Shamsher ALI Siddiquee

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अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधकदिवस

    


अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस प्रत्येक वर्ष 26 जून को मनाया जाता है। नशीली वस्तुओं और पदार्थों के निवारण हेतु 'संयुक्त राष्ट्र महासभा' ने 7 दिसम्बर, 1987 को प्रस्ताव संख्या 42/112 पारित कर हर वर्ष 26 जून को 'अंतर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस' मानाने का निर्णय लिया था। यह एक तरफ़ लोगों में चेतना फैलाता है, वहीं दूसरी ओर नशे के लती लोगों के उपचार की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण कार्य करता है। 'अंतरराष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस' के अवसर पर मादक पदार्थ एवं अपराध से मुक़ाबले के लिए 'संयुक्त राष्ट्र संघ' का कार्यालय यूएनओडीसी एक नारा देता है। इस अवसर पर मादक पदार्थों से मुक़ाबले के लिए विभिन्न देशों द्वारा उठाये गये क़दमों तथा इस मार्ग में उत्पन्न चुनौतियों और उनके निवारण का उल्लेख किया जाता है। '26 जून' का दिन मादक पदार्थों से मुक़ाबले का प्रतीक बन गया है। इस अवसर पर मादक पदार्थों के उत्पादन, तस्करी एवं सेवन के दुष्परिणामों से लोगों को अवगत कराया जाता है।

शुरुआत

समाज में दिन-प्रतिदिन शराब, मादक पदार्थों व द्रव्यों के सेवन की बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोकने के लिए सामाजिक न्याय विभाग द्वारा अभियान चलाया गया। इस आयोजन का उद्देश्य समाज में बढ़ती हुई मद्यपान, तम्बाकू, गुटखा, सिगरेट की लत एवं नशीले मादक द्रव्यों, पदार्थों के दुष्परिणामों से समाज को अवगत कराना था, ताकि मादक द्रव्य एवं मादक पदार्थों के सेवन की रोकथाम के लिए उचित वातावरण एवं चेतना का निर्माण हो सके। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मादक पदार्थ एवं गैर-कानूनी लेन-देन ज्यादा बढ़ जाने के कारण चिंता का विषय बन गया, तब यूएन जनरल असम्बली ने 7 दिसम्बर,1987 में एक प्रस्ताव पारित किया, जिसके अंतर्गत प्रतिवर्ष26 जून को अंतर्राष्ट्रीय मादक पदार्थ एवं गैर-कानूनी लेने-देन विरोधी दिवस के रूप में मनाये जाने का निश्चय किया गया। इस दिवस के माध्यम से जन-साधारण को नशे के खतरे एवं नशे में गैर-कानूनी लेन-देन के ख़िलाफ़ सरकार द्वारा उठाये जाने वाले कदमों को परिचित कराया जाना आवश्यक समझा गया।

भारत में नशे की स्थिति

संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया मेंभारत भी हेरोइन का बड़ा उपभोक्ता देश बनता जा रहा है। गौरतलब है कि अफीम से ही हेरोइन बनती है। भारत के कुछ भागों में धड़ल्ले से अफीम की खेती की जाती है और पारंपरिक तौर पर इसके बीज 'पोस्तो' से सब्जी भी बनाई जाती है। किंतु जैसे-जैसे इसका उपयोग एक मादक पदार्थ के रूप में आरंभ हुआ, यह खतरनाक रूप लेता गया। वर्ष2001 के एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण में भारतीय पुरुषों में अफीम सेवन की उच्च दर 12 से 60 साल की उम्र तक के लोगों में 0.7 प्रतिशत प्रति माह देखी गई। इसी प्रकार 2001 के राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार ही 12 से 60 वर्ष की पुरुष आबादी में भांग का सेवन करने वालों की दर महीने के हिसाब से तीन प्रतिशत मादक पदार्थ और अपराध मामलों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (यूएनओडीसी) की रिपोर्ट के ही अनुसार भारत में जिस अफीम को हेरोइन में तब्दील नहीं किया जाता, उसका दो तिहाई हिस्सा पांच देशों में इस्तेमाल होता है। ईरान 42 प्रतिशत, अफ़ग़ानिस्तान 7 प्रतिशत,पाकिस्तान 7 प्रतिशत, भारत छह प्रतिशत और रूस में इसका पांच प्रतिशत इस्तेमाल होता है। रिपोर्ट के अनुसार भारत ने 2008 में 17 मीट्रिक टन हेरोइन की खपत की और वर्तमान में उसकी अफीम की खपत अनुमानत: 65 से 70 मीट्रिक टन प्रति वर्ष है। कुल वैश्विक उपभोग का छह प्रतिशत भारत में होने का मतलब कि भारत में 1500 से 2000 हेक्टेयर में अफीम की अवैध खेती होती है। यह तथ्य वास्तव में ख़तरनाक है।

नशे का शिकार होता युवा वर्ग

मादक पदार्थों के नशे की लत आज के युवाओं में तेजी से फ़ैल रही है। कई बार फैशन की खातिर दोस्तों के उकसावे पर लिए गए ये मादक पदार्थ अक्सर जानलेवा होते हैं। कुछ बच्चे तो फेविकोल, तरल इरेज़र, पेट्रोल कि गंध और स्वाद से आकर्षित होते हैं और कई बार कम उम्र के बच्चे आयोडेक्स, वोलिनी जैसी दवाओं को सूंघकर इसका आनंद उठाते हैं। कुछ मामलों में इन्हें ब्रेड पर लगाकर खाने के भी उदहारण देखे गए हैं। मजाक-मजाक और जिज्ञासावश किये गए ये प्रयोग कब कोरेक्स, कोदेन, ऐल्प्राजोलम, अल्प्राक्स, स्पास्मोप्रोक्सीवान,  कैनेबिस जैसे दवाओं को भी घेरे में ले लेते हैं, पता ही नहीं चलता। फिर स्कूल-कॉलेजों या पास-पड़ोस में गलत संगति के दोस्तों के साथ ही गुटखा, सिगरेट, शराब, गांजा, भांग, अफीम और धूम्रपान सहित चरस, स्मैक, कोकिन, ब्राउन शुगर जैसे घातक मादक दवाओं के सेवन की ओर अपने आप कदम बढ़ जाते हैं। पहले उन्हें मादक पदार्थ फ्री में उपलब्ध कराकर इसका लती बनाया जाता है और फिर लती बनने पर वे इसके लिए चोरी से लेकर अपराध तक करने को तैयार हो जाते है। .नशे के लिए उपयोग में लाई जानी वाली सुइयाँ एच.आई.वी. का कारण भी बनती हैं, जो अंतत: एड्स का रूप धारण कर लेती है। कई बार तो बच्चे घर के ही सदस्यों से नशे की आदत सीखते हैं। उन्हें लगता है कि जो बड़े कर रहे हैं, वह ठीक है और फिर वे भी घर में ही चोरी आरंभ कर देते हैं। चिकित्सकीय आधार पर देखें तो अफीम, हेरोइन, चरस, कोकीन, तथा स्मैक जैसे मादक पदार्थों से व्यक्ति वास्तव में अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है एवं पागल तथा सुप्तावस्था में हो जाता है। ये ऐसे उत्तेजना लाने वाले पदार्थ हैं, जिनकी लत के प्रभाव में व्यक्ति अपराध तक कर बैठता है। मामला सिर्फ स्वास्थ्य से नहीं अपितु अपराध से भी जुड़ा हुआ है। कहा भी गया है कि जीवन अनमोल है। नशे के सेवन से यह अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है।

महिलाओं में मद्यपान की प्रवृत्ति

आज देश में शराब का सेवन करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है, साथ ही बढ़ रही है मद्यपान के कारण मौत से जूझने वालों की संख्या। 15 से 20 प्रतिशत भारतीय आज शराब पी रहे हैं। 20 साल पहले जहाँ 300 लोगों में से एक व्यक्ति शराब का सेवन करता था, वहीं आज 20 में से एक व्यक्ति शराबखोर है। परंतु महिलाओं में इस प्रवृत्ति का आना समस्या की गंभीरता दर्शाता है। पिछले दो दशकों में मद्यपान करने वाली महिलाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। विशेष कर उच्च तथा उच्च मध्यम वर्ग की महिलाओं में यह एक फैशन के रूप में आरंभ होता है और फिर धीरे-धीरे आदत में शुमार होता चला जाता है। महिलाओं में मद्यपान की बढ़ती प्रवृत्ति के संबंध में किए गए सर्वेक्षण दर्शाते हैं कि क़रीब 40 प्रतिशत महिलाएँ इसकी गिरफ्त में आ चुकी हैं। इनमें से कुछ महिलाएँ खुलेआम तथा कुछ छिप-छिप कर शराब का सेवन करती हैं। महानगरों और बड़े शहरों की कामकाजी महिलाओं के छात्रावासों में यह बहुत ही आम होता जा रहा है। महानगरों में स्थित शराब मुक्ति केंद्रों के ऑंकड़ों से ज्ञात होता है कि नशे की गिरफ्त से छुटकारा पाने हेतु आने वाले 10 व्यक्तियों में से 4 महिलाएँ होती हैं। अत: सब का ध्यान इस ओर जाना स्वाभाविक है कि आखिर महिलाओं में बढ़ती मद्यपान की प्रवृत्ति के पीछे कारण क्या हैं?

