाई कार्यक्रम भी चलाया जाता है. इस आत्महत्या की महामारी को देखते हुए जंगल के अधिकारियों ने “आपका जीवन बहुमूल्य है” और “क्या वो आपके काबिल है” जैसे बोर्ड्स जंगल में जगह-जगह लगा रखे हैं.

3. गुड़ियों का द्वीप – मेक्सिको

यह जगह इतनी खूबसूरत होने के बावजूद पर्यटकों की नज़र में आज तक चढ़ नहीं पायी है, क्योंकि इस जगह पर कदम-कदम पर विकृत डॉल्स पेड़ों से लटकी हुई हैं, जो हर किसी को घूरती नज़र आती हैं और जिन्हें देखने के बाद कोई एक कदम भी नहीं चल सकता. इसके पीछे की कहानी यह है कि डॉन जूलियन संटाना अपनी पत्नी सहित इस सुनसान जगह पर रहने के लिए आए. वहीं किसी दिन उन्हें नाले से बहते हुए एक लाश मिली, जिस पर जूलियन को लगा कि वे इस लाश की आत्मा के प्रभाव में आ गए हैं. और इसी आत्मा के प्रभाव से उबरने के लिए वे पूरे द्वीप पर जगह-जगह डॉल्स को लटकाते रहे, जब तक वे मर नहीं गए.

4. यूनियन सिमेट्री – कनेक्टीकट, अमरीका

ईस्टन में एक सामुदायिक कब्रगाह है, जो कनेक्टीकट के साथ-साथ पूरे अमरीका में सबसे डरावने कब्रगाह के रूप में प्रचलित है. यहां की सबसे फेमस भूतनी का नाम ‘व्हाइट लेडी’ है. और इसकी कई लोगों ने तस्वीरें भी उतारी हैं. लोगों के अनुसार उसके काफ़ी लंबे बाल हैं और वो हमेशा लबादे के जैसा गाउन पहने रहती है. उसे अकसर बीच सड़क पर देखा जाता है, जहां वो गाड़ियों से टकराती सी दिखती है, मगर फ़िर वो लोगों को सही-सलामत दिखती है. इस कब्रगाह को रात के दौरान बंद रखा जाता है.

5. द व्हेली हाउस – सैन डियेगो, अमरीका

जब से ही व्हेली फैमिली की रहस्यमयी मौतें हुईं है, तब से ही इस हवेली को लेकर न जाने कैसी-कैसी कहानियां कही और सुनी जा रही हैं. यहां आने वालों ने यहां बगीचे में भूत देखने की बातें स्वीकारी हैं, साथ ही व्हेली की आत्मा को भी बहुतों ने वहां के पार्लर में देखने की बात कही है. यहां एक लड़की जिसे लोग थॉमस व्हेली की परपोती बताते हैं, ने जहर पी कर ख़ुद को मार डाला था. यहां आने वाले बताते हैं कि रेनॉल्ड नामक यह लड़की लोगों के हाथ पकड़ कर पूरी हवेली घूमती है.

6. रायनहम हॉल – नोरफोक, इंग्लैंड

रायनहम हॉल नोरफॉक, इंग्लैंड में एक कंट्री हाउस है. पिछले लगभग 300 सालों तक इस पर टाउनस्हेंड फैमिली का कब्जा था. इस हवेली को पूरे इलाके में भुतहा घोषित कर दिया गया है. यहां खींची गई एक तस्वीर जिसमें एक औरत को सीढ़ियों से उतरते हुए देखा गया है, को भूतों की सबसे जबरदस्त तस्वीरों में शुमार किया जाता है. हालांकि इस तस्वीर के बाद फ़िर उस औरत को कभी नहीं देखा जा सका.

7. लंदन टावर – लंदन, यूनाइटेड किंगडम

लंदन टावर के नाम से फेमस यह जगह खासी कुख्यात भी है, यह सेंट्रल लंदन की एक ऐतिहासिक इमारत है, जो थेम्स नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित है. इस टावर की सबसे जानीमानी हस्ती ऐन बोलेन है, जो हेनरी VIII की एक पत्नी थी. इसके सिर को 1536 में इसी टावर में धड़ से अलग कर दिया गया था. यह औरत इस टावर और इलाके में देखी जाती है, जहां वह उसका ही कटा सिर लेकर घूमती देखी जाती है.

