Shamsher ALI Siddiquee

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गर्मियों में सेवन करें चने का सत्तू।

    


गर्मियों में चने का सत्तू सेहत के लिए फायदेमंद होता है। चने के सत्तू में फाइबर्स और कार्बोहाइड्रेट्स की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है। गर्मियों में प्यास बुझाने के लिए कोल्ड ड्रिंक्स का इस्तेमाल सेहत के लिए जितना नुकसानदायक होता है, उतना ही चने के सत्तू का शर्बत फायदेमंद होता है। कई बार खाना खाने के बाद डाइजेशन की प्रॉब्लम हो जाती है जिसे चने का सत्तू पीकर दूर किया जा सकता है। तो आइए आज बताते हैं कि इससे क्या-क्या फायदे होते हैं। 
आयुर्वेदाचार्योंका कहना है चने का सत्तू पीने से पेट में ठंडक बनी रहती है। इसे खाने से या इसे पीने से काफी समय तक भूख नहीं लगती। इससे आसानी से वजन कम किया जा सकता है।

एनर्जी का अच्छा स्रोत
इसका सेवन इंस्टेंट एनर्जी देता है। इसमें मौजूद कई तरह के मिनरल्स जैसे आयरन, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस शरीर के लिए बहुत ही फायदेमंद होते हैं, खासतौर से इसमें नींबू और नमक मिलाकर पीना।
पेट को ठंडा रखता है
चने के सत्तू में गर्मियों में लू से बचाने वाले गुण होते हैं। पेट को ठंडा रखने के साथ ही ये कई तरह की पेट की बीमारियों को भी दूर करता है। शरीर का तापमान कंट्रोल करता है जिसके लिए खाली पेट इसका सेवन करना ज्यादा फायदेमंद होता है।
कम करता है मोटापा
चने के सत्तू में कई सारे ऐसे तत्व होते हैं जो एक संपूर्ण आहार के लिए जरूरी होते हैं। इसे खाने से या इसे पीने से काफी समय तक भूख नहीं लगती। इससे आसानी से वजन कम किया जा सकता है। कई बार डाइटिंग के लिए लोग घंटों भूखे रहते हैं जिससे वजन तो आसानी से कम हो जाता है, लेकिन ज्यादा समय तक भूखे रहने से सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
एनीमिया की समस्या दूर
शरीर में आयरन की कमी से होने वाली एनीमिया की समस्या को रोजाना सत्तू में पानी मिलाकर पीकर दूर किया जा सकता है। महिलाओं में एनीमिया की सबसे ज्यादा समस्या पाई जाती है, खासतौर से प्रेग्नेंसी के बाद।
डायबिटीज से छुटकारा
चने के सत्तू का सेवन ताकतवर बनाने के साथ ही शरीर में एक्स्ट्रा ग्लूकोज की मात्रा को भी कम करता है जो डायबिटीज के मरीजों के लिए कारगर होता है।
लिवर के लिए जरूरी
प्रोटीन की भरपूर मात्रा पाई जाती है जो लिवर के लिए जरूरी होती है। सिर्फ इसके आधे कप में 10 ग्राम प्रोटीन, 178 कैलरी और 3 ग्राम फैट की मात्रा होती है। खराब खाना, एल्कोहल की ज्यादा मात्रा का सबसे ज्यादा असर लिवर पर पड़ता है जो कई सारी बीमारियों का कारण बनता है इसलिए इसे हेल्दी रखना बहुत ही जरूरी होता है।
प्रकार व गुण

जौ का सत्तू - जौ को धोने और साफ करने के बाद, भूनने व पीसने पर सत्तू तैयार होता है। वो गुणों में रुक्ष, शीतल एंव थोड़ा भारी होता है। रस में मधुर एवं कषाय होता है। यह तासीर में ठंडा, अग्नि प्रदीपक, कब्ज नाशक होने के साथ-साथ कफ व पित्त शामक तथा वात वर्धक होता है। सुपाच्य तो है ही, तुरंत शक्ति प्रदान करने वाला, बलवर्धक और कब्ज दूर करने वाला भी होता है। उसमें प्रोटीन्स 11.5 प्रतिशत तथा कार्बोहाइडेªट्स लगभग 70 प्रतिशत होते हैं।

जौ-चने का सत्तू

चने को भूनने के बाद छिलका हटाकर पिसवा लेने पर चैथाई भाग जौ का सत्तू मिलाने से जौ-चने का सत्तू तैयार हो जाता है। इस सत्तू को पानी में घोलकर या घी-शक्कर मिलाकर पीने से गर्मी और बारिश के मौसम में खोई शारीरिक ऊर्जा प्राप्त होती है। इसकी तासीर ठंडी होती है और यह ठंक देने वाला होता है। चना गुणों में लघु, रुक्ष एवं शीतल होता है। रस में मधुर एवं कषाय होता है। वो कफ, पित्त, रक्त शामक एवं वात वर्धक होता है।  इसमें लगभग 18 प्रतिशत प्रोटीन तथा 61 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं। चने का सत्तू मधुमेह, स्थौल्य एवं रक्त विकार के लिए प्रशस्त होता है। अम्लपित्त तथा परिणाम शूल में चने का सत्तू आहार रुप में देते हैं।

गेहूं का सत्तू - गेहूं स्निग्ध, मधुर, शीतल एवं पचने में भारी होता है। यह वात, पित्त शामक तथा कफ वर्धक होता है। साथ में वो जीवनीय, संधान कारक, स्थैर्य कारक और बृहणीय होता है। गेहूं का सत्तू पचने में गेहूं से हल्का होता है।

 

जौ-चने और गेहूं का सत्तू- एक किलो चने की दाल, आधा किलो गेहूं और दो सौ ग्राम जौ को एक साथ अधिकतम दस घंटे पानी में भिगो कर छाया में सुखा लें। साफ करने के बाद तीनों को भुनवा कर पीस लेने पर यह सत्तू तैयार होता है। इसमें तीनों मुख्य अनाज होने के कारण शरीर को पूरा पोषण प्राप्त होता है। जौ और चना होने के कारण यह बेहद ऊर्जावर्धक व पचने में आसान भी होता है।

सेवन की विधि       

सत्तू सेवन की निम्न विधियां अधिक लोकप्रिय हैं-
  • किसी भी प्रकार के सत्तू को ताजे पानी के साथ पतला पेय बना कर पिया जा सकता है। पानी घड़े का हो, तो ज्यादा अच्छा है। स्वाद अनुसार गुड़/चीनी या नमक मिलाया जा सकता है।

  • लप्सी (गाढ़ा घोल) बनाकर खाना भी कम रुचिकर नहीं होता। पानी की मात्रा कम और सत्तू की मात्रा अधिक रखकर इसे तैयार करने का बाकी तरीका पतला पेय बनाने जैसा ही है।

  • सत्तू की टिक्की, पूड़ी, रोटी, पराठा आदि भी खाया जा सकता है। नमकीन सत्तू में भुना हुआ जीरा, हींग, अजवाइन जैसे तत्वों को मिला लेना भी इसके पाचक गुणों को बढ़ा देता है।


  • सेवन संबंधी सावधानी      
  • खाना खाने के बाद सत्तू का सेवन नहीं करना चाहिए।

  • सत्तू पेट भरकर नहीं खाना/पीना चाहिए।

  • रात के समय सत्तू का सेवन न करें।

  • सत्तूके साथ पानी की मात्रा ज्यादा नहीं रखनी चाहिए।

    आयुर्वेदिक महत्व      

    आहार को आयुर्वेद के तीन उपस्तंभों में से एक और प्रमुख कहा गया है। रेशा (फाइबर), कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, स्टार्च तथा खनिजों की प्रचुर मात्रा होने के कारण आयुर्वेद ने सत्तू को सम्यक पूर्ण आहार का दर्जा दिया है। इन्हीं गुणों के कारण सत्तू मोटापा कम करने और डायबटीज जैसे रोगों के नियंत्रण में भी बहुत लाभदायक है।

    नहाने के पानी में मिलाएं ये चीजें, दूर होंगी बीमारियां

        


    अच्छे स्वास्थ्य के लिए रोजाना नहाना बहुत जरूरी होता है। नहाने से न सिर्फ शरीर की सफाई होती है बल्कि हमारा दिमाग भी तरोताजा होता है। अगर नहाने के पानी में कुछ चीजों को मिला लिया जाए तो सेहत सम्बंधी कई समस्याओं को दूर किया जा सकता हैं। जानना चाहेंगे कौन सी हैं वो चीजें...