कारण

कुछ हद तक आधुनिक रहन-सहन, पश्चिम का अंधानुकरण, मद्यपन को सामाजिक मान्यता, आसानी से शराब की उपलब्धता, तनाव, अवसाद व पुरुषों से बराबरी की होड़ को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है। पुराने समय के मुकाबले आधुनिक युग में शराब को अधिक सामाजिक मान्यता मिली हुई है। बड़ी पार्टियों में तो यह आवश्यक अंग बन गई है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों, जन संचार माधयमों आदि से जुड़ी महिलाएँ पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंग कर शराब को अपना लेती हैं। यही नहीं अब तो फैशन की आड़ ले कर कॉलेज की छात्राएँ तक शराब का सेवन कर बैठती हैं। मनोचिकित्सकों के अनुसार समय परिवर्तन के साथ-साथ महिलाओं की सामाजिक स्थिति में भी बदलाव हुआ है। घर बाहर की दोहरी जिम्मेदारियों को निभाती आज की नारी अधिक तनाव एवं मानसिक दबाव तले जी रही है। सफलता के मार्ग पर चलने के साथ ही उन पर कार्य का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। रोजमर्रा की अनेक समस्याओं से घिरी कई महिलाएँ इसका हल शराब के नशे के रूप में पाती हैं। कभी-कभी पुरुषों की बराबरी का दावा करती महिलाएँ इस नशे की लत में पड़ जाती हैं।

कामकाजी महिलाओं के विपरीत अकेलेपन की शिकार उच्च वर्ग की गृहणियाँ जिनके पति अत्यधिक व्यस्त रहते हैं, और जिनके पास करने को कुछ अधिक नहीं होता, भी क्लबों और पार्टियों में जाकर शराब का सहारा लेती हैं। मद्यपान शुरू करने के कारणों में महिलाओं में व्याप्त अकेलापन और बोरियत प्रमुख हो सकते हैं, क्योंकि सर्वेक्षणों के नतीजों से यह निष्कर्ष सामने आए हैं कि मद्यपान करने वाली महिलाओं में अविवाहित प्रौढ़ाओं, तलाकशुदा महिलाओं तथा पति से अलग रहने वाली युवतियों की संख्या अधिक थी। कभी-कभी महिलाओं को शराब तक पहुँचाने में पति एक अहम भूमिका निभाते हैं। शराब की गिरफ्त में फंसी महिलाओं को इसका मुआवजा स्वास्थ्य, आपसी संबंधों, सामाजिक संबंधों, व्यावसायिक व कैरियर संबंधी परेशानियों के रूप में चुकाना पड़ता है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या मद्यपान किसी समस्या का हल है? क्या मद्यपान को फैशन या शौक़ के रूप में अपनाना उचित है? इन प्रश्नों के उत्तर में सभी मनोचिकित्सकों, डॉक्टरों व समाजशास्त्रियों का एक ही मत है कि मद्यपान समाज के लिए व व्यक्ति के लिए ज़हर के समान है।

गर्भपात का खतरा

अमेरिका में किए गए अनुसंधानों से पता चला है कि गर्भपात का खतरा शराब का सेवन करने वाली महिलाओं में अधिक रहता है। गर्भवती महिलाओं में शुरू के दिनों में 12 प्रतिशत अधिक खतरा होता है। शिशु के मस्तिष्क में विकृति की सम्भावना औरों के मुकाबले मद्यपान करने वाली महिलाओं के शिशुओं में 35 प्रतिशत तक अधिक होती है। मद्यपान से स्मरण शक्ति कमज़ोर हो जाती है, निर्णय क्षमता घट जाती है। गुर्दे, यकृत और गर्भाशय संबंधी अनेक रोग हो जाते हैं। इससे न केवल महिलाओं का स्वास्थ्य चौपट होता है बल्कि उनकी समाज में छवि भी धूमिल होती है। शराबी महिलाएँ बलात्कार तथा यौन उत्पीड़न का अधिक शिकार होती हैं। शराब किसी समस्या का हल कभी नहीं बन सकती, भले ही यह कुछ समय के लिए उस समस्या को भुलाने में सहायक बन जाती हो। अवसाद, बोरियत, अकेलेपन का स्थायी हल इनका सामना करके ही निकाला जा सकता है। शराब तो व्यक्ति को उदासी व अवसाद की ओर धकेल देती है। इससे घर बर्बाद होते हैं, वैवाहिक संबंधा कटु होते होते टूट भी सकते हैं। बच्चे बीमार मानसिकता में पलते हैं, उनका पूर्ण विकास नहीं हो पाता। समाजशास्त्री बताते हैं कि शराबी पिता की अपेक्षा शराबी माँ होने पर बच्चे अधिक प्रभावित होते हैं। अत: अपने बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखकर नशे आदि से दूर रहना चाहिए।

अभिभावकों के लिए सुझाव

नशे से मुक्ति के लिए समय-समय पर सरकार और स्वयं सेवी संस्थाएँ पहल करती रहती हैं। पर इसके लिए स्वयं व्यक्ति और परिवार जनों की भूमिका ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। अभिभावकों को अक्सर सुझाव दिया जाता है कि वे अपने बच्चों पर नजर रखें और उनके नए मित्र दिखाई देने, क्षणिक उत्तेजना या चिडचिडापन होने, जेब खर्च बढने, देर रात्रि घर लौटने, थकावट, बेचैनी, अर्द्धनिद्राग्रस्त रहने, बोझिल पलकें, आँखों में चमक व चेहरे पर भावशून्यता, आँखों की लाली छिपाने के लिए बराबर धूप के चश्मे का प्रयोग करते रहने, उल्टियाँ होने, निरोधक शक्ति कम हो जाने के कारण अक्सर बीमार रहने, परिवार के सदस्यों से दूर-दूर रहने, भूख न लगने व वजन के निरंतर गिरने, नींद न आने, खांसी के दौरे पड़ने, अल्पकालीन स्मृति में ह्रास, त्वचा पर चकते पड़ जाने, उंगलियों के पोरों पर जले का निशान होने, बाँहों पर सुई के निशान दिखाई देने, ड्रग न मिलने पर आंखों-नाक से पानी बहने-शरीर में दर्द-खांसी-उल्टी व बेचैनी होने, व्यक्तिगत सफाई पर ध्यान न देने, बाल-कपड़े अस्त व्यस्त रहने, नाखून बढे रहने, शौचालय में देर तक रहने, घरेलू सामानों के एक-एक कर गायब होते जाने आदत के तौर पर झूठ बोलने, तर्क-वितर्क करने, रात में उठकर सिगरेट पीने, मिठाईयों के प्रति आकर्षण बढ जाने, शैक्षिक उपलब्धियों में लगातार गिरावट आते जाने, स्कूल कालेज में उपस्थिति कम होते जाने, प्रायः जल्दबाजी में घर से बाहर चले जाने एवं कपडों पर सिगरेट के जले छिद्र दिखाई देने जैसे लक्षणों के दिखने पर सतर्क हो जाएँ। यह बच्चों के मादक-पदार्थों का व्यसनी होने की निशानी है। यही नहीं यदि उनके व्यक्तिगत सामान में अचानक माचिस, मोमबत्ती, सिगरेट का तम्बाकू, 3 इंच लम्बी शीशे की ट्यूब, एल्मूनियम फॉयल, सिरिंज, हल्का भूरा-सफेदपाउडर मिलता है तो निश्चित जान लेना चाहिए कि वह ड्रग्स आदि का शिकार है। ऐसे में तत्काल ही ठोस क़दम उठाया जाना चाहिए।

INDIA is INDIRA: इमरजेंसी: शुरुआत से अंत तक

    


इंदिरा गांधी ने 41 साल पहले भारतीय लोकतंत्र पर काला धब्बा लगाया, तो हिंदुस्तान हैरत में पड़ गया था. आज की पीढ़ी को उस दौर का इल्म नहीं, जब दो साल हमारा देश नर्क में बदल गया था. 1975 की इमरजेंसी को समझना है, तो ये 7 बिंदू काफी हैं...

