Shamsher ALI Siddiquee

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रक्तदान सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी

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रक्त मानव शरीर का एक प्रकार का तरल पदार्थ है, जो शरीर के कोशिकाओ / cells को आवश्यक पोषक तत्व और प्राणवायु / oxygen पहुचाने का काम करता है और कोशिकाओ से खराब पदार्थ को शरीर से बाहर निकलने का कार्य करता है। रक्त की कमी के कारण देश भर में हर साल लाखो लोगो की मृत्यु हो जाती है।
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आंकड़ो के अनुसार देश में हर साल 4 करोड़ यूनिट खून की आवश्यकता होती है, पर मुश्किल से 40 से 50 लाख यूनिट रक्त ही Blood Donation द्वारा एकत्रित हो पाता है। हर 2 सेकंड में किसी न किसी को रक्त की जरुरत होती है और ऐसे में हर दिन 38000 रक्तदाताओ / Blood Donor की जरुरत है, लेकिन Blood Donation को लेकर समाज में फैली भ्रांतियों और जागरूकता के अभाव में लोग Blood donate करने के लिए आगे नहीं आते है।
Blood Donation के प्रति जागरूकता फ़ैलाने के लिए और समाज में Blood Donation को लेकर जो भ्रान्तिया है उसे दूर करने के लिए, रक्तदान / Blood Donation के बारे में विस्तृत जानकारी निचे दी गयी है :

The Gift of BLOOD is Gift of LIFE...!!
Blood Donation की जरुरत क्यों है ?Blood Donation in Hindi
रक्त जीवन रक्षक है ! अब तक किसी ऐसी मशीन का शोध नहीं लगा है जो की कृत्रिम रक्त तैयार कर सके। किसी रक्तदाता / Blood donor द्वारा Blood Donation करने पर ही रक्त की कमी या जरुरत को पूरा किया जा सकता है।
हर साल करोडो लोगो को रक्त की जरुरत होती है पर कुछ लाखो नसीबवालो को ही रक्त मिल पाता है।
Sickle Cell  के मरीज को कई बार Blood Donation की जरुरत पड़ती है।
अकेले एक Car Accident में ही 100 यूनिट रक्त की जरुरत पड सकती है।
एक बार  Blood Donation कर आप 3 लोगो की जिंदगी बचा सकते है।
अगर आप 18 साल की उम्र से 60 साल की उम्र तक हर 90 दिन बाद Blood Donation करते है, तो लग भग 30 gallon Blood Donate कर चुके होंगे जो की 500 लोगो की जान बचा सकता है।
भारत में सिर्फ 7% लोगो का  Blood group 'O Negative' है। 'O Negative' Blood Group को Universal Donor भी कहते है। किसी भी  Blood group के लोगो को 'O Negative' Blood Group का रक्त दिया जा सकता है। Emergency के समय या नवजात बालक जिनका Blood Group पता न हो, ऐसे समय 'O Negative' रक्त बहुत उपयोग में आता है।
भारत में सिर्फ 0.4 % लोगो का Blood group 'AB' होता है। इस Blood group के Plasma का उपयोग किसी भी Blood group के लोगो को emergency में लगा सकते है।
कई प्रकार के operation, emergency या बीमारी में  Blood Transfusion की जरुरत पड़ती है। अगर पर्याप्त मात्रा में समय पर रक्त न मिले तो रोगी व्यक्ति को काफी तकलीफ हो सकती है और उनकी मृत्यू भी हो सकती है।
Blood Donation कैसे किया जाता है ?

एक औसत व्यक्ति के शरीर में 10 यूनिट  (5 से 6 लीटर) रक्त मौजूद होता है। Blood Donation के समय सिर्फ 1 यूनिट रक्त ही लिया जाता है।  Blood donation की प्रक्रिया काफी सरल है और इसमें डरने की ज़रा भी जरुरत नहीं है। Blood donation किस तरह किया जाता है इसकी जानकारी निचे दी गयी है :
सबसे पहले आपका Registration होता है। आपका नाम, उम्र, पता इत्यादि जानकारी ली जाती है।
आपकी Medical history ली जाती है।
आपका Mini-physical परिक्षण किया जाता है जिसमे आपका Blood pressure, Pulse, Weight, Temperature के बाद Blood group और Hemoglobin level की जाँच की जाती है।
Blood donation करने योग्य पाए जाने पर आपको Blood donation कक्ष में टेबल पर लिटाया जाता है। आप के हाथ में एक निर्जन्तुक सुई (sterile needle) द्वारा 1 यूनिट खून 10 से 15 मिनिट में लिया जाता है।
Blood donation करने के बाद, एक बार फिर से आपका  Blood pressure और Pulse परिक्षण किया जाता है।
आपके रूचि अनुसार Blood donation के बाद आपको चाय-बिस्कुट या कोल्ड ड्रिंक दिया जाता है।
Blood Donation के बाद १/२ घंटे तक वाहन न चलाए।
आपको आपका Blood group card और Blood Donation Certificate भी दिया जाता है।     
Blood Donation कौन कर सकता है ?

अगर आप निचे दिए गए श्रेणी में आते है तो आप Blood Donation कर सकते है।
आपकी उम्र 18 से 60 साल के बिच है।
आपका वजन (Weight) 45 Kg या उससे ज्यादा है।
आपकी Pulse Rate 50 से 100 / min के बिच होनी चाहिए।
शरीर का तापमान / temperature 99.5°F से कम होना चाहिए।
Diastolic Blood Pressure 100 mm/Hg से कम होना चाहिए। 
Systolic Blood Pressure 160 mm/Hg से कम होना चाहिए। 
रक्त में Hemoglobin (Hb) की मात्रा 12.5 gm/dl से ज्यादा होना चाहिए।
पुरुष 90 दिन और महिलाए 120 दिन बाद दोबारा Blood Donation कर सकते है।
आप स्वस्थ है और आपको मलेरिया, टाइफाइड, हेपेटाइटिस इत्यादि संक्रामक बीमारी नहीं है या काफी समय से नहीं हुई है। 
" वे युवा बधाई के पात्र है जिन्होंने अपने रक्त से जीवनदान दिया है एवं जो दे सकते है ! "

Blood Donation कौन नहीं कर सकता है ?
अगर आप निचे दिए गए श्रेणी में आते है तो आप Blood Donation नहीं कर सकते है।
पिछले Blood Donation के समय काफी चक्कर या थकावट महसूस की हो।
अगर आपको बार-बार Blood Donate किया हो।
मासिक रक्तस्त्राव के समय Blood Donation से परहेज करे .
आप को कोई drug addiction या व्यसन हो।
24 घंटे के भीतर शराब का सेवन किये हुए व्यक्ति।
कई लोगो (High risk individual) के साथ शारीरिक सम्बन्ध होना या वेश्यागमन किया है ।
आप HIV Positive है या आप में AIDS के निचे दिए गए लक्षण मौजूद है। जैसे की :
बेवजह वजन कम होना / Unexplained weight loss
रात के समय काफी पसीना आना।
शरीर या मुंह में नीले, जामुनी या लम्बे समय से सफ़ेद दाग या धब्बे होना।
गर्दन / बगल या शरीर के किसी हिस्से में लम्बे समय से गांठ (swollen lymph node) होना।   
बार-बार बीमार होना या 99.5°F से ज्यादा का बुखार आना।
1 महीने से ज्यादा समय तक दवा लेने के बाद भी दस्त / loose motions की तकलीफ ठीक न होना।
HIV antigen / antibody test Positive आना।
आप कुछ बीमारी या विशेष अवस्था में कुछ समय तक रक्तदान / Blood donation नहीं कर सकते। इस क़ि जानकारी निचे तालिका में दी गयी है :

                   Disease
Postpone Blood Donation Period
Jaundice
1 year
Malaria
3 months
Dog Bite / Rabies vaccination
1 year
Abortion
3 months
Pregnancy - Till duration of pregnancy
1 year
Breast feeding
1 year after delivery
History of blood transfusion
6 months
Major Surgery
6 months
Minor surgery
3 months
Immunization - Typhoid,Diptheria,Tetanus
15 days
Immunoglobulin injections
12 months
Tatoo / Ear piercing
6 months
Dental extraction
72 hours
Drugs - Antibiotic / steroid / aspirin
72 hours
Respiratory tract infection
After recovery and 1 week after last dose of antibiotic
Tuberculosis (TB)
After 2 years of completion or course
Chicken Pox
After 1 year
कुछ प्रकार की दवाइया लेने के बाद भी आप Blood Donation नहीं कर सकते है। इसकी जानकारी निचे तालिका में दी गयी है :

                   Drugs
Postpone Blood Donation Period
Etreinate - used to treat Psoriasis
Not allowed to donate for lifetime
Finasteride – used to treat BPH
1 month after last dose
Isotretionoin – used to treat acne
1 month after last dose
Aspirin
72 hours after last dose
Contraceptive pills
Can donate anytime
Thyroxine
Can donate anytime
Human growth hormone
Not allowed to donate for lifetime
Taking regular parenteral drugs like Insulin
Not allowed to donate for lifetime
निचे दी गई बीमारी से ग्रसित लोग Blood donation नहीं कर सकते है।
कर्क रोग / Cancer
ह्रदय रोग / Heart Disease
मधुमेह के मरीज जो लगातार Insulin के injection  ले रहे है
संक्रामक पीलिया / Infectious Hepatitis
किडनी की बीमारी / Chronic Nephritis
कुष्ठ रोगी / Leprosy
मिरगी / Epilepsy
Liver की बीमारी
AIDS रोगी
" स्वेच्छा से रक्तदान कीजिए क्योंकि आपके द्वारा किया गया रक्तदान,
किसी को जीवनदान दे सकता है ! "

