Shamsher ALI Siddiquee

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एयर फ़ोर्स वन कि खूबियाँ!

    


दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क के मुखिया अमेरिकी राष्ट्रपति  हैं।  जानिए उनके सुरक्षा दस्ते के तीन सबसे महत्वपूर्ण हिस्से प्लेन एयरफोर्स वन, हेलीकॉप्टर मरीन वन और कार कैडिलैक...द बीस्ट की खूबियां।
एयरफोर्स वन

एयरफोर्स वन यानी नीले-सफेद रंग का वो विमान जिसके जितने अफसाने, उससे कहीं ज्यादा फसाने हैं। एयरफोर्स वन यानी वो विमान जिसे खासतौर से अमेरिकी राष्ट्रपति के हवाई सफर के लिए बनाया गया है। सबसे ताकतवर मुल्क का वो शख्स जिस पर 24 घंटे खतरा मंडराता रहता है, क्योंकि वो अमेरिकी ताकत का केंद्र होता है। ये महज विमान नहीं है, बल्कि अमेरिकी सत्ता, ताकत, प्रतिष्ठा और दुनिया पर उसके असर का प्रतीक भी है। माना जाता है कि ये विमान दुनिया का सबसे महंगा विमान है। इस विमान पर एक घंटे की उड़ान का खर्च करीब 68 हजार डॉलर बैठता है। नीले और सफेद रंग का ये विमान देखने में तो खूबसूरत है ही, इसमें ऐशो-आराम और सुरक्षा के भी ऐसे इंतजाम हैं जिसे जानकर कोई भी हैरान रह जाए।
इसके बारे में किंवदंतियां ऐसी हैं जिन्हें सुनकर यकीन करना मुश्किल है, मसलन-हवा में उड़ता किला एयरफोर्स वन घातक लेजर से लैस है, जो उसके लिए खतरा बने विमान पर हमले के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर दुश्मन विमान नजदीक आ जाए तो एयरफोर्स वन अपनी मिसाइलों से उसे मार गिरा सकता है। दुश्मन विमान मिसाइल से बच निकले तो उसे सबक सिखाने के लिए एयरफोर्स वन के डैनों में छुपी मशीनगन भी हैं। इतना सबकुछ होने के बावजूद अगर कोई दुश्मन विमान एयरफोर्स वन को नुकसान पहुंचा ही दे, तब राष्ट्रपति को बचाने के लिए जहाज में एक इस्केप पॉड यानी बचाव के लिए खास तरह का कैप्सूल भी मौजूद है। हॉलीवुड की मशहूर फिल्म एयरफोर्स वन में इस बचाव कैप्सूल का इस्तेमाल दिखाया गया था तभी से ये माना जाने लगा है कि एयरफोर्स वन में इस्केप पॉड भी है।
हालांकि ये एक बड़ा बोइंग 747-200B जेट ही है, जिसे खास राष्ट्रपति की जरूरत के मुताबिक ढाला गया है। इनकी संख्या दो है। इन दोनों ही विमान को नाम दिया गया है VC-25A। तकनीकी रूप से एयरफोर्स वन, राष्ट्रपति के विमान का रेडियो संदेश में पुकारा जाने वाला नाम है। हवा में उड़ते हुए ओबामा का पूरा दफ्तर इस विमान से संचालित होता है। आम तौर पर कुल 70 यात्री और 23 चालक दल एयरफोर्स वन पर सफर कर सकते हैं। किसी भी बोइंग-747 की तरह ये भी तीन मंजिला विमान है। आमतौर पर ओबामा जब एयरफोर्स वन से हाथ हिलाते हुए नीचे उतरते हैं, तो वो बीच की मंजिल से निकल रहे होते हैं लेकिन उससे ऊपर और नीचे के दरवाजों का इस्तेमाल भी जहाज पर सवार होने या उतरने के लिए किया जा सकता है।
इसमें हवा में ईंधन भरा जा सकता है। इसमें कॉकपिट, कम्युनिकेशन रूम, राष्ट्रपति का दफ्तर, डाइनिंग रूम , अफसरों का कमरा, 85 टेलीफोन लाइन, 19 टीवी, दफ्तर और मीडिया की जगह है। एयरफोर्स वन में बुलेट प्रूफ खिड़कियां, सुरक्षा अधिकारी हमेशा तैनात रहते हैं। न्यूक्लियर धमाके से सुरक्षा, छुपा इंफ्रारेड गाइडेंस सिस्टम, वरिष्ठ अधिकारियों का मीटिंग कक्ष, राष्ट्रपति की सुरक्षा टीम, मेडिकल सुविधाएं राष्ट्रपति कक्ष, जिम और ड्रेसिंग रूम भी है।
इतनी सुविधाओं और इतने लोगों को खाना खिलाने के लिए एयरफोर्स वन में करीब 2000 लोगों का खाना हमेशा पैक रहता है, हालांकि एक वक्त पर इस पर सिर्फ 100 लोगों को खाना खिलाया जा सकता है। बेशक, एयरफोर्स वन में हमलावर क्षमताएं तो नहीं हैं, लेकिन दुश्मन से हमले के बचाव के लिए इसमें कई खूबियां हैं। एयरफोर्स वन एक बार में पूरी दुनिया का चक्कर काट सकता है। इसके शीशों से लेकर पूरी बॉडी परमाणु धमाके से निकलने वाली शॉक वेब तक सह सकती है। इसके पिछले हिस्से में दुनिया भर के रडारों को जाम कर देने वाला जैमर मौजूद हैं। सबसे अहम ताकत है इसकी निचली मंजिल में मौजूद हथियारों का जखीरा और अमेरिकी जमीन पर मौजूद परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के लिए रिमोट कंट्रोल रूम।
जी हां, अमेरिकी राष्ट्रपति एयरफोर्स वन पर बैठे-बैठे अमेरिकी परमाणु हथियारों को दागने का आदेश भी दे सकते हैं। हमले से बचाव के लिए इसमें राडार जाम करने वाले इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और मिसाइलों को भटकाने के लिए आग के गोले छोड़ने की भी व्यवस्था है। जबकि दुश्मन के विमान पर हमला करने की जिम्मेदारी एयरफोर्स वन को आसमान पर सुरक्षा देते लड़ाकू जहाज निभाते हैं। फिर भी एयरफोर्स वन को इस तरह के कम्युनिकेशन प्रणाली से लैस किया गया है कि आप इसे उड़ता हुआ व्हाइट हाउस भी कह सकते हैं। साल 2010 में जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत दौरे पर आए थे तब दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट पर खड़े उनके विमान को एक सेकेंड के लिए भी बंद नहीं किया गया था। दो दिन के दौरान एयरफोर्स वन ने करीब डेढ़ सौ करोड़ का ईंधन फूंक डाला। एयरफोर्स में कुल जगह की बात की जाए तो इसमें करीब 4000 वर्गफुट जगह है।
मरीन वन

