Shamsher ALI Siddiquee

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12 अगस्त को रात नहीं होगी, बस एक बहुत बड़े झूठ से परदा उठेगा!

    


ज्ञानचक्षु खोलने का जिम्मा अब गुरुघंटालों की बजाय व्हाट्सऐप ग्रुप्स ने लिया हुआ है. जिसको आगे बढ़ाने का काम कुछ हमारी बिरादरी के लोग यानी मीडिया वाले करते हैं. नोट में चिप, लड़के की गूगल में नौकरी और चोटी कटवा आदि उदाहरण. वैसा ही एक ज्ञान ये भी है कि “12 अगस्त को रात नहीं होगी.” व्हाट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर सब पर ये बात फैल चुकी है. लेकिन 12 अगस्त को रात होगी और उस रात में दिन जैसा क्या होगा, ये अफवाह कैसी है ये सब बताते हैं.



अखबारों तक में छपी अफवाह

आदमी भरोसा कैसा न करे. जब लिखित में दिया गया उधार पक्का होता है तो क्या अखबार पक्का नहीं होगा. तो सोशल मीडिया पर ये वाली अखबारों की कटिंग वायरल हुईं जिनके बाद लोगों को पता चला कि इस 12 अगस्त को रात नहीं होगी.
साथ में नासा का हवाला भी दिया गया. हमारे यहां नासा और यूनेस्को को लोग नारको टेस्ट से भी ज्यादा सीरियसली लेते हैं. नासा की असली रिपोर्ट ये है.

क्या होगा 12 अगस्त की रात

दरअसल जो यूनीक सा कुछ होने वाला है वो सिर्फ 12 को नहीं बल्कि 10-11-12 तीन रातों तक होगा. बस ये है कि 12 अगस्त को पूरी रात और सबसे ज्यादा होगा. होना ये है कि मीटियर शॉवर होगा. इसे हिंदी में उल्का की बारिश कहते हैं. ढेर साले उल्का पिंड टूटकर इधर उधर बिखर जाएंगे. उनमें तेज चमकदार रोशनी होगी तो नीला आसमान भी दिखेगा. लेकिन वो दिन जैसी रोशनी नहीं होगी. इतना उजाला नहीं होगा कि उसमें शादी, मुंडन तेरहवीं जैसे प्रोग्राम निपटा लो. ये जैसे होता है, आप वीडियो में देख सकते हैं.

96 सालों में पहली बार?

ये पूरी तरह झूठ है. ये मीटियर शॉवर यानी उल्का बारिश हर साल होती है वो भी एक नहीं तीन तीन बार. एक बार जनवरी में, फिर अगस्त में और लास्ट जनवरी में. नासा ने ये बताया है कि इस बार की उल्का बारिश हर बार से ज्यादा होगी लेकिन ऐसा नहीं है कि हजारों सालों में ऐसा कभी हुआ ही नहीं.
खैर इस अफवाह को भूल जाओ और हम बताते हैं कुछ खास देशों के बारे में जहां वाकई कई दिनों और कभी कभी कई महीनों तक रात नहीं होती. जैसे नॉर्वे. इसे मिडनाइट कंट्री कहते हैं. यहां मई से जुलाई के बीच तकरीबन 76 दिन सूरज नहीं ढलता.
स्वीडन का भी यही हाल है, वहां मई से अगस्त तक 100 दिनों तक सूर्यास्त नहीं होता. उसके बाद आधी रात को ढलता है फिर सुबह साढ़े चार बजे निकल आता है. आइसलैंड में भी मई जून जुलाई यही हाल रहता है. यही सिस्टम अलास्का में है. कनाडा में लगभग पूरे साल बर्फ पड़ती है. लेकिन नॉर्थ वेस्ट में 50 दिनों तक सूरज नहीं डूबता. फिनलैंड का नाम तो सुना ही होगा. वहीं जहां की कंपनी नोकिया थी. गर्मी के मौसम में इस देश में 73 दिन तक सूरज नहीं डूबता.

फ्रेंडशिप डे: आख़िर क्या हैं इस दिन के मायने!

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दोस्त ना मिल सकें वो शोहरतों- सामाँ ना हो  द्वारिका क्या है जहां कोई सुदामा ना हो  बात करो रूठे यारों से! सन्नाटे से डर जाते है.......प्यार अकेला ही ज़ी सकता है.... दोस्त अकेले मर जाते हैं!

 Friendship Day

  दोस्ती दुनिया का सबसे हसीन रिश्ता
है। एक सच्चा दोस्त हमारी जिंदगी को
नई राह दे सकता है। लेकिन अक्सर हम
लोग छोटी - छोटी गलतियों या भूलों की
वजह से अपना बेशकीमती दोस्त खो देते हैं।
आज फ्रेंडशिप डे के मौके पर हम आपको बता रहे हैं ऐसी ही चंद भूलों के बारे में , जिनसे आपको बचना
चाहिए। पूरी जानकारी शमशेर अली से...



 फ्रेंडशिप डे यानि दोस्ती का दिन. अब भला आप सोचेंगे कि आखिर यह दोस्ती के दिन को लोग इतना महत्व क्यूं देते हैं. भारत में तो हर दिन हर शाम लोगों को दोस्तों का साथ मिलता है. दरअसल
फ्रेंडशिप डे पश्चिमी सभ्यता की सोच और मांग है जहां के एकल जीवन में अकसर दोस्तों का महत्व बेहद कम हो जाता है.
भारत में तो प्राचीन सभ्यता से ही दोस्ती की कई मिसालें देखने को मिलती हैं. राम ने दोस्ती के वास्ते ही सुग्रीव की मदद की थी,
कृष्ण और सुदामा की दोस्ती की मिसाल तो जमाना आदि काल से देता आ रहा है. पश्चिम की तुलना में भारत में दोस्ती व्यापक पैमाने पर फैली हुई है. यहां समाज में लोग ज्यादा घुलमिल कर रहते हैं.


फ्रेंडशिप डे की शुरुआत

व्यक्ति के जीवन में दोस्तों की अहमियत को समझते हुए और दोस्तों के प्रति आभार और सम्मान व्यक्त करने के उद्देश्य से अमेरिकी कांग्रेस ने सन 1935 में फ्रेंडशिप डे मनाने की घोषणा कर दी थी. अमेरिकी कांग्रेस के इस घोषणा के बाद हर राष्ट्र में अलग-अलग दिन फ्रेंडशिप डे मनाया जाने लगा.
भारत में यह हर वर्ष अगस्त माह के पहले रविवार को मनाया जाता है. सन 2011 से संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस दिन को एकरूपता देने और पहले से अधिक हर्षोल्लास से मनाने के उद्देश्य से 30 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय फ्रेंडशिप डे घोषित कर दिया है. लेकिन इसके बावजूद इस वर्ष अधिकतर देशों में फ्रेंडशिप डे 06 अगस्त को मनाया जाता है यानि अगस्त के पहले रविवार को.
दोस्ती का एक रिश्ता ऐसा है जो हम बनाते हैं. दोस्त से हम अपने दिल की सारी बातें कह सकते है. प्रेम, विश्वास और आपसी समझदारी के इस रिश्ते को दोस्ती कहते हैं. दोस्ती का रिश्ता जात-पांत, लिंग भेद तथा देशकाल की सीमाओं को नहीं जानता. पर इन सबके बावजूद हमारे समाज में एक लड़का और एक लड़की की दोस्ती को लेकर अकसर सवाल खड़े किए जाते हैं. एक लड़के और लड़की की दोस्ती को सहजता से लेने की बजाय उन पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है.
एल लड़के और लड़की की दोस्ती पर प्रश्न उठाने वालों को अकसर यह डर सताता है कि कहीं दोनों प्यार ना कर बैठें, वह प्यार जिसे चाहते तो सभी हैं लेकिन जब यही प्यार कोई अपना कर ले तौबा-तौबा करने लगते हैं.
आज फ्रेंडशिप डे के दिन हम उम्मीद करते हैं समाज अपनी विचारधारा में बदलाव करेगा और संसार में दोस्ती की नई बयार बहेगी.
30 जुलाई को होता है इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे
दुनियाभर के अलग-अलग देशों में फ्रेंडशिप डे अलग-अलग दिन मनाया जाता है। 27 अप्रैल 2011 को संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा ने 30 जुलाई को आधिकारिक तौर पर इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे घोषित किया था। हालांकि भारत सहित कई दक्षिण एशियाई देशों में अगस्त के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है। ओहायो के ओर्बलिन में 8 अप्रैल को फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है।