8. पिकेन्स कांउटी कोर्टहाउस – अलबामा, संयुक्त अमरीका

कारल्टन के पिकेन्स कांउटी कोर्टहाउस, अलबामा कोर्टहाउस की खिड़की पर भुतही इमेज दिखती है. कहते हैं कि यह इमेज हेनरी वेल्स की है, जिसे पिछले कोर्टहाउस में आग लगाने के गलत आरोप पर भीड़ द्वारा सन् 1878 की एक तूफ़ानी रात में मार दिया गया था. कहा जाता है कि आज भी वेल्स की इमेज इस कोर्टहाउस के खिड़कियों पर दिखती है. हालांकि यह इमेज सिर्फ़ बाहर से ही देखी जा सकती है, जिसे देखने-दिखलाने के लिए विशेष तौर पर संकेतक लगे हैं, और नज़दीक से देखने के लिए यहां विशेष चश्मे भी रखे हुए हैं.

9. प्रिपयात - यूक्रेन

प्रिपयात को 4 फरवरी 1970 को यूक्रेन में बेलारुस बॉर्डर के नज़दीक सोवियत यूनियन के न्यूक्लियर शहर के तौर पर बसाया गया था. यह शहर विशेष तौर पर चेरनोबिल न्यूक्लियर पावर प्वाइंट में कार्यरत कर्मचारियों के लिए बसाया गया था, जो दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से दुर्घटना का शिकार हो गया. हालांकि आज इस शहर को खाली करा लिया गया है, मगर आज इस शहर को खतरनाक रेडियोऐक्टिव किरणों की वजह से बैन कर दिया गया है.

10. मिर्नी डायमंड माइन – पूर्वी साइबपेरिया, रूस

दुनिया की मनुष्यों द्वारा बनायी गयी दूसरी सबसे बड़ी खदान को किसी दौर में स्टालिन ने खुदवाया था, ताकि वे रूस के हीरों की मांग को पूरा कर सकें. हालांकि एक समय के बाद यहां खुदाई करना बड़ा मुश्किल हो गया. यहां खुदाई के दौरान बहुतों ने अपनी जान गंवायी और वे आज भी इस इलाके के आस-पास घूमते देखे जाते हैं.

11. फार्महाउस – सेनेका झील, न्यूयॉर्क

इस पूरे इलाके को यहां पायी जाने वाली जहरीली चार-चार फीट झाड़ियां बेहद डरावनी बनाती हैं. इस परित्यक्त फार्महाउस को विंटेज कारों-गाड़ियों की कब्रगाह भी कह सकते हैं, जो इस इलाके को और भी डरावनी बनाती हैं.

12. विलर्ड पागलखाना- विलर्ड, न्यूयॉर्क

विलर्ड पागलखाना को 1869 में बनाया और 1995 में बंद कर दिया गया था. किसी दौर में यहां लगभग 4000 मरीज रहा करते थे. और लगभग 50,000 मरीजों की मौत इसकी चारदिवारियों के भीतर ही हुई थी, जो इस बंद हो चुके पागलखाने को और भी डरावनी बनाती है. हालांकि इसके बंद होने पर यहां रह रहे मरीजों को वापस भेज दिया गया, मगर इससे पहले तो यहां से मरीजों की सिर्फ़ लाश ही जाया करती थी.

13. सिक्स फ्लैग्स जैज़लैंड – न्यू ओरलीन्स, लूसियाना

कटरीना तूफ़ान से बुरी तरह तबाह होने के बाद, इस सिक्स फ्लैक्स जैज़लैंड को परित्यक्त घोषित कर दिया गया है. यहां की इमारतें उस तबाही के मंज़र की गवाह हैं. हालांकि कुछ बड़ी कम्पनियां इसे एक सैरगाह के तौर पर विकसित करना चाहती हैं, मगर आज यह इलाका किसी भुतही फ़िल्म के डरावने सेट जैसा ही लगता है.

ठंड में क्यों फटती है एड़ियां, जानिए सरल इलाज

    



जैसे-जैसे सर्दी का मौसम अपने शबाब पर पहुंचता है, पैरों की खूबसूरती को बनाए रखना मुश्किल होता जाता है। पैरों की चमड़ी का सख्त हो जाना और एड़ियों का फटना जैसी समस्याएं इस मौसम में आम तौर पर उभरकर सामने आती हैं। इससे बचने के लिए कुछ बातों का ख्याल रखना आवश्यक है।
जानिए कुछ महत्वपूर्ण बातें-