जिस तरह से लंबी दूरी की हवाई यात्रा के लिए एयरफोर्स वन अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए उड़ते हुए व्हाइट हाउस का किरदार निभाता है। ठीक उसी तरह से अमेरिका और बाकी देशों में छोटी दूरी के सुरक्षित सफर के लिए इस्तेमाल किया जाता है मरीन वन। एयरफोर्स वन के रनवे पर उतरते ही अगर एयरपोर्ट से मंजिल की दूरी दस किलोमीटर से ज्यादा हो तो मिस्टर प्रेसिडेंट सड़क की बजाय मरीन वन में सवार हो जाते हैं यानी वो हेलीकॉप्टर जो एयरफोर्स वन की तरह ही बेहद खास है।
सुरक्षा उपाय के तहत मरीन वन हमेशा एक जैसे दिखने वाले पांच हेलीकॉप्टरों के ग्रुप के तौर पर आसमान पर उड़ता है। पांच हेलीकॉप्टर में से किसी एक में अमेरिकी राष्ट्रपति होते हैं, लेकिन पांच हेलीकॉप्टरों के दल के वजह से ये पहचानना मुश्किल होता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति किस हेलीकॉप्टर में सफर कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति किस मरीन वन में उड़ रहे होते हैं, इसका पता सिर्फ चुनिंदा अफसरों और सीक्रेट सर्विस के एजेंट्स को ही होता है, लेकिन इस हेलीकॉप्टर की सुविधाओं और ताकत के बारे में कोई सस्पेंस नहीं है।
ओबामा जिस मरीन वन में उड़ते हैं, वो वीएच-थ्री की पीढ़ी का हेलीकॉप्टर है। इस शानदार हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल अमेरिकी नौसेना करती है। मरीन वन में भी अमेरिकी राष्ट्रपति का छोटा सा दफ्तर है। इस उड़ते हुए दफ्तर में वो दो-चार लोगों के साथ मीटिंग भी कर सकते हैं। इस हेलीकॉप्टर में करीब 14 लोग सफर कर सकते हैं। मरीन वन को यूएस मरीन कॉर्प्स की मरीन हेलीकॉप्टर्स की नाइट हॉक्स स्क्वाड्रन ऑपरेट करती है। इसे समंदर का राजा कहा जाता है। 1957 में इसका प्रयोग शुरू हुआ था। इसे उड़ाने से पहले मरीन एविएटर्स को एक सख्त जांच प्रक्रिया से गुजरना होता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति अमेरिका या विदेश में जब विशेष दौरे पर होते हैं तब उनके पहुंचने से पहले ही C-17 या C-5 मालवाहक विमान के जरिए मरीन वन और कैडिलेक को वहां पहुंचा दिया जाता है। अमेरिका में जब भी नया राष्ट्रपति सत्ता संभालता है तब प्रेसिडेंशियल इनॉगरेशन की परंपरा के मुताबिक रिटायर हो रहे राष्ट्रपति को कैपिटॉल से एंड्रेयू एयरबेस तक पहुंचाने की परंपरा मरीन वन हेलीकॉप्टर ही निभाता है।
मरीन वन की खासियतों की बात करें तो मरीन वन फौजी ग्रेड का हेलीकॉप्टर है। इस ताकतवर हेलीकॉप्टर के कवच को गोली या मिसाइल नहीं भेद सकती। मरीन वन थर्मल गाइडेड मिसाइल काउंटर वार फेयर से भी लैस है यानी गर्मी के आधार पर टारगेट तय करने वाली मिसाइलों को ये गच्चा दे सकता है। इसके काउंटर राडार सिस्टम दुश्मन के राडार को जाम कर सकते हैं।
कैडिलेक...बीस्ट

अमेरिकी राष्ट्रपति जिस कार में सफर करते हैं वो कैडिलेक वन है, जिसे बीस्ट भी कहा जाता है। बीस्ट में किसी विशालकाय जानवर से भी ज्यादा ताकत है। 18 फीट लंबी, साढ़े सात टन भारी और 60 मील प्रतिघंटे की रफ्तार से दौड़ सकने वाली बुलेट प्रूफ बीस्ट में ऐसे कई सिस्टम लगे हुए हैं, जिनकी वजह से ये कार बड़े आतंकी हमले के वक्त भी अमेरिकी राष्ट्रपति को बचाने में सक्षम है।
बीस्ट की खूबियों के तर्ज पर दुनिया के तमाम देशों ने अपने राष्ट्राध्यक्षों के लिए ऐसी ही कार का इंतजाम किया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति की कार उन सबमें सबसे सुरक्षित और सबसे अनोखी है। एक निगाह में अगर इसमें मौजूद सुविधाओं पर नजर डालें तो बीस्ट का बुलेट प्रूफ पेट्रोल टैंक इसे बड़ी सुरक्षा देता है। इसे एक विशेष फोम से सील किया जाता है, जिससे इसमें आग लगने की सूरत में धमाका नहीं होता।
बीस्ट में चार लोगों के बैठने की जगह है। बुलेट प्रूफ 8 इंच मोटे दरवाजे की वजह से इस कार को बम से निशाना नहीं बनाया जा सकता। इसका ड्राइवर CIA का प्रशिक्षित सीक्रेट एजेंट होता है। उसके लिए सिर्फ 3 इंच खुलने वाला शीशा भी कार में है, जिससे वो बाहर मौजूद एजेंट से बात करता है। अत्याधुनिक स्टीयरिंग और ट्रेनिंग की बदौलत ड्राइवर बीस्ट को हर खतरे से बचाने में सक्षम है। GPS ट्रैकिंग डिवाइस और पंक्चर न होने वाले स्टील रिम टायर इसे खास ताकत देते हैं। रात में देखने वाला कैमरा, आंसू गैस उपकरण भी बीस्ट का हिस्सा हैं।
बीस्ट को दुनिया की सबसे सुरक्षित कार कहा जाए तो गलत नहीं होगा। कार का खोल-बख्तरबंद फौजी गाड़ियों जैसा है। इसे स्टील, एल्मुनियम, टाइटेनियम और सिरेमिक से बनाया गया है। इस पर आम रॉकेट लांचर का असर नहीं होता। दरवाजे आठ इंच मोटे होते हैं, कार की चेसिस पांच इंच मजबूत स्टील की है, जो बारूदी सुरंग के फटने पर भी सलामत रहती है। कार के टायर केवलर से बने हैं, जिन पर गोली असर नहीं करती। टायर पंचर हो जाए तब भी इसके रिम इतने ताकतवर हैं कि वो कार को तेज रफ्तार से भगाते रहते हैं। कार के सामने का शीशा इतना मजबूत है कि बख्तरबंद भेदने वाली गोलियां भी इसे नहीं भेद सकतीं। कार का ड्राइवर इतना ट्रेंड होता है कि किसी भी सूरत में वो कार को बचाकर निकाल ले जा सकता है। कार में ड्राइवर और राष्ट्रपति के बैठने का चेंबर एक शीशे से अलग-अलग रहता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा कार मैं बैठे-बैठे वाई फाई, सैटेलाइट फोन और डायरेक्ट लाइन से चौबीसों घंटे उप राष्ट्रपति और अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के संपर्क में रहते हैं।
वैसे तो बीस्ट किसी भी तरह के आतंकी हमले में अमेरिकी राष्ट्रपति को बचाने में सक्षम है, लेकिन इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति के घायल हो जाने की सूरत में उन्हें बचाने के भी भरपूर इंतजाम हैं। कार के अगले हिस्से में राष्ट्रपति के ब्लड ग्रुप वाला खून रहता है, ताकि मुसीबत में उन्हें खून दिया जा सके। यही नहीं कार के पिछले हिस्से में ऑक्सीजन सप्लाई करने का भी इंतजाम रहता है।