इन 25 यारों से उपरवाला बचाए
सर्वज्ञानी: आपने आखिरी बार अपनी बात ऐसे दोस्त के सामने कब सही साबित किया था? याद नहीं है न? ऐसे दोस्तों को तो जरूर याद कर रहे होंगे आप।

म्यूजिक के ज्ञानी: ऐसे दोस्त, जो हर सिचुएशन में आपके लिए बढ़िया गाना सुझाते हैं, और कहते हैं-इसे सुन। मस्त हो जाएगा।

आंखों में फटाफट आंसू लाने वाले दोस्त: हमारे फ्रेंड सर्कल में कोई न कोई ऐसा दोस्त जरूर होता है, जो बात बात पर इमोशनल हो जाता है। कई बार तो वो आपको रुला भी देता है।

मोटिवेट करने वाला दोस्त: जब आपका समय खराब चल रहा हो, तभी दोस्त आकर कहे कि अबे, ये काम तो हमने कर लिया, तुम्हारे लिए तो छोटी बात है। परेशान मत हो, काम हो जाएगा। ऐसे खास दोस्तों के लिए ही फ्रेंडशिप डे बना है।

हमेशा भरोसा दिलाने वाला दोस्त: आप जब भी कभी खुद को अकेला महसूस कर रहे हों, तो ऐसे दोस्त आपको हमेशा हंसाने की कोशिश करते रहते हैं। आप उनके रहते कभी खुद को अकेला महसूस कर ही नहीं सकते।

कॉमन फ्रेंड: एक ही लड़की पर दो के दोनों दोस्तों का फ्लैट हो जाना। पर, नजरअंदाज करते हुए एक-दूसरे से उसके बारे में इन्फॉमेशन निकलवाना। ऐसे दोस्त हर किसी की लाइफ में जरूर होते हैं।

असली दोस्त: ऐसे दोस्त, जो हमेशा काम आते हैं। हर जरूरत में साथ खड़े होते हैं।

जीत की खुशी दिलाने वाला दोस्त: जब आप कोई काम कर रहे हों, या मुश्किल के दौर से गुजर रहे हों। तब आपकी जीत पर सबसे पहले बधाई देने वाला दोस्त आपका सच्चा दोस्त होता है। जीत मिलते ही वो दोस्त गले से लगा लेता है।

बात बात पर नुक्श निकालने वाला दोस्त: सबकी लाइफ में कोई न कोई ऐसा दोस्त होता है, जो हर बात में टांग खींचता है। आपकी हर बात को काटता है।

हमेशा दोस्ती पर अफसोस जाहिर करने वाला दोस्त: छोटी मोटी बात पर ये कहना कि तुझसे दोस्ती करके गलती कर दी। याद आया ऐसा कोई दोस्त?

आपको कभी न समझ पाने वाला दोस्त: ऐसे भी दोस्त खास होते हैं। जो हर बात पे कहते हैं, अरे-मुझे लगता था कि ये काम तुम कर ही नहीं पाओगे।

इमोशनल अत्याचारी दोस्त: जी हां, काम करो तो ठीक है। नहीं करो, तो आगे से बात मत करना वाले दोस्त। ऐसे दोस्तों का खूब मजाक भी उड़ता है। अक्सर फ्रेंड सर्कल में ऐसे दोस्तों को नौटंकी बोला जाता है।

चौंक जाने वाले दोस्त: आप कोई काम कर रहे हों, और वो हो जाने पर जो दोस्त चौंक कर कहते हैं कि अरे, ये काम हो गया? दरअसल, उन्हें भरोसा ही नहीं होता कि ये काम आप कर भी सकते हैं। ऐसे भी दोस्त हमारे सर्कल में होते ही होते हैं।

भुलक्कड़ दोस्त: ऐसे दोस्त, जो आपका जन्मदिन तक भूल जाएं। और फिर कहें कि याद क्यों नहीं दिलाया। आगे बोलें कि सॉरी यार, मुझे कुछ याद ही नहीं रहता। याद आई ऐसे बदमाश दोस्त की?

क्या सोचा था, क्या निकले: ऐसे भी दोस्त आपकी लाइफ में होते हैं, जो छोटी सी गलती होते ही चीखते हैं। और फिर कहते है कि तुझे अच्छा समझा था, पर तू तो धोखेबाज निकला।

सबसे अलग और सबसे खास दोस्त: आपके सबसे करीब वाला दोस्त। जो हर बात में आपकी अहमियत जताता हो।

सच्चे प्यार पर यकीन करने वाला दोस्त: याद करें, आपकी फ्रेंड सर्कल में कोई न कोई मजनू निकल ही आएगा। और अगर आप किसी को पसंद करते हैं, तो ये कहकर वो आपको बचाएगा कि सच्चा प्यार होगा, तो जरूर मिलेगा।

सीक्रेट क्रश: जी हां, आपके फ्रेंड सर्कल में कोई ऐसा भी होता है, जो मन से तो आपको चाहता है। पर कभी कहता नहीं। ऐसे दोस्तों के राज काफी समय बाद खुलते हैं।

कही भी खाने का मौका ढूंढने वाले दोस्त: याद करिए, हॉस्टल लाइफ में आप किन दोस्तों के साथ बिन बुलाए ही शादी-पार्टियों में घुस जाते थे?

पागल दोस्त: अगर आप किसी पार्टी में गए हों, और वापस लौटते ही दोस्त सवाल पूछे। कोई मिली क्या? ऐसे दोस्त तो होंगे ही आपके पास।

इंस्पायर्ड करने वाला दोस्त: अरे, उसे देख न। कल तक लफंगई करता था, आज कहां पहुंच गया। अब से हम सभी मेहनत करेंगे और उसके जैसा बनेंगे। ऐसा कहने वाले दोस्त भी सबकी लाइफ में होते हैं।

फिलॉसफी झाड़ने वाले दोस्त: हर बात का कोई न कोई लॉजिक निकाल देने वाले दोस्त भी लाइफ में होते हैं। इनके बिना लाइफ बोरियत लगने लगती है।

आपको अपनी ओर खींचने वाले दोस्त: ऐसे भी दोस्त हर किसी की लाइफ में होते होंगे, जिनके पास आप हमेशा न भी जाना चाहें, तो वे आपको खींच ही लाते हैं।

आपकी गलती निकालने वाला दोस्त: आप कोई भी काम कितने ही सही ढंग से न कर लें। पर इस तरह के दोस्त आपकी हर बात में कोई न कोई गलती निकाल ही देते हैं।
असली दोस्त: ऐसे दोस्त, जो हमेशा काम आते हैं। हर जरूरत में साथ खड़े होते हैं।