इमरजेंसी की नींव

इलाहाबाद में इं‌दिरा गांधी पर चुनाव में धांधली का मुकदमा, जिसने उन्हें दोषी ठहराया. सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, तो सशर्त स्‍थगन मिला. उन्हें सांसद बने रहने का अधिकार मिला, लेकिन संसदीय कार्यवाही से दूर रहने का आदेश भी. यह इमरजेंसी की तरफ पहला कदम माना जाता है

जेपी की क्रांति

दूसरा कदम जयप्रकाश नारायण रहे, जिन्होंने कोर्ट के आदेश के बाद इं‌दिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की और 'संपूर्ण क्रांति' की पहल की. 25 जून को ही उन्होंने देश भर में अलग-अलग सूबों की राजधानी में प्रदर्शन करने आह्वान किया

गिरफ्तारियां

हालात काबू से बाहर होते देख इंदिरा गांधी ने भारतीय संविधान के आर्टिकल 352 के तहत आपातकाल लगा दिया, जिससे उन्हें असीम ताक़त मिल गई. जेपी, मोरारजी देसाई, विजयराजे सिंधिया, जीवतराम कृपलानी, लालकृष्‍ण आडवाणी और कई दिग्गज नेताओं को जेल में डाल दिया गया. यही नहीं, कई लोगों को हिरासत के दौरान प्रताड़ित कर मार डाला गया, हालांकि सरकारी आंकड़ा सिर्फ 22 लोगों की मौत मानता है

चुनाव

विरोध करने वाले नेताओं को जेल में डाल दिया गया, आम नागरिकों के सारे अधिकार रद्द कर दिए गए हैं, ऐसे में चुनावों का क्या मतलब? इंदिरा गांधी ने देश में होने वाले सभी संसदीय और विधानसभा चुनावों पर पाबंदी लगा दी. कुछ राज्य की सरकारें गिराकर वहां के नेताओं को हिरासत में ले लिया गया

नसबंदी

आपातकाल ने सिर्फ इंदिरा गांधी नहीं, बल्कि उनके बेटे संजय गांधी को भी असीम ताक़त दी. उन्होंने परिवार नियोजन के नाम पर जबरन नसबंदी करने का अभियान चलाया. ऐसा कहा जाता है कि करीब 9 लाख लोगों की नसबंदी की गई. इनमें वो लोग भी थे, जिनकी शादी तक नहीं हुई या जो बुजुर्ग थे

मीडिया

लोकतंत्र का चौथा स्तम्‍भ आपातकाल के दौरान खुद को बचाने के लिए जूझ रहा था. अखबारों, टेलीविज़न और रेडियो पर कई पाबंदियां लगा दी गईं. कुछ अखबार-पत्रिकाओं ने विरोध जताने के लिए पन्ने खाली छापे, कुछ ने रबींद्रनाथ टैगोर की कविता प्रकाशित की और कुछ ने 'लोकतंत्र की मौत' पर मर्सिया पढ़ा

कानून

आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने अपनी मर्ज़ी से कानून लिखने शुरू कर दिए, क्योंकि उस वक्‍़त उनकी पार्टी के पास लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत था. उन्होंने अपने खिलाफ लगे सभी आरोप नए कानून पास कर हटा दिए. 42वां संशोधन आपातकाल की सारी कहानी कहता है

आपातकाल का अंजाम

करीब 21 महीने बाद इमरजेंसी हटी, हालांकि संजय गांधी की योजना इसे कई साल लगाए रखने की थी. आपातकाल के बाद हुए आम चुनावों में कांग्रेस को इसका अंजाम भुगतना पड़ा और वो बुरी तरह हारी. सलमान रश्दी की मिडनाइट चिल्ड्रन, वी एस नायपॉल के इंडिया-ए वूंडड कंट्री जैसे किताबें छपीं. किस्सा कुर्सी का जैसी फिल्म में सियासी हथकंडों पर तंज़ कसा गया. नसबंदी जैसी फिल्मों ने देश के हालात बताए 

फादर्स डे स्पेशल : पिता खुदा की नेमत है

    


क्यों मनाया जाता है फादर्स डे? 
माना जाता है कि फादर्स डे सर्वप्रथम 19 जून 1910 को वाशिंगटन में मनाया गया। साल 2016 में फादर्स-डे के 106 साल पूरे हो गए। इसके पीछे भी एक रोचक कहानी है- सोनेरा डोड की।

सोनेरा डोड जब नन्ही सी थी, तभी उनकी मां का देहांत हो गया। पिता विलियम स्मार्ट ने सोनेरो के जीवन में मां की कमी नहीं महसूस होने दी और उसे मां का भी प्यार दिया। एक दिन यूं ही सोनेरा के दिल में ख्याल आया कि आखिर एक दिन पिता के नाम क्यों नहीं हो सकता? ....इस तरह 19 जून 1910 को पहली बार फादर्स डे मनाया गया।

1924 में अमेरिकी राष्ट्रपति कैल्विन कोली ने फादर्स डे पर अपनी सहमति दी। फिर 1966 में राष्ट्रपति लिंडन जानसन ने जून के तीसरे रविवार को फादर्स डे मनाने की आधिकारिक घोषणा की।1972 में अमेरिका में फादर्स डे पर स्थायी अवकाश घोषित हुआ।

फि‍लहाल पूरे विश्व में जून के तीसरे रविवार को फादर्स डे मनाया जाता है। भारत में भी धीरे-धीरे इसका प्रचार-प्रसार बढ़ता जा रहा है। इसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बढती भूमंडलीकरण की अवधारणा के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है और पिता के प्रति प्रेम के इज़हार के परिप्रेक्ष्य में भी। 


पिता खुदा की नेमत है,

पिता समझ का दरिया।  

पिता से है छांव सिर पर, 

वह राहत का जरिया।।

ये पंक्तियां भी पिता के महान व्यक्तित्व के महत्व का रेखांकित करने में असमर्थ हैं, क्योंकि पिता का अस्ति‍त्व मात्र ही संतान के लिए ब्रह्मांड से भी व्यापक है और सागर से भी गहरा। उनके अनकहे शब्द भी खुद में कई शब्दों को समेटे हैं और उनकी हर एक बात में अनेक सबक हैं। उनकी परछाई में सुरक्षा की राहत है तो उनके कदमों में जन्नत के निशां...।

बच्चे का अपने माता-पिता से सबसे गहरा नाता होता है। मां से भावनाओं का जुड़ाव, तो पिता से समझ का। मां की ममता और करुणाशीलता तो जगजाहिर है, लेकिन कई बार पिता की अनकहे शब्द और जता न पाने की आदत उनके भावों को ठीक तरह से अभिव्यक्त नहीं कर पाती और हम पिता को जरूरत से ज्यादा सख्त और भावनाविहीन मान बैठते हैं।
लेकिन सच तो ये है कि एक मां बच्चे को जितना प्रेम करती है, उतनी ही चिंता पिता को भी होती है। बस फर्क इतना होता है कि मां के प्रेम का पलड़ा भारी होता है और पिता के सुरक्षात्मक रवैये का, जो कई बार बच्चों को कठोर लगने लगता है। मां हमेशा दुलारती है और पिता हमेशा आपको बनाते हैं, आपके व्यक्तित्व को संवारते हैं।

पिता हमेशा उस कुम्हार की तरह होता है, जो ऊपर से आपको आकार देता है और पीछे से हाथ लगाकर सुरक्षात्मक सहयोग। 
अगर पिता के प्रेम को जानना चाहते हैं तो आप कितने भी बड़े क्यों न हो गए हों, एक बार अपने बचपन में लौट आइए और देखिए कि कैसे पिता ने आपको साइकल चलाना सिखाया था, कैसे आपके हर उस सवाल का उन्होंने बड़े ही रोचक ढंग से जवाब दिया था जिन्हें अब सुनकर आप शायद चिढ़ जाते हैं और उनकी बात का जवाब देना जरूरी नहीं समझते। कैसे वे आपके सामने झुककर घोड़ा या हाथी बन जाया करते थे और आपकी मुस्कान से उनकी पीठ का वह दर्द भी गायब हो जाता था, जो आपके वजन के कारण हुआ था, कैसे आपकी हर छोटी से छोटी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए वे अपनी जरूरतों से समझौता कर लिया करते थे, आपके होमवर्क और प्रोजेक्ट के लिए कैसे आपके साथ वे भी देर तक जागते और उसे पूरा करवाते थे, कैसे वे आपकी छोटी-सी सफलता को भी जहान की सबसे बड़ी खुशी के रूप में मनाते थे। 
कैसे वे आपको स्कूल छोड़ने और लेने जाया करते थे और रास्ते में आपकी हर फरमाइश पूरी हुआ करती थी। हर शाम ऑफिस से लौटते हुए कई बार, बिन मांगे ही वे आपकी पसंद की चीजें ले आया करते थे। उनके लि‍ए केवल आपकी खुशी अनमोल थी।
अब जरा वापस लौटकर आइए इस दुनिया में और सोचिए कि पिता क्या है। सिर्फ एक पिता या आपको समझने वाला सच्चा दोस्त, आपका सहायक, पालक या फिर खुदा की नेमत।


बालश्रम निषेध दिवस

    


 बाल मजदूरी के प्रति विरोध एवं जगरूकता फैलाने के मकसद से हर साल 12 जून को बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के जागरूकता पैदा करने के लिए 2002 में विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस के रूप में मनाने की शुरूआत की। संगठन के अनुमान के मुताबिक विश्व में 21 करोड़ 80 लाख बालश्रमिक हैं। जबकि एक आकलन के अनुसार भारत में ये आंकड़ा 1 करोड, 26 लाख 66 हजार 377 को छूता है।
10 अक्टूबर 2006 तक बालश्रम को इस असमंजस में रखा गया, कि किसे खतरनाक और किसे गैर खतरनाक बाल श्रम की श्रेणी में रखा जाए। उसके बाद इस अधि‍‍नियम 1986 में संशोधन कर ढाबों, घरों, होटलों में बालश्रम करवाने को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया। 
दरअसल 1979 में सरकार व्दारा बाल मजदूरी को खत्म करने के उपाय के रूप में गुरूपाद स्वामी समिति का गठन किया गया। जिसके बाद बालश्रम से जुड़ी सभी समस्याओं के अध्ययन के बाद गुरूपाद स्वामी समिति व्दारा रिफारिश प्रस्तुत की गई, जिसमें गरीबी को मजदूरी के मुख्य कारण के रूप में देखा गया और ये सुझाव दिया गया, कि खतरनाक क्षेत्रों में बाल मजदूरी पर प्रतिबंध लगाया जाए एवं उन क्षेत्रों के कार्य के स्तर में सुधार किया जाए। समिति व्दारा बाल मजदूरी करने वाले बच्चों की समस्याओं के निराकरण के लिए बहुआयामी नीति की जरूरत पर भी बल दिया गया।  
1986 में समिति के सिफारिश के आधार पर बाल मजदूरी प्रतिबंध विनियमन अधि‍नियम अस्तित्व में आया, जिसमें विशेष खतरनाक व्यवसाय व प्रक्रि‍या के बच्चों के रोजगार एवं अन्य वर्ग के लिए कार्य की शर्तों का निर्धारण किया गया। इसके बाद सन 1987 में बाल मजदूरी के लिए विशेष नीति बनाई गई, जिसमें जोखि‍म भरे व्यवसाय एवं प्रक्र‍ियाओं में लिप्त बच्चों के पुर्नवास पर ध्यान देने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। बच्चों की समस्याओं पर विचार करने के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय प्रयास उस समय हुआ, जब अक्टूबर 1990 में न्यूयार्क में इस विषय पर एक विश्व शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें 151 राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा गरीबी, कुपोषण व भुखमरी के शिकार दुनिया भर के करोड़ों बच्चों की समस्याओं पर विचार-विमर्श किया गया ।

