Shamsher ALI Siddiquee

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बड़े काम का शहद, यूं जांचें 'असली' या 'नकली'

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आधुनिक जीवनशैली और खान-पान में बदलाव के कारण लोगों में बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। ऐलोपैथी दवाओं से जहां इलाज तुरंत संभव हो जाता है, वहीं इसके साइड इफेक्ट भी हैं। ऐसे में आयुर्वेद की अहमियत और बढ़ गई है। आयुर्वेद में स्वस्थ रहने के लिए जिन चीजों के सेवन का सुझाव दिया जाता है, शहद भी उनमें से एक है। शहद के अंदर कई गुण पाए जाते हैं। यह आपको स्वस्थ रखने के साथ-साथ आपके शरीर में रोगरोधी शक्ति भी पैदा करता है। आइये आज जानते हैं, शहद से क्या-क्या फायदे होते हैं...


रोगरोधी क्षमता: शहद में रोगरोधी क्षमता बढ़ाने के गुण पाए जाते हैं। इसके नियमित सेवन से आपका शरीर कई बीमारियों से लड़ने में सक्षम हो जाता है।

अच्छा ऐंटि-ऑक्सिडेंट: शहद अपने औषधीय और स्वास्थ्य संबंधित गुणों के लिये सैकड़ों सालों से मशहूर है। इसमें हाइ फेनोलिक एवं फ्लैवेनॉयड कॉटेंट के साथ विभिन्न प्रकार के फाइटोकेमिकल्स मौजूद होते हैं, जो इसकी उच्च ऐंटि-ऑक्सिडेंट ऐक्टिविटी को बढ़ाते हैं। शहद में ऐंटी-ऑक्सिडेंट गुण होता है, जिसमें फ्री रेडिकल्स के विकास को रोकने का सामर्थ्य है।

पाचन के लिये बेहतर: शहद पाचन के लिए अच्छा होता है और यह एक प्रीबायॉटिक के रूप में काम करता है।

कफ और गले में इन्फेक्शन: शहद कफ और गले में इन्फेक्शन को कम करने का काम करता है।

घाव भरने में कारगर: शहद जलन को कम करता है और दाग को कम कर घाव का जल्दी उपचार करने में मदद करता है।

शहद याददाश्त तेज करता है, कमजोर तंत्रिका तंत्र को ठीक करता है. शहद कामशक्ति वर्धक माना गया है ,इसका सेवन पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन और महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन बनाने के प्रक्रिया को तेज करता है.

शहद में कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, फास्फोरस, पोटैशियम, सोडियम और जिंक आदि खनिज तत्व पाए जाते है. 
“मनुका” शहद दुनिया का सबसे अच्छा शहद माना जाता है, ऐसा इस शहद में पाए जाने वाले खास एंटी-बैक्टिरियल गुणों की वजह से है. 
यह शहद ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में पाया जाता है. शहद का नियमित सेवन खोई हुई शक्ति वापस लौटाता है, और शरीर को सुन्दर, स्फूर्तिवान, बलवान, दीर्घजीवी और सुडौल बनाता है. चूँकि शहद एक हाइपरस्मोटिक एजेंट है इसलिए इसे घाव पर लगाने से यह घाव का तरल निकाल देता है, उस स्थान से बैक्टीरिया नष्ट करके शीघ्र भरपाई करता है  शहद सीधे लगाने की बजाय इसे पट्टी या रुई पर लगाकर फिर घाव पर लगायें. टाइफाइड, निमोनिया में शहद सेवन लीवर और आंतों की कार्यक्षमता बढाता है. पेशाब के इन्फेक्शन में दालचीनी चूर्ण ,शहद को गुनगुने पानी में मिलाकर पीने से बैक्टीरिया दूर होते हैं और आराम मिलता है.