Blood Donation करने के फायदे :
Research से यह पता चला है की, Blood Donation करने से Heart Attack और Cancer होने की आशंका कम हो जाती है। शरीर में cholesterol की मात्रा घटती है।
Blood Donation करना Weight loss करने वालो के लिए भी फायदेमंद है। एक बार Blood Donation करने पर लगभग 650 calories खर्च हो जाती है।
Blood Donation करने से जरुरत से ज्यादा की Iron level की मात्रा कम हो जाती है। बहुत ज्यादा Iron level होना भी रक्तवाहिनियो के लिए नुक्सानदेह होता है।
Blood Donation करने वालो में ह्रदय रोग की आशंका 33% कम हो जाती है।
मानव शरीर Blood Donation के रूप में किए गए रक्त की मात्रा की पूर्ति 24 घंटे में और कोशिकीय भाग की पूर्ति 1 से 2 माह के अन्दर पूरा कर लेता है। इससे शरीर की कार्यक्षमता और रोग प्रतिकार शक्ति बढती है।
Blood Donation करने से अस्थि मज्जा / Bone marrow सक्रीय बना रहता है, जो रक्त निर्माण में साहायक होता है। Blood Donation करने से शरीर में रक्त बनने की प्रक्रिया में तेजी आती है।
नियमित रक्तदाता में रक्त बनने की क्षमता उम्र के बढ़ने पर भी लगभग सामान्य बनी रहती है।
Blood Donation के वक्त आप का मुफ्त में physical जाँच और laboratory जाँच भी होती है।
Blood Donation कर के आप किसी को पुनर्जीवन प्रदान करते है। आप सिर्फ एक जिंदगी नहीं बल्कि उनसे जुडी कई अन्य जिंदगियो की भी मदद करते है। Blood Donation कर हम कई जिंदगीया बचाने का पुण्य कार्य करने का मौक़ा मिलता है।
Blood Donation से शरीर पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता है और न ही किसी प्रकार की हानि होती है।
Blood Donation / रक्तदान महादान है !! यह दान करने पर मिलनेवाली ख़ुशी और संतोष को शब्दों में बया नहीं किया जा सकता है।
मेरी आप सभी से प्रार्थना है की, आज ही Blood Donation / रक्तदान करने का संकल्प ले और किसी जरूरतमंद की सहायता करने की हर संभव कोशिश करे। आप जरुरत पड़ने पर  Blood Donation करने के लिए निचे दिए गए विकल्प चुन सकते है।
अपने शहर के Blood Bank में अपना नाम, पता, Blood group और Mobile number दर्ज करे ताकि किसी व्यक्ति को खून की जरुरत के समय आपसे संपर्क हो सके।
आपके Family Doctor के पास अपना नाम, पता, Blood group और Mobile number दर्ज करे ताकि किसी व्यक्ति को खून की जरुरत के समय आपसे संपर्क हो सके।
आप अपने अपने मित्रो या रिश्तेदारों के साथ मिलकर अपने society में या Whatsapp, Facebook और Google Plus पर Blood Donor group बना सकते है। 
हमारा ग्रुप नाम है: DBDTgopalganj
आप कुछ हमारे online website: http://www.dbdt.in पर अपना नाम register करा सकते है।
या आप हमारे एंड्राइड ऍप के द्वारा भी register कर सकते हैं पता है: https://play.google.com/store/apps/details?id=dbdtgopalganj.ali
Donate Blood ! Save a Life !!

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छह दिसंबर 1992- शौर्य दिवस या काला दिन? उस दिन सिर्फ मस्ज़िद ही नहीं और भी बहुत कुछ टूटा था!

    


छ: दिसंबर 1992 शौर्य दिवस या काला दिन? अयोध्या में तहजीब के मर जाने की कहानी?