दोस्ती में 10 भूलें
सुनना नहीं , सलाह देना
दोस्ती की नींव है बातचीत , लेकिन

ध्यान रखें कि इस बातचीत में जितना

जरूरी अपनी बात सामनेवाले को सुनाना

है , उससे ज्यादा जरूरी है उसकी बात
सुनना। दोस्त को बिना टोके अपनी बात

पूरी करने दें। खुद भी अपने बारे में जो भी
बताएं , पूरी ईमानदारी और खुलेपन के
साथ। साथ ही , लोग दोस्त की बात
सुनकर उसे सलाह देने लगते हैं। यह सही
नहीं है। अक्सर सामने वाला सिर्फ आपसे
बातें शेयर कर रहा होता है। वह आपसे
सलाह नहीं चाहता। इसलिए जब तक
आपका दोस्त आपसे सलाह न मांगे , आप
सलाह न दें। दोस्तों के बीच बहस भी खूब
होती है। पारिवारिक रिश्तों में हम
जिस तरह खुलकर बातें नहीं कर पाते ,
दोस्ती में वह छूट हमारे पास होती है ,
लेकिन यहां भी लिमिट ध्यान रखें और
आपसी बहस को हेल्दी डिबेट तक ही रखें।
अपनी बात को साबित करने के लिए दोस्त
को हर्ट करने की कोशिश न करें।


बदलने की कोशिश
हम किसी से दोस्ती अक्सर उसकी किसी
खासियत से इम्प्रेस होकर करते हैं। ऐसे में
हम सिर्फ उसकी पॉजिटिव चीजें देख रहे
होते हैं। लेकिन वक्त के साथ उसकी
खामियां भी नजर आने लगती हैं , बल्कि कई
बार हम उन्हीं पर फोकस करने लगते हैं।
जान लें कि दुनिया में कोई भी परफेक्ट
नहीं है। आप भी नहीं। फिर दूसरे से ऐसा
होने की उम्मीद क्यों ? हमें अपने दोस्त को
उसकी कमियों और कमजोरियों के साथ
स्वीकार करना चाहिए। साथ ही , उसकी
निंदा न करें। आलोचना तो अक्सर
परिवार वाले भी करते हैं। दोस्ती का तो
मतलब ही है कि जैसा है , उसे वैसे ही
स्वीकार करें और बदलने की कोशिश न करें।
अगर दोस्त की कोई बात पसंद नहीं आती
तो उस पर ध्यान लगाने की बजाय उसे
इग्नोर करें। इससे आपका मन भी शांत
रहेगा और रिश्ता भी कायम रहेगा। यहां
यह भी जरूरी है कि हम दोस्ती के साथ -
साथ दोस्त की भी कद्र करें।


सुख में साथ , दुख में दूर
दोस्ती का मतलब लोग मौज - मस्ती ,
पार्टी , सेलिब्रेशन ही समझते हैं। यह
गलत है। अगर आप सच्चे दोस्त हैं तो अपने
दोस्त की खुशी में शरीक न भी हो पाएं ,
लेकिन उसके गम का हिस्सा जरूर बनेंगे।
अगर वह तकलीफ में है और आपसे कुछ शेयर
करता है तो आप उसे महसूस करें। सिर्फ
हमदर्दी के कुछ बोल बोलकर अपना काम
खत्म न समझें , उसकी मदद करें। कहा भी
जाता है कि असली दोस्ती की परख
मुसीबत में ही होती है। अगर वह आपसे कुछ
शेयर नहीं करना चाहता तो पूछने की
कोशिश जरूर करें ताकि उसका मन हल्का
हो सके लेकिन कुरेद - कुरेद कर कभी न पूछें।
लेकिन अगर आपको लगता है कि आपका
दोस्त किसी गलत राह पर जा रहा है तो
उसे समझा - बुझाकर उधर जाने से जरूर
रोकें। आमतौर पर लोग दोस्तों की बातें
सुनते और मानते हैं। यह न सोचें कि इससे
दोस्ती खतरे में पड़ जाएगी। समझ आने पर
आपका दोस्त आपके और करीब आ जाएगा।


बांध कर रखना
अपने दोस्त को कभी भी बांधने की कोशिश
न करें। यह न सोचें कि वह हमेशा सिर्फ
मेरा ही दोस्त बना रहेगा। अपने दोस्त
की लिमिटेशन को समझें और उम्मीदों को
सच की कसौटी पर आंकें। मानें कि उसका
भी परिवार है , दूसरे दोस्त हैं , ऑफिस है ,
उन तमाम चीजों के लिए उसे वक्त चाहिए।
यह सोचने की बजाय कि वह आपसे मिला
नहीं , सोचें कि हो सकता है कि वह वाकई
बिजी हो। दोस्ती में सामनेवाले को स्पेस
देना बहुत जरूरी है। रिश्ते में एक सेफ
फासला देना चाहिए। अगर आप दोस्त को
वक्त - बेवक्त डिस्टर्ब करते रहेंगे तो यह
आपकी दोस्ती को डिस्टर्ब कर सकता है।
अपनी दोस्ती की तुलना अपने या दोस्त के
बाकी दोस्तों से न करें। दोस्त और उसके
दोस्तों से किसी भी चीज को लेकर जलन न
करें। अगर मन में कोई बात आती है तो उसे
दिल खोलकर दोस्त के साथ शेयर कर लें ,
पर उसे ऐसा न लगे कि आपकी निगाह
उसकी किसी चीज पर है।


भावनाएं न जताना
किसी भी रिश्ते में इजहार बहुत जरूरी है।
दोस्ती पर भी यह बात लागू होती है।
इसका मतलब यह नहीं कि आप हर वक्त
सामनेवाले को जताते रहें कि आप उसकी
कितनी कद करते हैं लेकिन बीच - बीच में ,
खासकर उसकी जिंदगी के खास मौकों
मसलन जन्मदिन , शादी की सालगिरह
आदि पर ऐसा करने का मौका न चूकें। इन
मौकों के अलावा बीच - बीच में भी दोस्तों
को कोई सरप्राइज देना चाहिए। उसे
अच्छा लगेगा। इसी तरह अगर दोस्त से
कोई वादा किया है , तो उसे जरूर पूरा
करें। यहां यह ध्यान रखना भी जरूरी है
कि इमोशनल डिस्प्ले जरूरत से ज्यादा न
हो। दोस्त से अपनी बातें ईमानदारी से
शेयर करना जरूरी है , लेकिन ध्यान रखें कि
आप हमेशा अपनी परेशानियों और तकलीफों
का रोना ही न रोते रहें। भावनाओं का
इजहार करते वक्त भी बैलेंस्ड होना जरूरी
है।


अपनी मर्जी चलाना
अक्सर हम दोस्त की पसंद - नापसंद को
नजरअंदाज कर देते हैं। दोस्तों के बीच
कॉमन इंट्रेस्ट शेयर करना बहुत जरूरी है।
ध्यान रखें कि दोस्त के साथ छुट्टियां या
फिल्म आदि प्लान करते वक्त उसकी पसंद -
नापसंद का भी ध्यान रखें। उससे पूछें कि
उसे क्या पसंद है और क्या नापसंद। कभी
उसकी पसंद की जगह पर जाएं , कभी आपकी
पसंद पर। बातचीत में भी सामनेवाली की
पसंद के ठीक उलट टॉपिक पर बार - बार
चर्चा से बचें , वरना आपका साथ उसके लिए
बोरिंग साबित होगा। दोस्ती में पैसा
भी काफी मायने रखता है। अक्सर एक ही
हैसियत के लोगों में दोस्ती होती है।
हालांकि इसके अपवाद भी मिलते हैं ,
लेकिन पैसे को लेकर नजरिया जरूर मायने
रखता है। ध्यान रखें कि ऐसा न हो कि
कोई एक ही खर्च करता रहे और दूसरा
चुपचाप बैठा रहे।