घर वापसी जिसने बदल दिया भारतीय इतिहास

    


1915 में एक भारतीय बैरिस्टर ने दक्षिण अफ़्रीका के अपने करियर को त्याग अपने देश वापस आने का फ़ैसला किया.
जब मोहनदास करमचंद गांधी मुंबई के अपोलो बंदरगाह में उतरे तो न वो महात्मा थे और न ही बापू.
फिर भी न जाने क्यों बहुतों को उम्मीद थी कि ये शख़्स अपने ग़ैर-परंपरागत तरीकों से भारत को अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ाद करा लेगा.
उन्होंने भारतवासियों को निराश नहीं किया. इसे इतिहास की विडंबना ही कहा जाएगा कि जब गांधी भारत लौटे तो एक समारोह में उनका स्वागत किया था बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना ने.
ये अलग बात है कि पांच साल के भीतर ही गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र से आने वाले इन धुरंधरों ने अलग-अलग राजनीतिक रास्ते अख़्तियार किए और भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रपिता कहलाए.
1915 से लेकर 1920 के बीच महात्मा गांधी ने किस तरह अपने आपको भारत के राजनीतिक पटल पर स्थापित किया
नौ जनवरी 1915 को जब अरबिया जहाज़ ने मुंबई के अपोलो बंदरगाह को छुआ, उस समय मोहनदास करमचंद गाँधी की उम्र थी 45 साल.
12 साल से उन्होंने अपनी जन्म भूमि के दर्शन नहीं किए थे.
उस ज़माने में सिर्फ़ ब्रिटिश सरकार के ख़ास आदमियों और राजा महाराजाओं को ही अपोलो बंदरगाह पर उतरने की अनुमति दी जाती थी.
गांधी को ये सम्मान सर फ़िरोज़शाह मेहता, बीजी हॉर्निमेन और गोपाल कृष्ण गोखले की सिफ़ारिश पर दिया गया था.
जब गाँधी जहाज़ से उतरे तो उन्होंने एक लंबा कुर्ता धोती और एक काठियावाड़ी पगड़ी पहनी हुई थी.
उनसे मिलने आए लोगों ने या तो यूरोपियन सूट पहने हुए थे या फिर वो राजसी भारतीय पोशाक में थे.
बीमार होते हुए भी उनके राजनीतिक गुरू गोपाल कृष्ण गोखले पूना से उनसे मिलने बंबई आए थे.
एक स्वागत समारोह की अध्यक्षता फ़िरोज़ शाह मेहता ने की थी तो दूसरे समारोह में एक साल पहले जेल से छूट कर आए बाल गंगाधर तिलक मौजूद थे.
इसी समारोह में जब गांधी की तारीफ़ों के पुल बांधे जा रहे थे तो उन्होंने बहुत विनम्रता से कहा था, "भारत के लोगों को शायद मेरी असफलताओं के बारे में पता नहीं है. आपको मेरी सफलताओं के ही समाचार मिले हैं. लेकिन अब मैं भारत में हूं तो लोगों को प्रत्यक्ष रूप से मेरे दोष भी देखने को मिलेंगें. मैं उम्मीद करता हूं कि आप मेरी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करेंगे. अपनी तरफ़ से एक साधारण सेवक की तरह मैं मातृभूमि की सेवा के लिए समर्पित हूं."
कैसरे-हिंद का ख़िताब
दक्षिण अफ़्रीका में अपना लोहा मनवाने के बाद गांधी की ख्याति भारत भी आ पहुंची थी और अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें गंभीरता से लेने का फ़ैसला लिया था.
महात्मा गांधी के पौत्र और उनकी जीवनी लिखने वाले राजमोहन गांधी कहते हैं, "गोखले के कहने पर गांधी बंबई के गवर्नर विलिंगटन से मिले थे और उनके कहने पर उन्हें ये आश्वासन दिया था कि सरकार के ख़िलाफ़ कोई क़दम उठाने से पहले वो गवर्नर को सूचित करेंगे. शायद सरकार भी गाँधी को अपने ख़िलाफ़ नहीं करना चाहती थी, इसलिए उनके भारत आने के कुछ समय के भीतर ही उसने दक्षिण अफ़्रीका में की गई उनकी सेवाओं के लिए कैसरे-हिंद के ख़िताब से नवाज़ा था."
पैरों में वेसलीन
गांधी ने गोखले की सलाह का पालन करते हुए पहले भारत के लोगों को जानने की कोशिश शुरू की. उन्होंने तय किया कि वो पूरे भारत का भ्रमण करेंगे और वो भी भीड़ से भरे तीसरे दर्जे के रेल के डिब्बे से.
तीसरे दर्जे के सफ़र में उनका लंबा कुर्ता और काठियावाड़ी पगड़ी बाधक साबित हुई, इसलिए उन्होंने उसका त्याग कर दिया.
गांधी के एक और जीवनीकार सुई फ़िशर लिखते हैं कि लोगों के छूने से उनके पैर और पिंडली इतनी खुरच जाती थी कि वहां पर गांधी के सहायकों को वेसलीन लगानी पड़ती थी.
बाद में उनकी अंग्रेज़ साथी मेडलीन स्लेड ने, जिन्हें गांधी मीराबेन कहा करते थे ने कुछ पत्रकारों को बताया कि वो खुद गांधी के पैरों को हर रात शैंपू से धोया करती थीं.
विश्वनाथ मंदिर में दक्षिणा देने से इंकार
अपनी भारत यात्रा शुरू करने से पहले गांधी गोखले और तिलक से मिलने पुणे गए. उसके बाद वो राजकोट पहुंचे और फिर रवींद्रनाथ टैगोर से मिलने शांतिनिकेतन. वहीं उन्हें गोखले के निधन की सूचना मिली.
वो वापस पुणे लौटे और शोक के तौर पर उन्होंने चप्पलें पहनना भी छोड़ दीं.
गोखले के शोक समारोह में भाग ले कर वो वापस शांति निकेतन लौटे जहां टैगोर ने उन्हें पहली बार महात्मा शब्द से संबोधित किया. वहां से वो बनारस गए. वहां पर उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर में दक्षिणा देने से इंकार कर दिया.
एक पंडे ने उनसे कहा, "भगवान का ये अपमान तुझे सीधे नर्क में ले जाएगा." इसके बाद गाँधी तीन बार बनारस गए लेकिन उन्होंने एक बार भी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन नहीं किए.
चंपारण आंदोलन
1916 के कांग्रेस अधिवेशन में वो पहली बार जवाहरलाल नेहरू से मिले. वहीं बिहार से राज कुमार शुक्ल आए हुए थे.
उन्होंने गांधी को चंपारण के नील पैदा करने वाले किसानों की व्यथा बताई और किसी तरह उन्हें वहां आने के लिए राज़ी कर लिया.
जब गांधी पटना पहुंचे तो शुक्ल उन्हें नील किसानों के वक़ील डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के निवास पर ले गए. उस समय राजेंद्र प्रसाद अपने घर पर नहीं थे.
राजमोहन गांधी बताते हैं कि राजेंद्र प्रसाद के नौकरों ने गांधी को निम्न जाति का व्यक्ति समझते हुए उन्हें कुएं से पानी निकालने और शौचालय का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी.
बाद में राजेंद्र प्रसाद गांधी के निकट सहयोगी बने और उन्हें स्वाधीन भारत का पहला राष्ट्रपति बनाया गया.
जब चंपारण जाते हुए गांधी की ट्रेन आधी रात को मुज़फ़्फ़रपुर पहुंची तो उनके स्वागत में लालटेन ले कर आए आचार्य कृपलानी उन्हें ढ़ूंढ़ नहीं पाए क्योंकि महात्मा गांधी तीसरे दर्जे में सफ़र कर रहे थे.
चंपारण में गांधी को पहली उपलब्ध ट्रेन से वो जगह छोड़ देने का फ़रमान सुनाया गया.
मोतिहारी की अदालत में गांधी ने कहा, "मैं इस आदेश का पालन इसलिए नहीं कर रहा कि मेरे अंदर क़ानून के लिए सम्मान नहीं है बल्कि इसलिए कि मैं अपने अन्तःकरण की आवाज़ को उस पर कहीं अधिक तरजीह देता हूं."
अंतत: सरकार को नील किसानों की समस्याओं को सुनने के लिए एक जांच कमेटी बनानी पड़ी और महात्मा गांधी को उसका सदस्य बनाया गया.
कमेटी ने एक मत से तिनकठिया व्यवस्था को समाप्त करने की सिफ़ारिश की. ये भारत की धरती पर सत्याग्रह का पहला सफल प्रयोग था.
खेड़ा और सरदार पटेल
गांधी की दूसरी परीक्षा हुई खेड़ा में जहां भारी बारिश के कारण किसानों की सारी फ़सल बरबाद हो गई. स्थानीय किसानों ने लगान माफ़ कराने के लिए गांधी की सहायता मांगी.
गांधी के आह्वान पर 3000 किसानों ने लगान देने से इंकार कर दिया. इस आंदोलन में सरदार पटेल ने गांधी के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम किया. अंतत: किसानों की जीत हुई और सरकार को लगान माफ़ करना पड़ा.
आचार्य कृपलानी ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मैंने अपनी आंखों से देखा कि किस तरह पटेल गांधी के जादू में आ गए. पहले वो एक युवा बैरिस्टर की तरह एक फ़ैशनेबल जीवन जिया करते थे. खेड़ा के दौरान न सिर्फ़ उन्होंने अपने विदेशी कपड़ों और आरामदायक जीवन को त्याग दिया बल्कि वो किसानों के साथ रहने लगे. उनका साधारण खाना खाने लगे, ज़मीन पर सोने लगे और यहां तक कि अपने कपड़े भी ख़ुद धोने लगे. लेकिन उनकी ज़ोरदार हंसी और विनोदी स्वभाव पहले की तरह बरकरार रहा."
इसके बाद गांधी ने अहमदाबाद के कपड़ा मिलों की वेतन वृद्धि की लड़ाई लड़ी.
उन्होंने घोषणा की कि जब तक उनके वेतन में 35 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी नहीं हो जाती वो अन्न को हाथ नहीं लगाएंगे. मालिकों को मज़दूरों की मांग माननी पड़ी. ये गांधी का पहला राजनीतिक उपवास था.
2119 दिन जेल में
1971 में अहमदाबाद के चंदूलाल दलाल ने एक किताब में नौ जनवरी, 1915 से लेकर 30 जनवरी, 1948 तक गांधी के भारत प्रवास के एक-एक दिन का ब्योरा दिया.
इसके अनुसार गांधी ने इस दौरान 12075 दिन बिताए. इसमें 4739 दिन वो अहमदाबाद और वर्धा में रहे, 2119 दिन उन्होंने ब्रिटिश जेलों में काटे, 5217 दिन वो सफ़र करते रहे.
इस दौरान वो भारत के अलावा इंग्लैंड, बर्मा और श्रीलंका भी गए. इनमें से अधिकतर यात्राएं तीसरे दर्जे के डिब्बे में की गईं.
दांडी मार्च में वो कई दिनों तक पैदल भी चले. इसके अलावा उन्होंने कभी-कभी घोड़े, हाथी और ऊंट की सवारी का सहारा भी लिया और नावों, स्टीमरों और कार की सवारी भी की.
अपनी इच्छा के विपरीत बहुत झिझकते हुए वो एक बार पालकी में भी चढ़े और एक बार उन्होंने साइकिल भी चलाई.