इस वर्ष इस दिवस का थीम है 'बच्चों के लिए न्याय : बाल श्रम समाप्त करो.'

भारतीय संविधान में मौलिक अधि‍कारों और नीति निर्देशों के अनुसार कहा गया है  -
1  धारा 24-  14 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्ट्री या खदान में कार्य करने के लिए नियुक्त नहीं किया जाएगा और ना ही किसी खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जाएगा। 

2  धारा 39-ई - राज्य अपनी नीतियां इस तरह निर्धारित करे कि श्रमिकों, पुरूषों और महिलाओं का स्वास्थ्य तथा उनकी क्षमता सुरक्ष‍ित रह सकें, बच्चों की कम उम्र का शोषण न हो, न ही वे अपनी उम्र और शक्ति के प्रतिकूल, आर्थ‍िक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रवेश करें ।

3  धारा 39 -एफ - बच्चों को स्वस्थ्, स्वतंत्र व सम्मानजनक स्थिति में विकास के अवसर व सुविधाएं दी जाएंगी और बचपन व युवावस्था के नैतिक व भौतिक दुरूपयोग से बचाया जाएगा।

4  संविधान लागू होने के 10 साल के भीतर राज्य 14 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेंगे (धारा 45)।

बालश्रम के लिए कानून 

1  बालश्रम निषेध व नियमन कानून 1986 -  इस कानून के अनुसार 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए अहितकर 13 पेशे औ 57 प्रक्रियाओं में , नियोजन को निषिद्ध बनाया गया है।ये सभी पेशे और प्रक्रियाएं कानून की सूची में दिए गए हैं।

2  फैक्ट्री कानून 1948 - यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के नियोजन को निषिद्ध करता है। इसके अनुसार 15 से 18 वर्ष तक के किशोर किसी भी फैक्ट्री में तभी नियुक्त किए जा सकते हैं, जब उनके पास किसी अधिक़त चिकित्सक का फिटनेस प्रमाण पत्र हो। इसके साथ ही इस कानून में 14 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए हर दिन साढ़े चार घंटे की कार्य अवधि‍ रखने के साथ ही रात के वक्त उनके कार्य करने पर प्रतिबंध लगाया गया है।

3  भारत में बाल श्रम के खिलाफ कार्रवाई में महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप 1996 में उच्चतम न्यायालय के उस फैसले से आया, जिसमें संघीय और राज्य सरकारों को खतरनाक प्रक्रियाओं और पेशों में काम करने वाले बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटाने और उन्हें गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया था।

- भारत निम्नलिखित संधियों पर हस्ताक्षर कर चुका है - 

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन बलात श्रम सम्मेलन (संख्या 29)

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन बलात श्रम सम्मेलन का उन्मूलन (संख्या 105)

बच्चों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (सीआरसी)

भारत के कुछ प्रमुख श्रमसंघों व्दारा बालश्रम के संबंध में महत्वपूर्ण योगदान है जिनमें- 

1  ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन संघ

2  भारतीय मजदूर संघ 

3  सेंटर ऑफ इंडिया ट्रेड यूनियंस  

4  हिन्द मजदूर सभा  

5  बाल श्रम उन्मूलन एवं कल्याण कार्यक्रम 

उघोग, ठिकाना, बालश्रम व नुकसान -

वर्तमान में देश के विभिन्न क्षेत्रों में छोटे स्तर पर होटल, घरों व फैक्ट्री में काम कर या अलग अलग व्यवसाय में मजदूरी कर हजारों बाल श्रमिक अपने बचपन को तिलांजलि दे रहें हैं, जिन्हें न तो किसी कानून की जानकारी है, और ना ही पेट पालने का कोई और तरीका पता है .... मध्यप्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल, आंध्रप्रदेश, आसाम, त्रिपुरा और संपूर्ण भारत में ये बाल श्रमिक - 

कालीन, दियासलाई, रत्न पॉलिश व जवाहरात, पीतल व कांच, बीड़ी उघोग, हस्तशिल्प ,सूती होजरी, नारियल रेशा, सिल्क, हथकरघा, कढ़ाई, बुनाई, रेशम, लकड़ी की नक्काशी, फिश फीजिंग, पत्थर की खुदाई, स्लेट पेंसिल, चाय के बागान और बाल वैश्यावृत्ति के कार्य करते देखे जा सकते हैं। लेकिन कम उम्र में इस तरह के कार्यों को असावधानी से करने पर इन्हें कई तरह की बीमारियां होने का खतरा होता है।अध्ययन करने पर ये पाया गया, कि जितने भी बच्चे बालश्रम में लिप्त हैं, वे या तो निरक्षर थे या पढ़ाई छोड़ दी थी।इनमें  अधि‍कांश बच्चे बीमार पाए गए और कई बच्चे नशे के आदि भी थे। 


खतरनाक है होंठों पर जीभ फिराना

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दिनभर होंठों पर जीभ फेरना या अंगुलियों से होंठ छूना अगर आपकी भी आदत में शुमार है तो जितनी जल्दी हो सके, यह आदत बदल लीजिए। क्यों? आईये जानते हैं: 


दिन भर होंठों पर जीभ फिराने से होंठ जल्दी सूखते हैं। और होंठ जल्दी सूखेंगे तो आपको लिपबाम की जरूरत भी बहुत जल्दी-जल्दी पड़ेगी।


कई बार आप दोस्तों से लिपबाम शेयर भी कर लेते हैं। और कई बार लिपबाम डायरेक्ट न लगाकर अंगुली से लगाते हैं। बस यहीं से मुख्य समस्या शुरू होती है।


अगर आप लिपबाम यूज करते हैं तो थोड़ी सावधानी बरतें। सबसे पहली बात तो यह कि जहां तक हो सके लिपबाम शेयर न करें और दूसरी बात यह कि लिपबाम को सीधे होंठों पर लगाएं, न कि अंगुली की सहायता से लिपबाम लगाएं।


आपकी यही अंगुलियां कीबोर्ड से होते हुए रेस्टरूम के दरवाजे का हैंडल और मोबाइल फोन तक जाने क्या-क्या नहीं छूतीं, तो जाहिर सी बात है कि इन पर कीटाणु (जर्म्स) और विषाणु (वायरस) भी चिपकेंगे।


आपको पता भी नहीं चलता और अंगुलियों पर चिपके कीटाणु और विषाणु होंठों के जरिए हमारे मुंह और फिर हमारे पाचन तंत्र में पहुंच जाते हैं, और बदले में हमें दे जाते हैं बीमारी। इसलिए जहां तक हो सके स्टिकबाम यूज करें जो डायरेक्ट लिप्स पर लगाया जा सके, और अगर स्टिकबाम नहीं है तो अंगुली से लगाने से पहले हाथ साफ कर लें।


सोने से पहले लिप बाम्स की जगह आप होंठों पर ऐलो वेरा जेल या देसी घी भी लगा सकते हैं. नियमित तौर पर इस्तेमाल करने से आपको दोबारा फटे होंठों की दिक्कत कभी नहीं होगी.


एक चीज़ जो हम में से ज़्यादातर लोग सर्दियों में भूल जाते हैं, वो है पानी पीना. शरीर में पानी की कमी, सूखे और फटे होंठों के पीछे एक मुख्य कारण है. इसलिए अपने शरीर में पानी की मात्रा का ध्यान रखें और रोज़ाना 8-10 ग्लास पानी ज़रूर पिएं


विटामिन बी पर्याप्त मात्रा में न लेने से न सिर्फ आप का पाचनतंत्र प्रभावित होता है, बल्कि इस से आप के होंठों की सेहत भी प्रभावित होती है. होंठों के किनारे और मुंह के कोने सूख कर फट जाते हैं. विटामिन बी की कमी से मुंह में अल्सर भी हो जाता है. ऐसे में सर्दी में होंठों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में विटामिन बी लें.