    संतरे का छिलका
    पानी की बाल्टी में 2 संतरे के छिलके डालें और 10 मिनट के बाद इन छिलकों को पानी से निकाल लें। इस पानी से नहाने से जोड़ों के दर्द से राहत मिलेगी।

    हल्दी
    थोड़ी -सी कच्ची हल्दी को पीस कर उसका पेस्ट बना लें और इसे पानी में मिलाकर नहाने से त्वचा रोेग दूर होगा।

    सेंधा नमक

    अगर एक बाल्टी पानी में एक चम्मच फिटकरी और एक सेंधा नमक मिलाकर नहाया जाए तो इससे ब्लड सर्कुलेशन सही होता है। इससे शरीर की थकान और तनाव दूर होता है और मांस-पेशियों को आराम मिलता है।

    नीम के पत्ते
    एक गिलास पानी में 8-10 नीम की पत्तियां उबाल लीजिए। फिर इसे ठंडा होने के लिए रख दें। ठंडा होने पर इसे छानकर ताजे पानी की बाल्टी में मिलाकर नहा लें। इससे हर तरह के स्किन इंफेक्शन से राहत मिलेगी और शरीर में सूजन भी कम होगी।

    चंदन
    अगर आप त्वचा से संबंधित समस्याओं से परेशान हैं तो रात को सोने से पहले एक कटोरी पानी में थोड़ा-सा चंदन पाउडर मिक्स करें। सुबह इस पेस्ट को नहाने वाले पानी में मिलाकर नहाएं। इससे त्वचा से जुड़ी सभी परेशानियां दूर हो जाएंगी।

    तुलसी
    तुलसी के पत्ते पानी में मिलाकर नहाने से फायदा होता है। तुलसी जीवाणुरोधी होती है, जिससे एक्जिमा जैसी बीमारी नहीं होती।

    दूध
    पानी में दूध मिलाकर नहाने से त्वचा चमकदार और स्वस्थ हो जाती है। दूध में पाया जाने वाला लैक्टिक एसिड और अल्फा ड्राइडोक्सी एसिड त्वचा की डेड स्किन हटाते हैं। साथ ही धूप से टैन हुई त्वचा को भी ठीक करके खूबसूरत बनाता है।

    कपूर
    कपूर का इस्तेमाल सिर्फ पूजा के लिए ही नहीं बल्कि नहाने के पानी में भी किया जा सकता है। इससे शरीर को आराम मिलता है और साथ ही सिर दर्द की परेशानी दूर होती है। समस्या से बचने के लिए नहाने की बाल्टी में 2 कपूर की टिकिया मिला लें। 

    गुलाब जल
    अगर आपके शरीर से पसीने की बदबू आ रही है तो आप पानी में गुलाब जल मिलाकर नहाएं। पानी में 3 से 4 चम्मच गुलाब जल मिलाकर नहाने से मांस-पेशियां रिलैक्स होती हैं और साथ शरीर की बदबू भी दूर होती है।

    डॉक्टर एससी पांडेय के अनुसार, आयुर्वेद में स्नान के अनेक फायदे बताए गए हैं। बहुद देर तक और अच्छे से स्नान करने से थकान और तनाव कम होता है। स्नान करते समय सिर पर पानी डालने पर शरीर के ऊपरी भागों की गर्मी पैरों के माध्यम से निकल जाती है। इससे काफी राहत मिलती है। 

    आप में बुद्धि होगी तो आप सच्चाई का पता लगा लेंगे: नटवरलाल की कहानी

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    "आप में बुद्धि होगी तो आप सच्चाई का पता लगा लेंगे।"
    ये बात एक ठग ने पुलिस वालों को कही थी. जब वो उनकी गिऱफ्त में था. एक ऐसा ठग जिसने वेश्याओं तक को नहीं छोड़ा. वो हर रोज वेश्याओं के पास जाता और उनको जहरीली शराब पिलाकर उनके पैसे और गहने लूट लेता था. एक पढ़ा-लिखा इंसान, जिसने वकालत की पढ़ाई करने के बाद ठगी को अपना पेशा बनाया. 8 राज्यों में 100 से ज्यादा मामलों में पुलिस इस ठग को ढूंढ रही थी. 8 बार वो अलग-अलग जेलों से फरार हो चुका था. एक ऐसा ठग जिसने ठगी के लिए राजीव गांधी से लेकर राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के नाम तक का इस्तेमाल किया. मिथिलेश कुमार उर्फ मिस्टर नटवरलाल.

    औसत क्षात्र से नटवरलाल बनने की कहानी
    मिथिलेश कुमार से नटवर लाल बनने की दो अलग कहानियां हैं. पहल कहानी के मुताबिक बिहार के सीवान जिले के बंगरा गांव का रहनेवाला मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव, धनी जमींदार रघुनाथ प्रसाद का बड़ा बेटा था. मिथिलेश पढ़ने में एक औसत छात्र था. पढ़ाई के बजाय फुटबॉल और शतरंज में उसकी रूचि ज्यादा थी. कहते हैं कि मैट्रिक के परीक्षा में फेल होने पर मिथिलेश को उसके पिता ने बहुता मारा. जिसके बाद वो कलकत्ता भाग गया. उस समय उसकी जेब में सिर्फ पांच रुपए थे. कलकत्ता में मिथिलेश ने बिजली के खंभे के नीचे पढ़ाई की. बाद में सेठ केशवराम नाम के एक बंदे ने मिथिलेश को अपने बेटे को पढ़ाने के लिए रख लिया. मिथिलेश ने सेठ से अपनी स्नातक की पढ़ाई के लिए पैसे उधार मांगे, जिसे सेठ ने देने से इनकार कर दिया. सेठ के इनकार करने से मिथिलेश इतना चिढ़ गया कि उसने रुई की गांठ खरीदने के नाम पर सेठ से 4.5 लाख ठग लिया.
    दूसरी कहानी ये कहती है कि एक बार मिथिलेश को उनके पड़ोसी सहाय ने बैंक ड्राफ्ट जमा करने के लिए भेजा. वहां जाकर मिथिलेश ने सहाय के हस्ताक्षर को हूबहू कॉपी किया. उस समय मिथिलेश को पहली बार लगा कि वो जालसाजी का काम कर सकता है. उस दिन के बाद से मिथिलेश कुछ दिनों तक अपने पड़ोसी के खाते से पैसे निकालता रहा. जब मिथिलेश के पड़ोसी को इस बात की भनक लगी, तब तक मिथिलेश अकाउंट से 1000 रुपए निकाल चुका था. पता चलने के बाद मिथिलेश कलकत्ता चला गया और वहां जाकर कॉमर्स से ग्रेजुएशन किया. साथ ही शेयर बाजार में दलाली का काम करने लागा.

    बड़े-बड़े नेताओं के नाम पर जब नटवर लाल ने लोगों को ठगा

    दिल्ली का कनाट प्लेस. सुरेंद्र शर्मा की घड़ी की दुकान. सफेद कमीज और पैंट पहने एक बूढ़ा आदमी घड़ी की दुकान में जाता है. और खुद का परिचय वित्तमंत्री नारायण दत्त तिवारी का पर्सनल स्टाफ डी.एन. तिवारी रूप में देता है. और दुकानदार से कहता है कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी के दिन अच्छे नहीं चल रहे हैं, इसलिए उन्होंने पार्टी के सभी वरिष्ठ लोगों को समर्थन के लिए दिल्ली बुलाया है. और इस बैठक में शामिल होने वाले सभी लोगों को वो घड़ी भेंट करना चाहते हैं. तो मुझे आपकी दुकान से 93 घड़ी चाहिए. दुकानदार को पहले तो इस आदमी की बातों पर शक हुआ लेकिन एक साथ इतनी घड़ियों को बेचने के लालच से खुद को रोक नहीं पाया.
    अगले दिन वो बूढ़ा आदमी घड़ी लेने दुकान पहुंचा. दुकानदार को घड़ी पैक करने की बात कह एक स्टाफ को अपने साथ नॉर्थ ब्लॉक (नॉर्थ ब्लॉक वो जगह है, जहां प्रधानमंत्री से लेकर बड़े-बड़े अफसरों का ऑफिस होता है) ले गया. वहां उसने स्टाफ को भुगतान के तौर पर 32,829 रुपए का बैंक ड्राफ्ट दे दिया. दो दिन बाद जब दुाकनदार ने ड्राफ्ट जमा किया तो बैंक वालों ने बताया कि वो ड्राफ्ट फर्जी है. फिर दुकानदार को समझ आया कि वो बूढ़ा आदमी नटवर लाल था. और इसके बाद वित्तमंंत्री वीपी सिंह तो कभी वाराणसी के जिला जज का नाम तो कभी यूपी के सीएम के नाम पर नटवर लाल अलग-अलग शहर में दुकानदारों का चूना लगाता रहा. 