दूध के साथ भूलकर भी न खाएं ये चीजें

    



दूध हमारी सेहत के लिए फायदेमंद होता है लेकिन इसे कुछ चीजों के साथ खाने पर नुकसान भी हो सकता है। आयुर्वेद के अनुसार, कुछ चीजों को साथ खाने पर पाचन संबंधी परेशानियां, वजन बढ़ना और त्स्किवचा से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। उड़द दाल और दूध दोनों ही पचने में समय लेते हैं। इन्हें एक ही वक्त में एक साथ लेने पर गैस की समस्या भी हो सकती है। इसके अलावा भी बहुत सी ऐसी चीजें हैं, जिन्हें दूध के साथ लेना खतरनाक हो सकता है।
नमकीन या चिप्स
दूध के साथ चिप्स, नमकीन खाने से बचें। नमक के कारण दूध में मौजूद प्रोटीन का पूरा फायदा नहीं मिल पाता। इसके अलावा इससे स्किन से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं।
प्याज
खाने में प्याज है तो उसके साथ या बाद में दूध लेने से बचें। इस कॉम्बिनेशन से दाद, खाज, खुजली, एग्जिमा जैसी स्किन से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।

मिर्च
मिर्च-मसाले वाला खाना खा रहे हैं तो इनके साथ दूध या दूध से बनी चीजें खाने से बचें। इन्हें साथ लेने पर पेट दर्द, एसिडिटी, गैस और उल्टी की समस्या हो सकती है।

मछली
इसकी तासीर गर्म होती है जबकि दूध की तासीर ठंडी होती है। इन्हें साथ लेने पर गैस, एलर्जी की समस्या हो सकती है।