होंठों को काला होने से बचाना चाहते हैं, तो नीबू का इस्तेमाल करें. नीबू में प्राकृतिक ब्लीच होती है, जिस से होंठों के धब्बे आसानी से हलके हो जाते हैं. होंठों को गुलाबी रंगत देने, उन्हें ठंडा रखने, मौइश्चराइज करने और ऐक्सफोलिएट करने के लिए चुकंदर और गुलाबजल का इस्तेमाल करें. आप गुलाबजल की कुछ बूंदें शहद में मिला कर भी होंठों पर लगा सकती हैं. अपने होंठों को पोषण और नमी देने के लिए आप इन की औलिव औयल से मसाज भी कर सकती हैं. होंठों को प्राकृतिक रूप से गुलाबी बनाने के लिए अनार के रस की कुछ बूंदों को होंठों पर मसलें. अनार के रस में पानी और क्रीम मिला कर होंठों पर लगाएं.

रोज़ों के दौरान ये खाएं, और इनसे करें परहेज

    


 इस बार का रमज़ान कई मायनों में बेहद खास है। इस बार हर रोज़ा करीब 15 घंटे लंबा होगा। इसके अलावा ये रोज़े जून की भीषण गर्मी में रखने होंगे। रोज़े में पानी भी नहीं पीना होता है, जिसके चलते डिहाइड्रेशन आम बात है। ऐसे में ज़रा सी लापरवाही बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है। रोज़े के दौरान किस तरह की चीजें खाएं और संभलकर कैसे रहें, जानते हैं....

डिहाइड्रेशन:
जून की झुलसा देने वाली गर्मी में रोज़े रखना साधारण बात नहीं है और वह भी 15 घंटों तक। रोज़ेदारों को इस दौरान पानी पीने की इजाजत नहीं होती है। ऐसे में उन्हें भारी काम करने से बचना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसे काम से बचें जिसमें पसीना निकले। मसलन साइकल चलाने या ज्यादा एक्सरसाइज़ करने से बचें।


हार्ट अटैक: 
अक्सर ऐसा देखा गया है कि रोज़ा रखने वालों का ग्लूकोज़ लेवल काफी बढ़ जाता है। 70-80 फीसदी मामलों में ऐसा देखा गया है। ऐसे में इस तरफ खास ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि इसके चलते हार्ट अटैक का ख़तरा करीब चार गुना तक बढ़ जाता है।


रोज़ेदारों को चाहिए कि वे सहरी या इफ्तार में चाय या कॉफी लेने की बजाय पानी या शिकंजी का सेवन करें। इससे लंबे समय तक पानी की कमी तो नहीं ही होगी साथ ही शुगर का स्तर भी बहुत ज्यादा नहीं बढ़ेगा।

चक्कर आना:
रोज़े के दौरान लंबे समय तक कुछ नहीं खाना पड़ता है। ऐसे में शरीर को लगातार ऊर्जा मुहैया करा पाना मुश्किल काम है। मस्तिष्क तक भी रक्त की आपूर्ति भी सुचारू रूप से नहीं हो पाती और चक्कर आना या चिड़चिड़ापन बढ़ जाना आम बात हो जाती है।


इस दौरान प्रोटीन और एनर्जी वाली चीजों का सेवन अधिक से अधिक करना चाहिए। सहरी में खजूर, सूखे मेवे और फल भरपूर मात्रा में लें।

वज़न बढ़ना:
कई बार देखा गया है कि रोज़े के बाद अक्सर लोगों को वज़न घटने की बजाय एकाएक बढ़ जाता है। लोग यह समझ नहीं पाते कि इतने दिनों तक भूखे रहने के बाद भी उनका वज़न कैसे बढ़ गया।


इसका सबसे आसान जवाब है कि वे सहरी या इफ्तार के दौरान अव्यस्थित तरीके से खाते हैं, इसलिए ऐसा होता है। इस दौरान वे बड़ी मात्रा में ग्लूकोज़ और वसा वाली चीजें एक साथ खाते हैं, जबकि तेल वाली चीजों से इस दौरान परहेज ही करना चाहिए। इसके अलावा 'वाइट फूड' (चावल, वाइट ब्रेड, चीनी आदि) से भी बचें।

प्रेग्नेंसी में रोज़े:
रमज़ान के दौरान बच्चों से लेकर बुज़ुर्ग तक लगभग सभी लोग रोज़े रखते हैं। इनमें गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं। वैसे तो उन्हें रोज़े रखने से परहेज़ करना चाहिए, लेकिन अगर वे रोज़े रख ही रहीं हैं तो उन्हें इस दौरान खास ध्यान देने की जरूरत होती है।


गर्भवती महिलाओं को कैल्शियम और आयरन से भरपूर चीजें लेनीं चाहिए, ताकि रोज़े के दौरान भी बच्चे को पोषण मिलता रहे। फलों का सेवन अधिक से अधिक करें ताकि शरीर में पानी की मौजूदगी लंबे समय तक बनी रहे। फाइबर से भरपूर भोजन लें। सबसे अहम बात ये कि उन्हें यह सब एक साथ लेने की बजाय थोड़ी-थोड़ी देर पर खाना चाहिए।


31मई : विश्व धूम्रपान निषेध दिवस

    


पिछले कुछ सालों में भारत के साथ ही पूरे विश्व भर में धूम्रपान
करने और उससे पीड़ित लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। इस गंभीर  लत ने कई लोगों को मौत का ग्रास तक बना दिया।
तंबाकू और धूम्रपान के दुष्परिणामों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन के
सदस्य देशों ने इसके लिए एक प्रस्ताव रखा जिसके बाद हर साल 31 मई को
तंबाकू निषेध दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। तभी से 31 मई को
प्रतिवर्ष विश्व धूम्रपान निषेध दिवस के रूप में इसे मनाया जाता है।
कुछ लोग यह कहकर सिगरेट पीते हैं कि इससे फ्रेश महसूस होता है लेकिन एक सिगरेट पीने से जिंदगी के 11 मिनट कम हो जाते हैं। इसके अलावा एक सिगरेट में 4,000 ऐसे केमिकल्स होते हैं जिससे कैंसर फैलता है। दुनिया में हर सेकंड में एक मौत तंबाकू सेवन के कारण होती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल करीब 10 लाख लोगों की मौत तंबाकू सेवन के कारण होती है और इस आंकड़े को 2020 तक 20 लाख पहुंच जाने की संभावना है।

ऐसे लगती है लत
तंबाकू में कई केमिकल होते हैं, जिनमें निकोटिन प्रमुख है। निकोटिन हमारे नर्वस सिस्टम को प्रभावित करता है। इसे लेने से इंसान को फौरी तौर पर बेहतर और हल्का महसूस होता है और जल्दी ही इसे इसकी लत लग जाती है।

तंबाकू के नुकसान
कैंसर, बांझपन, अस्थमा, दिल की बीमारी, सांस की दिक्कत आदि। स्मोकिंग से दिल की बीमारी होने के चांस ज्यादा होते हैं तो किसी भी रूप में तंबाकू चबाने पर कैंसर की आशंका ज्यादा होती है।

यूं छोड़ सकते हैं आप तंबाकू सेवन
सबसे पहले खुद को तैयार करें कि आप स्मोकिंग छोड़ सकते हैं। खुद पर विश्वास बनाए रखें।
स्मोकिंग छोड़ने के लिए एक दिन तय करें। कैलेंडर में मार्क करें। उसी दिन से शुरू करें।
छोड़ने की वजहों, नुकसान और फायदों को पेपर पर लिखें और ऐसी जगह लगाएं जहां बार-बार निगाह पड़ती हो।
अपने घर, ऑफिस और कार से सिगरेट को हटा दें।
ऐसे लोग और जगहों से दूर रहें, जहां पर स्मोकिंग के चांस ज्यादा हों।
सिरदर्द, बेचैनी, घबराहट, उलटी और पाचन में परेशानी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं, इनके लिए तैयार रहें।
अपने करीबी लोगों को स्मोकिंग छोड़ने की प्लानिंग के बारे में बताएं और उनकी मदद लें।
हो सके तो अपने डॉक्टर या काउंसलर की मदद लें।
इस दौरान खासतौर पर हेल्दी खाएं और तनाव न लें।
फिजिकली ऐक्टिव रहें। रोजाना 45 से 60 मिनट एक्सरसाइज जरूर करें। - योग और मेडिटेशन जरूर करें। इससे मन रिलैक्स रहेगा।

स्मोकिंग छुड़ाने में बहुत कारगर है निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरपी
तंबाकू या सिगरेट के अलावा किसी और तरीके से बॉडी में निकोटिन पहुंचाने को निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरपी (NRT) कहते हैं। स्मोकिंग छुड़ाने के लिए NRT यूज की जाती है। इसके तहत निकोटिन के चुइंगम, स्प्रे, इनहेलर, पैच आदि दिए जाते हैं लेकिन सबसे आसान और अच्छा तरीका चुइंगम है। NRT को डब्ल्यूएचओ ने मंजूरी दी हुई है। निकोटिन गम को चुइंगम की तरह लगातार न चबाएं, बल्कि कुछ देर चबाकर मुंह में रख लें और फिर से कुछ देर चबाएं। इससे निकोटिन धीरे-धीरे निकलेगा और तलब कम होगी। लगातार चबाने से तीखापन बढ़ जाएगा।
इसमें कम मात्रा में निकोटिन होता है और धुएं में पाए जानेवाले टॉक्सिन इसमें नहीं होते। इसका मकसद निकोटिन की मात्रा को कम कर धीरे-धीरे लत को दूर करना होता है। इनमें निकोटिन की मात्रा काफी कम होती है और लत लगने के चांस काफी कम होते हैं। निकोटिन थेरपी से तंबाकू की तलब कम होती है और स्मोकिंग छोड़ने के चांस 50-70 फीसदी तक कम हो जाते हैं।