    देश के बड़े-बड़े ऐतिहासिक धरोहरों तक को बेच डाला:
    ठगी में नटवर लाल इतने शातिर था कि उसने 3 बार ताजमहल, दो बार लाल किला, एक बार राष्ट्रपति भवन और एक बार संसद भवन तक को बेच दिया था. राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के फर्जी साइन करके नटवर लाल ने संसद को बेच दिया था. जिसे समय संसद को बेचा था, उस समय सारे सांसद वहीं मौजूद थे. कहते हैं कि नटवर लाल के 52 नाम थे, उनमें से एक नाम नटवर लाल था. सरकारी कर्मचारी का भेष धरकर नटवर लाल ने विदेशियों को ये सारे स्मारक बेचे थे. इनकी ठगी पर ‘मिस्टर नटवर लाल’ फिल्म भी बन चुकी है. जिसमें अमिताभ बच्चन ने इनका रोल निभाया है.
    दुनिया वालों के लिए ठग लेकिन अपने गांवों वालों के लिए रॉबिनहुड: 
    ठगी से ढेरों पैसे कमाने के बाद एक बार नटवर लाल तीन कार के काफिलों के साथ अपने गांव बंगरा गया. गांव वालों के मुताबिक नटवर लाल पूरे रईस अंदाज में गांव पहुंचा था. उसने जो इत्र लगा रखा था उसकी खुशबू मीलों तक फैली थी. नटवर लाल ने गांव में शामियाना लगवाया, गांव वालों के लिए बढ़िया खाने का इंतजाम किया. और इस भोज के बाद उसने गांव के हर गरीब आदमी को 100 रुपए दिए. गांव के लोग नटवर लाल के ठगी पर कभी शर्मिंदा नहीं हुए. उनके हिसाब से नटवर लाल ने उन लोगों को शर्मिंदा करने वाला कोई भी काम नहीं किया है. वो तो बस भ्रष्ट अमीरों को लूटता था और गरीबों की मदद करता था.
    कोर्ट ने 100 साल से ज्यादा की सजा सुनाई थी:
    पचास और साठ के दशक में नटवरलाल ने देश के बड़े-बड़े जौहरियों, साहूकारों और व्यपारियों को ठगा था. 8 राज्यों में 100 से अधिक मामलों में नटवरलाल का नाम ‘मोस्ट वांटेड’ की सूची में था. पुलिस ने 9 बार नटवरलाल को गिरफ्तार किया था, जिसमें से 8 बार वो पुलिस वालों को चकमा दे फरार हुआ थे.  सिंहभूम की अदालत ने नटवरलाल को 19 साल, दरभंगा की अदालत ने 17 साल की कैद और 2 लाख का जुर्माना और पटना के एक जज ने 5 साल की सजा सुनाई थी. सिर्फ बिहार में नटवरलाल को 100 साल से ज्यादा की सजा सुनाई गई थी. अपने जीवन के 20 साल नटवरलाल ने जेल में बिताया है. 2009 में नटवरलाल के वकील ने उसके खिलाफ दर्ज 100 मामलों को हटाने की याचिका दायर की थी. उस याचिका के हिसाब से नटवरलाल की मौत 25 जुलाई 2009 को हो चुकी थी.

    सिर्फ शातिर ही नहीं हाजिर-जवाबी और साहस का मिश्रण था नटवरलाल

    1987 में जब नटवरलाल को पुलिस ने वाराणसी से गिरफ्तार किया तो इंडिया टुडे के रिपोर्टर ने नटवर लाल से 2 घंटे तक बातचीत की थी. और उस समय ने रिपोर्टर के सवालों का नटवरलाल ने जो जवाब दिया, वो उसकी हिम्मत को दर्शाता है.

    आप इस बार पकड़े कैसे गए?
    मुझे अपनी बुद्धि पर इतना भरोसा है कि मुझे कोई नहीं पकड़ सकता है. यह तो परमपिता परमेश्वर की मर्जी है. मैं नहीं जानता उसने मेरे भाग्य में क्या लिखा है.
    आप भगवान में भरोसा करते हैं?
    निश्चित ही. जब भी मैं मुश्किल  में पड़ता हूं, बिल्कुल खामोश हो जाता हूं और परमश्वेर की प्रार्थना करता हूं. वह मेरे सामने प्रकट हो जाते हैं और फिर मेरी सारी समस्या दूर हो जाती हैं.
    जिस आदमी ने कईयों को ठगा हो वह भगवान में इस तरह भरोसा जताए, क्या यह कुछ अटपटा नहीं है?
    नहीं-नहीं किसने कहा कि मैंने ठगी की है? मैंने लोगों को कभी डराया-धमकाया नहीं है कि मुझे पैसे दो. लोगों ने तो हाथ जोड़कर मुझे पैसे दिए कि ‘श्रीमान’ पैसे ले लीजिए और मैंने ले लिए. इसमें अपराध क्या है? परमपिता इन कानूनों को नहीं बनाता है. कानून तो हम ही बनाता है और बदलते हैं.
    आप जेल से इतनी बार भागने में सफल कैसे रहे?
    मैं कभी नहीं भागा. वे मुझे ले जाते दरवाजा खोलते और जाने देते.
    क्या आपने अपनी कहानी पर बनी फिल्म ‘मिस्टर नटरवर लाल’ देखी है?
    नहीं, जब मैं खुद ही असली हीरो हूं तो नकली हीरो को क्यों देखूं? जब मुझे इस फिल्म के बारे में पता चला तो मैंने इसके निर्देशक और निर्माता पर मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया था.

    सावरकर के आगे वीर लगाना कितना सही है?

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    राजनीतिक हिंदुत्ववादी विचारधारा के जनक कहे जानेवाले विनायक दामोदर सावरकर के जीवन से जुड़ी घटनाएं उनकी ‘वीरता’ पर कई सवाल खड़े करती हैं