क्या है एड़ियां फटने की मुख्य वजह
एड़ियां फटने की मुख्य वजह शरीर में कैल्शियम और चिकनाई की कमी होती है। एड़ी व तलवों की त्वचा मोटी होती है, इसलिए शरीर के अंदर बनने वाला सीबम यानी कुदरती तेल पैर के तलवों की बाहरी सतह तक नहीं पहुंच पाता। फिर पौष्टिक तत्व व चिकनाई न मिल पानेकी वजह से ही एड़ियां खुरदरी-सी हो जाती हैं और इनमें दरार पड़ने लगती है।
एड़िया ज्यादा फटने से दर्द और जलन तो होती ही है, कभी-कभी खून भी निकल आता है।

ठंड में फटी एड़ियों से छुटकारा पाने के नुस्खे
* डेढ़ चम्मच वैसलीन में एक छोटा चम्मच बोरिक पावडर डालकर अच्छी तरह मिला लें और इसे फटी एड़ियों पर अच्छी तरह से लगा लें, कुछ ही दिनों में फटी एड़ियां फिर से भरने लगेंगी।
* अगर एड़ियां ज्यादा फटी हुई हों तो मैथिलेटिड स्पिरिट में रुई के फाहे को भिगोकर फटी एड़ियों पर रखें। ऐसा दिन में तीन-चार बार करें, इससे एड़ियां ठीक होने लगेंगी।
* गुनगुने पानी में थोड़ा शैंपू, एक चम्मच सोड़ा और कुछ बूंदें डेटॉल की डालकर मिला लें। इस पानी में पैरों को 10 मिनट तक भिगोकर रखें। त्वचा फूलने पर मैथिलेटिड स्पिरिट लगाकर एड़ियों को प्यूमिक स्टोन या झांवे से रगड़कर साफ कर लें। इससे एड़ियों कीमृत त्वचा साफ हो जाएगी। फिर साफ तौलिए से पोंछकर गुनगुने जैतून या नारियल के तेल से मालिश करें।
* पैरों को साफ व खूबसूरत बनाए रखने के लिए पैडिक्योर को अवश्य चुनें। यह पैरों के नाखून, एड़ी व तलवों की सफाई का शानदार तरीका है।
* पैडीक्योर एक आसान विधि है, इसे आप खुद घर पर भी कर सकती हैं अगर आपके पैरों की दशा ज्यादा खराब है तो पैडीक्योर किसी ब्यूटी स्पेशलिस्ट से ही करवाना मुनासिब है।
आम के ताजा कोमल पत्ते तोड़ने से जो एक प्रकार का द्रव पदार्थ निकलता है इस द्रव पदार्थ को एड़ी के फटे हिस्से पर भर देने से तुरन्त लाभ होता है।
– गेंदे के पत्तों का रस को वैसलीन में मिलाकर कई बार लगाने से फटे-हाथ पैरों में लाभ मिलता है।

– कच्चा प्याज पीसकर एड़ियों पर बांधने से फटी एड़िया ठीक हो जाती है।
– चार ग्राम मोम और चार ग्राम तिल पीसकर एक में मिलाकर गर्म करके लेप बना कर फटी एड़ियों पर लगाने से एड़ियां सुंदर हो जाती हैं।
– एड़ियों के ज्यादा फटने या उनमें खून निकलने की हालत में एड़ियों को रात को गर्म पानी से धोकर उनमें गुनगुना मोम लगाने से फटी एड़ियां ठीक हो जाती हैं।
– देशी घी में नमक मिलाकर बिबाइयों (फटी एड़ियों) पर लगाने से त्वचा मुलायम रहती है और हाथ-पैर नहीं फटते हैं
– पपीते के छिलकों को सुखाकर और पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में ग्लिसरीन मिलाकर दिन में 2 बार कटी-फटी एड़ियों और पैरों में लगाने से बहुत जल्दी लाभ होता है।
– मोम और सेंधा नमक को मिलाकर मलने से फटी हुई एड़ियां ठीक हो जाती हैं।

"राष्ट्रीय शिक्षा दिवस" कलम के सिपाही: "मौलाना अबुल कलाम आज़ाद"