 एक आम इंसाफ और अमन पसंद हिन्दुस्तानी की हैसियत से जब इस सवाल का जवाब ढूँढने की कोशिश करता हूँ तो कुछ और सवाल ज़ेहन में उठते हैं, जैसे:
1- हमारी जानकारी के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास जी ने महाराजा अकबर के काल में राम चरित्र मानस (रामायण) की रचना की। उनके इस पुनीत कार्य में बादशाह द्वारा विघ्न डाले जाने का कहीं कोई वर्णन नहीं मिलता। आज भारत में तुलसीदास जी की रामायण ही ज्यादा लोकप्रिय है।
2- अब तो तुलसी भी गलत लगने लगे हैं जो 1528 के आसपास ही जन्मे थे। लोग कहते हैं कि 1528 में ही बाबर ने राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई। तुलसी ने तो देखा या सुना होगा उस बात को? बाबर राम के जन्म स्थल को तोड़ रहा था और तुलसी लिख रहे थे “मांग के खाइबो मसीत (मस्जिद) में सोइबो”। और फिर उन्होंने रामायण लिखा डाली। राम मंदिर के टूटने का और बाबरी मस्जिद बनने का क्या तुलसी को जरा भी अफसोस न रहा होगा? मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन की हर छोटी बड़ी घटना को लिपिबध्द करने वाले तुलसी दास जी ने रामायण में रामजन्म भूमि पर आक्रमण(?) की इतनी बड़ी घटना को लिपिबध्द क्यों नहीं किया?
3- क्या अयोध्या सिर्फ हमारे हिन्दु भाईयों के लिये ही आस्था का केन्द्र है? मुसलमानों के लिये “हज़रत शीश पैगम्बर की समाधि” के कारण आस्था केन्द्र नहीं ?
4- कहते हैं अयोध्या में राम जन्मे, वहीं खेले कूदे बड़े हुए। बनवास भेजे गए। लौट कर आए तो वहां राज भी किया। उनकी जिंदगी के हर पल को याद करने के लिए एक मंदिर बनाया गया। जहां खेले, वहां गुलेला मंदिर है। जहां पढ़ाई की वहां वशिष्ठ मंदिर हैं। जहां बैठकर राज किया वहां मंदिर है। जहां खाना खाया वहां सीता रसोई है। जहां भरत रहे वहां मंदिर है। हनुमान मंदिर है। कोप भवन है। सुमित्रा मंदिर है। दशरथ भवन है। ऐसे बीसीयों मंदिर हैं और इन सबकी उम्र 400-500 साल है। यानी ये मंदिर तब बने जब हिंदुस्तान पर मुगल या मुसलमानों का राज रहा। अजीब है न! कैसे बनने दिए होंगे मुसलमानों ने ये मंदिर! उन्हें तो मंदिर तोड़ने के लिए याद किया जाता है? उनके रहते एक पूरा शहर मंदिरों में तब्दील होता रहा और उन्होंने कुछ नहीं किया। कैसे अताताई थे वे, जो मंदिरों के लिए जमीन दे रहे थे?
5- शायद वे लोग झूठे होंगे जो बताते हैं कि जहां गुलेला मंदिर बनना था उसके लिए जमीन मुसलमान शासकों ने ही दी? दिगंबर अखाड़े में रखा वह दस्तावेज भी गलत ही होगा जिसमें लिखा है कि मुसलमान राजाओं ने मंदिरों के बनाने के लिए 500 बीघा जमीन दी? निर्मोही अखाड़े के लिए नवाब सिराजुदौला के जमीन देने की बात भी सच नहीं ही होगी? सच तो बस बाबर है और उसकी बनवाई बाबरी मस्जिद?
6- अयोध्या में सच और झूठ अपने मायने खो चुके हैं। मुसलमान पांच पीढ़ी से वहां फूलों की खेती कर रहे हैं। उनके फूल सब मंदिरों पर उनमें बसे देवताओं पर, राम पर चढ़ते रहे। मुसलमान वहां खड़ाऊं बनाने के पेशे में जाने कब से हैं। ऋषि मुनि, संन्यासी, राम भक्त सब मुसलमानों की बनाई खड़ाऊं पहनते रहे। सुंदर भवन मंदिर का सारा प्रबंध चार दशक तक एक मुसलमान के हाथों में रहा। 1949 में इसकी कमान संभालने वाले मुन्नू मियां 23 दिसंबर 1992 तक इसके मैनेजर रहे। जब कभी लोग कम होते और आरती के वक्त मुन्नू मियां खुद खड़ताल बजाने खड़े हो जाते तब क्या वह सोचते होंगे कि अयोध्या का सच क्या है और झूठ क्या?
7- अग्रवालों के बनवाए एक मंदिर की हर ईंट पर 786 लिखा है। उसके लिए सारी ईंटें राजा हुसैन अली खां ने दीं. किसे सच मानें? क्या मंदिर बनवाने वाले वे अग्रवाल सनकी थे या दीवाना था वह हुसैन अली खां जो मंदिर के लिए ईंटें दे रहा था? इस मंदिर में दुआ के लिए उठने वाले हाथ हिंदू या मुसलमान किसके हों, पहचाना ही नहीं जाता। सब आते हैं। एक नंबर 786 ने इस मंदिर को सबका बना दिया।
8- शाश्वत सत्य है कि सुबूत मुजरिम मिटाता है, इस विवाद के सुबूत किसने और क्यों मिटाए?
9- देश के लोकतंत्र, संविधान, न्यायपालिका, कार्यपालिका आदि संस्थानों के साथ विश्वास्घात किसने किया? इनकी धज्जियाँ उड़ाना "काला दिन" क्यों नहीं?
10- एक खस्ताहाल इमारत को शासन और प्रशासन के संरक्षण ज़मींदोज़ कर देना,किस प्रकार के शौर्य की श्रेणी में आता है?
11- पिछले तैइस वर्षों से तथाकथित रामज़ादों की करतूत के कारण ही मर्यादा पुरुषोत्तम राम तम्बू में विराजमान हैं और खराब तम्बू को बदलने का निर्णय भी न्यायालय द्वारा लिया जा रहा है। आस्था के नाम पर देश के संविधान, न्यायपालिका तथा अन्य संवैधानिक संस्थाओं को नकारने वालों की आस्था अब कहाँ चली गयी है?
12- राम जी की इस बदहाली के ज़िम्मेदार और सत्ता प्राप्त कर उनसे विश्वासघात करने वाले क्या हैं?
13- क्या बस छह दिसंबर 1992 ही सच है, कौन जाने? छह दिसंबर 1992 के बाद सरकार ने अयोध्या के ज्यादातर मंदिरों को अधिग्रहण में ले लिया। वहां ताले पड़ गए। आरती बंद हो गई। लोगों का आना जाना बंद हो गया। बंद दरवाजों के पीछे बैठे देवी देवता क्या कोसते नहीं होंगे, कभी उन्हें जो एक गुंबद पर चढ़कर राम को छू लेने की कोशिश कर रहे थे? सूने पड़े हनुमान मंदिर या सीता रसोई में उस खून की गंध नहीं आती होगी, जो राम के नाम पर अयोध्या और भारत में बहाया गया? अयोध्या एक शहर के मसले में बदल जाने की कहानी है. अयोध्या एक तहजीब के मर जाने की कहानी है।
14- प्यारे देश वासियो, राममन्दिर अयोध्या में नहीं तो कहाँ बनेगा? लेकिन "लत्ते को सांप" बनाकर देश और समाज के सामने जो गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए गये हैं, उनके सही उत्तर तो ढूँढने ही होंगे। तभी तथाकथित रामज़ादों और (ह)रामज़ादों का सही चेहरा सामने आयेगा। 
शीर्षस्थ उपन्यासकार स्वर्गीय कमलेश्वर के सन् 2000 में प्रकाशित बहुचर्चित उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ की चर्चा करना समीचीन होगा,  जिसमें तथ्यों के हवाला देते हुए बताया गया है कि अयोध्या में न कभी बाबरी मस्जिद नाम की मस्जिद थी और न ही राम मंदिर।
कहने का मतलब अयोध्या में जिस विवादित रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद को लेकर सन् 1949 से देश में विवाद और दंगे-फ़साद हो रहे हैं, जिसके चलते लाखों हिंदू और मुसलमान आज भी एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं, वहां न बाबरी मस्जिद थी और न ही राम मंदिर। क़िताब का सारांश यह है कि भारत में हिंदू और मुसलमानों में विवाद की बीज अंग्रेज़ों ने एक साज़िश के तहत बोया था, जिसकी परिणति सन् 1947 में देश के विभाजन के रूप में हुई थी।
कमलेश्वर ने इस उपन्यास पर काम रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के बाद किया था और 10-12 साल के रिसर्च, स्टडी और ऐतिहासिक तथ्यों की छनबीन के बाद ‘कितने पाकिस्तान’ को लिखा है। उन्होंने क़िताब में बताने की कोशिश की है कि वहां बाबरी मस्जिद या राम मंदिर नहीं था।
उपन्यास को नामवर सिंह, विष्णु प्रभाकर, अमृता प्रीतम, राजेंद्र यादव, हिमांशु जोशी और अभिमन्यु अनत जैसे साहित्यकारों-लेखकों ने विश्व-उपन्यास कहते हुए उसकी जमकर तारीफ की थी। उस समय क़रीब-क़रीब हर प्रमुख हिंदी ही नहीं अंग्रेज़ी अख़बार में इसकी समीक्षा भी छपी थी।
अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में क़िताब को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। उस समय एचआरडी मिनिस्टर हिंदुत्व और राम मंदिर आंदोलन के पैरोकार डॉ. मुरली मनोहर जोशी थे। ज़ाहिर है अगर कमलेश्वर के निष्कर्ष से सरकार को किसी भी तरह की आपत्ति होती, तो कम से कम क़िताब को सरकारी पुरस्कार नहीं दिया जाता। अमूमन यह माना जाता है कि कोई सरकार किसी क़िताब को पुरस्कृत तब करती है जब वह सरकार क़िताब में लिखी हर बात से सहमत होती है।
कमलेश्वर ने बड़ी ख़ूबसूरती से समय और किरदार की सीमाओं से परे ‘कितने पाकिस्तान’ की रचना की है। मुख्य किरदार अदीब यानी लेखक ‘समय की अदालत’ लगाता है, जिसमें महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू, अली बंधु, लार्ड माउंटबेटन, बाबर, हुमायूं, औरंगजेब, कबीर जैसे सैकड़ों ऐतिहासिक किरदारों ने ख़ुद अपने-अपने बयान दर्ज कराए हैं।
यही नहीं अदालत में कई दर्जन विश्व-प्रसिद्ध इतिहासकारों ने भी हर विवादास्पद घटनाओं पर अपना बयान दिया है। सभी बयानात इतिहास, अंग्रेज़ों द्वारा तैयार गजेटियर, पुरातात्विक दस्तावेज़ों और नामचीन हस्तियों की आत्मकथाओं में उपलब्ध जानकारियों पर आधारित हैं। इनकी प्रमाणिकता पर संदेह नहीं किया जा सकता।
‘कितने पाकिस्तान’ में कई चैप्टर अयोध्या विवाद को समर्पित हैं। उपन्यास के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद बाबर के भारत पर आक्रमण करने से पहले ही मौजूद थी। बाबर 20 अप्रैल 1526 को इब्राहिम का सिर क़लम करके आगरा की गद्दी पर बैठा था और हफ़्ते भर बाद 27 अप्रैल 1526 को उसके नाम का ख़ुतबा पढ़ा गया।
क़िताब के मुताबिक, अयोध्या की मस्जिद (बाबरी मस्जिद नहीं)  में एक शिलालेख बनाया गया था, जिसका जिक्र ब्रिटिश अफ़सर ए फ़्यूहरर ने कई जगह किया है। फ़्यूहरर ने 1889 में आख़िरी बार उस शिलालेख को पढ़ा था, जिसे बाद में अंग्रेज़ों ने नष्ट करवा दिया। शिलालेख के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद का निर्माण इब्राहिम लोदी के शासन में उसी के आदेश पर 1523 में शुरू हुआ और 1524 में मस्जिद पूरी हुई।
इतना ही नहीं, शिलालेख के मुताबिक, मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर नहीं, बल्क़ि ख़ाली जगह पर बनाई गई थी। इसका यह भी मतलब होता है कि अगर विवादित स्थल पर राम या किसी दूसरे देवता का मंदिर था, जिसके अवशेष खुदाई करने वालों को मिले हैं, तो वह 14वीं सदी से पहले नेस्तनाबूद कर दिया गया होगा या ख़ुद ही नष्ट हो गया होगा। उसे कम से कम बाबर या मीरबाक़ी ने नहीं तोड़वाया जैसा कि इतिहासकारों का एक बड़ा तबक़ा और हिंदूवादी नेता दावा करते आ रहे हैं।
दरअसल, ‘कितने पाकिस्तान’ के मुताबिक लोदी के शिलालेख को नष्ट करने में अंग्रेज़ अफ़सर एचआर नेविल ने अहम भूमिका निभाई। सारी ख़ुराफ़ात और साज़िश का सूत्राधार नेविल ही था। बाद में उसने ही आधिकारिक तौर पर फ़ैज़ाबाद का गजेटियर तैयार किया था। नेविल की साज़िश में एक और दूसरा गोरा अफ़सर कनिंघम भी शामिल था, जिसे ब्रिटिश हुक़ूमत ने हिंदुस्तान की पुरानी इमारतों की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी दी थी। कनिंघम ने बाद में लखनऊ का गजेटियर तैयार किया था।
क़िताब के मुताबिक दोनों अफ़सरों ने धोखा और साज़िश के तहत गजेटियर में दर्ज किया कि 1528 में अप्रैल से सितंबर के बीच एक हफ़्ते के लिए बाबर अयोध्या आया और राम मंदिर को तोड़कर वहां बाबरी मस्जिद नींव रखी। यह भी लिखा कि अयोध्या पर हमले के दौरान लड़ाई में बाबर की सेना ने एक लाख चौहत्तर हज़ार हिंदुओं को मार दिया।
फ़ैज़ाबाद के गजेटियर में आज देखें तो मिलेगा कि 1869 में, बाबर के कथित आक्रमण के क़रीब साढ़े तीन सौ साल बाद, अयोध्या-फ़ैज़ाबाद की आबादी महज़ दस हज़ार थी, जो 1881 में बढ़कर साढ़े ग्यारह हज़ार हो गई। सवाल उठता है कि जिस शहर की आबादी इतनी कम थी वहां बाबर या उसकी सेना ने इतने लोगों की हत्या कैसे की या फिर इतने मरने वाले कहां से आ गए? यहीं तथ्य बाबरी मस्जिद के बारे में देश में बनी मौजूदा धारणा पर गंभीर संदेह होता है।
हैरान करने वाली बात है कि दोनों अफ़सरों नेविल और कनिंघम ने सोची-समझी नीति के तहत बाबर की डायरी बाबरनामा, जिसमें वह रोज़ाना अपनी गतिविधियां दर्ज करता था, के 3 अप्रैल 1528 से 17 सितंबर 1528 के बीच 20 से ज़्यादा पन्ने ग़ायब कर दिए और बाबरनामा में लिखे ‘अवध’ यानी‘औध’ को ‘अयोध्या’ कर दिया। मगर मस्जिद के शिलालेख के फ़्यूहरर के अनुवाद को ग़ायब करना ये दोनों अफ़सर भूल गए। वह अनुवाद आज भी आर्कियोलॉजीकल इंडिया की फ़ाइल में महफ़ूज़ है और ब्रितानी साज़िश को बेनकाब करता है।
इतना ही नहीं बाबर के मूवमेंट की जानकारी बाबरनामा की तरह हुमायूंनामा में भी दर्ज है। लिहाज़ा, बाबरनामा के ग़ायब किए गए पन्ने से नष्ट सूचनाएं हुमायूंनामा से ली जा सकती हैं। हुमायूंनामा के मुताबिक 1528 में बाबर अफ़गान हमलावरों का पीछा करता हुआ सरयू नदी तक ज़रूर गया था,  लेकिन उसी समय उसे अपनी बीवी बेग़म मेहम और अन्य खातूनों और बेटी बेग़म ग़ुलबदन समेत पूरे परिवार के काबुल से अलीगढ़ पहुंचने की इत्तिला मिली।
लंबे समय से युद्ध में उलझने की वजह से बाबर अपने परिवार से मिल नहीं पाया था, इसलिए वह फौरन अलीगढ़ रवाना हो गया और पत्नी-बेटी और परिवार के बाक़ी सदस्यों को लेकर आगरा आया। 10 जुलाई तक बाबर उनके साथ आगरा में ही रहा। उसके बाद बाबर परिवार के साथ धौलपुर चला गया। वहां से सिकरी पहुंचा, जहां सितंबर के दूसरे हफ़्ते तक रहा।
क़िताब के मुताबिक, गोस्वामी तुलसीदास से पहले जंबूद्वीप (तब भारत या हिंदुस्तान था ही नहीं सो इस भूखंड को जंबूद्वीप कहा जाता था) के हिंदू धर्म के अनुयायी नटखट कृष्ण, शंकर जी और हनुमान जी की पूजा किया करते थे। कहीं-कहीं गणेश की पूजा होती थी। तब राम का उतना क्रेज नहीं था। तुलसीदास सन् 1498 में पैदा हुए थे और बाबर के कार्यकाल तक वह किशोर ही थे।
वहीं पत्नी के दीवाने तुलसीदास अपनी मायावी दुनिया में मशगूल थे। उन्‍होंने रामचरित मानस की रचना बुढापे में की, जो हुमायूं और अकबर का दौर था। राम का महिमामंडन तो तुलसीदास ने किया और हिंदी (अवधी) में रामचरित मानस रचकर राम को हिंदुओं के घर-घर स्थापित कर दिया। रामचरित मानस के प्रचलन में आने के बाद ही राम हिंदुओं आराध्‍य हुए।
‘कितने पाकिस्तान’ में कमलेश्वर ने ऐतिहासिक तथ्यों का सहारा लेकर दावा किया है कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ चौकन्ने हो गए थे और ब्रिटिश इंडिया की नई पॉलिसी बनी, जिसके मुताबिक अंग्रेज़ों ने तय किया कि अगर इस उपमहाद्वीप पर लंबे समय तक शासन करना है, तो इसे धर्म के आधार पर विभाजित करना होगा। ताकि हिंदू और मुसलमान एक दूसरे से ही लड़ते रहें और उनका ध्यान आज़ादी जैसे मुद्दों पर न जाए। इसी नीति के तहत लोदी की मस्जिद ‘बाबरी मस्जिद’ बना दी गई और उसे ‘राम मंदिर’ से जोड़कर ऐसा विवाद खड़ा कर दिया जो कभी हल ही नहीं हो। अंग्रेज़ निश्चित रूप से सफल रहे क्योंकि उस वक़्त पैदा की गई नफ़रत ही अंततः देश के विभाजन की मुख्य वजह बनी।