दही
दूध और दही से बनी चीजें एक ही वक्त में न खाएं। इन्हें साथ खाने पर एसिडिटी, गैस, उल्टी और अपच की समस्या हो सकती है।

नींबू
नींबू या खट्टी चीजें खा रहे हैं तो एक घंटे तक दूध लेने से बचें। इन्हें साथ खाने पर एसिडिटी, गैस की समस्या हो सकती है।


- दूध के साथ दही कभी नहीं खानी चाहिए। इन्हें साथ खाने से एसिडिटी, गैस और उल्टी की समस्या हो सकती है। दही खाने के करीब एक से डेढ़ घंटे बाद दूध पीना चाहिए।

- उड़द की दाल के साथ कभी भी दूध का सेवन ना करें।

सर्द हवा के कई खतरे: सर्दियों में रखें इम्यून सिस्टम को तंदुरुस्त

    


विंटर सीजन में मस्ती के कई मौके मिलेंगे, लेकिन जरा-सी चूक आपके लिए नुकसानदायक हो सकती है। टेंपरेचर तेजी से नीचे आ रहा है। कोहरे और धुंध ने अस्थमा व हार्ट के मरीजों की परेशानी बढ़ा दी है। ऐसे मौसम में ऐलर्जी की भी संभावना बढ़ जाती है। इन बीमारियों से बचने के लिए खुद को एक्सपोजर से बचाने की जरूरत है।

1. भरपुर नींद लें
सर्दी हो या गर्मी इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाए रखने के लिए जरूरी है सुकून भरी नींद. आजकल की व्यस्त दिनचर्या में ज्यादातर लोग सिर्फ पांच या छह घंटे की नींद ही ले पाते हैं, जिसके कारण मोटापा और डायबिटीज जैसी बीमारियों के साथ-साथ दूसरी शारीरिक परेशानियों का भी खतरा हो सकता है. भरपूर नींद से शरीर खुद का पोषण करता है. डॉक्टर्स और डाइटीशियन के अनुसार, एक वयस्क को लगभग 7 घंटे की नींद तो लेनी ही चाहिए. नींद पूरी होगी, तो आप सेहतमंद भी रहेंगे. 
2. रहें तनाव से दूर 
दौड़भाग भरी ज़िन्दगी में लोगों को कई तरह के तनाव होते हैं. लेकिन यही तनाव शारीरिक और मानसिक दोनों ही तौर पर आपके लिए खतरनाक हो सकता है. अगर आप अक्‍सर तनाव में रहते हैं, तो सर्दी-जुकाम जैसी अन्य बीमारियां आपको जल्दी अपनी पकड़ में ले सकती हैं. थोड़ा बहुत और कभी-कभी तनाव होना खतरनाक नहीं होता है. लेकिन अगर आप हमेशा तनाव और स्ट्रेस महसूस करते हैं तो यह सही नहीं है. आपको बता दें कि जैसे-जैसे बॉडी में स्ट्रेच हार्मोन बढ़ता है, शरीर का इम्यूनिटी सिस्टम वैसे-वैसे कमजोर होता जाता है. 
3. पानी का सेवन अधिक करें 
अगर आपको खुद को सर्दियों में स्वस्थ रखना है, तो ज्यादा से ज्यादा पानी पियें. पूरे दिन में कम से कम 7-8 लीटर पानी ज़रूर पियें. पानी की मात्रा वबढ़ाने के लिए लिए आप मौसमी फलों के जूस, ग्रीन-टी आदि पेय पदार्थ ग्रहण कर सकते हैं. ग्रीन टी आपका इम्यूनिटी सिस्टम मजबूत करती है. इसमें एंटीवायरल और एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं. इसीलिये इसके नियमित सेवन से वायरल और बैक्टीरियल इंफेक्शन से बचा जा सकता है. 
4. लंच के बाद टहलने ज़रूर जाएं 
शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए ज़रूरी है कि खाना खाने के बाद थोड़ी देर टहलें ज़रूर. डॉक्टर्स के अनुसार, एक्टिव शरीर और नियमित शारीरिक सक्रियता शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इसके अलावा नियमित रूप से योग, व्यायाम या एक्सरसाइज करने वाले लोगों सर्दी-जुकाम और फ्लू कम होता है. सर्दियों की धुप शरीर के लिए ज़रूरी होती है. सूर्य की रोशनी विटामिन डी का बेहतर स्रोत है, जो हमारे इम्यून सिस्टम की कार्यप्रणाली के लिए आवश्यक है. इसलिए सर्दियों में रात के बजाय दिन में टहलना लाभकारी होता है. विटामिन डी कुछ ही खाद्य पदार्थों में पाया जाता है. विटामिन डी आपके इम्यून रिस्पांस को बढ़ा सकता है. 
5. अपने आहार में शामिल करें इन चीजों को 
लहसुन और अदरक दोनों ही आपके इम्यूनिटी सिस्टम को मजबूती देते हैं. लहसुन प्राकृतिक एंटी वायरल और एंटी बैक्टीरियल है. यह शरीर में ऐसे एंजाइम की संख्या को बढ़ाता है जो खून को साफ करने में सहायक होते हैं. दिन में एक या दो लहसुन खाने से इम्यून सिस्टम मजबूत होता है. इसके अलावा पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन लें. प्रोटीन से एंटीबॉडीज बनते हैं, जो आपके इम्यून सिस्टम की कार्यप्रणाली के लिए बहुत आवश्यक होते हैं. दालें, अंडे, मांस, डेरी उत्पाद, सोया, मछली आदि प्रोटीन के अच्छे स्रोत हैं. इतना ही नहीं खट्टे फल जैसे कि संतरी, मौसंबी, नींबू, आंवला आदि विटामिन सी से भरपूर होते हैं. हमारे शरीर में विटामिन सी की भूमिका एक संरक्षक की होती है. यह पोषक तत्व फ्री रेडिकल्स से हमारी कोशिकाओं का बचाव करता है व हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है, जिसके कारण सर्दी, खांसी व अन्य तरह के इन्फेक्शन होने का खतरा कम होता है. इसलिए सर्दियों में खट्टे फलों का सेवन जरूर करें. 
6. दही का सेवन ज़रूर करें 
दही में कुछ ऐसे बैक्टीरिया होते हैं, जो हमारे इम्यून सिस्टम के लिए काफी लाभदायक हैं. इसमें उच्च मात्रा में प्रीबायोटिक और प्रोबायोटिक बैक्टीरिया पाये जाते हैं, जो हमारी पाचन तंत्र के लिए लाभदायक माने जाते हैं. इतना ही नहीं, ये शरीर को विभिन्न प्रकार की बीमारियों से बचाते हैं. इसलिए खासतौर से सर्दियों में अपने भोजन में दही को शामिल करें और अपने इम्यून सिस्टम को बेहतर बनाएं. 
7. तुलसी का सेवन करें 
तुलसी एंटीबायोटिक, दर्द निवारक और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी फायदेमंद है। सर्दियां शुरू होते ही रोज सुबह तुलसी के 3-5 पत्तों का सेवन करना चाहिए। ये आपके इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाएगी और आपको सर्दियों में होने वाले इंफेक्शन्स जैसे सर्दी, जुकाम, खांसी आदि से एक सुरक्षा कवच प्रदान करेगी. 
8. पहने मास्क या यूज़ करें  कपड़ा
इन सब उपायों के अलावा बाहर निकलने से पहले मुंह को किसी सूती कपड़े से ज़रूर कवर करें ताकि बीमारियों के बैक्टीरिया आपके शरीर में प्रवेश न करें. या फिर आप मास्क भी पहन सकते हैं.
हाइपोथर्मिया से बचें
जब ठंड के कारण बॉडी का टेंपरेचर धीरे-धीरे कम होने लगता है, इसे हाइपोथर्मिया कहते हैं। इंसान की बॉडी का नॉर्मल टेंपरेचर 37 डिग्री सेंटिग्रेड होता है। अगर बॉडी का टेंपरेचर 35 डिग्री से कम होने लगे तो मरीज की जान जा सकती है। यह इंसान की बॉडी के इम्यून सिस्टम के कमजोर होने की स्थिति में और खतरनाक हो जाता है। इसका अटैक खासकर बच्चों और बुजुर्गों में काफी रहता है, इसलिए इस मौसम में ठंड से बच कर रहें और गर्म खाना खाएं और लिक्विड लेते रहें।
ब्लड प्रेशर का बढ़ जाता है खतरा 
सर्दी की वजह से टेंपरेचर में आई कमी से ब्लड वेसल्स सिकुड़ने लगती हैं और ब्लड गहरा हो जाता है। इस कारण शरीर में ब्लड फ्लो ठीक से नहीं हो पाता है और हार्ट को शरीर मे ब्लड पहुंचाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। दूसरा, सर्दियों मे कोहरे के कारण प्रदूषित कणों की मात्रा भी बढ़ जाती है। इस कारण भी ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। ऐसे में जरा-सी दौड़भाग करने से ही सांस फूलने लगती है, सिरदर्द और सिर में भारीपन महसूस होता है। अगर डायबीटीज से पीड़ित हो तो मरीज को हार्ट और ब्रेन स्ट्रोक, आई हैमरेज, किडनी खराब होने का खतरा रहता है।
हार्ट अटैक का खतरा 
सर्दियों में लोगों को दिल का दौरा पड़ने का खतरा ज्यादा रहता है। हार्ट के बाईं ओर से निकलने वाली धमनियां गिरते तापमान के साथ सिकुड़ने लगती हैं, जिस कारण हार्ट को ब्लड फ्लो करने के लिए अधिक प्रयास करना पड़ता है। इससे दिल पर अधिक दबाव पड़ने लगता है और यही दिल का दौरा पड़ने का कारण बनता है। ऐसी स्थिति में उन लोगों के लिए खतरा और बढ़ जाता है, जिन्हें अपने दिल की स्थिति के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं होती।
साइनोसाइटिस का खतरा 
साइनोसाइटिस गिरते मौसम की आम बीमारी है, जो कॉमन कोल्ड की वजह से होती है। अगर आपको सिर, दांतों या गाल में लगातार दर्द होने लगे, सांस लेने में कठिनाई होने लगे या फिर सर्दी-खांसी के साथ बुखार आने लगे तो समझ जाएं कि आप साइनोसाइटिस के शिकार हो गए हैं। यह साइनस की सूजन है। साइनस हड्डियों के बीच खाली स्थान है, जहां हवा भरी होती है। ललाट, नाक की हड्डियों, गाल और आंखों के पीछे स्थित होता है यह साइनस। साइनस में जब संक्रमण हो जाता है तो उसमें सूजन आ जाती है। साइनस की इसी सूजन को साइनोसाइटिस कहा जाता है। इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि हम कॉमन कोल्ड को नजरअंदाज न करें। रोजाना तीन-चार बार स्टीम लें।
जॉइंट में दर्द का खतरा 
डॉक्टर का कहना है कि ठंड की वजह से कमर, गर्दन, कंधों, हाथ-पैर के जोड़ों में दर्द होता है। सर्दी के मौसम में परेशानी और भी ज्यादा बढ़ जाती है। इससे बचाव के लिए जितना हो सके, सर्दी से खुद को बचाकर रखें।
क्या खाएं...
-गर्म चीजों का सेवन अधिक करें।
-लहसुन, प्याज, मछली, गुड़, बादाम, काजू जैसी चीजों का अधिक सेवन करें।
-खाने में कैल्शियम और प्रोटीन युक्त चीजों को प्रमुखता से शामिल करें।