स्वास्थ्य संबंधित गुणों के कारण शहद अधिक लोकप्रिय हो गया है। बाजार में शहद के कई ब्रैंड मौजूद है, जो सबसे अधिक शुद्ध होने का दावा करते हैं। लेकिन इनमें स्वीकार्य सीमा से अधिक कई हानिकारक ऐंटिबायॉटिक्स हो सकते हैं, और साथ ही इसमें शक्कर भी मिला हो सकता है। ऐसे में शहद की परख जरूरी हो जाती है। यहां हम आपको बता रहे हैं कि कैसे आप असली और नकली शहद में फर्क कर पाएंगे।

गाढ़ेपन की जांच: वैज्ञानिक रूप से यह प्रमाणित हो चुका है कि शुद्ध शहद काफी गाढ़ा और चिपचिपा होता है।

जल परीक्षण: पानी में एक चम्मच शहद डालें। यदि यह तली में जाकर बैठ जाता है, तो यह शुद्ध है। यदि यह फौरन घुल जाता है, तो इसमें अतिरिक्त नमी है यानी कि यह अच्छी क्वॉलिटी का नहीं है।
क्रिस्टलीकरण परीक्षण: शुद्ध शहद के क्रिस्टलीकरण में ज्यादा वक्त लगता है। आमतौर पर रेफ्रिजरेटर में रखे जाने पर यह 4 सप्ताह में दानेदार बन जाता है।


सऊदी नेशनल डे पर जानिये सऊदी अरब के बारे में

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सउदी अरब मध्यपूर्व मे स्थित एक सुन्नी मुस्लिम देश है। यह एक इस्लामी राजतंत्र है जिसकी स्थापना १७५० के आसपास सउद द्वारा की गई थी। यहाँ की धरती रेतीली है तथा जलवायु उष्णकटिबंधीय मरुस्थल। यह विश्व के अग्रणी तेल निर्यातक देशों में गिना जाता है। सउदी अरब के पश्चिम की ओर लाल सागर है और उसके पार मिस्र दक्षिण की ओर ओमान और यमन हैं और उनके दक्षिण में हिन्द-महासागर। उत्तर में इराक़ और ज़ॉर्डन की सीमा लगती है जबकि पूरब में फारस की खाड़ी और कुवैत तथा संयुक्त अरब अमीरात। इसरायल-फ़िलिस्तीन का क्षेत्र इसके उत्तर की दिशा में है और अरबों ने इसके इतिहास को बहुत प्रभावित किया है।
यहाँ इस्लाम के प्रवर्तक मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था और यहाँ इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थल मक्का और मदिनाअवस्थित हैं। इस्लाम में हज का स्थान मक्का बताया गया है और दुनिया के सारे मुसलमान मक्का की ओर ही नमाज अदा करते हैं। यहाँ के मुसलमान मुख्यतः सुन्नी हैं और इस्लाम की राजनैतिक राजधानी के इस देश से बाहर रहने के बावजूद इस देश के लोगों ने इस्लाम धर्म पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है।
प्राचीन काल में दिल्मन सभ्यता सुमेर तथा मिस्र की प्राचीन सभ्यता के समकालीन थी। सन् ३५००-२५०० ईसापूर्व के मध्य में कुछ अरबों का बेबिलोनिया-असीरिया के इलाके में आगमन अरबों के इतिहास की पहली महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। सातवीं सदी तक अरबों का इतिहास कबीलों के झगड़ों और छिटपुट रूप से विदेशी प्रभुत्व की कहानी लगती है।