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मौलाना अबुल कलाम आजाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रीय सदस्य और साथ ही एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे। मौलाना आज़ाद ने बहुत से स्वतंत्रता आंदोलनों और अभियानों में हिस्सा भी लिया है. 1923 में कांग्रेस के विशेष सत्र को इन्होंने संबोधित भी किया था और केवल 35 साल की आयु में कांग्रेस के राष्ट्रिय अध्यक्ष चुने जाने वाले वे सबसे युवा व्यक्ति थे.
आजाद का जन्म 11 नवम्बर 1888 को मक्का, सऊदी अरेबिया में हुआ था. उनका सही नाम अबुल कलाम घुलाम मुहियुद्दीन था जो बाद में बदलकर मौलाना आज़ाद बना. आज़ाद के पिता मौलाना मुहम्मद खैरुद्दीन एक विद्वान लेखक थे जिनकी कई साड़ी किताबे प्रकाशित हो चुकी थी जबकि उनकी माँ एक अरबी थी, पहले उनका परिवार बंगाल प्रान्त में रहता था, लेकिन विभाजन के बाद वे मक्का चले गये जहा मौलाना आज़ाद का जन्म हुआ और फिर बाद में 1890 में अपने पुरे परिवार के साथ वे वापिस कलकत्ता आ गये.
आज़ाद को उस समय कई भाषाए भी आती थी जैसे उर्दू, हिंदी, पर्शियन, बंगाली, अरेबिक और इंग्लिश. वे मज़ाहिब हनफी, मालिकी, शफी और हंबली फिकह, शरीअत, गणित, दर्शनशास्त्र, विश्व इतिहास और विज्ञानं में माहिर थे, साथ ही उन्हें पढ़ाने के लिए उनके परिवार ने एक घर पर पढ़ाने वाला शिक्षक भी रखा था. उनका घर पूरी तरह से पुस्तकालय से भरा हुआ था और इसी वजह से जब वे केवल 12 साल के थे तब उन्होंने घज़ली के जीवन पर एक किताब लिखनी चाही और उनका यही लेख मख्ज़ां बहोत प्रसिद्द हुआ. एक पत्रकार होने के नाते वे अपने लिखो में राजनीती से संबंधित लेखो को प्रकाशित करते जिसमे उनका कविताओ से भरा लेख नैरंग-ए-आलम भी था और साथ वे वे साप्ताहिक अखबार अल-मिस्बाह के संपादक भी थे और तब उनकी आयु केवल 12 साल की थी.1903 में, उन्होंने मासिक लेख लिस्सन-उस-सिडक (Lissan-Ul-Sidq) खरीदना शुरू किया, जो बहोत ही विख्यात था. 13 साल की उम्र में उन्होंने ज़ुलिईखा बेगम से शादी कर ली.
आजाद अपने जवानी के दिनों में उर्दू भाषा की कविताये भी लिखा करते थे. और साथ ही उनके धर्म पर प्रेरनादायी किताबे और दर्शनशास्त्रीयो पर लेख लिखा करते थे. लेकिन एक पत्रकार के रूप में वे ज्यादा प्रख्यात थे, जो अपने लेख में ब्रिटिश राज के विरूद्ध लिखकर उसे प्रकाशित करते थे. आज़ाद बाद में खिलाफत आन्दोलन के नेता बने. जहा उनका सम्बन्ध महात्मा गाँधी
से हुआ. महात्मा गाँधी के अहिंसा आन्दोलन का आजाद पर बहोत प्रभाव पड़ा और वे गांधीजी के महान अनुयायी बन गये और उन्होंने गांधीजी के ही बताये रास्तो पर चलना सिखा और गांधीजी के साथ मिलकर रोलेट एक्ट की 1919 में रक्षा की. आजाद खुद को गांधीजी का महान भक्त बतलाते थे, और गांधीजी की तरह वे भी स्वदेशी वस्तुओ का ही इस्तेमाल करते थे, और लोगो को भी स्वदेशी वस्तुओ का ही उपयोग करने की सलाह दिया करते थे. 1923 में, 35 साल की आयु में उन्होंने सबसे कम उम्र में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में सेवा की.