मतभेद को मनभेद बनाना
कॉमन फ्रेंड्स में या किसी से भी अपने
दोस्त की बुराई न करें। आमतौर पर लोग
दूसरे से कोई बात शेयर करते हुए कहते हैं कि
किसी से न कहना लेकिन वे भूल जाते हैं कि
सामनेवाला भी इस बात को दूसरे से शेयर
करते हुए यही करेगा। इस तरह एक की
कही बात पूरे सर्कल में फैल जाती है।
कॉमन दोस्तों के बीच कही कोई बात
अक्सर दोस्ती के लिए दरार साबित
होती है। दोस्त को लेकर कोई गलतफहमी
हो गई है , तो उसे गांठ न बनाएं। उस मसले
पर डिस्कस करके हल कर लें। अपनी बात
कहने के साथ - साथ दूसरे को भी अपनी
बात कहने का मौका दें। आपसी दिक्कत को
हल करने के लिए किसी तीसरे की मदद न
लें। खुद ही हल निकालें। किसी भी रिश्ते
में ट्रांसपैरंसी बहुत जरूरी है। इसी तरह ,
दोस्त की कोई बात बुरी लगी तो उसे
माफ करना सीखें।


फैमिली से न घुलना
शादी के बाद कई बार अच्छे दोस्तों की
दोस्ती भी खत्म हो जाती है। इससे
निपटने के लिए दो चीजें जरूरी हैं। सबसे
पहले आप अपने दोस्त को छूट दें कि वह
अपनी नई लाइफ में थोड़ा बिजी हो
सकता है। उसकी जिम्मेदारियां बढ़ गई
हैं। नए रिश्तों में एडजस्टमेंट के लिए वक्त
की जरूरत होती है। ऐसे में आप आगे बढ़कर
दोस्त के साथ कॉन्टैक्ट कर लें। अपने दोस्त
के पार्टनर व बच्चों आदि के साथ भी
रिश्ता बढ़ाने की कोशिश करें। इससे
दोस्ती भी बनी रहेगी और मजा भी
ज्यादा आएगा। अगर आपका पार्टनर आपके
दोस्त के साथ रिश्ता न रखना चाहता हो
तो उसे मजबूर न करें। स्वीकार करें कि
उसकी अपनी पसंद - नापसंद है , उसका
अपना दोस्तों का सर्कल है लेकिन अपनी
दोस्ती की अहमियत उसे बताएं और अपने
दम पर रिश्ते को बनाए रखें।


वर्चुअल दोस्ती में बिजी
यह सही है कि आजकल हर कोई बिजी है।
ऐसे में लंबे वक्त तक लोग सोशल नेटवर्किंग
साइट या फोन के जरिए ही दोस्तों के टच
में रहते हैं। अक्सर उन्हें लगता है कि
दोस्ती के लिए हमेशा मिलना - जुलना
जरूरी थोड़े ही है। यह बात काफी हद तक
सही भी है लेकिन पूरी तरह नहीं। आपस में
मिलने - जुलने और पर्सनल टच बनाए रखने से
रिश्ते मजबूत होते हैं। जितना वक्त आप
वर्चुअल दुनिया में देते हैं , अगर उसमें से कुछ
वक्त निकालकर सामने जाकर मिलेंगे तो
दोस्त के साथ का मजा भी लेंगे और रिश्ते
भी मजबूत होंगे। अब यह मिलना - जुलना
बेशक कुछ दिनों या महीने में ही क्यों न हो
, पर ऐसा करना आपके रिश्ते को नई
ताजगी से भर देगा।


नाप - तोल करना

दोस्ती में कभी भी स्वार्थी न बनें। यह न
सोचें कि इस दोस्ती से मुझे फलां फायदा
होगा। इससे आनेवाले वक्त में आपको तो
झटका लगेगा ही , असलियत पता लगने पर
आप एक अच्छा दोस्त भी खो देंगे। दोस्ती
में नाप - तोल न करें। यह न सोचें कि उसने
मेरे लिए जो किया , मैं भी उतना ही करूं।
वह मेरे घर नहीं आया तो मैं ही क्यों जाऊं ?
उसने कॉल नहीं किया तो मैं क्यों करूं ?
दोस्ती आपने इसलिए की कि आपको फलां
शख्स पसंद है तो फिर एक कदम आगे बढ़ाने में
आपको संकोच क्यों ? दोस्त के लिए कुछ
करके आपको भी खुशी मिलेगी और दोस्त को
भी , फिर नाप - तोल क्यों ? इसी तरह
अगर कोई दोस्त आपसे ज्यादा कॉन्टैक्ट
नहीं कर पा रहा तो यह न सोचें कि वह
आपसे दोस्ती नहीं रखना चाहिए , यानी
मन में खुद ही कुछ न गढ़ लें।


अकबर के सामने कहाँ टिकते हैं महाराणा प्रताप?

    


राजस्थान यूनिवर्सिटी ने एक बीजेपी विधायक के उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है जिसमें उन्होंने कहा था कि यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रमों यह लिखा जाए कि हल्दी घाटी की लड़ाई अकबर ने नहीं, बल्कि महाराणा प्रताप ने जीती थी.
राजस्थान में यूनिवर्सिटी के साथ स्कूलों में भी बच्चों को यही पढ़ाया जाएगा.
अभी हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि इतिहासकारों ने महाराणा प्रताप के साथ नाइंसाफी की है. उन्होंने कहा था कि अक़बर को द ग्रेट कहा जाता है लेकिन महाराणा प्रताप को महान क्यों नहीं कहा जाता है. राजनाथ सिंह ने कहा था कि महाराणा प्रताप राष्ट्रनायक थे.

अक़बर बाहरी आक्रांता थे?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कहा कि अकबर आक्रांता था और असली हीरो महाराणा प्रताप हैं. योगी ने कहा युवा जितनी जल्दी इस सच को स्वीकार कर लेंगे उतनी जल्दी देश को सारी समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा.
क्या हमारी सरकारें इतिहास को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़कर लिखवा रही हैं? क्या अक़बर आक्रांता थे? क्या महाराणा प्रताप अकबर से ज़्यादा महान थे? क्या हल्दी घाटी में अकबर की हार हुई थी? क्या अकबर और महाराणा प्रताप का संघर्ष हिंदुओं और मुसलमानों का संघर्ष था?

आईये जानते हैं विस्तार से इतिहासकारों की क्या राय है इसपर....

जॉर्ज ऑरवेल ने अपने उपन्यास 1984 में लिखा है कि जिसका वर्तमान पर नियंत्रण होता है उसी का अतीत पर भी नियंत्रण होता है. इसका मतलब यह हुआ कि अतीत को आप जैसा चाहें, वैसा तोड़-मरोड़ कर उल्टा-सीधा बना सकते हैं, क्योंकि वर्तमान में आपको इसकी ज़रूरत पड़ती है. वो तो एक उपन्यास की बात है लेकिन हमारे में देश में यही सच होता दिख रहा है.

इतिहास से छेड़छाड़

आज की तारीख़ में इनकी ज़रूरत यही है कि वो अपने मन का इतिहास पढ़ाएं. मतलब राजस्थान में उनको ऐसी ज़रूरत थी तो कर दिया. आने वाले दिनों में देश अन्य हिस्सों में भी ऐसा देखने को मिल सकता है. इतिहास को यहां हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.
इतिहास के तथ्यों से इन्हें कोई मतलब नहीं है. इनकी राजनीतिक ज़रूरतें झूठ से पूरी होती है तो वो झूठ को ही सच कहेंगे. ऐतिहासिक तथ्य तो यही है कि हल्दी घाटी में महाराणा प्रताप हारे थे. इस हार के बाद वो अपने चेतक घोड़े के साथ निकल गए थे. हल्दी घाटी के बाद उन्होंने बड़ी मुश्किल से जीवन व्यतीत किया. उन्होंने काफ़ी मुश्किलें झेली थीं लेकिन यह सच है कि वह अकबर से हल्दी घाटी की लड़ाई हारे थे.
मैं हल्दी घाटी जा चुका हूँ. मेरा उस मैदान को देखने का मन था जिसमें इतना प्रसिद्ध युद्ध हुआ था. मैं जानना चाहता था कि कितना बड़ा मैदान है. वो छोटा सा मैदान है. मेरा ख्याल है कि तीन या चार फुटबॉल मैदान के बराबर का वह मैदान है. ज़ाहिर सी बात है कि उसमें हज़ारों और लाखों की तादाद में सिपाही नहीं आ सकते हैं.