इस्लाम का उदयसंपादित करें

६१३ इस्वी के आसपास एक अरबी दफ़ातर ने लोगों में एक दिव्य ज्ञान का प्रचार किया। आपका कहना था कि आपको इसका ज्ञान अल्लाह के फरिश्ते जिब्राईल ने दिया और प्रत्येक इन्सान को उन्हीं तरीकों को अपनाना चाहिए। आपका का नाम मुहम्मद (स्०) था और उनकी बीवी का नाम खादीजा था। लोगों को उनकी बात पर या तो यकीन नहीं आया या साधारण सी लगी। पर गरीबों को ये बात बहुत पसन्द आई कि किसी का शोषण नहीं करना चाहिए जो यह करेगा उसे कयामत के दिन नरक का प्राप्ति होगी। लोगों के बीच समानता के भाव की बात दलितों और निचले तबकों में लोकप्रियता मिलने लगी। फिर धीरे धीरे और लोग भी उनके अनुयायी बनने लगे। उनकी बढ़ती ख्याति देखकर मक्का के कबीलों को अपनी लोकप्रियता और सत्ता खो देने का भय हुआ और उन्होंने मुहम्मद (स्०) को सन् ६२२ (हिजरी) में मक्का छोड़ने को विवश कर दिया। वो मदीना चले आए जहाँ लोगों,खासकर संभ्रांत कुल के लोग और यहूदियों से उन्हें समर्थन मिला। इसके बाद उनके अनुचरों की संख्या और शक्ति बढती गई। मुहम्मद (स्०) ने मक्का पर चढ़ाई कर दी और वहाँ के प्रधान ने हार मान ली। उनके 'संदेश' से और लोग प्रभावित होने लगे और उनकी प्रभुसत्ता में विश्वास करने लगे। उसके बाद मुहम्मद ने अपने नेतृत्व में कई ऐसे सैनिक अभियान भी चलाए जिनमें उनका विरोध करने वालों को हरा दिया गया। सन् ६३२ में मुहम्मद साहब की मृत्यु तक लगभग सारा अरब प्रायद्वीप मुहम्मद साहब के संदेश को कुबूल कर चुका था। इन लोगों को मुस्लिम कहा जाने लगा।
मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद अरबों की राजनैतिक शक्ति में बहुत वृद्धि हुई। सन् ७०० इस्वी तक ईरान, मिस्र, ईराक तथा मध्यपूर्व में इस्लाम की सामरिक विजय स्थापित हो गई थी। अरब इन इलाकों में छिटपुट रूप से बस भी गए थे। इस्लाम की राजनैतिक सत्ता खिलाफ़त के हाथ रही। आरंभ में तो इस्लाम का केन्द्र दमिश्क रहा और फिर मक्का पर आठवीं सदी के मध्य तक बग़दाद इस्लाम की राजनैतिक राजधानी बना। इस्लाम के राजनैतिक वारिस अरब ही रहे पर कई और नस्ल/जाति के लोग भी धीरे धीरे इसमें मिलने लगे। सोलहवीं सदी में उस्मानों ने मक्का पर अधिकार कर लिया और इस्लाम की राजनैतिक शक्ति तुर्कों के हाथ चली गई और सन् १९२२ तक उन्हीं के हाथों रही।
सऊदी अरब के बारे में कुछ रोचक तथ्य
सऊदी अरब में 25 साल से कम उम्र के युवाओं की संख्या कुल आबादी की आधी है। हर 4 में से 3 सऊदी 35 साल से कम उम्र का है। सऊदी में महिलाओं से ज्यादा संख्या पुरुषों की है। पुरुष और महिला का रेशियो 1.37 है।

सऊदी अरब में कोई संविधान नहीः सऊदी अरब के बुनियादी कानून का आर्टिकल 1 इस बात पर जोर देता है कि पवित्र ग्रंथ कुरान और पैगंबर मोहम्मद ही उसके संविधान हैं। यह देश वास्तव में शरियत कानून के मुताबिक चलता है।

महिलाओं को कार चलाने की आजादी नहीं: सऊदी अरब में महिलाओं को कार चलाने की आजादी नहीं है। हालांकि, हाल के कुछ वर्षों में स्थानीय महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे लेकर प्रदर्शन किया है। इनमें से कुछ को मुकदमे का सामना करना पड़ा है और यह बैन अभी भी नहीं हटा है...

हज कोटाः इस्लाम में मक्का और मदीना को दो पवित्र शहर माना जाता है और गैर-मुस्लिमों को यहां आने की इजाजत नहीं है। हर साल यहां दुनियाभर से बड़ी संख्या में मुस्लिम तीर्थयात्री आते हैं। सऊदी अरब इस यात्रा के लिए हर देश को स्पेशल कोटा देता है जिससे यहां आने वालों की संख्या को नियंत्रित किया जा सके।

महिला और वोटिंगः सऊदी अरब दुनिया का आखिरी ऐसा देश है जिसने महिलाओं को वोट डालने की आजादी दी। 2011 में, शेख अब्दुल्ला ने आदेश देकर म्युनिसिपल इलेक्शन में महिलाओं के वोट डालने का रास्ता तैयार किया।

सबसे बड़ा रेगिस्तानः इसमें कोई हैरानी नहीं कि सऊदी अरब जैसे देश में अगर पूरी धरती का सबसे सूखा स्थान मिल जाए। रब अल खली, दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तानी इलाका है। यह 250,000 स्क्वेयर मील तक फैला हुआ क्षेत्र है। यह सऊदी अरब के बड़े इलाके तक फैला हुआ क्षेत्र है और दुनिया का सबसे सूखा क्षेत्र है।