    आज विनायक दामोदर सावरकर की पुण्यतिथि है. आज के दिन भाजपा के तमाम नेता सावरकर के उस साहस को याद करते हैं जिसकी वजह से उन्हें वीर कहकर सम्मानित किया जाता है.
    लेकिन सवाल है कि ‘वीर’ सावरकर क्या असलियत में इतने ही वीर और साहसी थे?
    सावरकर की मृत्यु 1966 में हुई थी. वे 1948 में हुई महात्मा गांधी की हत्या के आठ आरोपितों में से एक थे. हालांकि उन्हें बरी कर दिया गया क्योंकि उन्हें दोषी साबित करने के लिए जरूरी सबूत नहीं थे. आजादी से पहले वे तीन अंग्रेज अधिकारियों की हत्या या इसकी कोशिश में शामिल थे. राष्ट्रवादियों के नजरिये से ये हत्याएं हिंसक तौर-तरीकों से अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने की सावरकर की क्रांतिकारी भावना दिखाती हैं.
    सावरकर अपने अनुयायियों को यह जताकर भरमाते रहे कि अंग्रेजों की हत्या में उनका हाथ था वहीं दूसरी तरफ इस बात का भी भरसक ध्यान रखा कि कहीं किसी हत्याकांड से उनका संबंध उजागर न हो जाए
    इन घटनाओं ने वीरता को लेकर उनके बारे में गढ़े गए मिथक को मजबूत किया. हालांकि बीते सालों में ऐसी कई जानकारियां सामने आई हैं जो इसे चूर-चूर करती रही हैं. एक तरफ सावरकर अपने अनुयायियों को यह जताकर भरमाते रहे कि अंग्रेजों की हत्या में उनका हाथ था वहीं दूसरी तरफ उन्होंने इस बात का भी भरसक ध्यान रखा कि कहीं किसी हत्याकांड से उनका संबंध उजागर न हो जाए. इसके लिए सावरकर अपने सबसे कट्टर अनुयायियों से भी पल्ला झाड़ सकते थे. गांधी जी की हत्या करने वाला नाथूराम गोडसे भी उनका ऐसा ही अनुयायी था.
    सावरकर की जिस बहादुरी की तारीफ की जाती है वह अंडमान में उनके कैद के दिनों में भी शायद ही कहीं दिखी हो. इस दौरान वे देश नहीं बल्कि अपनी आजादी के लिए अंग्रेजों से माफी मांगते हुए मोलभाव कर रहे थे.
    पहली हत्या जिसमें सावरकर का नाम आया
    एक जुलाई, 1909 में मदनलाल ढींगरा ने सर विलियम कर्जन वाइली की लंदन में गोली मारकर हत्या कर दी थी. वाइली लंदन स्थित इंडिया ऑफिस में सचिव स्तर के अधिकारी थे. इससे पहले ढींगरा की योजना भारत के पूर्व वायसराय लॉर्ड कर्जन और बंगाल के पूर्व गवर्नर ब्रमफील्ड फुलर को मारने की थी. ये दोनों लंदन में एक कार्यक्रम में शामिल होने वाले थे. लेकिन ढींगरा के आयोजन स्थल पर देर से पहुंचने की वजह से यह योजना फेल हो गई.
    सावरकर की जिस बहादुरी की तारीफ की जाती है वह अंडमान में उनकी कैद के दौरान भी शायद ही कहीं दिखी हो. उस समय वे देश नहीं बल्कि अपनी आजादी के लिए अंग्रेजों से माफी मांगते हुए मोलभाव कर रहे थे
    बाद में फिर एक दूसरी योजना बनाकर उन्होंने वाइली को गोली मारी थी. इसके लिए ढींगरा को फांसी की सजा हुई. अंग्रेजों को इस मामले में सावरकर पर भी शक था लेकिन उनके खिलाफ कोई मजबूत सबूत नहीं थे. ऐसे कुछ सबूत 1966 में सावरकर की मृत्यु के बाद उजागर हो पाए. ये सबूत उसी साल प्रकाशित हुई उनकी जीवनी में दर्ज हैं.
    धनंजय कीर सावरकर के जीवनीकार थे. उनकी लिखी किताब, सावरकर एंड हिज टाइम्स 1950 में प्रकाशित हुई थी. सावरकर की मृत्यु के बाद कीर ने इसे फिर प्रकाशित करवाया. उन्होंने दावा किया कि इसमें कई नई जानकारियों को शामिल किया गया है जो उन्हें खुद सावरकर से मिली थीं. इस संस्करण में कीर ने लिखा है कि वाइली की हत्या के दिन सुबह सावरकर ने ढींगरा को एक रिवाल्वर दी थी और कहा था, ‘यदि इसबार तुम असफल हुए तो मुझे अपना चेहरा मत दिखाना.’ कीर ने यह बात रॉबर्ट पायने को भी बताई थी कि सावरकर ने ढींगरा को महीनों तक ट्रेनिंग दी थी और वे अक्सर उलाहना देते थे कि ढींगरा लॉर्ड कर्जन और फुलर की हत्या करने में असफल रहे. रॉबर्ट पायने लाइफ एंड डेथ ऑफ महात्मा गांधी नाम की किताब के लेखक हैं.
    कीर की किताब से हुए इस खुलासे के आधार पर इतिहासकार एजी नूरानी ने अपनी किताब – सावरकर एंड हिंदुत्व : द गोडसे कनेक्शन में तंज करते हुए लिखा है, ‘इस बात पर आश्चर्य होता है कि क्या सावरकर ने ही यह तय किया था कि इन बातों का प्रकाशन उनकी मृत्यु के बाद होना चाहिए. इस बात को स्वीकार किए बिना दो संस्करणों के बीच 16 साल के अंतराल को नहीं समझा जा सकता.’
    दूसरी राजनीतिक हत्या जिससे सावरकर का संबंध जुड़ता है
    इंग्लैंड में कानून की पढ़ाई के लिए रवाना होने से पहले सावरकर मित्र मेला नाम के एक गुप्त संगठन के सदस्य थे. इसी का नाम बाद में अभिनव भारत रखा गया. इस संगठन का लक्ष्य हिंसक तौर-तरीकों से अंग्रेजी शासन को खत्म करना था.
    सावरकर के बड़े भाई गणेश उर्फ बाबाराव भी अभिनव भारत के सदस्य थे. एक बार अंग्रेज पुलिस ने छापेमारी के दौरान उनको हिरासत में लिया तो उनके पास से बमों का जखीरा बरामद हुआ था. इसके लिए उन्हें आठ जून, 1909 को कालापानी की सजा सुनाई गई थी.
    दया याचिका में सावरकर का कहना था कि अंग्रेजों द्वारा उठाए गए सुधारात्मक कदमों से उनकी संवैधानिक व्यवस्था में आस्था पैदा हुई है. इसके साथ उन्होंने घोषणा की थी कि वे अब हिंसा पर यकीन नहीं करते
    गणेश के साथियों ने इसका बदला लेने की योजना बनाई. इन्हीं में से एक अनंत कन्हेरे ने 29 दिसंबर, 1909 को एएमटी जैक्सन को गोली मार दी. जैक्सन नासिक के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट थे और उन्हीं की अदालत में गणेश के मुकदमे की सुनवाई हुए थी. हालांकि उन्होंने गणेश को अंडमान भेजने की सजा नहीं सुनाई थी. यह फैसला दूसरे जज का था.
    इस हत्याकांड के तुरंत बाद घटनास्थल से ही कन्हेरे को गिरफ्तार कर लिया गया. उनके दो और साथी इस मामले में गिरफ्तार हुए और इनके पास से सावरकर के पत्र बरामद हुए थे. सावरकर पर आरोप लगा कि उन्होंने इस हत्या में इस्तेमाल की गई ब्राऊनिंग पिस्टल और उस जैसी 20 और पिस्टल इंग्लैंड से भारत भिजवाई थीं. इसी के आधार पर टेलिग्राफ से सावरकर के नाम एक वारंट लंदन भेजा गया. सावरकर ने 13 मार्च, 1910 को आत्मसमर्पण कर दिया. फिर उन्हें भारत लाया गया.
    जैक्सन की हत्या और अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह के आरोप में सावरकर को भी दो बार की कालापानी की सजा सुनाई गई. यानी उन्हें कुल 50 साल अंडमान की जेल में रहना था. सावरकर चार जुलाई, 1911 को पोर्ट ब्लेयर पहुंचे थे.
    सावरकर का माफी मांगना
    इसमें कोई दोराय नहीं कि अंडमान की सेल्यूलर जेल में हालात भयावह थे. जानवरों को जिस तरह कोल्हू में जोता जाता है, सावरकर को उसी तरह तेल मिल में काम पर लगाया गया. यह बर्बर सजा थी हालांकि वे अकेले व्यक्ति नहीं थे जिसे इस काम में लगाया गया हो. 1911 में उन्होंने खुद ही सरकार के सामने दया याचिका लगा दी. इस दया याचिका में क्या लिखा गया था आज उसकी जानकारी मौजूद नहीं है लेकिन जब उन्होंने 14 नवंबर, 1913 को दूसरी याचिका भेजी तो इसमें पहली याचिका का जिक्र किया गया था. अपने ऊपर दया करने की गुहार लगाते हुए उन्होंने अंग्रेज सरकार से खुद को भारत में स्थित किसी जेल में भेजे जाने की प्रार्थना की थी. इसके बदले में उन्होंने प्रस्ताव दिया था कि जिस तरह भी संभव होगा वे सरकार के लिए काम करेंगे. सावरकर का कहना था कि अंग्रेजों द्वारा उठाए गए सुधारात्मक कदमों से उनकी संवैधानिक व्यवस्था में आस्था पैदा हुई है. ऐसा कहते हुए उन्होंने घोषणा की थी कि वे अब हिंसा पर यकीन नहीं करते.