धूप में बैठें और रहें बीमारियों से दूर

    


शरीर को दिनभर में 10 से 20 नैनोग्राम विटमिन D की जरूरत होती है। अगर हम ठंड में रोज सुबह 15 मिनट धूप में बैठते हैं, तो इससे शरीर को पर्याप्त मात्रा में विटमिन D मिलता है। इससे हार्ट अटैक जैसी बीमारियों को कंट्रोल किया जा सकता है। इससे शरीर में कोलेस्ट्रॉल कम होता है, हार्ट अटैक, हाई BP जैसी बीमारियों से राहत मिलती है। एक नजर इसके फायदों पर...


हेल्दी हार्ट: ठंड में रोज धूप में बैठने से कोलेस्ट्रॉल कम होता है। इससे हार्ट डिजीज का खतरा कम हो जाता है।

स्किन हेल्दी: धूप में बैठने से शरीर के बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं। इससे पिंपल्स, एक्ने और स्किन इंफेक्शन की समस्या दूर हो जाती है।

हाई बीपी: रोज सुबह धूप में बैठने से ब्लड सर्कुलेशन सुधरता है। इससे हाई बीपी की समस्या कंट्रोल होती है।

हड्डी हों मजबूत: ठंड में 15 मिनट धूप लेने से पर्याप्त विटमिन D मिलता है, हड्डियां मजबूत होती हैं।

बीमारियों से बचाए: सर्दियों में रोज धूप में बैठने से शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। इससे सर्दी, खांसी, बुखार जैसी बीमारियों से राहत मिलती है।

मसल्स मजबूत: धूप में बैठने से शरीर में विटमिन D मिलता है। इससे मसल्स हेल्दी और स्ट्रॉन्ग होती हैं।

वजन घटाए: ठंड में रोज धूप में बैठने से बॉडी मॉस इंडेक्स (BMI) कम होता है। इससे वजन घटाने में भी मदद मिलती है।

नींद की समस्या: धूप में बैठने से शरीर में मेलाटोनिन नामक हॉर्मोन बनने लगता है। इससे रात में नींद न आने की समस्या दूर हो जाती है।