एक भी नदी या झील नहीः सऊदी अरब में पानी दुर्लभ चीज है और इसीलिए यह यहां बेहद कीमती भी है। सऊदी अरब में एक्वीफर्स पानी का बड़ा स्रोत हैं। ये अंडरग्राउंड बनाए गए बेहद बड़े जलाशय हैं। जल का एक दूसरा बड़ा स्रोत समुद्र है। सऊदी अरब समुद्र के पानी को पीने लायक बनाकर इस्तेमाल करता है।

तेल से महंगा पानीः सऊदी अरब में कोई बड़ी नदी या झील नहीं है और यहां बेहद कम बारिश होती है। सऊदी अरब दुनिया में सबसे ज्यादा तेल प्रड्यूस करने वाले देशों में से है। इसलिए यह जानकर आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि सऊदी अरब में एक गैलन पानी एक गैलन तेल से ज्यादा महंगा है।

2012 में, सऊदी अरब ने सरकारी दफ्तरों और अधिकतर सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान पर बैन लगा दिया। सऊदी अरब के आंकड़े बताते हैं कि देश के आम लोग औसतन 8 डॉलर हर रोज सिगरेट पर खर्च करते हैं।

सऊदी अरब के कारों के शौकीनों ने एक अलग तरह का खेल ईजाद किया है जिसका नाम साइडवॉक स्कीइंग है। इसमें मोटर कार को उसके एक तरफ के पहियों पर खड़ा कर खेल खेला जाता है।

रियाद ऊंट बाजार दुनिया का सबसे बड़ा ऊंट बाजार है। यहां हर रोज लगभग 100 ऊंट बिकते हैं।

गैर-मुस्लिमों को सऊदी नागरिकता की इजाजत नहीं है। देश में गैर-मुस्लिम अपनी पूजा पद्दति को नहीं अपना सकते हैं। देश में गैर-मुस्लिम धर्म का प्रदर्शन अपराध है। होमोसेक्शुऐलिटी भी देश में जुर्म है।

सऊदी अरब दुनिया का एकमात्र देश है जहां गला काटना, अंगविच्छेद कर देना और पत्थर मारने की सजा दी जाती है। इसे देश में गैरकानूनी नहीं माना गया है।

देश में अकेली महिला, चाहे वह स्थानीय हो या विदेशी- उसे अजनबी पुरुष के साथ जाने की इजाजत नहीं है।

2006 तक, सरकारी इमारतों, सरकारी जगहों पर हवाईअड्डों की तस्वीर लेने की सख्त मनाही थी। आज भी अगर आप सऊदी अरब में ऐसा करते हैं तो कुछ लोगों या पुलिसवालों द्वारा मुसीबत में पड़ सकते हैं क्योंकि बहुत लोगों को बदल दिए गए कानून की जानकारी नहीं है।

द किंग्डम टावरः 2018 में, सऊदी अरब में दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बनकर तैयार हो रही है। अतुलनीय किंग्डम टावर 3,280 फीट (एक किलोमीटर से भी लंबी) दुनिया की पहली इमारत होगी। इस टावर में एक होटल, ऑफिस होंगे। यह नए जमाने की इंजीनियरिंग को नए स्तर तक लेकर जाएगी।

मिलिटरी में महिलाओं के लिए पोशाकः सऊदी अरब में गैर-मुस्लिम महिलाओं को सर से पैर तक खुद को ढकने की जरूरत नहीं है। हालांकि, 2001 में देश में स्थित अमेरिकी मिलिटरी बेस में महिलाओं को ऐसी ड्रेस पहनने का आदेश दिया गया। मार्था मैकसैली, एक हाई रैंक यूएस फाइटर पायलट थी। उन्होंने इस आदेश पर अमेरिका के रक्षा सचिव डोनाल्ड रम्सफील्ड पर केस किया। मैकसैली ने यह केस जीत भी लिया। उसी वक्त से यूएस सर्विसविमिन को हैडस्कार्फ पहनने से छूट मिल गई।

सऊदी इंडस्ट्रियल प्रॉपर्टी अथॉरिटी, मोडोन को देश को बाकी आधुनिक दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते देखने के मकसद से एक आधुनिक शहर बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस शहर में सिर्फ महिलाएं ही रहेंगी। जो पूरी आजादी और मनचाहा काम कर सकती हैं। यहां महिलाएं कड़े इस्लामी कानून को तोड़े बिना मनचाहा काम करने के लिए पूरी तरह आजाद होंगी।