1931 के धरासाना सत्याग्रह में आजाद की मुख्य भूमिका रही, उस समय हिन्दू-मुस्लिम के बिच एकता होने के कारण वे भारत के प्रमुख नेता माने जाते थे. उन्होंने 1940 से 1945 तक कांग्रेस की अध्यक्ष के रूप में सेवा की. और इसी समय ब्रिटिश भारत छोडो बगावत शुरू हुई थी. आजाद को उनके जीवन में कांग्रेस के अन्य नेताओ के साथ 3 साल की जेल भी हुई थी.
जिस समय भारत में सांप्रदायिक धर्मो के बिच विभाजन की बात चल रही थी, उसी समय वे विविध धर्मो के बिच मधुर संबंध बनाने का काम कर रहे थे. भारत के शिक्षामंत्री के रूप में उन्होंने गरीबो को प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मुफ्त में उपलब्ध करवाई. साथ ही भारतीय तंत्रज्ञान संस्था और यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन की भी स्थापना की, ताकि वे भारतीयों को अच्छे से अच्छी शिक्षा प्रदान कर सके.
आज़ाद भारत के पहले शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलम आज़ाद ने 15 अगस्त 1947 से 2 फेब्रुअरी 1958 तक देश की सेवा की और उनके जन्मदिन को आज पूरा भारत “राष्ट्रिय शिक्षा दिन” के रूप में मनाता है. भारत में राष्ट्रिय शिक्षा दिन हर साल 11 नवम्बर को मनाया जाता है.
अबुल कलाम मुहियुद्दीन अहमद आजाद / Maulana Abul Kalam Azad एक भारतीय विद्वान और भारतीय स्वतंत्रता अभियान के वरिष्ट राजनैतिक नेता थे. अपने स्वतंत्रता के अभियान में आगे बढ़ते हुए भारत सरकार के वे पहले शिक्षामंत्री थे. 1992 में, उनके मरणोपरांत उन्हें भारतीय नागरिकत्व के सबसे बडे पुरस्कार “भारत रत्न” का सम्मान दिया गया. उनको ये सम्मान देने के पीछे कई सारे विवाद भी उठ खड़े हुए थे, क्यू की ऐसा कहा जाता है की जो भारत रत्न देने वालो की निर्णायक समिति में शामिल होता है उसे यह पुरस्कार नहीं दिया जाता है, और यही कहते हुए पहले उन्होंने इस पुरस्कार को लेने से माना कर दिया था. आधुनिक भारत में वे साधारणतः मौलाना आजाद के नाम से याद किये जाते है. इसमें मौलाना शब्द ये “सिखने/सिखाने वाला इंसान” से लिया गया है और उन्हें आजाद अपने उपनाम के रूप में अपनाया था. उनके जीवन का एक ही ध्येय था की वे भारत में शिक्षा प्रदान करने वाली संस्थाओ का निर्माण करना चाहते थे, और उनकी इसी याद में पुरे भारत में उनका जन्मदिन “राष्ट्रिय शिक्षा दिन” के रूप में मनाया जाता है.
आज़ाद ने स्वतंत्रता के आन्दोलन के समय कई लोगो को शिक्षित किया और उन्हें आज़ादी पाने के लिए लड़ने की प्रेरणा दी. उन्होंने उस समय कई भारतीयों को शिक्षा देकर उनका भविष्य सवारा और खुद की परवाह किये बिना ही हिन्दू-मुस्लिम में भेदभाव किये बिना सभी को एक सामान शिक्षा का अधिकार दिया. निच्छित ही हमें ऐसे शिक्षामंत्री पर गर्व होना चाहिए.