डकार आए मतलब शरीर स्वस्थ है

ऐसे आती है डकार 
जब हम खाना खाते हैं तो भोजन के साथ कुछ वायु पेट में प्रवेश कर जाती है। भोजन नली और पेट के बीच एक दरवाजा होता है जो भोजन करते समय खुल जाता है। भोजन के पेट में प्रवेश हो जाने के बाद यह खुद ही बंद हो जाता है। इससे पेट में कुछ वायु इकट्ठी हो जाती है। लेमन सोडा आदि पेय पदार्थों के पीने से भी पेट में ज्यादा गैस पैदा हो जाती है, जिससे शरीर के कंट्रोल रूम रूपी मस्तिष्क बेकार गैसों को बाहर निकालने का आदेश दे देता है। इसके बाद कुछ मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं जिससे भोजन नली में छाती और पेट के बीच बना दरवाजा कुछ देर के लिए खुल जाता है। वायु गले और मुंह से होती हुई बाहर आती है जिसे डकार आना कहा जाता है जो पेट भरने का परिचायक नहीं है।

डकार आने पर आवाज का कारण
जब इकट्ठा वायु पेट से भोजन नली में आती है तो एक तरह का कंपन करने लगती है जो गले और मुंह से बाहर निकलने पर आवाज करती है। अगर पेट की वायु बाहर निकलने पर कंपन न करे तो आवाज नहीं होगी, जो असंभव है क्योंकि यह स्वाभाविक शारीरिक क्रिया है।

डकार न आने पर
अगर डकार न आए यानी मस्तिष्क पेट में एकत्रित गैस को बाहर निकालने के लिए आदेश देने में कुछ देरी कर रहा है तो हमें बेचैनी होने लगती है।

अगर डकार न आए तो...
पेट में अक्सर दर्द की शिकायत रहने लगती है।
भूख कम लगने लगती है।
पाचन क्रिया शिथिल पड़ जाती।

अजवायन का पानी पीने के ये फायदे आपको हैरत में डाल देंगे

सिरदर्द से मिलेगा आराम : 
अजवाइन का पानी उबालने पर या उसका पानी पीते हुए जो भाप मिलती है उससे सिरदर्द और नाक के कंजेशन में काफी राहत मिलती है।

उल्टी से राहत :
अजवाइन के पानी से उल्टी भी ठीक की जा सकती है। कई मामलों में, इसको पीने से लगातार आ रहीं उल्टियां भी रुक जाती हैं।

दांत दर्द करता है दूर :
आयुर्वेदिक डॉक्टर यह सलाह देते हैं कि दांत दर्द होने पर अजवाइन के पानी से कुल्ला करें। अजवाइन में मौजूद थायमोल दर्द से राहत दिलाता है और मुंह के स्वास्थ्य का ख्याल रखता है।

पाचन क्रिया बेहतर बनाता है: 
अजवाइन में थायमॉल मौजूद होता है। अजवाइन में मौजूद यह केमिकल पेट से गैस्टिक जूस रिलीज करने में मदद करता है, जो कि पाचन को नुकसान पहुंचाता है और इनके निकलने से पाचन क्रिया आसान हो जाती है।

वजन घटाता है: 
अजवाइन न सिर्फ आपकी पाचन क्रिया को बेहतर करता है बल्कि मेटाबॉलिज्म को भी तेज करता है, जिससे कि वजन घटाने में मदद मिलती है।

ठंड से बचे रहना है तो खाना शुरू कर दें ये चीजें

    



ठंड के मौसम में शरीर को सिर्फ गर्म कपड़ों से आराम नहीं मिलता। ऐसे में कुछ चीजें ऐसी हैं जिन्हें खाकर ठंड से बचा जा सकता है। शरीर में अगर अंदर से खुद को मौसम के हिसाब से ढालने की क्षमता हो तो ठंड कम लगेगी और कई बीमारियां भी नहीं होंगी। यही कारण है कि ठंड में खानपान पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

मूंगफली के हैं कई फायदे : 
100 ग्राम मूंगफली के भीतर कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं। इसमें प्रोटीन 25.3 ग्राम, फैट 40.1 ग्राम, मिनरल्स 2.4 ग्राम, फाइबर 3.1 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट 26.1 ग्राम, ऊर्जा 567 कैलरी, कैल्शियम 90 मिलीग्राम, फॉस्फोरस 350 मिलीग्राम, आयरन 2.5 मिलीग्राम, कैरोटीन 37 मिलीग्राम, थाइमिन 0.90 मिलीग्राम, फोलिक एसिड. 20 मिलीग्राम होता है।

ठंड से बचाता है बादाम : 
बादाम कई गुणों से भरपूर है। बादाम खाने से मेमरी बढ़ती है, साथ ही यह अन्य कई रोगों से हमारी रक्षा भी करता है। इसके सेवन से कब्ज की समस्या भी दूर हो जाती है।

अदरक से मिलती है गर्मी : 
रोजाना खाने में अदरक शामिल करने से बहुत सी छोटी-बड़ी बीमारियों से बचा जा सकता है। इससे शरीर को गर्मी मिलती है और डाइजेशन भी सही रहता है।

शहद रखेगा निरोग : 
शरीर को स्वस्थ, निरोग और ऊर्जावान बनाए रखने के लिए शहद को आयुर्वेद में अमृत भी कहा गया है। सर्दियों में इसके सेवन से पाचन क्रिया में सुधार होता है।

रसीले फल न खाएं : 
संतरा, रसभरी या मौसमी आपके शरीर को ठंडक देते हैं जिससे आपको सर्दी या जुकाम जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

साबुत लहसुन

अगर आप सर्दी से परेशान हो तो दिन में हर 3से 4 घंटे के अंतर पर कच्चा लहसुन का सेवन कर सकते है। आप चाहे तो लहसुन को थोड़ा सा भून भी सकते है, ये खाने में ठीक लगा है। साथ ही आप शहद के साथ इसका सेवन  कर सकते है। ये गले को भी आराम देता है। औऱ शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को बढता है। 

सर्दियों में खाये साग

सर्दियों में खान-पान का विशेष ध्‍यान रखना पड़ता है क्‍योंकि आपकी जरा सी लापरवाही से सर्दी-जुकाम और बुखार का खतरा बढ़ जाता है। इस मौसम में धूप न निकलने के कारण विटामिन डी की कमी हो जाती है और रक्‍त कोशिकायें संकुचित हो जाती हैं जिसके कारण रक्‍त का संचार ठीक से नहीं होता। इसलिए इस मौसम में साग खाने की सलाह दी जाती है, चना, बथुआ, सरसों, आदि के साग न केवल स्‍वादिष्‍ट होते हैं बल्कि आपको स्‍वस्‍थ रखकर बीमारियों से भी बचाते हैं।


विश्‍व मानवाधिकार दिवस: क्‍या है मानव अधिकार?