तलवारबाजों की कमीः सऊदी अरब में मृत्यु की सजा आम है। मृत्युदंड देने के मामले में दुनिया में सऊदी का नंबर चौथा है। देश में गर्दन काटकर मृत्यु देने की सजा सबसे आम है लेकिन बड़ी संख्या में इस सजा के चलते देश में सजा देने वालों की कमी हो गई है और देश किसी दूसरे तरीके पर विचार कर रहा है।

लॉन्जरी शॉपः सऊदी अरब में दशकों तक महिलाओं को काम करने की मनाही रही है। लॉन्जरी शॉप में पुरुष ही महिलाओं को सामान दिखाते रहे। लेकिन 2012 की शुरुआत में मर्दों को महिलाओं के सामान वाली दुकानों पर मर्दों के काम करने की मनाही हो गई।

जादू की इजाजत नहीं: सऊदी अरब में जादू या टोने पर पूरी तरह प्रतिबंध है। देश में एक स्पेशल पुलिस यूनिट है जो जादूगरों को ही पकड़ने का काम करती है। ऐसा करना देश में एक बड़ा अपराध है और इसकी सजा गर्दन काटने के रूप में दी जाती है। यही वजह थी कि देश में हैरी पॉटर पर बैन लगा दिया गया था।


अभियन्ता दिवस (इंजीनियर्स डे)

    



अभियन्ता दिवस (इंजीनियर्स डे) 15 सितम्बर को मनाया जाता हैं | यह दिन मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म दिवस हैं, जो कि एक महान इंजिनियर थे, इसलिए उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए इस दिन को इंजीनियर्स डे के नाम पर समर्पित किया गया |इन्हें एक अच्छे इंजिनियर के तौर पर सफलतम कार्य करने हेतु 1955 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था | इंजिनियर डे के द्वारा दुनिया के समस्त इंजिनियरों को सम्मान दिया जाता है. देश के बड़े बड़े वैज्ञानिक, इंजिनियर ने देश के विकास के लिए अनेकों अनुसन्धान किये.

आज के वक्त में दुनियाँ के हर क्षेत्र में इंजिनियर का नाम हैं | दुनियाँ की प्रगति में इंजिनियर का हाथ हैं फिर चाहे वो कोई भी फील्ड हो | तकनिकी ज्ञान के बढ़ने के साथ ही किसी भी देश का विकास होता हैं | इससे समाज के दृष्टिकोण में भी बदलाव आता हैं | इस तरह पिछले दशक की तुलना में इस दशक में दुनियाँ का विकास बहुत तेजी से हुआ इसका श्रेय दुनियाँ के इंजिनियर को जाता हैं |

इसके उदहारण के लिये अगर हम अपने हाथ में रखे स्मार्ट फोन को ही देखे और पीछे मुड़कर इसके इतिहास को याद करे तो हमें होने वाले बदलावों का अहसास हो जाता हैं | अभी से लगभग 15 वर्ष पहले एक टेलीफोन की जगह लोगो के हाथों में मोबाइल फोन आये थे जिसमे वो Call, SMS के जरिये अपनों के और भी करीब हो गये वहीँ कुछ वक्त बीतने पर यह मोबाइल फोन, स्मार्ट फ़ोन में बदल गया | कल तक अपने करीब आये थे | आज दुनियाँ मुट्ठी में आ गई | अपनों से बात करने से लेकर बिल भरना, शॉपिंग करना, बैंक के काम आदि कई काम एक स्मार्ट फोन के जरिये संभव हो पाये | और ऐसे परिवर्तन हर कुछ मिनिट में बदलकर और बेहतर रूप लेते जा रहे हैं इस तरह के विकास का श्रेय इंजिनियर्स को जाता हैं |
यह तो केवल एक उदाहरण था | ऐसे कई क्षेत्र हैं जहाँ Engineers ने अपने करतब दिखाये हैं और दुनियाँ को एक जगह पर बैठ- बैठे आसमान तक की सैर करवाई हैं |