महाराणा प्रताप कितने महान?

मतलब वहां पर बहुत बड़ी लड़ाई नहीं हुई थी. दूसरी बात यह है कि महाराणा प्रताप लगभग अकेले राजपूत शासक थे जिन्होंने अक़बर के सामने समर्पण नहीं किया. इस लड़ाई का कोई विशेष ऐतिहासिक महत्व नहीं था. 16वीं, 17वीं और 18वीं सदी में इस बात का महत्व न इस तरफ़ से था, न उस तरफ़ से था.
हालांकि लोकप्रिय कल्पनाओं में महाराणा प्रताप को एक हीरो की तरह से देखा गया. और देखा जाना भी चाहिए था क्योंकि वो अकेले राजपूत थे जिन्होंने घुटने नहीं टेके और आख़िरी दम तक लड़ते रहे. एक हीरो की तरह उनको याद किया गया. हम सभी जानते हैं कि नायकों को लेकर सबकी अपनी-अपनी यादें होती हैं.
दिक़्क़त यहां है कि महाराणा प्रताप को जो पोशाक पहनाई जा रही है कि उन्होंने भारत की सुरक्षा में विदेशियों से टक्कर ली और वो एक राष्ट्रीय हीरो थे, जिसने राष्ट्र की गरिमा के लिए लड़ाइयां लड़ीं, ये सच नहीं है. देश की कल्पना न केवल भारत में बल्कि संसार भर में 18वीं और 19वीं शताब्दी में आई है.
अंग्रेज़ी में देश को कंट्री कहते हैं लेकिन कंट्री क्या देश को कहा जाता था? कंट्री तो गांव को कहा जाता है. जो लंदन में बड़े-बड़े लोग रहते हैं उनके लिए कंट्री हाउस होता है. कंट्री का मतलब देश नहीं है. यह केवल अंग्रेज़ी में ही नहीं बल्कि फ्रेंच में भी ऐसा ही है. फ्रेंच में पेई कंट्री को कहते हैं और पेंजा किसान को कहते हैं.

देश की परिकल्पना

देश का मतलब हमारे यहां भी गांव हैं इसीलिए हम कहते हैं कि परदेस जा रहे हैं. आप पटना से कोलकाता चले गए तो परदेस चले गए. परदेस को लेकर कितनी कविताएं और लोककथाएं मौजूद हैं. देश का मतलब होता है कि जहां आप पैदा हुए हैं. देश और उसके बरक्स जो विदेश की परिकल्पना है ये 18वीं और 19वीं सदी की है. 16वीं सदी में देश, विदेश और विदेशी जैसी परिकल्पना कहीं नहीं थी. और राष्ट्र का तो बिल्कुल सवाल ही नहीं था.
ये सारी परिकल्पाएं बाद की हैं और इनका अपना महत्व है. समस्या तब होती है जब आप जब 19वीं सदी की परिकल्पना को 16वीं सदी में बैठा दें तो वैसे ही होगा जैसे हम मान लें कि हल्दी घाटी की लड़ाई में अकबर की फ़ौजें फाइटर प्लेन में बैठकर गई थीं. कोई ऐसा करने की ज़िद करे तो हम इसे बेवकूफी ही कहेंगे.
लेकिन उनको इस बेवकूफी से फ़ायदा हो रहा है और ये बेवकूफी उनकी ज़रूरत है. बीजेपी की वोट बैंक की राजनीति का राजस्थान बेहतरीन उदाहरण है. इतिहास को तोड़-मरोड़ कर लिखवाना केवल राइट विंग को ही रास नहीं आता है, बल्कि सोवियत रूस में ऐसा काम कम्युनिस्टों ने भी किया था.

इतिहास का कॉम्युनिस्ट नज़रिया

सोवियत रूस में जो इतिहास लिखा गया था वो इतना उटपटांग था कि इन्होंने भी जबर्दस्ती एक किस्म की राष्ट्रवादी परिकल्पना डाल दी थी. ऐसी छेड़छाड़ किसी भी तरफ़ से संभव है. हमारे में देश में राइट विंग यह काम इसलिए कर रहा है क्योंकि इसकी बुनियाद स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान ही बन गई थी.
कांग्रेस में हिन्दू और मुस्लिमों के अलग-अलग गुट बनने लगे थे. एक समुदाय के बरक्स दूसके समुदाय के रूप में सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद को जो स्वरूप दिया गया वह हमारे राष्ट्रीय आंदोलन का एक चरित्र था. इसकी छाया इतिहास पर भी पड़ी. ऐसे में जो इतिहास पढ़ा जाता था वो हिन्दू बनाम मुस्लिम होता था. इसे धार्मिक इकाइयों में ही देखा जाता था. 1950 से 1970 के बीच इतिहास लेखन का रूप बदला. ये हिंदू बनाम मुस्लिम को छोड़कर नए वर्ग संघर्ष के रूप में आया जिसे मार्क्सवादी इतिहासकारों ने आगे बढ़ाया.
ये इतिहासकार संख्या में बहुत ज़्यादा नहीं थे. सबसे पहले डीडी कौशांबी, इरफ़ान हबीब, आरएस शर्मा और एआर देसाई जैसे इतिहासकरों ने लेखन को नई करवट दी. इन्होंने इतिहास लेखन का रुख बदल दिया. जहां धार्मिक इकाइयां थीं, वहां इन्होंने वर्ग संघर्ष को स्थापित किया. इससे इतिहास लेखन की प्रक्रिया पूरी तरह से बदल गई. 1980 के मध्य आते-आते ये इकाइयां भी कमज़ोर पड़ने लगीं. एक तो मार्क्सवाद की अपनी भी कमज़ोरियां थीं. नए-नए विषय उभरकर सामने आए जिनकी व्याख्या मार्क्सवाद के पास नहीं थी.

इतिहास लेखन का रुख

जैसे भावनाओं का इतिहास, व्यक्तियों के परस्पर संबंधों का इतिहास, हैबिटाट का इतिहास, पर्यावरण का इतिहास और जेंडर का इतिहास. ऐसे कई विषय आने लगे थे. ऐसे में इतिहास लेखन फिर से घिरा. 1985 आते-आते स्थिति बिल्कुल बदल चुकी थी. यह लेखन हिन्दू-मुस्लिम इकाइयों से बहुत दूर जा चुका था.
एक बदकिस्मती है कि राइट विंग इतिहासकार कोई है नहीं. पहले थे और बहुत अच्छे इतिहासकार थे. इनमें आरसी मजूमदार सबसे बड़ा नाम है. राधाकृष्ण मुखर्जी लखनऊ में थे. इन लोगों ने इतिहास को बिल्कुल हिंदू परिदृश्य में देखा. फिर भी ये बहुत योग्य इतिहासकार थे. उनसे बहस करने में मज़ा आता था. मैं तो उस वक़्त छोटा था इसलिए बहस नहीं कर पाता था लेकिन आरएस शर्मा और इरफ़ान हबीब बहुत तीखी बहस करते थे. आज तो कोई है ही नहीं जिसके साथ बहस की जा सके.
अब इतिहास के मुद्दे बदल चुके हैं. अब फिर से लोग हिंदू बनाम मुस्लिम इतिहास लिखना चाहते हैं जिसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है. लेकिन ये फिर से वहीं वापस जाना चाहते हैं. दरअसल, जेम्स मिल ने भारतीय इतिहास को तीन खांचों में बांटा था. मिल साहब ने ही हमें सिखाया कि भारतीय इतिहास का एक हिंदू काल है, मुस्लिम काल है और ब्रिटिश काल है.