    सावरकर अंडमान में कैदियों को हड़ताल या विरोध की कार्रवाइयों के लिए उकसाते थे लेकिन कभी इन कार्रवाइयों में सीधे-सीधे शामिल नहीं होते थे
    इस दया याचिका में सावरकर का यह भी कहना था कि संवैधानिक व्यवस्था में उनकी आस्था भारत और दूसरी जगहों पर रह रहे उन भटके हुए युवाओं को मुख्यधारा में ले आएगी जो उनको अपना मार्गदर्शक मानते हैं. यह लिखते हुए सावरकर ने एक झटके में ही भारत के क्रांतिकारी आंदोलन को छोड़ दिया था.
    अंग्रेज सरकार को इस अर्जी पर बिल्कुल भरोसा नहीं हुआ लेकिन इसकी वजह से जेल में उनकी स्थिति थोड़ी सुधर गई. इसके बाद उन्हें फोरमैन की जिम्मेदारी दे दी गई.
    सावरकर जेल में कैदियों का भड़काने का काम भी करते थे लेकिन खुद उनके साथ खड़े नहीं होते थे. इतिहासकार आरसी मजूमदार सावरकर के साथ जेल में रहे त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती के हवाले से लिखते हैं कि सावरकर ने उन्हें और दूसरे कैदियों को भूख-हड़ताल करने के लिए उकसाया था लेकिन खुद उन्होंने और उनके भाई ने इसमें हिस्सा नहीं लिया. वह भी तब जबकि सावरकर से ज्यादा उम्र के कैदी भूख हड़ताल कर रहे थे. सावरकर अपने फैसले को यह कहकर जायज ठहराते थे कि इसकी वजह से उन्हें कालकोठरी में डाल दिया जाएगा और भारत में पत्र भेजने का अधिकार छीन लिया जाएगा. इन घटनाओं के आधार पर सावरकर ऐसे नेता के रूप में उभरते हैं जो तब तक क्रांति का समर्थन करता है जब तक कि उसे खुद इसकी कीमत न चुकानी पड़े.
    सावरकर की मुख्यभूमि में वापसी
    मई, 1921 में सावरकर को अंडमान से मुख्यभूमि (भारत) भेज दिया गया. वे अब यहां पुणे की यरवदा जेल में थे. तीन साल बाद सरकार ने उनके सामने रिहाई के लिए कुछ शर्तें रखीं. ये शर्तें थीं – सावरकर को रत्नागिरी जिले में ही रहना होगा; बिना सरकारी अनुमति के वे जिले से बाहर नहीं जा सकते; वे निजी या सार्वजनिक रूप से राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते; ये शर्तें पांच साल के लिए थीं और इस समयावधि के बाद इन्हें दोबारा लगाया जा सकता था.
    अंग्रेज सरकार को दिए शपथपत्र में सावरकर ने लिखा था, ‘मैं बीते सालों में हिंसा की जिन गतिविधियों लिप्त रहा अब पूरे हृदय से उनसे घृणा करता हूं और मुझे लगता है कि कानून और संविधान का पालन करना मेरा कर्तव्य है...’
    सावरकर ने ये शर्तें मान ली थीं, यह तथ्य खुद-ब-खुद ही उन्हें वीर कहे जाने के मिथक को तोड़ने के लिए पर्याप्त है. हालांकि बात यहीं पूरी नहीं होती. इसी घटना से जुड़ा एक तथ्य और है - इन शर्तों को मानने के साथ सावरकर ने अपनी तरफ से सरकार को एक शपथपत्र भी दिया था. फ्रंटलाइन पत्रिका के 1995 के एक अंक के मुताबिक सावरकर ने इस शपथपत्र में घोषणा की थी कि उनके मुकदमे की निष्पक्ष सुनवाई हुई थी और उन्हें उचित सजा मिली थी. इसमें वे लिखते हैं, ‘मैं बीते सालों में हिंसा की जिन गतिविधियों लिप्त रहा अब पूरे हृदय से उनसे घृणा करता हूं और मुझे लगता है कि कानून और संविधान का पालन करना मेरा कर्तव्य है...’
    सावरकर सरकार के सामने लगातार झुकते रहे
    1925 में पंजाब में ‘रंगीला रसूल’ नाम से एक किताब प्रकाशित हुई थी. इस किताब में पैगंबर मोहम्मद के बारे में कई आपत्तिजनक बातें थीं जिस वजह से वहां तनाव का माहौल बन गया था. सावरकर ने मार्च, 1925 में इस पर अखबार में एक भड़काऊ आलेख लिखा था. इसके बाद सरकार ने उन तक यह संदेश भिजवा दिया कि यदि उन्होंने फिर ऐसा कुछ लिखा तो उनकी रिहाई पर पुनर्विचार हो सकता है. इस आलेख में ‘स्वराज’ का भी जिक्र किया गया था. सरकार की चेतावनी के जवाब में सावरकर ने एक लंबा पत्र लिखा. इसमें स्पष्ट किया गया था कि उनके लिखे स्वराज का वह मतलब नहीं है जो समझा गया. इसके साथ ही उन्होंने सरकार का आभार माना कि उसने उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिया.
    तीसरी राजनीतिक हत्या जिससे सावरकर का नाम जुड़ा
    22 जुलाई, 1931 को बंबई के प्रभारी गवर्नर सर अर्नेस्ट हॉट्सन पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में आए थे. इसी दौरान वीबी गोगाटे ने उनपर दो गोलियां दागीं लेकिन किस्मत से वे बच गए. सावरकर का संबंध हत्या की इस कोशिश से भी जोड़ा जाता है. हालांकि उस समय इस मामले में उनका नाम नहीं आया था लेकिन कीर ने 1966 में सावरकर पर जो किताब प्रकाशित की थी उसके मुताबिक गोगाटे सावरकर का कट्टर अनुयायी था और हॉटसन पर हमले के पहले वह सावरकर से मिल चुका था. इस बात के जरिए क्या कीर यह कहना चाहते थे कि हत्या की इस कोशिश के पीछे भी सावरकर का हाथ था?
    महात्मा गांधी की हत्या के बाद जब सावरकर को पुलिस हिरासत में लिया गया तो उन्होंने पुलिस आयुक्त को पत्र लिखकर प्रस्ताव दिया, ‘यदि मुझे रिहा कर दिया जाता है तो सरकार जब तक चाहेगी मैं सांप्रदायिक और राजनीतिक गतिविधियों से खुद को दूर रखूंगा’
    महात्मा गांधी की हत्या में सावरकर की भूमिका
    महात्मा गांधी की हत्या 30 जनवरी, 1948 को हुई थी और सावरकर को पांच फरवरी को हिरासत में ले लिया गया था. 17 दिन बाद उन्होंने बंबई के पुलिस आयुक्त को एक पत्र लिखा था. इसमें वे लिखते हैं, ‘यदि मुझे रिहा कर दिया जाता है तो सरकार जब तक चाहेगी मैं सांप्रदायिक और राजनीतिक गतिविधियों से खुद को दूर रखूंगा.’ यह एक गैरजरूरी प्रस्ताव था जिसने गांधी जी की हत्या में सावरकर की भूमिका पर शक को और गहरा कर दिया. हालांकि अदालत में इसे साबित नहीं किया जा सका. वहीं सावरकर की मृत्यु के कई सालों बाद इस मामले में भी उनकी भूमिका स्पष्ट हुई थी.
    जनवरी, 1948 में गांधी जी की हत्या की दो कोशिशें हुई थीं. पहली बार एक पंजाबी शरणार्थी मदनलाल पाहवा ने 20 जनवरी को उन्हें मारने की साजिश की थी लेकिन वह असफल रहा. दूसरी कोशिश नाथूराम गोडसे की थी जिसमें इन लोगों को सफलता मिल गई थी.
    गांधी जी की हत्या के मामले में आठ आरोपित थे – नाथूराम गोडसे और उनके भाई गोपाल गोडसे, नारायण आप्टे, विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, शंकर किष्टैया, विनायक दामोदर सावरकर और दत्तात्रेय परचुरे. इस गुट का नौवां सदस्य दिगंबर रामचंद्र बडगे था जो सरकारी गवाह बन गया था. अदालत में दी गई बडगे की गवाही के आधार पर ही सावरकर का नाम इस मामले से जुड़ा था.
    बडगे ने इसमें बताया था कि वह गोडसे और आप्टे के साथ दो बार बंबई में सावरकर सदन गया था. इस भवन की दूसरी मंजिल पर सावरकर रहते थे. ये लोग पहली बार 14 जनवरी को वहां पहुंचे थे. इसी दिन बडगे ने गोडसे और आप्टे को दो गन-कॉटन (पलीता), पांच हैंडग्रेनेड और डिटोनेटर दिए थे. बडगे उस दिन सावरकर सदन के अंदर नहीं गया था. लेकिन आप्टे ने उसे बताया था कि उनकी और गोडसे की सावरकर से मुलाकात हुई है और सावरकर ने कहा है कि गांधी और नेहरू को ‘खत्म’ होना चाहिए. आप्टे के मुताबिक सावरकर ने यह जिम्मेदारी उन दोनों को सौंपी थी.
    मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष लगातार इस बात पर जोर देता रहा कि गोडसे और आप्टे सावरकर के प्रति समर्पित रहे हैं. वहीं सावरकर अपनी आदत के अनुसार इन दोनों से पल्ला झाड़ते रहे
    ये लोग दूसरी बार 17 जनवरी को सावरकर सदन पहुंचे थे. इस बार बडगे भी सदन के अंदर गया था. गोडसे और आप्टे दूसरी मंजिल पर सावरकर से मिलने चले गये. बडगे के मुताबिक 10 मिनट बाद जब वे सीढ़ियों से उतर रहे थे तो उसने सावरकर को उनसे मराठी में यह कहते सुना ‘तुम्हें सफलता मिले और तुम वापस लौटो’. हालांकि बडगे ने यह कहते हुए सावरकर को देखा नहीं था.
    ट्रायल कोर्ट के जज आत्माचरण के मुताबिक बडगे ‘सच्चा गवाह’ था लेकिन उन्होंने सावरकर को इस मामले में बरी कर दिया क्योंकि अदालत में बडगे की बयानों की कड़ियां जोड़ने वाले सबूत पेश नहीं किए जा सके.
    इसकी एक वजह यह भी थी कि गोडसे और दूसरे लोगों ने भरसक कोशिश की थी कि उनके मार्गदर्शक का नाम इस हत्याकांड में न आए. उदाहरण के लिए गोडसे ने सावरकर से अपना संबंध वैसा ही बताया जैसा एक नेता और उसके अनुयायी का होता है. गोडसे का कहना था कि उन्होंने और उनके साथियों ने, ‘1947 में ही वीर सावरकर के नेतृत्व को छोड़ दिया था और उनसे भविष्य की योजनाओं-नीतियों पर सलाह लेना बंद कर दिया था... मैं दोबारा यह कहना चाहता हूं कि यह बात सही नहीं हैं कि वीर सावरकर को मेरी गतिविधियों के बारे में कोई जानकारी थी और जिन पर आगे बढ़ते हुए मैंने गांधी जी की हत्या की.’
    मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष लगातार इस बात पर जोर देता रहा कि गोडसे और आप्टे सावरकर के प्रति समर्पित रहे हैं. वहीं सावरकर अपनी आदत के अनुसार इन दोनों से पल्ला झाड़ते रहे. उनका कहना था कि कई अपराधी अपने गुरुओं और मार्गदर्शकों के प्रति काफी सम्मान दिखाते हैं लेकिन क्या जिन लोगों ने अपराध किया है उनकी निष्ठा के आधार पर गुरुओं और मार्गदर्शकों को उस अपराध के लिए दोषी ठहराया जा सकता है?
    जिस तरह सावरकर ने नाथूराम गोडसे से पल्ला झाड़ा था उससे वह बहुत आहत था. उसने यह बात की चर्चा गोपाल गोडसे के वकील पीएल इनामदार से की थी 
    सावरकर के इस वक्तव्य से गोडसे काफी आहत हुआ था. इस बात की पुष्टि पीएल ईनामदार करते हैं जिन्होंने इस मामले में गोपाल गोडसे की पैरवी की थी. वे एक स्थान पर लिखते हैं, ‘कालकोठरी में नाथूराम, तात्याराव (सावरकर) के हाथ के स्पर्श, सहानुभूति के दो बोल या कम से कम स्नेह भरी एक नजर के लिए तड़पता था. नाथूराम से मेरी अंतिम मुलाकात के दौरान भी उसने इस संदर्भ में अपनी आहत भावनाओं के बारे में चर्चा की थी...’
    सावरकर के खिलाफ कुछ नए सबूत
    गोपाल गोडसे की सजा पूरी होने के बाद उसे अक्टूबर, 1964 में रिहा कर दिया गया. उसकी रिहाई का उत्सव मनाने के लिए 11 नवंबर, 1964 को पुणे में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. इसमें तरुण भारत अखबार के संपादक जीवी केतकर भी मौजूद थे. यहां केतकर का कहना था कि नाथूराम गोडसे उनसे अक्सर गांधी की हत्या के फायदों के बारे में चर्चा करता रहता था.
    केतकर के इस इस खुलासे से पूरे देश में हलचल मच गई. संसद में भी इसपर खूब हल्ला-गुल्ला मचा और आखिरकार सरकार ने मार्च, 1965 जस्टिस जेएल कपूर की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन कर दिया. आयोग को यह पता लगाना था कि क्या महात्मा गांधी की हत्या की साजिश काफी पहले रची गई थी और क्या सरकार को इस बारे में पहले से कोई जानकारी मिली थी.
    आयोग गठित होने के कुछ महीनों बाद ही सावरकर ने स्वेच्छा से खाना-पीना बंद करके अपने प्राण त्याग दिये. उनका कहना था कि किसी व्यक्ति के जीवन का मिशन खत्म होने के बाद यह बेहतर है कि वह स्वेच्छा से प्राण त्याग दे. यहां सवाल उठाया जा सकता है कि क्या सावरकर ने यह कदम आयोग की जांच में अपना नाम आने और अपने जीवन के इस अंतिम चरण में अपमानित होने की आशंका से बचने के लिए उठाया था?
    इस सवाल का ठीक-ठीक जवाब नहीं दिया जा सकता. पर सावरकर के ऐसा करने से शायद उनके सुरक्षाकर्मी अप्पा रामचंद्र कसर और उनके सचिव विष्णु डामले को यह आजादी जरूर मिल गई थी कि वे आयोग के सामने अपनी सही गवाही दर्ज करवा सकें. इन दोनों ने इस बात की पुष्टि की कि गोडसे और आप्टे सावरकर के काफी करीबी थे और यहां तक कि ये लोग एक साथ हिंदू महासभा की बैठकों में भी भाग लेने जाया करते थे. आयोग को उन्होंने यह जानकारी भी दी कि विष्णु करकरे एक पंजाबी शरणार्थी लड़के (मदनलाल पाहवा) को जनवरी, 1948 के पहले हफ्ते में सावरकर से मिलाने लाया था और इन दोनों के बीच में तकरीबन 30-45 मिनट तक बातचीत हुई थी.
    1967 में गोपाल गोडसे ने एक किताब लिखी थी – गांधी हत्या, अणि मी (गांधी की हत्या और मैं). इसमें उसने जानकारी दी थी कि नाथूराम गोडसे सावरकर को 1929 से जानता था
    1967 में गोपाल गोडसे ने एक किताब लिखी थी – गांधी हत्या, अणि मी (गांधी की हत्या और मैं). इसमें उसने जानकारी दी थी कि नाथूराम गोडसे सावरकर को 1929 में तब से जानता था जब सावरकर रत्नागिरी में रह रहे थे. इस किताब के मुताबिक नाथूराम गोडसे और सावरकर का रोजाना मेलजोल होता था.
    इन बयानों और सूचनाओं के आधार पर जस्टिस कपूर का निष्कर्ष था कि ये सभी तथ्य एक साथ रखे जाएं तो यह बात स्पष्ट होती है कि गांधी जी की हत्या के पीछे सावरकर और उनके संगठन का ही हाथ था.
    जिस तरह से सावरकर, गोडसे और आप्टे का करीबी संबंध था, ऐसे में क्या मुमकिन है कि इन लोगों ने अपने मार्गदर्शक को गांधी जी की हत्या की योजना के बारे में न बताया हो? 2011 में प्रकाशित किताब हिस्टरी एंड द मेकिंग ऑफ मॉडर्न हिंदू सेल्फ में इसका एक जवाब मिलता है. यह किताब अपर्णा देवारे ने लिखी है. इसमें उन्होंने अपने एक बुजुर्ग रिश्तेदार डॉ अच्युत फड़के का जिक्र किया है जिन्हें नारायण आप्टे ने हाई स्कूल में फिजिक्स पढ़ाई थी. फड़के ने देवारे को बताया था कि आप्टे गांधी की हत्या की अपनी और गोडसे की योजना के बारे में खुलेआम चर्चा करता था. यह बड़ी ही विचित्र बात है कि जो बात ये लोग स्कूल के बच्चों के सामने कर रहे थे भला वो उन्होंने सावरकर से क्यों छिपाई होगी.
    सावरकर के प्रति भाजपा का प्यार
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुत्व के जिस राजनीतिक दर्शन को आगे बढ़ाना चाहता है सावरकर उसके जनक हैं इसीलिए वह सावरकर के साहस से जुड़े मिथक को इतना बढ़ा-चढ़ाकर बताता है. संघ के लिए यह बात मायने नहीं रखती कि सावरकर ने किस तरह अपने कट्टर अनुयायियों से पल्ला झाड़ लिया था या फिर वे किस तरह अंग्रेज सरकार को माफीनामे भेज रहे थे.