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की जीवन कार्य :
1906 में मक्का के मुल्ला-मौलवीने उनका सन्मान किया और उन्हें ‘अबुल कलाम’ उपाधि बहाल की. ‘आज़ाद’ उनका उपनाम था. लिखने के लिये इस नाम का इस्तेमाल करते थे. उर्दू कविता के अंत में वह ‘आज़ाद’ लिखा करते थे. और इसी कारन उनको लोग आज़ाद नाम से जानने लगे और उनका सही नाम पीछे छुट गया. ‘आज़ाद’ नाम लिखने के पीछे उनका मकसद पुराने बंधनो से ‘आज़ाद’ होनेकी प्रेरणा थी.
1905 आज़ादजी के पिताजीने उन्हें आशिया भेजा. मौलाना आज़ादजी इराक, इजिप्त, सीरिया, तुर्कस्थान आदी देश गये. और ‘कैरो’ देश भी गए वहा पर ‘अल-अझर’ विद्यापीठ गये. योगी अरविन्दजी से मिले और एक क्रांतिकारी समूह में शामील हुये और बादमे इस समूह हुये.क्रांतिकारी समूह मुसलमानो के विरोध में सक्रिय है, ऐसा आज़ादजी को लगने लगा.
1912 में मौलाना आज़ाद जी ने कलकत्ता यहा ‘अल-हिलाल’ ये उर्दू अकबार शुरु किया. और ब्रिटिश विरोध में अपनी जंग छेडी. भारतीय मुसलमानो के ब्रिटिश श्रध्दा पर टिपनी की. इसी कारण सरकार ने इ.स. 1914 में ‘अल-हिलाल’ पर पाबंदी  लगाई आगे उन्होंने इ.स. 1915 में ‘अल-बलाग’ नामसे अकबार शुरू किया.
1920 में दिल्ली आनेपर महात्मा गांधीजी से मिले और कॉंग्रेस का सदस्यपद लिया.
मौलाना आज़ादजी को महात्मा गांधी के साथ असहयोग आंदोलन में शामील होने के कारण और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भाषण करने कारणवश 10 दिसंबर 1921 वे गिरफ्तार हुये और दो सालकी सजा काटनी पडी.
मौलाना आज़ादजी ने हिंदू-मुस्लीम एकता का कार्य किया उससे प्रभावित होकर सन 1923 में उनका भारतीय राष्ट्रिय कॉंग्रेस के अध्यक्षपद के लिए चयन किया गया. भारतीय मुसलमानो मे राष्ट्रीय भाव निर्माण करने उद्देश से राष्ट्रीय कॉंग्रेस में रहकर ही 1929 में ‘नॅशनल मुस्लीम पक्षकी’ स्थापना की और उसका अध्यक्षपद भी मौलाना आज़ाद जी को सौपा गया. इस पार्टीने मुस्लीम लीग जैसे जातीय संघटनो का विरोध किया.
1930 के नागरिक अवज्ञा आंदोलन में खुद शामील होकर भारतीय मुसलमानो को शामील होने हेतु प्रोस्ताहित किया मौलाना आज़ादजी के इस आंदोलन का नेतृत्व और प्रभुत्व देखकर ब्रिटिश शासनने अनेक प्रांतमें उन्हें प्रवेश बंदी की. 1940 में आज़ाद दूसरी बार राष्ट्रीय कॉंग्रेस के अध्यक्ष बने. 1946 तक इस पदपर रहे.
1942 में भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस का मुंबई में हुये ऐतिहासिक अधिवेशन के मौलाना आज़ाद अध्यक्ष थे. उन्हीकी अध्यक्षता में ‘छोडो भारत’ का प्रस्ताव पारित किया.
1947 को पं. नेहरू ने अंतरिम सरकार तयार की थी. उसमे आज़ाद इनका शिक्षणमंत्री इस रूप में समावेश था. उनकी मौत तक वो इस स्थान पर थे. मौलाना आज़ाद पुर्णतः राष्ट्रवादी भारतीय थे, और देश उन्हें आज भी गौरव से याद करता है.