तंबाकू से जुडे कुछ तथ्य -
1. विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ के मुताबिक दुनिया के करीब 125 देशों में तंबाकू का उत्पादन होता है।

2. दुनियाभर में हर साल करीब
5.5 खरब सिगरेट का उत्पादन होता है और एक अरब से ज्यादा लोग इसका सेवन करते हैं।

3. रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 80 फीसदी पुरुष तंबाकू का सेवन करते हैं, लेकिन कुछ देशों में महिलाओं में धूम्रपान करने की आदत काफी बढ़ी है।

4. दुनियाभर में धूम्रपान करने वालों का करीब 10
फीसदी भारत में है, रिपोर्ट के अनुसार भारत में
करीब 25 हजार लोग गुटखा, बीडी, सिगरेट, हुक्का
आदि के जरिये तंबाकू का सेवन करते हैं।

5. भारत में 10 अरब सिगरेट और 72 करोड़ 50 लाख किलो तंबाकू का उत्पादन होता है।

6. भारत तंबाकू निर्यात के मामले में ब्राजील, चीन,
अमेरिका,मलावी और इटली के बाद छठे नंबर पर है।

7. विकासशील देशों में हर साल 8 हजार बच्चों की मौत
अभिभावकों द्वारा किए जाने वाले धूम्रपान के कारण होती है।

8. दुनिया के किसी अन्य देश के मुक़ाबले में भारत में तंबाकू से होने वाली बीमारियों से मरने वाले लोगों की संख्या बहुत
तेजी से बढ़ रही है।

9. किसी भी प्रकार का धूम्रपान 90 प्रतिशत से अधिक फेफड़े
के कैंसर, ब्रेन हेमरेज और पक्षाघात का प्रमुख कारण है।

10. सिगरेट व तंबाकू - मुंह , मेरूदंड, कंठ और मूत्राशय के कैंसर के रूप में प्रभावी होता है ।

11. सिगरेट व तंबाकू में मौजूद कैंसरजन्य पदार्थ शरीर की
कोशिकाओं के विकास को रोककर उनके नष्ट होने और कैंसर के बनने में मदद करता
है।

12. लंबे समय तक धूम्रपान करने से मुंह, गर्भाशय, गुर्दे और पाचक ग्रंथि में कैंसर होने की अत्यधिक संभावना होती है।

13. धूम्रपान का सेवन और न चाहते हुए भी उसके धुंए का सामना, हृदय और मस्तिष्क की बीमारियों का मुख्य कारण है।

14. धूम्रपान के धूएं में मौजूद निकोटीन, कार्बन मोनो आक्साइड जैसे पदार्थ हृदय, ग्रंथियों और धमनियों से संबंधित रोगों के कारण हैं।

भारत में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर पाबंदी है, इसके बावजूद लचर
कानून व्यवस्था के चलते इस पर अमल नहीं हो पाता। भारत में आर्थिक
मामलों की संसदीय समिति पहले ही
राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम को मंज़ूरी दे
चुकी है। इसका मक़सद तंबाकू नियंत्रण कानून के प्रभावी
क्रियान्वयन और तम्बाकू के हानिकारक प्रभावों के बारे में लोगों तक जागरूकता फैलाना
है।

इसलिए दुनिया कहती थी ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर

    


किसी भी खिलाड़ी की महानता को नापने का सबसे बड़ा
पैमाना है कि उसके साथ कितनी किंवदंतियाँ जुड़ी हैं. उस
हिसाब से तो मेजर ध्यानचंद का कोई जवाब नहीं है. हॉलैंड में
लोगों ने उनकी हॉकी स्टिक तुड़वा कर देखी कि कहीं उसमें
चुंबक तो नहीं लगा है.

जापान के लोगों को अंदेशा था कि उन्होंने अपनी स्टिक में गोंद
लगा रखी है. हो सकता है कि इनमें से कुछ बातें बढ़ा चढ़ा कर कही
गई हों लेकिन अपने ज़माने में इस खिलाड़ी ने किस हद तक अपना
लोहा मनवाया होगा इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा
सकता है कि वियना के स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक मूर्ति लगाई गई
है जिसमें उनके चार हाथ और उनमें चार स्टिकें दिखाई गई हैं, मानों
कि वो कोई देवता हों.
1936 के बर्लिन ओलंपिक में उनके साथ खेले और बाद में पाकिस्तान
के कप्तान बने आईएनएस दारा ने वर्ल्ड हॉकी मैगज़ीन के एक अंक में
लिखा था, "ध्यान के पास कभी भी तेज़ गति नहीं थी बल्कि वो
धीमा ही दौड़ते थे. लेकिन उनके पास गैप को पहचानने की गज़ब
की क्षमता थी. बाएं फ्लैंक में उनके भाई रूप सिंह और दाएं फ़्लैंक में
मुझे उनके बॉल डिस्ट्रीब्यूशन का बहुत फ़ायदा मिला. डी में घुसने
के बाद वो इतनी तेज़ी और ताकत से शॉट लगाते थे कि दुनिया के
बेहतरीन से बेहतरीन गोलकीपर के लिए भी कोई मौका नहीं रहता
था."
दो बार के ओलंपिक चैंपियन केशव दत्त ने हमें बताया कि बहुत से
लोग उनकी मज़बूत कलाईयों ओर ड्रिब्लिंग के कायल थे. "लेकिन
उनकी असली प्रतिभा उनके दिमाग़ में थी. वो उस ढ़ंग से हॉकी के
मैदान को देख सकते थे जैसे शतरंज का खिलाड़ी चेस बोर्ड को
देखता है. उनको बिना देखे ही पता होता था कि मैदान के किस
हिस्से में उनकी टीम के खिलाड़ी और प्रतिद्वंदी मूव कर रहे हैं."
याद कीजिए 1986 के विश्व कप फुटबॉल का फ़ाइनल. माराडोना
ने बिल्कुल ब्लाइंड एंगिल से बिना आगे देख पाए तीस गज़ लंबा
पास दिया था जिस पर बुरुचागा ने विजयी गोल दागा था.
किसी खिलाड़ी की संपूर्णता का अंदाज़ा इसी बात से होता है
कि वो आँखों पर पट्टी बाँध कर भी मैदान की ज्योमेट्री पर
महारत हासिल कर पाए.
केशव दत्त कहते हैं, "जब हर कोई सोचता था कि ध्यानचंद शॉट लेने
जा रहे हैं वो गेंद को पास कर देते थे. इसलिए नहीं कि वो स्वार्थी
नहीं थे (जो कि वो नहीं थे) बल्कि इसलिए कि विरोधी उनके इस
मूव पर हतप्रभ रह जाएं. जब वो इस तरह का पास आपको देते थे तो
ज़ाहिर है आप उसे हर हाल में गोल में डालना चाहते थे."