    सोते वक्त क्यों बहती है लार? जानिए कारण

        


    अक्सर हम देखते है कि कई बच्चे जब सोकर उठते है तो उनकी मुंह से लार बह रही होती है। ये समस्या बच्चों में नहीं बल्कि बड़ो में भी देखी जाती है। अगर आप भी इस समस्या से जूझ रहे है तो हम आपको इसका कारण।

    नींद और लार का क्या है संबंध?

    जब कोई बच्चा गहरी नींद से सोकर उठता है तो उसके मुंह के किनारे से लार की पतली सी धार बह रही होती है। हालांकि सोते हुए लोगों के मुंह से लार बहना बहुत आम बात है लेकिन कई बार ये किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी होता है। आइए पहले जानते हैं कि आपकी नींद और लार बहने के बीच क्या संबंध है।

    कब बहती है लार

    जब आप नींद में होते हैं तो आप और आपकी चेहरे की नसें आराम के मूड में होती हैं। इसलिए ऐसे में जब आपके लार के ग्लैंड्स लार तैयार करते हैं तो वो बहने लग जाती है क्योंकि आप उसे निगलते नहीं हैं। अगर आपकी सोते हुए लार बहती है तो आपने देखा होगा कि लार आमतौर पर तभी बहती है जब आप करवट लेकर सोते हो। हम आपको बताते है कि लार बहने के क्या कारण होते है।

    - एलर्जी

    खाने पीने की चीजों से होने वाली एलर्जी और नाक से संबंधित एलर्जी की वजह से लार का अधिक निर्माण हो सकता है और वो बह सकती है। शरीर में लार बनाने वाले अलग से ग्लैंड्स होते हैं। सोते समय जागते समय की अपेक्षा अधिक लार का निर्माण होता है।

    - एसीडिटी 

    वैज्ञानिकों का मानना है कि एसिड रिफ्लक्स एपीसोड्स के कारण गेस्ट्रिक एसिड होता है। इससे एसोफागोसलाइवरी उत्तेजित होता है और बहुत अधिक लार बनने लगती है।

    - साइनस इंफेक्शन

    श्वास नलिका के संक्रमण आमतौर पर सांस लेने और निगलने की समस्याओं से जुड़े होते हैं। इन समस्याओं में लार जमा हो जाने से मुंह से बहने लगती है। फ्लू के कारण जब नाक बंद होती है तो आप खासतौर पर रात को अपने मुंह से सांस लेते हैं और ऐसे में आपके मुंह से लार बहने लगती है।

    - टोंसिलाइटिस

    टोंसिल्स ग्लैंड्स गले के पीछे मौजूद होते हैं, जिनमें सूजन आ जाने से टोंसिलाइटिस हो सकता है। सूजन की वजह से गले का रास्ता छोटा हो जाता है जिससे लार गले से उतर नहीं पाती और मुंह से बहने लग जाती है।

    - सोते हुए डरना


    कुछ लोगों को सोते हुए डर लगता है। इस समस्या का एक लक्षण लार बहना भी है। युवाओं में साइकोपैथोलॉजिकल कारण से ये समस्या होती हैं। ऐसा उनके भावनात्मक तनाव में होने के कारण, ड्रग्स या एल्कोहल लेने के कारण और नींद की कमी के कारण भी हो सका है। इसके इलावा कई बार नींद से जुड़ी अन्य समस्याओं जैसे नींद में चलना, नींद में बात करना आदि में भी लार बहती है।

    - ड्रग्स और केमिकल्स

    ड्रग्स और केमिकल्स के कारण भी लार का निर्माण होता है। अगर आप कोई दवाई या ड्रग्स ले रहे हैं तो सोते हुए लार बहना आपके लिए बहुत आम बात हो सकती है। कुछ एंटीडिप्रेसेंट और दवाएं जैसे कि मॉर्फिन, पिलोकार्पिन आदि लार का निर्माण बढ़ा देती हैं।


    पोखरण टेस्ट 1: बुद्धा इज़ स्माइलिंग!

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    18 मई, 1974 की सुबह आकाशवाणी के दिल्ली स्टेशन पर 'बॉबी' फ़िल्म का वो मशहूर गाना बज रहा था, "हम तुम एक कमरे में बंद हों और चाबी खो जाए."

    ठीक नौ बजे गाने को बीच में ही रोक कर उद्घोषणा हुई, कृपया एक महत्वपूर्ण प्रसारण की प्रतीक्षा करें.
    कुछ सेकंड बाद रेडियो पर उद्घोषक के स्वर गूंजे, "आज सुबह आठ बजकर पांच मिनट पर भारत ने पश्चिमी भारत के एक अज्ञात स्थान पर शांतिपूर्ण कार्यों के लिए एक भूमिगत परमाणु परीक्षण किया है."
    इससे एक दिन पहले लंदन में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के प्रधान सचिव पीएन हक्सर बार-बार भारतीय उच्चायुक्त बीके नेहरू से सवाल कर रहे थे, "दिल्ली से कोई ख़बर आई?"
    जैसे ही भारत के परमाणु परीक्षण की ख़बर मिली नेहरू ने हक्सर के चेहरे पर आई राहत को साफ़ पढ़ा.
    वो समझ गए कि हक्सर क्यों बार-बार दिल्ली से आने वाली ख़बर के बारे में पूछ रहे थे.

    किसका सिर काटा जाए

    पाँच दिन पहले 13 मई को परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी सेठना की देखरेख में भारत के परमाणु वैज्ञानिकों ने परमाणु डिवाइस को असेंबल करना शुरू किया था.
    14 मई की रात डिवाइस को अंग्रेज़ी अक्षर एल की शक्ल में बने शाफ़्ट में पहुंचा दिया गया था. अगले दिन सेठना ने दिल्ली के लिए उड़ान भरी. इंदिरा गाँधी से उनकी मुलाक़ात पहले से ही तय थी.
    सेठना ने कहा, "हमने डिवाइस को शाफ़्ट में पहुंचा दिया है. अब आप मुझसे ये मत कहिएगा कि इसे बाहर निकालो क्योंकि ऐसा करना अब संभव नहीं है. अब आप हमें आगे जाने से नहीं रोक सकतीं."
    इंदिरा का जवाब था, "गो अहेड. क्या तुम्हें डर लग रहा है?"
    सेठना बोले, "बिल्कुल नहीं. मैं बस ये बताना चाह रहा था कि अब यहाँ से पीछे नहीं मुड़ा जा सकता." अगले दिन इंदिरा गाँधी की मंज़ूरी ले कर सेठना पोखरण वापस पहुँचे.
    उन्होंने पूरी टीम को जमा किया और सवाल किया कि अगर ये परीक्षण असफल हो जाता है तो किसका सिर काटा जाना चाहिए? बम के डिज़ाइनर राजगोपाल चिदंबरम ने छूटते ही जवाब दिया, "मेरा."
    टीम के उपनेता पी के आएंगर भी बोले, "किसी का सिर काटने की ज़रूरत नहीं है. अगर ये असफल होता है तो इसका मतलब है भौतिकी के सिद्धांत सही नहीं हैं." ( राजा रमन्ना, इयर्स ऑफ़ पिलग्रिमेज)

    जीप ने दिया धोखा

    18 मई की सुबह पोखरण के रेगिस्तान में गर्मी कुछ ज़्यादा ही थी. विस्फोट को देखने के लिए वहाँ से पाँच किलोमीटर दूर एक मचान-सा बनाया गया था.
    वहाँ पर होमी सेठना, राजा रमन्ना, तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल बेवूर, डीआरडीओ के तत्कालीन अध्यक्ष बीडी नाग चौधरी, टीम के उपनेता पी के आयंगर और लेफ़्टिनेंट कर्नल पीपी सभरवाल मौजूद थे.
    नाग चौधरी के गले में कैमरा लटक रहा था और वो लगातार तस्वीरें खींच रहे थे. चिदंबरम और एक दूसरे डिज़ाइनर सतेंद्र कुमार सिक्का कंट्रोल रूम के पास एक दूसरे मचान पर थे.
    श्रीनिवासन और इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेशन टीम के प्रमुख प्रणव दस्तीदार कंट्रोल रूम के अंदर थे. परीक्षण के लिए सुबह आठ बजे का समय निर्धारित किया गया था.
    लेकिन इससे एक घंटे पहले अंतिम जाँच करने गए वैज्ञानिक वीरेंद्र सिंह सेठी की जीप परीक्षण स्थल पर स्टार्ट होने का नाम ही नहीं ले रही थी. समय निकलता जा रहा था. आख़िरकार सेठी ने जीप वहीं छोड़ी और दो किलोमीटर पैदल चल कर कंट्रोल रूम पहुँचे.
    सेठना ने वहाँ मौजूद थल सेनाध्यक्ष जनरल बेवूर से पूछा कि जीप का क्या किया जाए जो परीक्षण स्थल के बिल्कुल पास खड़ी थी. जनरल बेवूर का जवाब था, "ओह यू कैन ब्लो द डैम थिंग अप."
    ऐसा करने की नौबत नहीं आई क्योंकि इस बीच भारतीय सेना के जवान एक जीप ले कर वहाँ पहुंच गए और ख़राब जीप को टो करके सुरक्षित जगह पर लाया गया. लेकिन इस चक्कर में परीक्षण का समय पाँच मिनट और बढ़ा दिया गया.