बाबरी मस्जिद विध्वंस के पांच 'सूत्रधार'

लाल कृष्ण आडवाणी

सीबीआई की मूल चार्जशीट के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी नेता लाल कृष्ण आडवाणी अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद गिराने के 'षड्यंत्र' के मुख्य सूत्रधार हैं जो अक्टूबर 1990 में शुरू होकर दिसंबर 1992 तक चला बताया गया है.
अभियोजन पक्ष का तर्क है कि बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि ढांचे का विवाद काफी समय से चला आ रहा है, जो अदालत में लंबित है. हिंदुओं के अनुसार राम जन्मभूमि पर मीर बाकी ने मस्जिद का निर्माण किया था.
विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या, काशी और मथुरा के मंदिरों को मुक्त करने का अभियान चलाया और इसके अंतर्गत लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा की.
शिव सेना नेता बाल ठाकरे ने मुंबई के दादर में आडवाणी का स्वागत किया. उसी दिन लाल कृष्ण आडवाणी ने पंचवटी में घोषणा की थी कि बाबरी मस्जिद कभी भी मस्जिद नही रही और हिंदू संगठन प्रत्येक दशा में अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए दृढ संकल्प हैं. ठाकरे ने इस कार्य में साथ देने का वादा किया.
चार्जशीट के अनुसार 1991 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इस योजना मे सक्रिय साथ दिया.
पांच दिसंबर 1992 को अयोध्या मे भाजपा नेता विनय कटियार के घर पर एक गोपनीय बैठक हुई, जिसमें विवादित ढांचे को गिराने का अंतिम निर्णय लिया गया.
आडवाणी ने छह दिसंबर को कहा था, "आज कारसेवा का आखिरी दिन है. कारसेवक आज आखिरी बार कारसेवा करेंगे."
जब उन्हें पता चला कि केन्द्रीय बल फैजाबाद से अयोध्या आ रहा है तब उन्होंने जनता से राष्ट्रीय राजमार्ग रोकने को कहा. अभियोजन पक्ष का यह भी कहना है कि आडवाणी ने कल्याण सिंह को फोन पर कहा कि वे विवादित ढांचा पूर्ण रूप से गिराए जाने तक अपना त्यागपत्र न दें.
आडवाणी ने राम कथा अकुंज के मंच से चिल्लाकर कहा कि "जो कार सेवक शहीद होने आए हैं, उन्हें शहीद होने दिया जाए."
आडवाणी पर आरोप है कि उन्होंने यह भी कहा कि, “मंदिर बनाना है, मंदिर बनाकर जाएंगे. हिंदू राष्ट्र बनाएंगे.”
स्थानीय प्रशासन ने विवादित ढांचा गिराए जाने से रोकने का कोई प्रयास नही किया इसलिए अभियोजन के अनुसार तत्कालीन जिला जिला मजिस्ट्रेट आरएन श्रीवास्तव और पुलिस अधीक्षक डीबी राय इस 'षड्यंत्र' में शामिल थे. इनमें से राय का अब निधन हो चुका है.
लेकिन हाई कोर्ट के आदेश के तहत आडवाणी पर फिलहाल बाबरी मस्जिद गिराने के षड्यंत्र में शामिल होने का पहला मुकदमा नही चल रहा है.
आडवाणी तथा उनके सात अन्य सहयोगियों पर रायबरेली की अदालत में केवल मुस्लिम समुदाय के खिलाफ विद्वेष भड़काने वाल भाषण देकर कारसेवकों को उकसाने का आरोप है, जिसके फलस्वरूप मस्जिद गिरा दी गई.
आडवाणी और उनके साथियों ने अदालत में सभी आरोपों से इनकार किया है.

कल्याण सिंह

कल्याण सिंह उन तेरह लोगों में हैं, जिन पर मूल चार्जशीट में मस्जिद गिराने के 'षड्यंत्र' में शामिल होने का आरोप है, लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से अभी मुकदमा नही चल रहा है.
सीबीआई की मूल चार्जशीट के मुताबिक़ 1991 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कल्याण सिंह ने डॉ. मुरली मनोहर जोशी और अन्य नेताओं के साथ अयोध्या जाकर शपथ ली थी कि विवादित स्थान पर ही मंदिर का निर्माण होगा. उन्होंने नारा लगाया , “राम लला हम आए हैं, मंदिर यहीं बनाएंगे.”
केंद्र सरकार ने 195 कंपनी केन्द्रीय पैरा मिलिटरी फ़ोर्स कानून व्यवस्था में मदद के लिए भेजी, लेकिन भाजपा सरकार ने उसका उपयोग नही किया. पांच दिसंबर को उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव गृह ने केन्द्रीय बल का प्रयोग करने का सुझाव दिया, लेकिन कल्याण सिंह इससे सहमत नही हुए.
कल्याण सिंह ने मस्जिद की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में दिए गए आश्वासन का पालन नही किया, जबकि उन्होंने संविधान और देश के कानून की सुरक्षा की शपथ ली थी.
कल्याण सिंह घटना के समय अयोध्या में उपस्थित नही थे, फिर भी उन्हें षड्यंत्र में शामिल बताया गया.
चार्जशीट के अनुसार कल्याण सिंह ने छह दिसंबर के बाद अपने बयानों में स्वीकार किया कि गोली न चलाने का आदेश उन्होंने ही जारी किया था और उसी वजह से प्रशासन का कोई अधिकारी दोषी नही माना जाएगा.
कल्याण सिंह ने सभी आरोपों से इनकार किया है.

अशोक सिंघल

विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल अयोध्या के विवादित स्थल पर राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण आंदोलन के प्रमुख स्तंभ रहे हैं.
चार्जशीट के अनुसार अशोक सिंघल 20 नवंबर 1992 को बाल ठाकरे से मिले और उन्हें कारसेवा में भाग लेने का निमंत्रण दिया.
चार दिसंबर 1992 को बाल ठाकरे ने शिव सैनिकों को अयोध्या जाने का आदेश दिया.
शिव सेना नेता जय भान सिंह पवैया ने अशोक सिंघल से चंबल घाटी में प्रशिक्षित मौत दस्ता तैनात करने के लिए कहा.
अशोक सिंघल ने यह भी कहा था कि छह दिसंबर की कारसेवा में मस्जिद के ऊपर मीर बाक़ी का शिलालेख हटाया जाएगा, क्योंकि यही अकेला चिन्ह मस्जिद के संबंध में है.
दूसरे दिन पांच दिसंबर को अशोक सिंघल ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा था "जो भी मंदिर निर्माण में बाधा आए गी उसको हम दूर कर देंगे. कार सेवा केवल भजन कीर्तन के लिए नही है बल्कि मंदिर के निर्माण कार्य को प्रारम्भ करने के लिए है."
चार्जशीट में अशोक सिंघल पर आरोप है कि वो छह दिसंबर को राम कथा कुंज पर बने मंच से अन्य अभियुक्तों के साथ- साथ कारसेवकों से नारा लगवा रहे थे कि "राम लला हम आए हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे. एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो."
जब बाबरी मस्जिद ढहाई जा रही थी तो अभियुक्त हर्षित थे और मंच पर उपस्थित लोगों के साठ उत्साहित होकर मिठाई बांटी जा रही थी. अभियुक्तों के भाषण से उत्तेजित होकर पहले बाबरी मस्जिद ढहाई गई और उसी दिन अयोध्या में स्थित मुसलमानों के घरों को तोड़ा गया, जलाया गया, मस्जिदें और कब्रें तोडी गईं. इससे मुसलमानों में भय उत्पन्न हुआ और वे अयोध्या छोड़ जाने को बाध्य हुए.
रायबरेली में चल रहे केस नम्बर 198 के सभी अभियुक्तों, विशेषकर उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा पर ऐसे आरोप हैं. सभी अभियुक्त ने आरोपों से इनकार किया है.

विनय कटियार

विनय कटियार की पहचान विश्व हिंदू परिषद के सहयोगी संगठन बजरंग दल के नेता के रूप में रही है. वह अपने उग्र और विवादस्पद बयानों के लिए जाने जाते रहे हैं.
चार्जशीट के अनुसार 14 नवंबर 1992 को विनय कटियार ने अयोध्या में कहा कि बजरंग दल का आत्मघाती दस्ता कार सेवा करने को तैयार है, और छह दिसंबर को मौत दस्ता शिवाजी की रणनीति अपनाएगा.
विवादित मस्जिद गिरने से एक दिन पूर्व पांच दिसंबर को अयोध्या में विनय कटियार के घर पर एक गोपनीय बैठक हुई, जिसमे आडवाणी के अलावा शिव सेना नेता पवन पांडे मौजूद थे. इसी बैठक में विवादित ढांचे को गिराने का अंतिम निर्णय लिया गया.
चार्जशीट के अनुसार कटियार ने छह दिसंबर को अपने भाषण में कहा था, “हमारे बजरंगियों का उत्साह समुद्री तूफान से भी आगे बढ़ चुका है, जो एक नही तमाम बाबरी मस्जिदों को ध्वस्त कर देगा."

मुरली मनोहर जोशी

मुरली मनोहर जोशी आडवाणी के बाद भारतीय जनता पार्टी के दूसरे बड़े नेता हैं जो राम मंदिर आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिसा लेते रहे हैं.
जोशी छह दिसंबर को विवादित परिसर में मौजूद थे. चार्जशीट के अनुसार मस्जिद का गुम्बद गिरने पर उमा भारती आडवाणी और डॉ. जोशी के गले मिल रही थीं.
मुरली मनोहर जोशी के बारे में अभियोजन पक्ष की ओर से कहा गया है कि वे और आडवाणी कार सेवा अभियान के लिए मथुरा और काशी होते हुए दिल्ली से अयोध्या के लिए चले.
इन सभी पर आरोप है कि 28 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट से प्रतीकात्मक कारसेवा का निर्णय हो जाने के बाद भी इन लोगों ने पूरे प्रदेश में सांप्रदायिकता से ओतप्रोत भाषण दिए.
इन उत्तेजनात्मक भाषणों से धर्मनिरपेक्ष भारत में सांप्रदायिक जहर घोला गया.