पूरा नाम       – मोहिउद्दीन अहमद खैरुद्दीन बख्क्त
जन्म            – 11 नव्हंबर 1888.
जन्मस्थान   – मक्का.
पिता             – मौलाना खैरुद्दीन.
माता             – आलियाबेगम.
शिक्षा            – जादातर पढाई निवास पर पुरी 1903 में ‘दर्स. ए. निजामिया’ पारसी भाषा में उत्तींर्ण होकर ‘अलीम प्रमाणपत्र’.
विवाह           – जुलेखा बेगम के साथ  (1907 में ).

भारत से यूं अलग होता है अमेरिका का चुनाव

    



सबसे पुराना लोकतंत्र : भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गौरव प्राप्त है तो अमेरिका विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र है। करीब 200 वर्ष पहले सन 1804 में यहां चुनाव की शुरुआत हुई। पहले उपराष्ट्रपति का चुनाव भी इलेक्टोरल कॉलेज ही करता था, लेकिन तब अलग-अलग मत नहीं डाले जाते थे। उस समय जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलते थे, वह राष्ट्रपति बनता था और दूसरे नंबर पर रहने वाला व्यक्ति उपराष्ट्रपति निर्वाचित होता था। यहां हर चार साल में चुनाव होते हैं।
अमेरिकी संसद : भारत की तरह अमेरिकी संसद में भी दो सदन होते हैं। पहला हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव जिसे प्रतिनिधि सभा भी कहा जाता है। इसके सदस्यों की संख्या 435 है। दूसरे सदन सीनेट में 100 सदस्य होते हैं। इसके अतिरिक्त अमेरिका के 51वें राज्य कोलंबिया से तीन सदस्य आते हैं। इस तरह संसद में कुल 538 सदस्य होते हैं। 
द्विदलीय व्यवस्था : अमेरिकी लोकतंत्र में द्विदलीय राजनीतिक व्यवस्था है। इसलिए त्रिशंकु संसद का खतरा भी नहीं होता। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट यहां दो प्रमुख पार्टियां हैं। अन्य दलों का यहां कोई वजूद नहीं है। राष्ट्रपति बनने की आकांक्षा रखने वाले उम्मीदवार सबसे पहले एक समिति बनाते हैं, जो चंदा इकट्ठा करने और संबंधित नेता के प्रति जनता का रुख भांपने का काम करती है। कई बार यह प्रक्रिया चुनाव से दो साल पहले ही शुरू हो जाती है।
योग्यता : अमेरिका में राष्ट्रपति बनने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति का जन्म अमेरिका में हुआ हो और वह 14 साल से देश में रह रहा हो। उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए। साथ ही राष्ट्रपति को अंग्रेजी भाषा आना भी आवश्यक है। राष्ट्रपति का चुनाव 538 इलेक्टर्स करते हैं। राष्ट्रपति बनने के लिए कम से कम 270 इलेक्टोरल मत हासिल करना आवश्यक होता है। अमेरिकी कानून के मुताबिक राष्ट्रपति पद के दो कार्यकाल के बाद कोई भी व्यक्ति तीसरी बार चुनाव नहीं लड़ सकता।
चुनाव प्रक्रिया : दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव की प्रक्रिया भारत के मुकाबले काफी पेचीदा और लंबी होती है। अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद 2 में राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया का उल्लेख है। संविधान में ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ के जरिए राष्ट्रपति के चुनाव की व्यवस्था है। हालांकि अमेरिकी संविधान निर्माताओं का एक वर्ग इस पक्ष में था कि संसद को राष्ट्रपति चुनने का अधिकार मिले, जबकि दूसरा धड़ा सीधी वोटिंग के जरिए चुनाव के हक में था। ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ को इन दोनों धड़ों की अपेक्षाओं के बीच की एक कड़ी माना गया। 
पहले होता है पार्टी में चुनाव : के पहले राजनीतिक दल अपने स्तर पर दल का प्रतिनिधि चुनते हैं। प्राथमिक चुनाव में चुने गए पार्टी के प्रतिनिधि दूसरे दौर में राजनीतिक दल का हिस्सा बनते हैं और अपनी पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का चुनाव करते हैं। यही वजह है कि कुछ राज्यों में जनता ‘प्राइमरी’ दौर में मतदान का इस्तेमाल न करके ‘कॉकस’ के जरिए पार्टी प्रतिनिधि का चुनाव करती है। 

क्या है कॉकस और प्राइमरी? : कॉकस में पार्टी के सदस्य जमा होते हैं। स्कूलों, घरों या फिर सार्वजनिक स्थलों पर उम्मीदवार के नाम पर चर्चा की जाती है। वहां मौजूद लोग हाथ उठाकर उम्मीदवार का चयन करते हैं। वहीं प्राइमरी में मतपत्र के जरिए मतदान होता है। हर राज्य के नियमों के हिसाब से अलग-अलग तरह से प्राइमरी होती है और कॉकस प्रक्रिया भी हर राज्य के कानून के हिसाब से अलग-अलग होती है। 
कहां से शुरू होती है चुनाव प्रक्रिया : राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया आयोवा और न्यू हैंपशायर से शुरू होती है। दोनों ही छोटे राज्य हैं मगर यहां की आबादी में 94 प्रतिशत लोग गोरे हैं, जबकि पूरे अमेरिका में गोरी आबादी 77 फीसदी है। यहां सबसे पहले कॉकस या प्राइमरी होता है। इन दो राज्यों में मिली जीत आगे की चुनावी मुहिम पर खासा असर डालती है। हालांकि यहां की जीत का अर्थ यह नहीं होता कि प्रत्याशी को पार्टी की उम्मीदवारी मिल ही जाएगी, लेकिन आयोवा और न्यू हैंपशायर की जीत मीडिया कवरेज दिलाने में जरूर मददगार होती है। 
चुनाव का दिन : अमेरिका में चुनाव के लिए दिन और महीना बिलकुल तय होता है। यहां चुनावी साल के नवंबर महीने में पड़ने वाले पहले सोमवार के बाद पड़ने वाले पहले मंगलवार को मतदान होता है। हालांकि यहां 60 दिन पहले वोट डालने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस अवधि में अमेरिका से बाहर रहने वाला व्यक्ति भी ऑनलाइन वोट डाल सकता है।
इस तरह बनता है मंत्रिमंडल : अमेरिका मंत्रिमंडल बनाने की प्रक्रिया भारत से बिलकुल ही भिन्न है। यहां मंत्री बनने वाले व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं कि वह संसद का सदस्य हो, ना ही उसके लिए राजनीतिक दल का सदस्य होना जरूरी है। यदि राष्ट्रपति को लगता है तो वह विरोधी पार्टी के सदस्य अथवा किसी विषय विशेषज्ञ को भो मंत्री बना सकता है। 