    वी विल प्रोसीड

    अंतत: मचान के पास मौजूद लाउड स्पीकर से उल्टी गिनती शुरू हुई. सेठना और रमन्ना ने ट्रिगर दबाने का गौरव प्रणव दस्तीदार को दिया.
    जैसे ही पाँच की गिनती हुई प्रणव ने हाई वोल्टेज स्विच को ऑन किया. दस्तीदार के पैरों से ज़मीन निकल गई जब उन्होंने अपनी बाईं तरफ़ लगे इलेक्ट्रीसिटी मीटर को देखा.
    मीटर दिखा रहा था कि निर्धारित मात्रा का सिर्फ़ 10 फ़ीसदी वोल्टेज ही परमाणु डिवाइस तक पहुँच पा रहा था. उनके सहायकों ने भी ये देखा. वो घबराहट में चिल्लाए, "शैल वी स्टॉप ? शैल वी स्टॉप?" हड़बड़ी में गिनती भी बंद हो गई.
    लेकिन दस्तीदार का अनुभव बता रहा था कि शॉफ्ट के अंदर अधिक आद्रता की वजह से ग़लत रीडिंग आ रही है. वो चिल्लाए, "नो वी विल प्रोसीड."
    जॉर्ज परकोविच अपनी किताब 'इंडियाज़ न्यूकिल्यर बॉम्ब' में लिखते हैं आठ बज कर पाँच मिनट पर दस्तीदार ने लाल बटन को दबाया.

    कृष्ण ने पर्वत को अपनी उंगली पर उठाया

    उधर मचान पर मौजूद सेठना और रमन्ना ने जब सुना कि गिनती बंद हो गई है तो उन्होंने समझा कि विस्फोट को रोक दिया गया है.
    रमन्ना 'इयर्स ऑफ़ पिलग्रिमेज' में लिखते हैं कि उनके साथी वैंकटेशन ने जो इस दौरान लगातार विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रहे थे, अपना जाप रोक दिया था.
    अभी सब सोच ही रहे थे कि उनकी सारी मेहनत बेकार गई है कि अचानक धरती से रेत का एक पहाड़-सा उठा और लगभग एक मिनट तक हवा में रहने के बाद गिरने लगा. बाद में पी के आएंगर ने लिखा, "वो ग़ज़ब का दृश्य था. अचानक मुझे वो सभी पौराणिक कथाएं सच लगने लगी थीं जिसमें कहा गया था कि कृष्ण ने एक बार पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया था."
    उनके बग़ल में बैठे सिस्टम इंटिगरेशन टीम के प्रमुख जितेंद्र सोनी को लगा जैसे उनके सामने रेत की क़ुतुब मीनार खड़ी हो गई हो.

    औंधे मुंह गिरे

    तभी सभी ने महसूस किया मानो एक ज़बरदस्त भूचाल आया हो. सेठना को भी लगा कि धरती बुरी तरह से हिल रही है. लेकिन उन्होंने सोचा कि विस्फोट की आवाज़ क्यों नहीं आ रही? या उन्हें ही सुनाई नहीं पड़ रहा ? (रीडिफ़.कॉम से बातचीत- 8 सितंबर 2006)
    लेकिन एक सेकेंड बाद विस्फोट की दबी हुई आवाज़ सुनाई पड़ी. चिदंबरम, सिक्का और उनकी टीम ने एक दूसरे को गले लगाना शुरू कर दिया. चिदंबरम ने बाद में लिखा, ''ये मेरे जीवन का सबसे बड़ा क्षण था.'' जोश में सिक्का मचान से नीचे कूद पड़े और उनके टख़ने में मोच आ गई.
    कंट्रोल रूम में मौजूद श्रीनिवासन को लगा जैसे वो ज्वार भाटे वाले समुद्र में एक छोटी नाव पर सवार हों जो बुरी तरह से डगमगा रही हो. रमन्ना ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मैंने अपने सामने रेत के पहाड़ को ऊपर जाते हुए देखा मानो हनुमान ने उसे उठा लिया हो."
    लेकिन वो इस उत्तेजना में भूल गए थोड़ी देर में धरती कांपने वाली है. उन्होंने तुरंत ही मचान से नीचे उतरना शुरू कर दिया. जैसे ही धरती हिली मचान से उतर रहे रमन्ना अपना संतुलन नहीं बरक़रार रख पाए और वो भी ज़मीन पर आ गिरे.
    ये एक दिलचस्प इत्तेफ़ाक़ था कि भारत के परमाणु बम का जनक, इस महान उपलब्धि के मौक़े पर पोखरण की चिलचिलाती गर्म रेत पर औंधे मुँह गिरा पड़ा था.

    बुद्धा इज़ स्माइलिंग

    अब अगली समस्या थी कि इस ख़बर को दिल्ली इंदिरा गाँधी तक कैसे पहुँचाया जाए?
    सिर्फ़ इसी मक़सद से सेना ने वहाँ पर प्रधानमंत्री कार्यालय के लिए ख़ास हॉट लाइन की व्यवस्था की थी. पसीने में नहाए सेठना का कई प्रयासों के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क स्थापित हुआ.
    दूसरे छोर पर प्रधानमंत्री के निजी सचिव पी एन धर थे. सेठना बोले, "धर साहब, एवरी थिंग हैज़ गॉन..." तभी लाइन डेड हो गई.
    सेठना ने समझा कि धर को लगा होगा कि परीक्षण फ़ेल हो गया है. उन्होंने सेना की जीप उठाई और लेफ़्टिनेंट कर्नल पीपी सभरवाल के साथ बदहवासों की तरह ड्राइव करते हुए पोखरण गाँव पहुँचे जहाँ सेना का एक टेलिफ़ोन एक्सचेंज था.
    वहाँ पहुँच कर सेठना ने अपना माथा पीट लिया जब उन्होंने पाया कि वो धर का डाएरेक्ट नंबर भूल आए हैं.
    यहाँ सभरवाल उनकी मदद को आगे आए. उन्होंने अपनी सारी अफ़सरी अपनी आवाज़ में उड़ेलते हुए टेलिफ़ोन ऑपरेटर से कहा, "गेट मी द प्राइम मिनिस्टर्स ऑफ़िस. "
    ऑपरेटर पर उनके इस आदेश का कोई असर नहीं हुआ. उसने ठेठ हिंदी में पूछा आप हैं कौन?
    काफ़ी मशक्क़त और हील हुज्जत के बाद आख़िरकार प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क हुआ.
    बहुत ख़राब लाइन पर लगभग चीखते हुए सेठना ने वो मशहूर कोड वर्ड कहा, "बुद्धा इज़ स्माइलिंग. "

    प्रधानमंत्री निवास

    उस घटना के 29 वर्षों बाद तक पी एन धर ने ये बात किसी को नहीं बताई कि सेठना के ये सारे प्रयास बेकार साबित हुए थे क्योंकि दस मिनट पहले ही थलसेनाध्यक्ष जनरल बेवूर का फ़ोन उन तक पहुँच चुका था.
    धर उनसे सीधा सवाल नहीं कर सकते थे क्योंकि टेलिफ़ोन लाइन पर बातचीत सुनी जा सकती थी. धर ने उनसे पूछा था ' क्या हाल है?' बेवूर का जवाब था,' सब आनंद है.'
    धर को उसी समय लग गया कि भारत का परमाणु परीक्षण सफल रहा है. उन्होंने तुरंत प्रधानमंत्री निवास का रुख़ किया. उस समय इंदिरा गाँधी अपने लॉन में आम लोगों से मिल रही थीं.
    जब उन्होंने धर को आते हुए देखा तो वो लोगों से बात करना बंद उनकी तरफ़ दौड़ीं. उखड़ी हुई साँसों के बीच उन्होंने पीएन धर से पूछा, "क्या हो गया."
    धर का जवाब था, "सब ठीक है मैडम."
    धर ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मुझे अभी भी याद है कि ये सुनते ही इंदिरा गाँधी की बाँछे खिल गई थीं. एक जीत की मुस्कान को उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ा जा सकता था."