हिन्दू और मुस्लिम इतिहास का सच

लेकिन जेम्स मिल के चश्मे वाले इतिहास को भारतीय इतिहासकारों ने बहुत पीछे छोड़ दिया है. उनको इतिहास इसलिए पसंद नहीं है क्योंकि वो उसमें हिंदू बनाम मुस्लिम की गोटी बैठा नहीं पाते हैं. महाराणा प्रताप का ही उदाहरण लीजिए. ज़ाहिर है वो अपनी फ़ौज के नेता थे लेकिन उनके बाद उनके सबसे बड़े सिपहसालार हाक़िम ख़ान थे, जो कि मुसलमान थे.
अकबर की ओर से राजा मान सिंह थे जो कि हिंदू थे. ऐसे में हम उसे हिंदू बनाम मुसलमान कैसे कर सकते हैं? उस ज़माने में हिंदू बनाम मुस्लिम जैसी कोई बात ही नहीं थी. आप देख रहे हैं कि महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा साथी मुसलमान है और दूसरी ओर हिंदू राजा मान सिंह उनसे लड़ाई लड़ रहे हैं तो आप इसे हिंदू बनाम मुस्लिम कैसे साबित कर देंगे? उस ज़माने में ऐसा नहीं किया गया था.
महाराणा प्रताप उस वक़्त हीरो की तरह थे और वो प्रसिद्ध भी हुए. लोकगीतों और लोकगाथाओं में महाराणा प्रताप की लोकप्रियता काफ़ी है. लेकिन एक हिंदू राष्ट्रवादी ने अपने राष्ट्र की रक्षा करने के लिए एक विदेशी से लड़ाई की, ये परिकल्पना तो थी ही नहीं और इसकी कोई प्रासंगिकता भी नहीं है. ऐसे में उनकी समस्या यह है कि अगर तथ्य उनके साथ नहीं जाते तो तथ्यों को मरोड़ दो और कह दो कि हल्दी घाटी में महाराणा प्रताप जीते थे. बच्चों का क्या, वो तो मान ही लेंगे.

ऐतिहासिक तथ्यों से शर्मिंदगी

कई बार जनमानस में सच को छुपाने और फ़र्ज़ी गौरव को स्थापित करने के लिए सत्य को खंडित किया जाता है. ऐसा करना दोनों को अच्छा लगता है. लोग भी जिस जाति और मजहब से ताल्लुक रखते हैं उन्हें उनकी वीरता की कहानी ज़्यादा भाती है. उस वक़्त इसे एक हिंदू और मुसलमान की लड़ाई के रूप में नहीं देखा गया. वह लड़ाई एक बादशाह और एक वीर की तकरार के रूप में देखी जाती थी.
जिसमें निडर योद्धा की वीरगाथाएं और बादशाह का अपना इतिहास है. मध्यकालीन भारत का एक दिलचस्प तथ्य यह है कि मुगल बादशाहों में या उसके पहले सल्तनतों से राजपूतों की 300 साल तक लड़ाइयां चलती रहीं. कोई किसी से हारा नहीं. जब मुगल आए तो उन्होंने राजपूतों को अपने साथ मिला लिया. अकबर के सबसे बड़े विश्वासपात्र राजा मान सिंह थे.
औरंगजेब के जमाने में जो सबसे ऊंचे मनसबदार थे वो महाराजा जसवंत सिंह और महाराजा जय सिंह थे. मराठे भी भरे हुए थे. उस ज़माने में इसे हिंदू बनाम मुस्लिम कभी नहीं देखा गया. मुगलों में और राजपूतों में लड़ाइयां हुई हैं, मुगलों में और सिखों में हुईं, मुगलों और मराठों में हुई, मुगलों और जाटों में हुई हैं. इन लड़ाइयों में ख़ून-ख़राबा हुआ लेकिन पूरे 550 सालों में जिसको जेम्स मिल ने मुस्लिम शासनकाल कहा था उसमें एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ था.

सेक्युलर स्टेट में ज़्यादा दंगे

पहला दंगा जो हुआ वो 1713-14 में अहमदाबाद में हुआ. यह दंगा होली और एक गाय की हत्या को लेकर हुआ था. औरंगजेब की मृत्यु 1707 में हो चुकी थी उसके 6-7 साल बाद दंगा हुआ. सोचिए, औरंगजेब के जमाने में भी कोई दंगा नहीं हुआ. पूरी 18वीं सदी में महज पांच दंगे हुए थे. मध्यकाल में सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए यानी हिंदू मुसलमान एक दूसरे की गर्दन काटने को आतुर नहीं थे. आज तो हमारा राज्य धर्मनिरपेक्ष है लेकिन देखिए कितने दंगे हो रहे हैं.
मैं इस तथ्य का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं कि उस काल का चरित्र अलग था. 18वीं सदी की शुरुआत में जब मुगल साम्राज्य का पतन शुरू हुआ तो फिर पहचान के लिए गोलबंदी शुरू हुई. मुस्लिम पहचान शाह हबीबुल्लाह ने उभारना शुरू किया कि कट्टर मुसलमान बनना चाहिए. उसका मानना था कि हम जिसे कंपोजिट कल्चर कह रहे थे उसमें बह गए थे और हमें इसका शुद्धीकरण करना चाहिए.
पहचान का निर्माण जो शुरू हुआ वो 18वीं सदी में हुआ है और 19वीं सदी में उसको ख़ास तौर पर बल मिला है. उसके बाद देखा गया कि मुसलमानों की शक्ति का बिल्कुल ख़ात्मा हो चुका था. लेकिन मुसलमानों की शक्ति का ख़त्म होना कहना अतार्किक व्याख्या है. क्या मध्यकाल में शासक मुसलमान थे?
मतलब जो शासक थे वो मुसलमान थे लेकिन ये कहना कि मुस्लिम शासन था या मुस्लिम संप्रदाय का शासन था और हिन्दू संप्रदाय शासित था ये तो अपने आप में बड़ी उल्टी सी बात है. संप्रदाय शासक नहीं होता है. संप्रदाय के एक ऊपर का जो स्तर होता है वो शासक होता है. मुसलमान का पतन हुआ, मुसलमानों की तबाही हुई ये भी अपने आप में एक ग़लत व्याख्या है.