1947 के पूर्वी अफ़्रीका के दौरे के दौरान उन्होंने केडी सिंह बाबू
को गेंद पास करने के बाद अपने ही गोल की तरफ़ अपना मुंह मोड़
लिया और बाबू की तरफ़ देखा तक नहीं. जब उनसे बाद में उनकी इस
अजीब सी हरकत का कारण पूछा गया तो उनका जवाब था, "अगर
उस पास पर भी बाबू गोल नहीं मार पाते तो उन्हें मेरी टीम में रहने
का कोई हक़ नहीं था."
1968 में भारतीय ओलंपिक टीम के कप्तान रहे गुरुबख़्श सिंह ने मुझे
बताया कि 1959 में भी जब ध्यानचंद 54 साल के हो चले थे
भारतीय हॉकी टीम का कोई भी खिलाड़ी बुली में उनसे गेंद नहीं
छीन सकता था.
1936 के ओलंपिक खेल शुरू होने से पहले एक अभ्यास मैच में भारतीय
टीम जर्मनी से 4-1 से हार गई. ध्यान चंद अपनी आत्मकथा 'गोल' में
लिखते हैं, "मैं जब तक जीवित रहूँगा इस हार को कभी नहीं भूलूंगा.
इस हार ने हमें इतना हिला कर रख दिया कि हम पूरी रात सो नहीं
पाए. हमने तय किया कि इनसाइड राइट पर खेलने के लिए आईएनएस
दारा को तुरंत भारत से हवाई जहाज़ से बर्लिन बुलाया जाए."
दारा सेमी फ़ाइनल मैच तक ही बर्लिन पहुँच पाए.
जर्मनी के ख़िलाफ फ़ाइनल मैच 14 अगस्त 1936 को खेला जाना
था. लेकिन उस दिन बहुत बारिश हो गई. इसलिए मैच अगले दिन
यानि 15 अगस्त को खेला गया. मैच से पहले मैनेजर पंकज गुप्ता ने
अचानक कांग्रेस का झंडा निकाला. उसे सभी खिलाड़ियों ने
सेल्यूट किया (उस समय तक भारत का अपना कोई झंडा नहीं था.
वो गुलाम देश था इसलिए यूनियन जैक के तले ओलंपिक खेलों में भाग
ले रहा था.)
बर्लिन के हॉकी स्टेडियम में उस दिन 40,000 लोग फ़ाइनल देखने के
लिए मौजूद थे. देखने वालों में बड़ौदा के महाराजा और भोपाल
की बेगम के साथ साथ जर्मन नेतृत्व के चोटी के लोग मौजूद थे.
ताज्जुब ये था कि जर्मन खिलाड़ियों ने भारत की तरह छोटे छोटे
पासों से खेलने की तकनीक अपना रखी थी. हाफ़ टाइम तक भारत
सिर्फ़ एक गोल से आगे था. इसके बाद ध्यान चंद ने अपने स्पाइक
वाले जूते और मोज़े उतारे और नंगे पांव खेलने लगे. इसके बाद तो
गोलों की झड़ी लग गई.
दारा ने बाद में लिखा, "छह गोल खाने के बाद जर्मन रफ़ हॉकी
खेलने लगे. उनके गोलकीपर की हॉकी ध्यान चंद के मुँह पर इतनी
ज़ोर से लगी कि उनका दांत टूट गया. उपचार के बाद मैदान में
वापस आने के बाद ध्यान चंद ने खिलाड़ियों को निर्देष दिए कि
अब कोई गोल न मारा जाए. सिर्फ़ जर्मन खिलाड़ियों को ये
दिखाया जाए कि गेंद पर नियंत्रण कैसे किया जाता है. इसके बाद
हम बार बार गेंद को जर्मन डी में ले कर जाते और फिर गेंद को बैक
पास कर देते. जर्मन खिलाड़ियों की समझ में ही नहीं आ रहा था
कि ये हो क्या रहा है."
भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराया और इसमें तीन गोल ध्यान चंद ने
किए. एक अख़बार मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा, "बर्लिन लंबे समय तक
भारतीय टीम को याद रखेगा. भारतीय टीम ने इस तरह की हॉकी
खेली मानो वो स्केटिंग रिंक पर दौड़ रहे हों. उनके स्टिक वर्क ने
जर्मन टीम को अभिभूत कर दिया."
ध्यानचंद के पुत्र और 1972 के म्यूनिख ओलंपिक खेलो में कांस्य पदक
विजेता अशोक कुमार बताते हैं कि एक बार उनकी टीम म्यूनिख में
अभ्यास कर रही थी तभी उन्होंने देखा कि एक बुज़ुर्ग से शख़्स एक
व्हील चेयर पर बैठे चले आ रहे हैं. उन्होंने पूछा कि इस टीम में अशोक
कुमार कौन हैं. जब मुझे उनके पास ले जाया गया तो उन्होंने मुझे गले
लगा लिया और भावपूर्ण ढ़ंग से अपनी टूटी फूटी अंग्रेज़ी में बताने
लगे... तुम्हारे पिता इतने महान खिलाड़ी थे. उनके हाथ में 1936 के
ख़बरों की पीली हो चुकी कतरनें थी जिसमें मेरे पिता के खेल का
गुणगान किया गया था.
ओलंपियन नंदी सिंह ने एक बार मीडिया को बताया था कि
लोगों में ये बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है कि ध्यान चंद बहुत ड्रिबलिंग
किया करते थे. वो बिल्कुल भी ड्रिबलिंग नहीं करते थे. गेंद को वो
अपने पास रखते ही नहीं थे. गेंद आते ही वो उसे अपने साथी
खिलाड़ी को पास कर देते थे.
भारत लौटने के बाद ध्यानचंद के साथ एक मज़ेदार घटना हुई. फ़िल्म
अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ध्यानचंद के फ़ैन थे. एक बार मुंबई में हो रहे
एक मैच में वो अपने साथ नामी गायक कुंदन लाल सहगल को ले आए.
हाफ़ टाइम तक कोई गोल नहीं हो पाया. सहगल ने कहा कि हमने
दोनों भाइयों को बहुत नाम सुना है. मुझे ताज्जुब है कि आप में से
कोई आधे समय तक एक गोल भी नहीं कर पाया. रूप सिंह ने तब
सहगल से पूछा कि क्या हम जितने गोल मारे उतने गाने हमें आप
सुनाएंगे?
सहगल राज़ी हो गए. दूसरे हाफ़ में दोनों भाइयों ने मिल कर 12
गोल दागे. लेकिन फ़ाइनल विसिल बजने से पहले सहगल स्टेडियम
छोड़ कर जा चुके थे. अगले दिन सहगल ने अपने स्टूडियो आने के लिए
ध्यान चंद के पास अपनी कार भेजी. लेकिन जब ध्यान चंद वहाँ पहुंचे
तो सहगल ने कहा कि गाना गाने का उनका मूड उखड़ चुका है.
ध्यान चंद बहुत निराश हुए कि सहगल ने नाहक ही उनका समय
ख़राब किया. लेकिन अगले दिन सहगल खुद अपनी कार में उस जगह
पहुँचे जहाँ उनकी टीम ठहरी हुई थी और उन्होंने उनके लिए 14 गाने
गाए. न सिर्फ़ गाने गाए बल्कि उन्होंने हर खिलाड़ी को एक एक
घड़ी भी भेंट की!