मानाकि आज के वक्त में Engineering की पढाई करके डिग्री हासिल करना आम बात हो गई हैं इसलिए कहीं न कहीं इस फील्ड को लेकर नकारात्मक भाव भी उतनी ही तेजी से बढ़े हैं जितने की विकास हुए हैं |
असल में इंजीनियरिंग गलत नहीं हैं पढाई का बनाया हुआ सिस्टम ही गलत हैं जो फिल्ड वर्क की बजाये केवल राटा रटाया ज्ञान देता हैं ऐसे में हर कोई इस परीक्षा और परीक्षा फल की बेड़ियों को तोड़कर आसमान तक उड़ नहीं पाता |
आप सभी को 3 Idiots फिल्म याद होगी, जिसमे इस बात को खुलकर सामने रखा गया | असल में तकनिकी ज्ञान को केवल किताबी फोर्मुले से समझ पाना, हर किसी के बस का नहीं होता| अगर यही ज्ञान प्रेक्टिकल रूप में स्टूडेंट्स के सामने होगा, तो इसे एक्सेप्ट करने एवं समझने में ज्यादा आसानी होगी और इन सबसे बढ़कर इस तरह के ज्ञान के प्रति स्टूडेंट की जिज्ञासा बढ़ेगी और तब जाकर वो एक सफल इंजिनियर बनने की दौड़ में शामिल हो पायेगा |
इंजिनियर डे सेलिब्रेशन (Engineers day celebration) –
इंजिनियर डे के दिन सभी इंजिनियर को बधाई दी जाती है. इंजीनियरिंग कॉलेज, ऑफिस में कार्यक्रम होते है. आजकल बढाई देने के लिए सोशल मीडिया, फ़ोन का उपयोग सबसे ज्यादा होता है. लोग एक दुसरे को मेसेज भेजते है, कविता शायरी शेयर की जाती है. विश्वेश्वरैया जी को याद करके, कार्यक्रम आयोजन किया जाता है.
दुनिया के अन्य क्षेत्र में इंजिनियर डे –
क्रमांक
देश
तारीख
1.
अर्जेंटीना
16 जून
2.
बांग्लादेश
7 मई
3.
बेल्जियम
20 मार्च
4.
कोलंबिया
17 अगस्त
5.
आइसलैंड
10 अप्रैल
6.
ईरान
24 फ़रवरी
7.
इटली
15 जून
8.
मैक्सिको
1 जुलाई
9.
पेरू
8 जून
10.
रोमानिया
14 सितम्बर
11.
तुर्की
5 दिसम्बर

भारत देश में इंजिनियर डे महान इंजिनियर और राजनेता मोक्षमुंडम विश्वेश्वरैया की याद में मनाया जाता है, तो चलिए इनके जीवन को करीब से जानते है.

मोक्षमुंडम विश्वेश्वरैया जी का जीवन परिचय–
एम् विश्वेश्वरैया भारत के महान इंजिनियरों में से एक थे, इन्होंने ही आधुनिक भारत की रचना की और भारत को नया रूप दिया. उनकी दृष्टि और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में समर्पण भारत के लिए कुछ असाधारण योगदान दिया।
क्रमांक
जीवन परिचय बिंदु
विश्वेश्वरैया जीवन परिचय
1.
पूरा नाम
मोक्षमुंडम विश्वेश्वरैया
2.
जन्म
15 सितम्बर, 1860
3.
जन्म स्थान
मुद्देनाहल्ली गाँव, कोलर जिला, कर्नाटका
4.
माता-पिता
वेंकचाम्मा – श्रीनिवास शास्त्री
5.
मृत्यु
14 अप्रैल 1962

मोक्षमुंडम विश्वेश्वरैया जी का शुरुवाती जीवन –
विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितम्बर को 1860 में मैसूर रियासत में हुआ था, जो आज कर्नाटका राज्य बन गया है. इनके पिता श्रीनिवास शास्त्री संस्कृत विद्वान और आयुर्वेदिक चिकित्सक थे. इनकी माता वेंकचाम्मा एक धार्मिक महिला थी. जब विश्वेश्वरैया 15 साल के थे, तब उनके पिता का देहांत हो गया था. चिकबल्लापुर से इन्होंने प्रायमरी स्कूल की पढाई पूरी की, और आगे की पढाई के लिए वे बैंग्लोर चले गए. 1881 में विश्वेश्वरैया ने मद्रास यूनिवर्सिटी के सेंट्रल कॉलेज, बैंग्लोर से बीए की परीक्षा पास की. इसके बाद मैसूर सरकार से उन्हें सहायता मिली और उन्होंने पूना के साइंस कॉलेज में इंजीनियरिंग के लिए दाखिला लिया. 1883 में LCE और FCE एग्जाम में उनका पहला स्थान आया. (ये परीक्षा आज के समय BE की तरह है)