पहचान की राजनीति

लेकिन फिर भी ये पहचान बननी शुरू हो गई थी. 19वीं शताब्दी में और ख़ासकर के बीसवीं शताब्दी में जब स्वतंत्रता की लड़ाई शुरू हुई तो उसमें तो जनभावना धर्म और इलाक़े से परे थी. अभी तक जो मुगलों के साथ जाटों, सिखों, राजपूतों और मराठों की युद्ध होते रहे थे वो एक राजनीतिक और मिलिटरी कॉन्फ्लिक्ट थे. कहने में तो अजीब लगता है लेकिन सच यही है कि सांप्रदायिकता का उदय लोकतंत्र का एक पहलू है. पहले जनता को राजनीति में शामिल नहीं किया जाता था लेकिन लोकतंत्र में जनता सीधे राजनीति में शामिल होने लगी.
अब तक शासक वर्ग हुआ करता था. जब जनता शामिल होती है तो उसमें वह तरह-तरह से शामिल होती है. उनको हिंदू बनाम मुस्लिम शामिल किया जाता है. उनको बंगाली बनाम मराठी शामिल किया जाता है. उनको ग़रीब बनाम अमीर शामिल किया जाता है. उनको हिन्दी बनाम तमिल शामिल किया जाता है. इसमें सबसे बड़ा था हिन्दू बनाम मुस्लिम. कांग्रेस का जो राष्ट्रवादी चरित्र था वो धार्मिक इकइयां ही थीं. मतलब फर्क यह था कि कांग्रेस के लिए हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई और मुस्लिम लीग के लिए दुश्मन. जब देश का लोकतांत्रीकरण शुरू हुआ उसी में ये सारी पहचानें उभरकर सामने आईं.
इसी पहचान के सहारे लोगों को लामबंद किया जाता है. मतलब इस समस्या का लंबा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य है जो कि 19वीं और 20वीं शताब्दी में ये इकाइयां उभरकर आई हैं जिसका परिणाम हम आज देख रहे हैं, और अब यह लोकतंत्र का हिस्सा हो गया. नेहरू का ये विचार था कि आने वाले वक़्त में ये सारी चीज़ें ख़त्म हो जाएंगी लेकिन हुआ इसका उल्टा.


कारगिल विजय दिवस : जरा याद करो कुर्बानी

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‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌’।
(या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा।)

गीता के इसी श्लोक को प्रेरणा मानकर भारत के शूरवीरों ने कारगिल युद्ध में दुश्मन को पाँव पीछे खींचने के लिए मजबूर कर दिया था। 
26 जुलाई 1999 के दिन भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर भारत भूमि को घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इसी की याद में ‘26 जुलाई’ अब हर वर्ष कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हँसते-हँसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन समर्पित है उन्हें, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए बलिदान कर दिया।

कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि : कारगिल युद्ध जो कारगिल संघर्ष के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में मई के महीने में कश्मीर के कारगिल जिले से प्रारंभ हुआ था। 
इस युद्ध का कारण था बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों व पाक समर्थित आतंकवादियों का लाइन ऑफ कंट्रोल यानी भारत-पाकिस्तान की वास्तविक नियंत्रण रेखा के भीतर प्रवेश कर कई महत्वपूर्ण पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लेह-लद्दाख को भारत से जोड़ने वाली सड़क का नियंत्रण हासिल कर सियाचिन-ग्लेशियर पर भारत की स्थिति को कमजोर कर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरा पैदा करना।
पूरे दो महीने से ज्यादा चले इस युद्ध (विदेशी मीडिया ने इस युद्ध को सीमा संघर्ष प्रचारित किया था) में भारतीय थलसेना व वायुसेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे आक्रमणकारियों को मार भगाया था। स्वतंत्रता का अपना ही मूल्य होता है, जो वीरों के रक्त से चुकाया जाता है।


हिमालय से ऊँचा था साहस उनका : इस युद्ध में हमारे लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा शहीद व 1300 से ज्यादा घायल हो गए, जिनमें से अधिकांश अपने जीवन के 30 वसंत भी नही देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है। 
इन रणबाँकुरों ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था। वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्रध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था। 

भारत के वीर सपूत : ‘ये
 दिल माँगे मोर’ - हिमाचलप्रदेश के छोटे से कस्बे पालमपुर के 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के कैप्टन विक्रम बत्रा उन बहादुरों में से एक हैं, जिन्होंने एक के बाद एक कई सामरिक महत्व की चोटियों पर भीषण लड़ाई के बाद फतह हासिल की थी।
यहाँ तक कि पाकिस्तानी लड़ाकों ने भी उनकी बहादुरी को सलाम किया था और उन्हें ‘शेरशाह’ के नाम से नवाजा था। मोर्चे पर डटे इस बहादुर ने अकेले ही कई शत्रुओं को ढेर कर दिया। सामने से होती भीषण गोलीबारी में घायल होने के बावजूद उन्होंने अपनी डेल्टा टुकड़ी के साथ चोटी नं. 4875 पर हमला किया, मगर एक घायल साथी अधिकारी को युद्धक्षेत्र से निकालने के प्रयास में माँ भारती का लाड़ला विक्रम बत्रा 7 जुलाई की सुबह शहीद हो गया। अमर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा को अपने अदम्य साहस व बलिदान के लिए मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैनिक पुरस्कार ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।


17 जाट रेजिमेंट के बहादुर कैप्टन अनुज नायर टाइगर हिल्स सेक्टर की एक महत्वपूर्ण चोटी ‘वन पिंपल’ की लड़ाई में अपने 6 साथियों के शहीद होने के बाद भी मोर्चा सम्भाले रहे। गम्भीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने अतिरिक्त कुमुक आने तक अकेले ही दुश्मनों से लोहा लिया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय सेना इस सामरिक चोटी पर भी वापस कब्जा करने में सफल रही। 
इस वीरता के लिए कैप्टन अनुज को मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े सैनिक सम्मान ‘महावीर चक्र’ से नवाजा गया। 

राजपूताना राइफल्स के मेजर पद्मपाणि आचार्य भी कारगिल में दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए। उनके भाई भी द्रास सेक्टर में इस युद्ध में शामिल थे। उन्हें भी इस वीरता के लिए ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।

1/11 गोरखा राइफल्स के लेफ्टिनेंट मनोज पांडेय की बहादुरी की इबारत आज भी बटालिक सेक्टर के ‘जुबार टॉप’ पर लिखी है। अपनी गोरखा पलटन लेकर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में ‘काली माता की जय’ के नारे के साथ उन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में लड़ते हुए मनोज पांडेय ने दुश्मनों के कई बंकर नष्ट कर दिए। 
गम्भीर रूप से घायल होने के बावजूद मनोज अंतिम क्षण तक लड़ते रहे। भारतीय सेना की ‘साथी को पीछे ना छोडने की परम्परा’ का मरते दम तक पालन करने वाले मनोज पांडेय को उनके शौर्य व बलिदान के लिए मरणोपरांत ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।
भारतीय वायुसेना भी इस युद्ध में जौहर दिखाने में पीछे नहीं रही, टोलोलिंग की दुर्गम पहाडियों में छिपे घुसपैठियों पर हमला करते समय वायुसेना के कई बहादुर अधिकारी व अन्य रैंक भी इस लड़ाई में दुश्मन से लोहा लेते हुए शहीद हुए। 

सबसे पहले कुर्बानी देने वालों में से थे कैप्टन सौरभ कालिया और उनकी पैट्रोलिंग पार्टी के जवान। घोर यातनाओं के बाद भी कैप्टन कालिया ने कोई भी जानकारी दुश्मनों को नहीं दी। 

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा का विमान भी दुश्मन गोलीबारी का शिकार हुआ। अजय का लड़ाकू विमान दुश्मन की गोलीबारी में नष्ट हो गया, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और पैराशूट से उतरते समय भी शत्रुओं पर गोलीबारी जारी रखी और लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। 

फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता इस युद्ध में पाकिस्तान द्वारा युद्धबंदी बनाए गए। 

वीरता और बलिदान की यह फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती। भारतीय सेना के विभिन्न रैंकों के लगभग 30,000 अधिकारी व जवानों ने ऑपरेशन विजय में भाग लिया। 

युद्ध के पश्चात पाकिस्तान ने इस युद्ध के लिए कश्मीरी आतंकवादियों को जिम्मेदार ठहराया था, जबकि यह बात किसी से छिपी नहीं थी कि पाकिस्तान इस पूरी लड़ाई में लिप्त था। बाद में नवाज शरीफ और शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पाक सेना की भूमिका को स्वीकार किया था। यह युद्ध हाल के ऊँचाई पर लड़े जाने वाले विश्व के प्रमुख युद्धों में से एक है। सबसे बड़ी बात यह रही कि दोनों ही देश परमाणु हथियारों से संपन्न हैं। 
पर कोई भी युद्ध हथियारों के बल पर नहीं लड़ा जाता है, युद्ध लड़े जाते हैं साहस, बलिदान, राष्ट्रप्रेम व कर्त्तव्य की भावना से और हमारे भारत में इन जज्बों से भरे युवाओं की कोई कमी नहीं है।

मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने वाले अमर बलिदानी भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर इनकी यादें हमारे दिलों में हमेशा- हमेशा के लिए बसी रहेंगी... 



‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा।

दो महीने तक चला था कारगिल युद्ध


पूरे दो महीने से भी अधिक समय तक चले इस युद्ध में भारतीय थलसेना व वायुसेना ने 'लाइन ऑफ कंट्रोल' पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे आक्रमणकारियों को मार भगाया था। दुश्मन पर मिली 26 जुलाई कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज अगर हम देश की सरहद के बीच सकून और सुरक्षित होने का एहसास कर पा रहे हैं तो वह हमारे वीर सैनिकों की वजह से है।

ऑपरेशन बद्र
1998-99 की सर्दियों में पाकिस्तानी सेना आतंकवादियों की मिलीभगत से नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार कर कारगिल क्षेत्र में भारतीय सीमा में घुस आई। सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण कारगिल पहाडिय़ों पर उन्होंने बेहद सर्दी के दिनों में ही कब्जा जमा लिया। उन्होंने घुसपैठ को ऑपरेशन बद्र नाम दिया।

मकसद
दुश्मन की मंशा कश्मीर को लद्दाख से जोडऩे वाली एकमात्र सड़क एनएच-1 पर कब्जा करने की थी। इससे सियाचिन ग्लेशियर पर भारतीय उपस्थिति पर विपरीत असर पड़ता और उसे कश्मीर की विवादित सीमा के मसले पर बातचीत के लिए विवश होना पड़ता। इसके जरिये पाकिस्तान का मकसद कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीकरण करना भी था।

युद्ध
मई, 1999 में भारतीय सेना को घुसपैठ का पता चलते ही सरकार ने ऑपरेशन विजय की घोषणा की। सेना ने हमला बोल दिया। दो महीने तक दोनों पक्षों में भीषण युद्ध हुआ। कई सैनिक शहीद हुए। पहाड़ की ऊंचाई पर कब्जा जमाने के चलते दुश्मनों को रणनीतिक लाभ मिला लेकिन हमारी सेना के तगड़े प्रहार के चलते जल्दी ही उनके पांव उखड़ गए। एक-एक कर कारगिल की सभी चोटियों पर भारतीय परचम फिर से लहराने लगा। 26 जुलाई, 1999 को विजय की घोषणा हुई।

साजिश
पाकिस्तानी सेना हमेशा अपनी घुसपैठ और युद्ध में शिरकत से इन्कार करती रही लेकिन माना जाता है कि अक्टूबर, 1998 में पाकिस्तानी सेना की कमान संभालने के बाद जनरल परवेज मुशर्रफ ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी किसी भी भूमिका से इन्कार करते हुए मुशर्रफ को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। मुशर्रफ के रिश्तेदार लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) शाहिद अजीज ने अपनी किताब 'ये खामोशी कहां तक' और पाकिस्तान सेना में कर्नल रहे अशफाक हुसैन ने भी अपनी किताब 'विटनेस टू ब्लंडर-कारगिल स्टोरी अनफोल्ड्स' में मुशर्रफ की कुटिल चालों और उनके झूठ को बेनकाब करते हुए कहा है कि उस युद्ध में पाकिस्तान सेना ने भी हिस्सा लिया था।

कारगिल जंग
मई-जुलाई 1999
नुकसान (भारतीय आधिकारिक आंकड़े)
  • शहीद-527
  • घायल-1363
  • युद्धबंदी-1
  • लड़ाकू विमान गिराया गया-1
  • लड़ाकू विमान क्रैश-1
  • हेलीकाप्टर मार गिराया-1
पाकिस्तानी आधिकारिक आंकड़े
  • मारे गए सैनिक-357-453
  • घायल-665 से अधिक
  • युद्धबंदी-8

कैसे आगाज से अंजाम तक पहुंचा कारगिल युद्ध
  • 3 मई- स्थानीय गड़रियों ने कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ की सूचना दी।
  • 5 मई- भारतीय सेना का गश्ती दल भेजा गया। पांच भारतीय सैनिकों को बंधक बनाकर यातनाएं देकर मार दिया गया।
  • 9 मई- पाकिस्तानी सेना की भारी गोलीबारी में कारगिल में रखे भारतीय गोला-बारुद तबाह हुए।
  • 10 मई- द्रास, काकसर और मुश्कोह सेक्टरों में सबसे पहले घुसपैठ का पता चला।
  • मध्य मई- कारगिल सेक्टर में भारतीय सेना का जमावड़ा।
  • 26 मई- घुसपैठियों पर भारतीय वायुसेना (आइएएफ) ने हमला बोला।
  • 27 मई- आइएएफ के दो लड़ाकू विमान मार गिराए गए। फ्लाइट लेफ्टिनेंच नचिकेता को युद्धबंदी बनाया गया।
  • 28 मई- पाकिस्तान ने आइएएफ एमआइ-17 को मार गिराया। चालक दल के चार सदस्य मारे गए।
  • 1 जून- पाकिस्तान ने एनएच-1 पर बम बरसाने शुरू किए।
  • 5 जून- तीन पाकिस्तानी सैनिकों से मिले कागजात को भारतीय सेना ने जारी किए। ये पाकिस्तानी के शामिल होने की कहानी कह रहे थे।
  • 6 जून- भारतीय सेना ने जोरदार जवाबी हमला शुरू किया।
  • 9 जून- बाल्टिक सेक्टर कीदो अहम चौकियों पर भारत ने दोबारा कब्जा जमाया।
  • 11 जून- भारत ने चीन दौरे पर गए पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख परवेज मुशर्रफ की रावलपिंडी में अपने चीफ ऑफ जनरल स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल अजीज खान से बातचीत को जारी किया। इसमें पाकिस्तानी सेना के शामिल होने की पुष्टि हो रही थी।
  • 13 जून- द्रास में तोलोलिंग पर कब्जा जमाया गया।
  • 15 जून- तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को फोन पर कारगिल से सेना को पीछे हटने को कहा।
  • 29 जून- भारतीय सेना ने दो अहम चौकियों प्वाइंट 5060 और प्वाइंट 5100 पर कब्जा जमाया।
  • 2 जुलाई- भारतीय सेना ने कारगिल में तिहरा हमला शुरू किया।
  • 4 जुलाई- 11 घंटों की मशक्कत के बाद टाइगर हिल पर भारत का कब्जा।
  • 5 जुलाई- द्रास पर भारत का कब्जा, क्लिंटन से मुलाकात के बाद शरीफ ने पाकिस्तानी सेना को वापस बुलाने की घोषणा की।
  • 7 जुलाई- बटालिक में जुबार चोटी पर भारत ने कब्जा जमाया।
  • 11 जुलाई- पाकिस्तानी सेना के पांव उखडऩे शुरू, बटालिक की प्रमुख चोटियों पर भारत का कब्जा।
  • 14 जुलाई- तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री ने कारगिल को घुसपैठियों से मुक्त कराने के लिए चलाए गए ऑपरेशन विजय को सफल घोषित किया।
  • 26 जुलाई- आधिकारिक रूप से कारगिल युद्ध समाप्त हुआ।