वो धमाका जिसने राजीव गांधी को मार डाला

    


अपनी हत्या से कुछ ही पहले अमरीका के राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी ने कहा था कि अगर कोई अमरीका के राष्ट्रपति को मारना चाहता है तो ये कोई बड़ी बात नहीं होगी बशर्ते हत्यारा ये तय कर ले कि मुझे मारने के बदले वो अपना जीवन देने के लिए तैयार है.
"अगर ऐसा हो जाता है तो दुनिया की कोई भी ताक़त मुझे बचा नहीं सकती."

 21 मई, 1991 की रात दस बज कर 21 मिनट पर तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में ऐसा ही हुआ. तीस साल की एक नाटी, काली और गठीली लड़की चंदन का एक हार ले कर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की तरफ़ बढ़ी. जैसे ही वो उनके पैर छूने के लिए झुकी, कानों को बहरा कर देने वाला धमाका हुआ.
उस समय मंच पर राजीव के सम्मान में एक गीत गाया जा रहा था.... राजीव का जीवन हमारा जीवन है... अगर वो जीवन इंदिरा गांधी के बेटे को समर्पित नहीं है... तो वो जीवन कहाँ का?
वहाँ से मुश्किल से दस गज़ की दूरी पर गल्फ़ न्यूज़ की संवाददाता और इस समय डेक्कन क्रॉनिकल, बंगलौर की स्थानीय संपादक नीना गोपाल, राजीव गांधी के सहयोगी सुमन दुबे से बात कर रही थीं.
नीना याद करती हैं, "मुझे सुमन से बातें करते हुए दो मिनट भी नहीं हुए थे कि मेरी आंखों के सामने बम फटा. मैं आमतौर पर सफ़ेद कपड़े नहीं पहनती. उस दिन जल्दी-जल्दी में एक सफ़ेद साड़ी पहन ली. बम फटते ही मैंने अपनी साड़ी की तरफ़ देखा. वो पूरी तरह से काली हो गई थी और उस पर मांस के टुकड़े और ख़ून के छींटे पड़े हुए थे. ये एक चमत्कार था कि मैं बच गई. मेरे आगे खड़े सभी लोग उस धमाके में मारे गए थे."
नीना बताती हैं, "बम के धमाके से पहले पट-पट-पट की पटाखे जैसी आवाज़ सुनाई दी थी. फिर एक बड़ा सा हूश हुआ और ज़ोर के धमाके के साथ बम फटा. जब मैं आगे बढ़ीं तो मैंने देखा लोगों के कपड़ो में आग लगी हुई थी, लोग चीख रहे थे और चारों तरफ़ भगदड़ मची हुई थी. हमें पता नहीं था कि राजीव गांधी जीवित हैं या नहीं."
श्रीपेरंबदूर में उस भयंकर धमाके के समय तमिलनाडु कांग्रेस के तीनों चोटी के नेता जी के मूपनार, जयंती नटराजन और राममूर्ति मौजूद थे. जब धुआँ छटा तो राजीव गाँधी की तलाश शुरू हुई. उनके शरीर का एक हिस्सा औंधे मुंह पड़ा हुआ था. उनका कपाल फट चुका था और उसमें से उनका मगज़ निकल कर उनके सुरक्षा अधिकारी पीके गुप्ता के पैरों पर गिरा हुआ था जो स्वयं अपनी अंतिम घड़ियाँ गिन रहे थे.
बाद में जी के मूपनार ने एक जगह लिखा, "जैसे ही धमाका हुआ लोग दौड़ने लगे. मेरे सामने क्षत-विक्षत शव पड़े हुए थे. राजीव के सुरक्षा अधिकारी प्रदीप गुप्ता अभी ज़िंदा थे. उन्होंने मेरी तरफ़ देखा. कुछ बुदबुदाए और मेरे सामने ही दम तोड़ दिया मानो वो राजीव गाँधी को किसी के हवाले कर जाना चाह रहे हों. मैंने उनका सिर उठाना चाहा लेकिन मेरे हाथ में सिर्फ़ मांस के लोथड़े और ख़ून ही आया. मैंने तौलिए से उन्हें ढक दिया."
मूपनार से थोड़ी ही दूरी पर जयंती नटराजन अवाक खड़ी थीं. बाद में उन्होंने भी एक इंटरव्यू में बताया, "सारे पुलिस वाले मौक़े से भाग खड़े हुए. मैं शवों को देख रही थी, इस उम्मीद के साथ कि मुझे राजीव न दिखाई दें. पहले मेरी नज़र प्रदीप गुप्ता पर पड़ी... उनके घुटने के पास ज़मीन की तरफ मुंह किए हुए एक सिर पड़ा हुआ था... मेरे मुंह से निकला ओह माई गॉड... दिस लुक्स लाइक राजीव."
वहीं खड़ी नीना गोपाल आगे बढ़ती चली गईं, जहाँ कुछ मिनटों पहले राजीव खड़े हुए थे.
नीना बताती है, "मैं जितना भी आगे जा सकती थी, गई. तभी मुझे राजीव गाँधी का शरीर दिखाई दिया. मैंने उनका लोटो जूता देखा और हाथ देखा जिस पर गुच्ची की घड़ी बँधी हुई थी. थोड़ी देर पहले मैं कार की पिछली सीट पर बैठकर उनका इंटरव्यू कर रही थी. राजीव आगे की सीट पर बैठे हुए थे और उनकी कलाई में बंधी घड़ी बार-बार मेरी आंखों के सामने आ रही थी.
इतने में राजीव गांधी का ड्राइवर मुझसे आकर बोला कि कार में बैठिए और तुरंत यहाँ से भागिए. मैंने जब कहा कि मैं यहीं रुकूँगी तो उसने कहा कि यहाँ बहुत गड़बड़ होने वाली है. हम निकले और उस एंबुलेंस के पीछे पीछे अस्पताल गए जहाँ राजीव के शव को ले जाया जा रहा था."
दस बज कर पच्चीस मिनट पर दिल्ली में राजीव के निवास 10, जनपथ पर सन्नाटा छाया था. राजीव के निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज अपने चाणक्यपुरी वाले निवास की तरफ़ निकल चुके थे.
जैसे ही वो घर में दाख़िल हुए, उन्हें फ़ोन की घंटी सुनाई दी. दूसरे छोर पर उनके एक परिचित ने बताया कि चेन्नई में राजीव से जुड़ी बहुत दुखद घटना हुई है.
जॉर्ज वापस 10 जनपथ भागे. तब तक सोनिया और प्रियंका भी अपने शयन कक्ष में जा चुके थे. तभी उनके पास भी ये पूछते हुए फ़ोन आया कि सब कुछ ठीक तो है. सोनिया ने इंटरकॉम पर जॉर्ज को तलब किया. जॉर्ज उस समय चेन्नई में पी. चिदंबरम की पत्नी नलिनी से बात कर रहे थे. सोनिया ने कहा जब तक वो बात पूरी नहीं कर लेते वो लाइन को होल्ड करेंगीं.
नलिनी ने इस बात की पुष्टि की कि राजीव को निशाना बनाते हुए एक धमाका हुआ है लेकिन जॉर्ज सोनिया को ये ख़बर देने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. दस बज कर पचास मिनट पर एक बार फिर टेलीफ़ोन की घंटी बजी.
रशीद किदवई सोनिया की जीवनी में लिखते हैं, "फ़ोन चेन्नई से था और इस बार फ़ोन करने वाला हर हालत में जॉर्ज या मैडम से बात करना चाहता था. उसने कहा कि वो ख़ुफ़िया विभाग से है. हैरान परेशान जॉर्ज ने पूछा राजीव कैसे हैं? दूसरी तरफ़ से पाँच सेकेंड तक शांति रही, लेकिन जॉर्ज को लगा कि ये समय कभी ख़त्म ही नहीं होगा. वो भर्राई हुई आवाज़ में चिल्लाए तुम बताते क्यों नहीं कि राजीव कैसे हैं? फ़ोन करने वाले ने कहा, सर वो अब इस दुनिया में नहीं हैं और इसके बाद लाइन डेड हो गई."
जॉर्ज घर के अंदर की तरफ़ मैडम, मैडम चिल्लाते हुए भागे. सोनिया अपने नाइट गाउन में फ़ौरन बाहर आईं. उन्हें आभास हो गया कि कुछ अनहोनी हुई है.
आम तौर पर शांत रहने वाले जॉर्ज ने इस तरह की हरकत पहले कभी नहीं की थी. जॉर्ज ने काँपती हुई आवाज़ में कहा "मैडम चेन्नई में एक बम हमला हुआ है."
सोनिया ने उनकी आँखों में देखते हुए छूटते ही पूछा, "इज़ ही अलाइव?" जॉर्ज की चुप्पी ने सोनिया को सब कुछ बता दिया.
रशीद बताते हैं, "इसके बाद सोनिया पर बदहवासी का दौरा पड़ा और 10 जनपथ की दीवारों ने पहली बार सोनिया को चीख़ कर विलाप करते सुना. वो इतनी ज़ोर से रो रही थीं कि बाहर के गेस्ट रूम में धीरे-धीरे इकट्ठे हो रहे कांग्रेस नेताओं को वो आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी. वहाँ सबसे पहले पहुंचने वालों में राज्यसभा सांसद मीम अफ़ज़ल थे.
उन्होंने मुझे बताया कि सोनिया के रोने का स्वर बाहर सुनाई दे रहा था. उसी समय सोनिया को अस्थमा का ज़बरदस्त अटैक पड़ा और वो क़रीब-क़रीब बेहोश हो गईं. प्रियंका उनकी दवा ढ़ूँढ़ रही थीं लेकिन वो उन्हें नहीं मिली. वो सोनिया को दिलासा देनी की कोशिश भी कर रही थीं लेकिन सोनिया पर उसका कोई असर नहीं पड़ रहा था."
इस केस की जाँच के लिए सीआरपीएफ़ के आईजी डॉक्टर डी आर कार्तिकेयन के नेतृत्व में एक विशेष जाँच दल का गठन किया. कुछ ही महीनो में इस हत्या के आरोप में एलटीटीई को सात सदस्यों को गिरफ़्तार किया गया. मुख्य अभियुक्त शिवरासन और उसके साथियों ने गिरफ़्तार होने से पहले साइनाइड खा लिया.
डॉक्टर कार्तिकेयन ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "आप कह सकते हैं हमारी पहली सफलता थी हरि बाबू के कैमरे से उन दस तस्वीरों का मिलना. हमने आम लोगों से सूचनाएं लेने के लिए अख़बारों में विज्ञापन दिया और एक टॉल फ़्री नंबर भी दिया. हमारे पास कुल तीन चार हज़ार टेलीफ़ोन कॉल आए. हर एक कॉल को गंभीरता से लिया गया. हमने चारों तरफ़ छापे मारने शुरू किए और जल्द ही हमें सफलता मिलनी शुरू हो गई."
"पहले दिन से ही मैं इस काम में 24 घंटे, हफ़्ते के सातों दिन बिना किसी आराम के लगा रहा. मैं रोज़ रात के दो बजे काम के बाद कुछ घंटों की नींद लेने के लिए गेस्ट हाउस पहुंचता था. सारी जाँच तीन महीने में पूरी हो गई लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट्स आने में समय लगा लेकिन हत्या की पहली वर्षगाँठ से पहले हमने अदालत में चार्जशीट दाख़िल कर दी थी."
कुछ दिनों बाद सोनिया गांधी ने इच्छा प्रकट की कि वो नीना गोपाल से मिलना चाहती हैं.
नीना गोपाल ने बताया, "भारतीय दूतावास के लोगों ने दुबई में फ़ोन कर मुझे कहा कि सोनिया जी मुझसे मिलना चाहती हैं. जून के पहले हफ्ते में मैं वहां गई. हम दोनों के लिए बेहद मुश्किल मुलाक़ात थी वो. वो बार-बार एक बात ही पूछ रहीं थी कि अंतिम पलों में राजीव का मूड का कैसा था, उनके अंतिम शब्द क्या थे. मैंने उन्हें बताया कि वह अच्छे मूड में थे, चुनाव में जीत के प्रति उत्साहित थे. वो लगातार रो रही थीं और मेरा हाथ पकड़े हुए थीं. मुझे बाद में पता चला कि उन्होंने जयंती नटराजन से पूछा था कि गल्फ़ न्यूज़ की वो लड़की मीना (नीना की जगह) कहां हैं, जयंती मेरी तरफ आने के लिए मुड़ी थीं, तभी धमाका हुआ."
इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव रहे पीसी एलेक्ज़ेंडर ने अपनी किताब 'माई डेज़ विद इंदिरा गांधी' में लिखा है कि इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ घंटों के भीतर उन्होंने ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट के गलियारे में सोनिया और राजीव को लड़ते हुए देखा था.
राजीव सोनिया को बता रहे थे कि पार्टी चाहती है कि 'मैं प्रधानमंत्री पद की शपथ लूँ'. सोनिया ने कहा हरगिज़ नहीं. 'वो तुम्हें भी मार डालेंगे'. राजीव का जवाब था, 'मेरे पास कोई विकल्प नहीं है. मैं वैसे भी मारा जाऊँगा'.
सात वर्ष बाद राजीव के बोले वो शब्द सही सिद्ध हुए थे.

HAPPY MOTHER'S DAY!

    


माँ के बारे में क्या लिखूं.......
माँ ने खुद मुझे लिखा।
 कब, कैसे और क्यों शुरू हुआ मदर्स डे