1.
अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव 51 छोटे-छोटे चुनाव हैं। 50 राज्यों और एक अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन का चुनाव। हर राज्य में पॉप्युलर वोट के जरिए कुछ सदस्यों का चुनाव होता है जो दिए गए कैंडिडेट में किसी एक का समर्थन करते हैं। इलेक्टोरल कॉलेज में 538 सदस्य हैं। हर राज्य की जनसंख्या के हिसाब से उनके इलेक्टोरल सदस्य होते हैं। ठीक उसी तरह से जैसे भारत में लोकसभा में सांसद होते हैं।
2.
हाउस ऑफ रेप्रिज़ेंटटिव में हर राज्य के सदस्यों का एक इलेक्टोरल होता है और दूसरा राज्य के दो सिनेटर के लिए। अमेरिका के हर राज्य में 2 सिनेटर होता है फिर चाहे उनकी जनसंख्या कितनी भी हो।
3.
जादुई आंकड़ा 270 वोटों का है। राष्ट्रपति वही बनेगा जो 538 इलेक्टोरल वोटों में से कम से कम 270 वोट हासिल कर लेगा।
4.
सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य कैलिफॉर्निया में 55 इलेक्टोरल हैं, टेक्सस में 38, न्यू यॉर्क और फ्लॉरिडा में 29 इलेक्टोरल। तो वहीं सबसे कम जनसंख्या वाले अलास्का, डेलवेयर, वर्मॉन्ट और वायोमिंग में सिर्फ 3 इलेक्टोरल है।
5.
इलेक्टोरल कॉलेज के सदस्य आधिकारिक तौर पर 19 दिसंबर को राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। लेकिन उससे पहले ही नतीजे पता चल जाते हैं क्योंकि डेमोक्रैट्स और रिपब्लिकन, दोनों ही पार्टियां हर राज्य में इलेक्टोरल कॉलेज में अपने सदस्यों की सूची देती हैं। ये इलेक्टोरल पार्टी अधिकारी होते हैं जो अपने राज्य में जीतने वाले सदस्य के पक्ष में वोट करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।
6.
अमेरिका की चुनावी प्रक्रिया भारत से बिल्कुल अलग है। कई बार एक उम्मीदवार ज्यादा पॉप्युलर वोट जीतने के बाद भी चुनाव हार जाता है क्योंकि इलेक्टोरल कॉलेज की भूमिका अहम होती है।
7.
सभी राज्यों को कुछ निर्वाचक मिलते हैं जो कांग्रेसमैन या सिनेटर्स होते हैं। जाहिर है बड़े राज्यों के पास ज्यादा निर्वाचक होते हैं। लेकिन दो राज्यों- मेन और नेब्रास्का की भूमिका बड़ी होती है। यदि आप कैलिफोर्निया में 60 पर्सेंट वोट हासिल करते हैं तो आपके पास राज्य के सभी इलेक्टर्स आ गए। उदाहरण के लिए 2012 में ओबामा ने राष्ट्रीय स्तर पर 51 पर्सेंट वोट हासिल किया था, जबकि यह 61 पर्सेंट इलेक्टोरल कॉलेज वोट में तब्दील हुआ था।
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एक तरफ जहां भारत में वोट देने की प्रक्रिया खत्म होने के बाद मतगणना की प्रक्रिया कई दिनों तक चलती है। वहीं, अमेरिका में जैसे ही किसी राज्य में मतदान खत्म होता है वहां, वोटों की गिनती शुरू हो जाती है। साथ ही नतीजे भी पब्लिक में अनाउंस कर दिए जाते हैं।
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जैसे-जैसे राज्यों से चुनाव के परिणाम आते जाते हैं एक चुनावी नक्शा तैयार हो जाता है। लाल रंग वाले राज्यों का मतलब रिपब्लिकन की जीत और नीला रंग डेमोक्रैट का प्रतिनिधित्व करता है। यह चुनावी नक्शा पार्टियों और उम्मीदवारों के प्रदर्शन की जानकारी देता है। नक्शा बताता है कि कौन कहां से जीत या हार रहा है।
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अमेरिकी टेलिविजन एक-एक कर सभी राज्यों में विजेताओं की घोषणा करते हैं। यह घोषणा उनके वोट टैली, एग्जिट पोल और उनके खुद के प्रॉजेक्शन के साथ की जाती है। आमतौर पर डेमोक्रैट्स के गढ़ कैलिफॉर्निया के 55 इलेक्टरोल वोट के रिजल्ट से पहले ही चुनाव में जीत-हार तय हो चुकी होती है।