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इंसानी अधिकारों को पहचान देने और वजूद को अस्तित्व में लाने के लिए, अधिकारों के लिए जारी हर लड़ाई को ताकत देने के लिए हर साल 10 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस यानी यूनिवर्सल ह्यूमन राइट्स डे मनाया जाता है. पूरी दुनिया में मानवता के खिलाफ हो रहे जुल्मों-सितम को रोकने, उसके खिलाफ संघर्ष को नई परवाज देने में इस दिवस की महत्वूपूर्ण भूमिका है.

क्या है 'मानव अधिकार'
किसी भी इंसान की जिंदगी, आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार है मानवाधिकार है. भारतीय संविधान इस अधिकार की न सिर्फ गारंटी देता है, बल्कि इसे तोड़ने वाले को अदालत सजा देती है.
भारत में 28 सितंबर 1993 से मानव अधिकार कानून अमल में आया. 12 अक्टूबर, 1993 में सरकार ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया.
आयोग के कार्यक्षेत्र में नागरिक और राजनीतिक के साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार भी आते हैं. जैसे बाल मजदूरी, एचआईवी/एड्स, स्वास्थ्य, भोजन, बाल विवाह, महिला अधिकार, हिरासत और मुठभेड़ में होने वाली मौत, अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकार.

शुरुआत
10 दिसम्बर, 1948 को ' संयुक्त राष्ट्र महासभा ' ने विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र जारी कर प्रथम बार मानवाधिकार व मानव की बुनियादी मुक्ति पर घोषणा की थी। वर्ष 1950 में 'संयुक्त राष्ट्र' ने हर वर्ष की 10 दिसम्बर की
तिथि को 'विश्व मानवाधिकार दिवस' तय किया। 65 वर्ष से पहले हुआ पारित 'विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र' एक मील का पत्थर है, जिसने समृद्धि, प्रतिष्ठा व शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के प्रति मानव की आकांक्षा प्रतिबिंबित की है। आज यही घोषणा पत्र 'संयुक्त राष्ट्र संघ' का एक बुनियादी भाग है।

क्या है 'मानव अधिकार'
किसी भी इंसान की ज़िंदगी, आज़ादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार है- "मानवाधिकार"। ' भारतीय संविधान ' इस अधिकार की न सिर्फ़ गारंटी देता है, बल्कि इसे तोड़ने वाले को अदालत सजा देती है। भारत में
28 सितंबर , 1993 से मानव अधिकार क़ानून अमल में आया। 12 अक्टूबर , 1993 में सरकार ने 'राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग' का गठन किया। आयोग के कार्यक्षेत्र में नागरिक और राजनीतिक के साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार भी आते हैं, जैसे- बाल मज़दूरी, एचआईवी/एड्स, स्वास्थ्य, भोजन, बाल विवाह , महिला अधिकार, हिरासत और मुठभेड़ में होने वाली मौत, अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकार आदि।
'विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र' का मुख्य विषय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगारी, आवास,
संस्कृति, खाद्यान्न व मनोरंजन से जुड़ी मानव की बुनयादी मांगों से संबंधित है। विश्व के बहुत से क्षेत्र गरीबी से पीड़ित है, जो बड़ी संख्या वाले लोगों के प्रति बुनियादी मानवाधिकार प्राप्त करने की सबसे बड़ी बाधा है। उन क्षेत्रों में बच्चे, वरिष्ठ नागरिकों व महिलाओं के बुनियादी हितों को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। इस के अलावा नस्लवाद व नस्लवाद भेद मानवाधिकार कार्य के विकास को बड़ी चुनौती दे रहा है।

मानवाधिकार - औचित्य और स्वरूप
मानव के जन्म लेने के साथ ही उसके अस्तित्व को बनाये रखने के लिए कुछ अधिकार उसको स्वतः मिल जाते हैं और वह उनका जन्मसिद्ध अधिकार होता है। इस दुनिया में प्रत्येक मनुष्य के लिए अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिकार एक मनुष्य होने के नाते प्राप्त हो जाता है। चाहे वह अपने हक के लिए बोलना भी जानता हो या नहीं। एक नवजात शिशु को दूध पाने का अधिकार होता है और तब वह बोलना भी नहीं जानता। लेकिन माँ उसको स्वयं देती है और अगर नहीं देती है तो उसके घरवाले, डॉक्टर सभी उसको इसके लिए कहते हैं, क्योंकि ये उस बच्चे का हक है और ये उसे मिलना ही चाहिए। एक बच्चे के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए ये जरूरत सबसे अहम् होती है। लेकिन उसके बड़े होने के साथ-साथ उसके अधिकार भी बढ़ने लगते हैं। बच्चे के पढ़ने-लिखने और अपनी परवरिश आदि के लिए उसको समुचित सुविधाएँ और वातावरण देना भी जरूरी अधिकारों में आता है। उन्हें आत्म-सम्मान के साथ जीने के लिए, अपने विकास के लिए और आगे बढ़ने के लिए कुछ हालात ऐसे चाहिए, जिससे की उनके रास्ते में कोई व्यवधान न आये। पूरे विश्व में इस बात को अनुभव किया गया है और इसीलिए मानवीय मूल्यों की अवहेलना होने पर वे सक्रिय हो जाते हैं। इसके लिए हमारे संविधान में भी उल्लेख किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 14,15,16,17,19,20,21,23,24,39,43,45 देश में मानवाधिकारों की रक्षा करने के सुनिश्चित हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, इस दिशा में आयोग के अतिरिक्त कई एनजीओ भी काम कर रहे हैं और साथ ही कुछ समाजसेवी लोग भी इस दिशा में अकेले ही अपनी मुहिम चला रहे हैं।

मानव अधिकार से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारी :-
1829 - राजा राममोहन राय द्वारा चलाए गए हिन्दू सुधार आंदोलन के बाद भारत में ब्रिटिश राज के दौरान सती प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
1929 - नाबालिगों को शादी से बचाने के लिए बाल विवाह निरोधक कानून पास हुआ।
1947 - ब्रिटिश राज की गुलामी से भारतीय जनता को आजादी मिली।
1950 - भारतीय गणतंत्र का संविधान लागू हुआ।
1955 - भारतीय परिवार कानून में सुधार। हिन्दू महिलाओं को मिले और ज्यादा अधिकार।
1973 - केशवानंद भारती वाद में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि संविधान संशोधन द्वारा संविधान के मूलभूत ढांचे में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। (जिसमें संविधान द्वारा प्रदत्त कई मूल अधिकार भी शामिल हैं)
1989 - अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचारों से सुरक्षा) एक्ट 1989 पास हुआ।
1992 - संविधान में संशोधन के जरिए पंचायत राज की स्थापना, जिसमें महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण लागू हुआ। अजा-अजजा के लिए भी समान रूप से आरक्षण लागू।
1993 - प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स एक्ट के तहत
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना।
2001 - खाद्य अधिकारों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त आदेश पास किया।
2005 - सूचना का अधिकार कानून पास।
2005 - रोजगार की समस्या हल करने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट पास।
2005 - भारतीय पुलिस के कमजोर मानव अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के निर्देश दिए।