हालांकि यह ज़िक्र करना समीचीन होगा कि चार साल पहले ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी माना था कि अयोध्या में राम मंदिर को बाबर और उसके सूबेदार मीरबाक़ी ने 1528 में मिसमार करके वहां बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया। मीरबाक़ी का पूरा नाम मीरबाक़ी ताशकंदी था और वह अयोध्या से चार मील दूर सनेहुआ से सटे ताशकंद गांव का निवासी था। इसी तथ्य को आधार बनाकर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सितंबर में बहुप्रतीक्षित ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया था।
जिसमे विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांटने का निर्देश दिया था।

औरंगज़ेब और मुग़लों की तारीफ़ क्यों करते थे महात्मा गांधी?

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1 नवंबर, 1931 की सुबह थी. लंदन में गुलाबी ठंड पड़ने लगी थी. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के पेम्ब्रोक कॉलेज में एकदम सुबह से ही भीड़ जुटने लगी थी. यहां महात्मा गांधी बोलने आनेवाले थे.
गांधी को यहां सुनने आनेवाले प्रमुख लोगों में ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स एलिस बार्कर, ब्रिटिश राजनीति-विज्ञानी और दार्शनिक गोल्ड्सवर्दी लाविज़ डिकिन्सन, प्रसिद्ध स्कॉटिश धर्मशास्त्री डॉ. जॉन मरे और ब्रिटिश लेखक एवलिन रेंच इत्यादि शामिल थे.
गांधी के सहयोगी महादेव देसाई के मुताबिक गांधी की यह वार्ता अपने तय समय से कई घंटे अधिक समय तक चली थी.
इस बैठक में गांधी खुलकर बोल रहे थे. बोलते-बोलते एक स्थान पर उन्होंने कहा, "मैं यह जानता हूं कि हर ईमानदार अंग्रेज़ भारत को स्वतंत्र देखना चाहता है, लेकिन उनका ऐसा मानना क्या दुःख की बात नहीं है कि ब्रिटिश सेना के वहां से हटते ही दूसरे देश उसपर टूट पड़ेंगे और देश के अंदर आपस में भी भारी मार-काट मच जाएगी? …आपके बिना हमारा क्या होगा, इसकी इतनी अधिक चिंता आपलोगों को क्यों हो रही है? आप अंग्रेज़ों के आने से पहले के इतिहास को देखें, उसमें आपको हिंदू-मुस्लिम दंगों के आज से ज्यादा उदाहरण नहीं मिलेंगे. ...औरंगज़ेब के शासन-काल में हमें दंगों का कोई हवाला नहीं मिलता."

अंग्रेज़ों ने औरंगज़ेब को खराब दिखाया

उसी दिन दोपहर को कैम्ब्रिज में ही 'इंडियन मजलिस' की एक सभा में गांधी ने और स्पष्ट तरीके से कहा- 'जब भारत में ब्रिटिश शासन नहीं था, जब वहां कोई अंग्रेज़ दिखाई नहीं देता था, तब क्या हिंदू, मुसलमान और सिख आपस में बराबर लड़ ही रहे थे?
हिंदू और मुसलमान इतिहासकारों द्वारा दिए गए विस्तृत और सप्रमाण विवरणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि तब हम अपेक्षाकृत अधिक शांतिपूर्वक रह रहे थे. और ग्रामवासी हिंदुओं और मुसलमानों में तो आज भी कोई झगड़ा नहीं है. उन दिनों तो उनके बीच झगड़े का नामो-निशान तक नहीं था.
स्वर्गीय मौलाना मुहम्मद अली, जो खुद एक हद तक इतिहासकार थे, मुझसे अक्सर कहा करते थे कि "अगर अल्लाह ने मुझे इतनी ज़िंदगी बख्शी तो मेरा इरादा भारत में मुसलमानी हुक़ूमत का इतिहास लिखने का है. उसमें दस्तावेज़ी सबूतों के साथ यह दिखा दूंगा कि अंग्रेज़ों ने गलती की है. औरंगज़ेब उतना बुरा नहीं था जितना बुरा अंग्रेज़ इतिहासकारों ने दिखाया है, मुग़ल हुक़ूमत इतनी खराब नहीं थी जितनी खराब अंग्रेज़ इतिहासकारों ने बताई है."
ऐसा ही हिंदू इतिहासकारों ने भी लिखा है. यह झगड़ा पुराना नहीं है. यह झगड़ा तो तब शुरू हुआ जब हम ग़ुलामी की शर्मनाक स्थिति में पड़े."
गांधी ने अपनी पहली किताब हिंद स्वराज में ही इसपर विस्तार से लिखा था कि भारत का इतिहास लिखने में तत्कालीन विदेशी इतिहासकारों ने दुर्भावना और राजनीति से काम लिया था. मुग़ल बादशाहों से लेकर टीपू सुल्तान तक के इतिहास को तोड़-मरोड़कर हिंदू-विरोधी दिखाने की कोशिशों का गांधी कई बार पर्दाफाश कर चुके थे.

अपनी टोपियां खुद बनाते थे औरंगज़ेब

लेकिन औरंगज़ेब के बारे में जो सबसे बड़ी बात महात्मा गांधी को खींचती थी, वह थी औरंगज़ेब की सादगी और श्रमनिष्ठा. 21 जुलाई, 1920 को 'यंग इंडिया' में लिखे अपने प्रसिद्ध लेख 'चरखे का संगीत' में गांधी ने कहा था, "पंडित मालवीयजी ने कहा है कि जब तक भारत की रानी-महारानियां सूत नहीं कातने लगतीं, और राजे-महाराजे करघों पर बैठकर राष्ट्र के लिए कपड़े नहीं बुनने लगते, तब तक उन्हें संतोष नहीं होगा. उन सबके सामने औरंगज़ेब का उदाहरण है, जो अपनी टोपियां खुद ही बनाते थे."
इसी तरह 20 अक्तूबर, 1921 को गुजराती पत्रिका 'नवजीवन' में उन्होंने लिखा, "जो धनवान हो वह श्रम न करे, ऐसा विचार तो हमारे मन में आना ही नहीं चाहिए. इस विचार से हम आलसी और दीन हो गए हैं. औरंगज़ेब को काम करने की कोई ज़रूरत नहीं थी, फिर भी वह टोपी सीता था. हम तो दरिद्र हो चुके हैं, इसलिए श्रम करना हमारा दोहरा फर्ज है."
ठीक यही बात वह 10 नवंबर, 1921 के 'यंग इंडिया' में भी लिखते हैं, "दूसरों को मारने का धंधा करके पेट पालने की अपेक्षा चरखा चलाकर पेट भरना हर हालत में ज्यादा मर्दानगी का काम है. औरंगज़ेब टोपियां सीता था. क्या वह कम बहादुर था?"
मुग़ल शासन में एक तरह का स्वराज था
लेकिन औरंगज़ेब के बारे में जो सबसे अद्भुत बात गांधी ने कही थी, वह कही थी उड़ीसा के कटक की एक सार्वजनिक सभा में जिसमें खासतौर पर वकीलों और विद्यार्थियों ने भाग लिया था.
इसमें गांधी ने इशारा किया था कि अंग्रेज़ों के शासनकाल में भारतीय मानसिक रूप से ग़ुलाम हो गए और उनकी निर्भीकता और रचनात्मकता जाती रही. जबकि मुग़लों के शासन में भारतीयों की स्वतंत्रचेतना और सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर कभी आंच नहीं आई.
24 मार्च, 1921 को आयोजित इस कार्यक्रम में महात्मा गांधी के शब्द थे, "अंग्रेज़ों से पहले का समय ग़ुलामी का समय नहीं था. मुग़ल शासन में हमें एक तरह का स्वराज्य प्राप्त था. अकबर के समय में प्रताप का पैदा होना संभव था और औरंगज़ेब के समय में शिवाजी फल-फूल सकते थे. लेकिन 150 वर्षों के ब्रिटिश शासन ने क्या एक भी प्रताप और शिवाजी को जन्म दिया है? कुछ सामंती देशी राजा जरूर हैं, पर सब-के-सब अंग्रेज़ कारिंदे के सामने घुटने टेकते हैं और अपनी दासता स्वीकार करते हैं."

आज़ाद भारत का सबसे दर्दनाक दंगा

अभी जब विपक्षी दल के भावी अध्यक्ष को लक्ष्य करके औरंगज़ेब का हवाला दिया गया, तो औरंगज़ेब के बारे में गांधी के ये विचार याद आ गए.
सादगी और श्रमनिष्ठा के प्रतीक वे औरंगज़ेब जिनके राज में कभी दंगे नहीं हुए. और औरंगज़ेब की सादगी के बरक्श हमारे कुछ नेताओं की सज-धज चीथड़ों में लिपटे भारत के फटेहाल ग़रीबों को मुंह भी चिढ़ाती हो सकती है.
क्या आज के हमारे शासकों के दरबार में बीरबल जैसा कोई मुंहफट दरबारी हो सकता है, हममें उतनी निर्भयता बची है क्या? जो सच बोलने में जरा भी घबराता न हो? क्या यह वही जनक और याज्ञवल्क्य का भारत है?

एक गरम चाय की प्याली हो!

    


चाय को चाय के पौधे की पत्तियों से बनाया जाता है।
वर्तमान समय में हमारे रोजमर्रा के जीवन में एक चाय के
कप की बहुत अहमीयत है। हम चाय तो रोज़ पीते हैं पर
चाय के बारे में कई मज़ेदार बातों से अनजान हैं। इस पोस्ट
में आपको ऐसी ही मज़ेदार बातों के बारे में बताते हैं–

1. चीन के लोगों ने सबसे पहले चाय पीना शुरू किया। ऐसा
कहा जाता है कि 4700 साल पहले चीन के एक राजा ‘ शैन
नुंग ‘ के सामने रखे गर्म पानी के प्याले में, चाय की कुछ सूखी
पत्तियाँ आकर गिरी जिससे पानी में रंग आ गया। जब राजा
ने उसको जरा सा पीया तो उन्हें स्वाद बहुत पसंद आया ओर
तभी से चाय का सफर शुरू होता है।

2. भारत में चाय की खेती की शुरूआत 1835 में हई थी। दरासल 1815 में कुछ ब्रिटिश यात्रियों का ध्यान असम में उगने वाली चाय की झाड़ियों पर गया था जिसे स्थानीय कबाइली लोग एक पेय बनाकर पीते थे। इसके बाद 1834 में अंग्रेज़ सरकार द्वारा एक समिति का गठन किया गया जिसका उद्देश्य भारत में चाय की परंपरा शुरू करने और उसका उत्पादन करने की संभावना तलाश करना था। तब जाकर भारत में 1835 में चाय के पहले बाग लगाए गए।

3. पहले की कुछ सदियों तक चाय का उपयोग एक दवाई के रूप में ही होता रहा था। इसे रोज पीने की परंपरा खास कर
भारत में पिछली सदी से शुरू हुई थी।

4. एक अनुमान के अनुसार चाय की 1500 से ज्यादा किस्में हैं। भले ही संसार में चाय की 1500 से ज्यादा किस्में हैं पर इनमें से मुख किस्में हैं – काली, हरी, सफेद और पीली। काली चाय
कुल चाय के उपयोग का 75 प्रतीशत होती है।

5. भारत लंम्बे समय तक चाय का सबसे बड़ा उत्पादक देश रहा, परंतु पिछले कुछ सालों से चीन इसे पछाड़ कर आगे निकल गया है। भारत में चाय का उत्पादन मुख्य रूप से आसाम और दारजलिंग में होता है। चाय आसाम का ‘राजकीय पेय’ भी है।

6. 1610 ईसवी में डच व्यापारी चाय को चीन से युरोप ले गए
और तभी से धीरे-धीरे चाय पूरी दूनिया का पसंदीदा पेय बन
गया।

7. पानी के बाद, चाय ऐसा पेय पदार्थ है जो सबसे ज्यादा
पीया जाता है।

8. यदि चाय की पत्तियों को अच्छी तरह से पानी में भिगो
के उसनी गंध(smell) को घर में फैलाया जाए तो यह
प्राकृतिक Allout का काम करती हैं, मतलब कि मच्छर दूर रहते हैं।

9. अफ़गानिस्तान और ईरान का राष्ट्रीय पेय (national
drink) चाय है।

10. इंग्लैंड के लोग रोजाना 16 करोड़ चाय के कप पीते हैं। इस तरह से एक साल में इंग्लैंड के लोग 60 अरब चाय के कप पी जाते हैं।

11. पूरी दुनिया में सालाना 30 लाख टन चाय का उत्पादन
होता है। मतलब कि 3000000000 (3 अरब) किलोग्राम।

12. काली चाय की सबसे ज़्यादा खपत भारत ने ही होती है।
13. भारत में हर व्यक्ति हर साल करीब 750 ग्राम चाय का सेवन करता है।
14. अमेरिका में 80% चाय की खपत “Ice-Tea ” के रुप में होती है।
15. 82% रशियन हर रोज़ चाय पिते है।
16. तूर्की का लगभग हर व्यक्ति हर रोज़ करीब 10 कप चाय पीता है।
17. खाली पेट ब्लैक टी पीने से पेट फूलता है।
18. स्ट्रांग चाय पीने वालों को अल्सर होने का खतरा रहता है।
19. चाय में कैफीन, एल-थायनिन और थियोफाइलिन होता है। इससे खाली पेट पीने से अपच हो सकती है।
20. एक दिन में 4-5 कप चाय पीने से पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर की संभावना हो सकती है।
21. चाय में एंटीऑक्सीडेंट शामिल होता है। चाय उम्र बढ़ने से आपके शरीर की रक्षा करती है।
22. रोज़ छह कप से अधिक चाय पीने से दिल की बीमारी होने का खतरा एक तिहाई तक कम हो सकता है।
23. चाय वास्तव में फ्लोराइड और में टैनिंन से बनी होती है जो प्‍लेग को दूर रखता है। इसीलिए स्वस्थ दांतों और मसूड़ों के लिए चाय लाभदायक है ।

आइये जानें एंड्राइड मोबाइल में पाये जाने वाले सेंसर्स के बारे में!

    


आज आप इस पोस्ट में जानेंगे की आपके आधुनिक एंड्राइड फ़ोन में कितने सेंसर है। और कौनसा सेंसर क्या काम करता है, भारत में आज एंड्राइड फ़ोन लगभग 70% से ज्यादा लोग इस्तेमाल कर रहे है, अभी तक सबसे ज्यादा मशहूर ऑपरेटिंग सिस्टम एंड्राइड है, और यह सबसे जल्दी मशहूर हुआ, इससे पहले सिम्बियान और जावा भी आया लेकिन एंड्राइड से ज्यादा अभी तक कोई ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं चला, आज एंड्राइड का ऑपरेटिंग सिस्टम ऐपल के आई ओ एस (IOS) को भी टक्कर देने का दम रखता है, और लोगो को अब यह ऐपल से ज्यादा पसंद आ रहा है, क्योकि हर दिन एंड्राइड फ़ोन्स में कुछ न कुछ नया आ रहा है, और वो  वाजिब दाम में, इसी वजह से आज एंड्राइड सबसे ज्यादा चलने वाला OS बन गया है।
हर एंड्राइड फ़ोन में कुछ ऐसे फीचर होते है जिससे फ़ोन और भी ज्यादा अच्छा लगने लगता है, आज हम बात करेगे एंड्राइड फ़ोन के सभी सेंसर की, और ये भी जानेंगे की कौनसा सेंसर क्या काम करता है।
सेंसर को हिंदी में ज्ञानेंद्री या संवेदक भी कहते है, या फिर आप ये भी कह सकते है के आपके इशारो समझने वाला कंप्यूटर तो हम सबसे पहले बात करते है सबसे साधारण पर जरुरी सेंसर की जिसे लेत सेंसर कहते है।

 android mobile sensors
1. Light Sensor – लाइट सेंसर फ़ोन की लाइट को कण्ट्रोल करता है और जब भी आप कम लाइट में आते है, या अँधेरे में जाते है तो आपके फ़ोन की डिस्प्ले की लाइट भी कम हो जाती है, जिससे अँधेरे में आपकी आँखे कमजोर न हो, और साथ ही फ़ोन की बैटरी भी ज्यादा देर तक चले।
ठीक इसी तरह यह सेंसर ज्यादा तेज़ रौशनी में जाने पर डिस्पले की लाइट को तेज़ भी कर देता है, जिससे आप धुप या तेज़ रौशनी में भी फ़ोन को चला सके।
2. Proximity Sensor – ठीक लाइट सेंसर की तरह प्रोक्सिमिटी सेंसर भी फ़ोन में लाइट को कण्ट्रोल करने का काम करता है, लेकिन यह लाइट को कम या ज्यादा नहीं करता, यह लाइट को बंद या चालू करता है।
जब भी किसी को फ़ोन लगाते है और बात करते वक्त जब आप फ़ोन को अपने काम पर लगाते है तो यह सेंसर फ़ोन की लाइट बंद कर देता है, इससे फ़ोन की बैटरी ज्यादा चलती है, और जब बिना वजह फ़ोन की लाइट चालू भी नहीं रहती।
3. Accelerometer – एक्सीलेरोमीटर का सेंसर पता लगता है की आपका फ़ोन किस दिशा में मुड़ा हुआ है, यह सेंसर आपके फ़ोन में विडियो देखने में काफी सहायता करता है, जब भी आप अपने फ़ोन को टेढ़ा करेंगे तो आपको फ़ोन की डिस्पले भी टेड़ी ( Rotate ) हो जाएगी।
4. Gyroscope Sensor – ग्यरोस्कोपे सेंसर एक्सीलेरोमीटर की तरह कुछ हद तक काम करता है है, लेकिन यह सेंसर एक्सीलेरोमीटर से ज्यादा असरदार है, एक्सीलेरोमीटर आपके फ़ोन में सिर्फ डिस्प्ले को घूम सकता है, लेकिन ग्यरोस्कोपे सेंसर की वजह से आपका फ़ोन यह भी पता कर सकता है की आप आगे झुके हुए है या पीछे की और ज्यादा झुके हुए है, इस सेंसर का सबसे ज्यादा इस्तेमाल गेम खेलने के लिए होता है।
5. Magnetometer – मैग्नेटोमीटर आजकल बिकने वाले सभी नए फ़ोन में आता है, इसकी मदद से आप यह पता कर सकते है की किस दिशा में पूर्व या किस दिशा में पश्चिम है, यह एक दिशा सूचक यन्त्र का काम करता है, क्योकि जंगल में कोई मोबाइल के सिग्नल नहीं आते और रस्ते भी एक जैसे होते है इसलिए जंगलो में घूमने वाले या शिकार करने वाले अक्सर इस यन्त्र का उपयोग करते है।
साथ ही यह सेंसर लोहे की और आकर्षित होता है, अगर आप अपने फ़ोन में metal डिटेक्टर इंसटाल कर ले तो आप अपने फ़ोन को मेटल डिटेक्टर की तरह भी इस्तेमाल कर सकते है।
6. Fingerprint Sensors – आजकल यह सेंसर बहुत सारे फ़ोन्स में आ गया, थोड़े समः पहले यह सेंसर सिर्फ महंगे मोबाइल में आता था, लेकिन अभी एंड्राइड OS भी इसे कम दाम में लेकर आया है, जिसकी मदद से आप अपने फ़ोन को सुरक्षित रख सकते है, अपनी उंगलियो के निशान से फ़ोन को लॉक लगा सकते है, जिसके बाद फ़ोन सिर्फ आपकी ऊँगली के निशान से ही खुलेगा, और यह बहुत सुरक्षित लॉक है, कोई और इस लॉक को अपनी फिंगर से कभी भी नहीं खोल सकता।
7. Thermometer – थर्मामीटर को तो आप सभी जानते होंगे, क्योकि यह हर डॉक्टर के पास आपको दिख जाता है, लेकिन एंड्राइड फ़ोन का थर्मामीटर थोड़ा अलग होता है, यह आपका बुखार तो नहीं बताता लेकिन आपके दिल की धड़कन का पता लगा लेता है, साथ ही यह आपको बताता है की आपकी सेहत कैसी है, आजकल एंड्राइड OS शरीर की सेहत को भी ध्यान में रखकर बनाया जा रहा है, और अब फ़ोन में ऐसे सेंसर भी आ गए है जो आपके शरीर का ध्यान रखेंगे साथ ही आपको वजम करने में, या दौड़ लगाने में मदद करेंगे।
8. Air Humidifier Sensor – आज कल यह सेंसर कुछ ही फ़ोन में आ रहा है, जो आपको यह बतात है की आपके आस पास का मौसम कैसा है, आपके आस पास कितनी गर्मी या सर्दी है, इस सेंसर का कोई खास इस्तेमाल नहीं, इसलिए यह कुछ ही फ़ोन में है जो शायद भारत में उपलब्ध भी नहीं।
9. Measure Distance Sensor – आजकल कुछ नए फ़ोन में लंबाई और चौड़ाई नापने वाला सेंसर भी आ गया है, जिसकी मदद से आप कमरे के एक कोने में खड़े होकर यह चेक कर सकते है की इस कमरे की लंबाई कितनी है, या चौड़ाई कितनी है, इस सेंसर का इस्तेमाल अक्सर मेज़रमेंट लेने वाले है, हमने कुछ इंटीरियर डिज़ाइनर को यह सेंसर इस्तेमाल करते हुए देखा भी है।
10. Universal Remote Sensor – और अंत में सबसे आखिर का जो सेंसर है वो भी अब नए फ़ोन्स में आने लगा है, जिसकी मदद से हम अपने घर में हर चीज़ जो रिमोट से कण्ट्रोल होती है वो कण्ट्रोल कर सकते है, जैसे टेलीविजन या AC, सेट आप बॉक्स आदि, यह सेंसर काफी काम का साबित हो रहा है।
तो दोस्तों उम्मीद है आपको यह पोस्ट पसंद आया होगा, हमने सभी तरह के सेंसर के बारे में इस पोस्ट में शेयर किया है, इसके अलावा वजन लेने वाला सेंसर भी फ़ोन में आ चुका है, लेकिन वह फ़ोन भारत में नहीं है, इसलिए हमने शेयर नहीं किया, अगर आपको यह पोस्ट अच्छा लगा तो आप अपने सोशल मीडिया पर इस पोस्ट को जरूर शेयर करें।

प्रेग्‍नेंसी: इन संकेतों से समझ‍िए क‍ि शुरू हो गया है ‘लेबर पेन’

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महिलाओं के लिए प्रेग्नेंसी का सबसे कठिन दौर तब होता है जब उन्हें लेबर पेन यानी कि प्रसव पीड़ा शुरू होती है। हर महिला के लिए लेबर पेन अलग-अलग तरह का होता है। बहुत सी ऐसी महिलाएं होती हैं जिनमें यह दर्द बहुत कम समय के लिए होता है जबकि बहुत सी महिलाएं ऐसी होती हैं जिनमें यह दर्द लंबे समय तक होता है। लेकिन हर महिला को लेबर पेन से होकर गुजरना ही पड़ता है। अक्सर ऐसा होता है कि महिलाएं अपने लेबर पेन को पहचान नहीं पाती। कभी कभी ऐसा भी होता है जब वह फाल्स लेबर पेन को वास्तविक लेबर पेन समझ लेती हैं। इसलिए उन्हें उन लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है जो लेबर पेन के बारे में सही जानकारी देते हैं। आज हम आपको ऐसे ही लक्षणों के बारे में बताने जा रहे हैं।
1. पानी निकलना – प्रसव पीड़ा का यह सबसे सटीक लक्षण है। इस दौरान वह द्रव्य जिनमें शिशु लिपटे होते हैं, वह बाहर निकलने लगता है। इन द्रवों को एमनियोटिक द्रव कहते हैं जिनका बाहर निकलना इस बात का सूचक है कि अब आपका बच्चा बाहर आने ही वाला है।
2. श्लेम का निकलना – खून जैसे रंग वाले या फिर भूरे रंग का श्लेम यानी कि म्यूकस का निकलना भी लेबर पेन का लक्षण है। गर्भाशय की ग्रीवा पर लगे श्लेम का डाट बाहर आ जाना भी प्रसव के नजदीक होने की सूचना देता है।
3. पीठ में दर्द होना – प्रेग्नेंसी के दौरान पीठ दर्द की समस्या हो सकती है। लेकिन अगर यह पीठ दर्द लंबे समय तक हो या फिर ज्यादा दर्द हो तो समझ लीजिए कि यह लेबर पेन का लक्षण है।
4. बच्चे का नीचे खिसकना – जब बच्चे का सिर आपके श्रोणि से नीचे की ओर खिसकना शुरू हो जाए तब समझ जाइए कि आपको लेबर पेन शुरू होने वाला है। इसके अलावा अगर लगातार दबाव के साथ-साथ दर्द महसूस हो रहा हो और बार बार पेशाब के लिए जाना पड़ रहा हो तो यह भी लेबर पेन का संकेत होता है।
डॉक्टर से कब मिलें – अगर आपको लगातार दर्द हो रहा हो और दर्द कम होने की बजाय बढ़ता जा रहा हो तो आपको तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसके अलावा अगर शिशु की हलचल कम लग रही हो या फिर योनि से पानी या ब्लड निकल रहा हो ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से संपर्क 
करना चाहिए।

डॉक्टर या दाई को कब बुलाएं:

अगर आप निश्चित तौर पर प्रसव-पीड़ा के बारे में नहीं जानती, तो डॉक्टर या दाई को बुलाएं. वह उन महिलाओं के बुलावे के आदी होते हैं, जो प्रसव में हैं लेकिन इसके बारे में जानती नहीं हैं, साथ ही वे यह भी जानते हैं कि किनको सलाह देनी चाहिए.

अपने डॉक्टर या दाई को बुलाएं यदिः-
• आपके गर्भ के तरल पदार्थ की थैली टूट गई हो

• आपकी योनि से खून बह रहा है

• आपको बुखार, तीखा सरदर्द हो, देखने में पहले के मुकाबले बदलाव आया हो या पेट में दर्द हो

क्या हरेक दर्द प्रसव-पीड़ा नहीं भी हो सकता है.

हां आपको झूठी प्रसव-पीड़ा भी हो सकती है अगर आपका सर्विक्स नहीं खुलता (आपका डॉक्टर या दाई आपकी जांच कर इसे बेहतर बता सकते हैं) और आपका खिंचाव लगातार और तीखा नहीं है और आपके पेट या पीठ का कोई भी दर्द एक गरम स्नान या मसाज से ही ठीक हो जाता है.

क्या पहले से प्रसव-पीड़ा को समझा जा सकता है.

शायद. हालांकि आप इसके बारे में बाखबर नहीं होंगे, लेकिन आपका शरीर बच्चों को जन्म देने के एक महीने पहले ही तैयार होने लगता है. कुछ महिलाओं में—
• सर्विक्स पहले ही खुलने लगता है

• बच्चे का सिर जन्म की स्थिति में आने लगता है

• योनि से होने वाला रिसाव बढ़ने लगता है

• ब्रेक्सटन हिक्स कांट्रैक्शंस (जिसे अभ्यासी खिंचाव के नाम से भी जाना जाता है जिसमें गर्भ की पेशियां गर्भावस्था के बीच से ही 30 से60 सेकंड के लिए खिंचने लगती हैं) नियमित और तीव्र हो जाती हैं.

शाहरुख़ ख़ान की 52 ख़ास बातें!

    


बॉलीवुड के बेताज बादशाह शाहरुख़ ख़ान आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. हर उम्र के लोगों में उनकी फैन फॉलोइंग है. 2 नवंबर 1965 को जन्मे शाहरुख़ खान से जुड़ी 52 खास बातें.
1. शाहरुख ख़ान का जन्म 2 नवंबर 1965 को ताज मोहम्मद ख़ान और लतीफ़ फ़ातिमा के घर हुआ था. लेकिन शुरुआती पांच सालों तक उनकी नानी ने पहले मैंगलोर और फ़िर बैंगलोर में उनका पालन किया.
2. शाहरुख अपने नाना नानी के साथ रहते थे. उनके नाना मैंगलोर पोर्ट के मुख्य अभियंता थे. हार्बर हाउस जहां मैंगलोर में वो रहे, आज उसे देखने टूरिस्ट पहुंचते हैं.
3. शाहरुख की मां हैदराबाद से, पिता पेशावर से और दादी कश्मीर से हैं.
4. दिल्ली में पले बढ़े शाहरुख सैंट कोलंबास स्कूल में पढ़ाई के दौरान खेलों में काफ़ी रूचि लेते थे. बाद में उन्होंने हंसराज कॉलेज से अर्थशास्त्र में बीए पास किया और जामिया मिलिया इस्लामिया में मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया लेकिन इसकी पढ़ाई को पूरा नहीं कर सके.
5. फ़ुटबॉल खेलने के दौरान घायल हुए शाहरुख़ से थियेटर डायरेक्टर बैरी जॉन ने एक बार अपनी एक नाटक के लिए ऑडिशन देने को कहा. इसमें उन्हें एक डायलॉग के साथ प्रमुख डांसर का किरदार मिला. हालांकि बैरी जॉन शुरुआत में उनकी गाने की काबिलियती से काफ़ी प्रभावित थे.
6. शाहरुख जब 15 साल के थे तब कैंसर से उनके पिता का निधन हो गया. उनके पिता वकील और स्वतंत्रता सेनानी थे. वो जब 14-15 साल के थे तो स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल गए. बाद में वो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के ख़िलाफ़ चुनाव भी लड़े लेकिन हार गए. उन्होंने कई बिजनेस में हाथ आजमाए लेकिन असफल रहे.
7. शाहरुख का नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के साथ नजदीकी रिश्ता रहा. उनके पिता 1974 तक एनएसडी में मेस चलाते थे और तब शाहरुख़ अपने पिता के साथ वहां जाया करते. वहां उन्हें रोहिणी हटंगड़ी, सुरेखा सिकरी, रघुवीर यादव, राज बब्बर जैसे कलाकार अभिनय करते दिखते. वो इब्राहिम अलकाज़ी के साथ रहते और 'सूरज का सातवां घोड़ा' जैसे नाटकों का रिहर्सल देखते. इस प्रकार अभिनय और सिनेमा से उनका जुड़ाव शुरू हुआ.
8. शाहरुख़ ख़ान की पहली कमाई 50 रुपये की थी जो उन्होंने पंकज उधास के कंसर्ट के दौरान कमाया. इस कमाई के पैसे से वो ट्रेन से आगरा गए.
9. दिल्ली में ये लेख टंडन थे जिन्होंने 1988 में उन्हें दिल दरिया सीरियल में काम दिया. उनकी शर्त थी कि शाहरुख़ को अपने बाल काटने होंगे.
10. हालांकि, उनका पहला टीवी सीरियल कर्नल कपूर द्वारा निर्देशित फ़ौजी (1989) था. कर्नल कपूर ने कुछ लड़कों को दौड़ा कर देखा. केवल कुछ ही लड़के वापस लौटे जिनमें शाहरुख़ भी एक थे. शाहरुख़ उनके साथ फ़ौजी के लिए चुन लिए गए.
11. शाहरुख़ जब छोटे थे तो उनकी सेना में जाने की तमन्ना थी और उन्होंने आर्मी स्कूल कोलकाता में एडमिशन भी लिया लेकिन उनकी मां इसके लिए राजी नहीं हुईं.
12. शाहरुख़ और उनके चार स्कूली दोस्तों के प्रसिद्ध गैंग थे जिसे वो सीगैंग कहते थे. प्रतिद्वंद्वी स्कूल गैंग जैसे पीएलओ गैंग, सरदार गैंग के जवाब में उसका एक लोगो था. बाद में उन्होंने ऐसा ही एक किरदार फ़िल्म जोश में निभाया जहां वो एक गैंग के हिस्सा हैं.
13. एक आर्मी वाले की बेटी गौरी छिब्बा के स्कूल के दौरान ही शाहरुख़ की उनसे मुलाकात हुई. एक डांस पार्टी के दौरान दोनों की आपस में बातचीत हुई और तब से दोनों में रिश्ता पनपने लगा. एक बार जब गौरी अपने दोस्तों के साथ छुट्टी मनाने मुंबई गई थीं तो शाहरुख़ ख़ान भी मुंबई पहुंच गए, बिना यह जाने की उन्हें कहां ढूंढेंगे. यह जानते थे कि उन्हें तैराकी पसंद है, वो मुंबई के सभी समुद्र तटों पर उन्हें ढूंढते रहे और अंत में एक बीच पर उन्हें तलाश लिया. उस दौरान रात को उन्हें रेलवे स्टेशन पर अपनी रात गुजारनी पड़ी. इन दोनों की शादी 25 अक्तूबर 1991 को हुई.
14. शाहरुख़ को गौरी से मुलाकात की तारीख़ 09.09.1984 याद है, ये वही तारीख़ है जब उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस भी मिला था.
15. वागले की दुनिया, दूसरा केवल सरीखे सीरियल में काम करने के बाद शाहरुख़ को टीवी सीरियल सर्कस (1989-90) में रेणुका शहाने के साथ काम मिला. तब उनकी मां बेहद बीमार थीं और उन्हें दिल्ली के बत्रा अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उन्होंने अपनी मां को सर्कस का एक एपिसोड दिखाने की ख़ास अनुमति ली, लेकिन वो इतनी बीमार थीं कि शाहरुख़ को पहचान तक नहीं सकीं. अप्रैल 1991 में उनकी मौत हो गई.
16. मां के निधन के दर्द के उबरने के लिए शाहरुख एक साल के लिए मुंबई आए और फ़िर कभी वापस नहीं लौटे.
17. शाहरुख़ ने 1991 में मणि कौल की टीवी फ़िल्म इडियट में नकारात्मक भूमिका निभाई. लेकिन पहली बार कैमरा प्रदीप किशन और अरुंधती रॉय की फ़िल्म 'इन विच एनी गिव्स इट दोज़ वन्स' के लिए फेस किया. हालांकि, फ़िल्म में उनका किरदार कम कर दिया गया.
18. 1991 में उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म हेमा मालिनी 'दिल आसना है' साइन किया. जबकि मुख्य अभिनेता के रूप में उनकी पहली फ़िल्म 25 जून 1992 को 'दीवाना' आई.
19. राहुल नाम तो सुना होगा- डर, दिल तो पागल है, कुछ कुछ होता है, ज़माना दीवाना, यस बॉस, कभी खुशी कभी गम, चेन्नई एक्सप्रेस समेत 9 फ़िल्मों में शाहरुख़ का नाम राहुल था.
20. राज नाम भी शाहरुख़ ख़ान को प्रिय रहा. राजू, डीडीएलजे, बादशाह, मोहब्बतें, रब ने बना दी जोड़ी में उनका यही नाम था.
21. रुपहले पर्दे पर शाहरुख़ की कई फ़िल्मों में मौत हो जाती है. बाज़ीगर, डर, अंजाम, दिल से, राम जाने, डुप्लीकेट, देवदास, शक्ति, कल हो ना हो, ओम शांति ओम, रा-वन, करण अर्जुन (इसमें पुनर्जन्म भी हुआ).
22. शाहरुख़ कठिन मेहनत के लिए जाने जाते हैं, वो केवल 4-5 घंटे सोते हैं. उनका फेवरेट लाइन है कि सोना जीवन को बर्बाद करना है.
23. शाहरुख़ अपनी बेटी के लिए एक किताब लिख रहे हैं, जिसमें वो अभिनय पर अपना नजरिया बताएंगे. अनुपम खेर के टीवी शो में उन्होंने अपनी किताब के नाम का खुलासा किया- टू सुहाना, ऑन एक्टिंग, फ्रॉम पापा. उन्होंने इस शो में यह भी बताया कि वो अपनी बेटी को एक अभिनेत्री के रूप में देखना चाहते हैं.
24. शाहरुख़ एक दशक से भी अधिक समय से अपनी जिंदगी पर एक किताब लिख रहे हैं. उन्होंने इसे निर्माता-निर्देशक महेश भट्टे के अनुरोध पर लिखना शुरू किया.
25. शाहरुख़ और सलमान ने 1996 में महमूद की बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म दुश्मन दुनिया में साथ काम किया था. इसमें उनका स्पेशल अपियरेंस था.
26. पत्नी और बच्चों के अलावा शाहरुख़ के साथ उनकी बड़ी बहन लालारुख़ रहती हैं. वो एमए, एलएलबी हैं.
27. दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे की कहानी सुनने के समय अधिकतर क्रू को लगा कि शाहरुख़ ने फ़िल्म के लिए ना कह दिया है. वो सैफ़ अली ख़ान को लेने की सोच रहे थे. तब शाहरुख़ एक रोमांटिक फ़िल्म नहीं करना चाहते थे. लेकिन उन्होंने हां कहा और फ़िल्म में एक्शन और फ़ाइट के सीन जोड़े.
28. डीडीएलजे की शूटिंग खेतों में किए जाने का जब किसानों ने विरोध किया तो शाहरुख़ ख़ान ने ख़ास हरियाणवी लहजे में उन्हें इसके लिए राजी किया, तब जा कर 'तुझे देखा तो ये जाना सनम...' शूट की गई.
29. डीडीएलजे की शूटिंग का कुछ हिस्सा शूट करने के दौरान ही वो त्रिमूर्ति की भी शूटिंग में भाग ले रहे थे.
30. शाहरुख़ ने फ़िल्म जोश में 'अपुन बोला...' गाना भी गाया है.
31. एक युवा के रूप में शाहरुख़ ख़ान कुमार गौरव से मिलना चाहते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वो कुमार गौरव के जैसे दिखते हैं.
32. शाहरुख़ को फ़ौजी के दौरान पहली बार अपने फैन का सामना करना पड़ा. एक बार वो दिल्ली के पंचशील पार्क इलाके में थ्रीव्हिलर में जा रहे थे तभी दो महिलाएं चिल्लाईं 'देख अभिमन्यु राय'. फ़ौजी में उनके किरदार का यही नाम था.
33. शाहरुख़ का पेशावर से भी संबंध है. वो 1978-79 के दौरान वहां गए थे. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उनकी चचेरी बहन नूर जहां ने बताया कि वो यहां आकर बहुत खुश थे क्योंकि यह पहला मौका था जब वो अपने पिता के परिवार से मिल रहे थे. भारत में केवल उनकी मां के परिवार से संबंधी रहते हैं.
34. शाहरुख़ रामलीला में भी काम कर चुके हैं. छाबरा रामलीला नई दिल्ली के साथ. वो वानर सेना में हुआ करते थे.
35. रामलीला में ब्रेक के दौरान वो उर्दू की शायरी कहा करते और इसके एवज में उन्हें 1 रुपये का ईनाम मिला करता था.
36. अपने फैन से बचने के लिए शाहरुख़ को एक बार कार की डिक्की में भी सवारी करनी पड़ी थी.
37. लॉस एंजिल्स में एक स्टेज शो के दौरान मैडोना देखने पहुंची तो शाहरुख़ अपनी स्टेप्स भूल गए.
38. बॉलीवुड की एक कॉमेडी है 'आमिर सलमान शाहरुख़' जिसमें आमिर, सलमान और शाहरुख़ ख़ान के डुप्लिकेट ने काम किया.
39. शाहरुख़, आमिर और सैफ़ ने एक साथ 1993 में फ़िल्म पहला नशा में एक कैमियो की भूमिका निभाई.
40. बेंगलुरु में अपने नाना नानी के साथ रहने के दौरान शाहरुख़ के पड़ोसी अभिनेता महमूद थे.
41. शाहरुख़ को खिलौनों से अब भी बहुत लगाव है.
42. शाहरुख़ के पिता घर पर हिन्दको भाषा बोलते थे, यह पाकिस्तान में बोली जाने वाली एक पंजाबी बोली है.
43. स्कूल के दौरान शाहरुख़ हिंदी में कमजोर थे. जब एक बार उन्हें 10 में दस अंक मिले तो उनकी मां उन्हें देवानंद की फ़िल्म जोशीला दिखाने ले गईं.
44. एक टीवी शो में शाहरुख़ ने बताया कि जन्म के बाद उन्होंने पहला शब्द चम्पा बोला था. ये उस महिला का नाम था जो उनके पड़ोस में रहती थीं.
45. शाहरुख़ को उनके जन्म पर चांदी का टब उपहार में दिया गया था.
46. शाहरुख़ के ट्विटर पर लगभग तीन करोड़ फॉलोवर हैं.
47. शाहरुख़ को फ़िल्मों में घुड़सवारी और किसिंग सीन से डर लगता है.
48. शाहरुख़ के पापा और बहन घुड़सवारी किया करते थे. दोनों भाई बहन का नाम उनके पिता के घोड़े के नाम पर रखा गया है.
49. 1998 में जी सीने अवार्ड के लिए सर्वेश्रेष्ठ अभिनेता चुने जाने पर उन्होंने स्टेज पर सलमान ख़ान को बुलाया और उनकी ओर से सभी का शुक्रिया अदा करने को कहा क्योंकि सलमान को लगता है कि सारे अवार्ड्स शाहरुख़ को मिल जाते हैं उन्हें नहीं.
50. शाहरुख़ ऐसे पहले बॉलीवुड एक्टर हैं जिन्हें मलेशिया के (नाइटहुड के समान) प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा गया है. 2014 में उन्हें फ्रांस के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार लिजन ऑफ़ ऑनर दिया गया. 2005 में उन्हें पद्म श्री मिला. यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबर्ग से डॉक्टरेट की उपाधि भी मिली.
51. 2004 में शाहरुख़ ख़ान टाइम मैगज़ीन के कवर पर भी आए.
52. फोर्ब्स मैगज़ीन ने शाहरुख़ ख़ान को दुनिया के 10 सर्वाधिक कमाई करने वाले अभिनेताओं में आठवें नंबर पर रखा है.