मोक्षमुंडम विश्वेश्वरैया जी का करियर–
इंजीनियरिंग पास करने के बाद विश्वेश्वरैया को बॉम्बे सरकार की तरफ से जॉब का ऑफर आया, और उन्हें नासिक में असिस्टेंट इंजिनियर के तौर पर काम मिला. एक इंजीनियर के रूप में उन्होंने बहुत से अद्भुत काम किये. उन्होंने सिन्धु नदी से पानी की सप्लाई सुक्कुर गाँव तक करवाई, साथ ही एक नई सिंचाई प्रणाली ‘ब्लाक सिस्टम’ को शुरू किया. इन्होने बाँध में इस्पात के दरवाजे लगवाए, ताकि बाँध के पानी के प्रवाह को आसानी से रोका जा सके. उन्होंने मैसूर में कृष्णराज सागर बांध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ऐसे बहुत से और कार्य विश्वेश्वरैया ने किये, जिसकी लिस्ट अंतहीन है.

1903 में पुणे के खड़कवासला जलाशय में बाँध बनवाया. इसके दरवाजे ऐसे थे जो बाढ़ के दबाब को भी झेल सकते थे, और इससे बाँध को भी कोई नुकसान नहीं पहुँचता था. इस बांध की सफलता के बाद ग्वालियर में तिगरा बांध एवं कर्नाटक के मैसूर में कृष्णा राजा सागरा (KRS) का निर्माण किया गया. कावेरी नदी पर बना कृष्णा राजा सागरा को विश्वेश्वरैया ने अपनी देख रेख में बनवाया था, इसके बाद इस बांध का उद्घाटन हुआ. जब ये बांध का निर्माण हो रहा था, तब एशिया में यह सबसे बड़ा जलाशय था.
1906-07 में भारत सरकार ने उन्हें जल आपूर्ति और जल निकासी व्यवस्था की पढाई के लिए ‘अदेन’ भेजा. उनके द्वारा बनाये गए प्रोजेक्ट को अदेन में सफलतापूर्वक कार्यान्वित किया गया. हैदराबाद सिटी को बनाने का पूरा श्रेय विश्वेश्वरैया जी को ही जाता है. उन्होंने वहां एक बाढ़ सुरक्षा प्रणाली तैयार की, जिसके बाद समस्त भारत में उनका नाम हो गया. उन्होंने समुद्र कटाव से विशाखापत्तनम बंदरगाह की रक्षा के लिए एक प्रणाली विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
विश्वेश्वरैया को मॉडर्न मैसूर स्टेट का पिता कहा जाता था. इन्होने जब मैसूर सरकार के साथ काम किया, तब उन्होंने वहां मैसूर साबुन फैक्ट्री, परजीवी प्रयोगशाला, मैसूर आयरन एंड स्टील फैक्ट्री, श्री जयचमराजेंद्र पॉलिटेक्निक संस्थान, बैंगलोर एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, स्टेट बैंक ऑफ़ मैसूर, सेंचुरी क्लब, मैसूर चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स एवं यूनिवर्सिटी विश्वेश्वरैया कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग की स्थापना करवाई. इसके साथ ही और भी अन्य शैक्षिणक संस्थान एवं फैक्ट्री की भी स्थापना की गई. विश्वेश्वरैया ने तिरुमला और तिरुपति के बीच सड़क निर्माण के लिए योजना को अपनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

दीवान ऑफ़ मैसूर–
1908 में विश्वेश्वरैया ने अपने काम से थोड़े समय का ब्रेक लिया और विदेश यात्रा में चले गए, यहाँ उन्होंने देश के औद्योगिक विकास के बारे में गहन चिंतन किया. विदेश से लौटने के बाद इन्होने थोड़े समय के लिए हैदराबाद के निज़ाम के रूप में कार्य किया. उस समय हैदराबाद की मूसी नदी से बाढ़ का अत्याधिक खतरा था, तब विश्वेश्वरैया जी ने इससे बचाव के लिए उपाय सुझाये. नवम्बर 1909 में विश्वेश्वरैया जी को मैसूर राज्य का मुख्य इंजिनियर बना दिया गया. इसके बाद 1912 में विश्वेश्वरैया जी को मैसूर रियासत का दीवान बना दिया गया, वे इस पद पर सात सालों तक रहे. उन्होंने 1918 में इस पद से इस्तीफा दे दिया.
मैसूर के राजा कृष्णराजा वोदेयार की मदद से विश्वेश्वरैया जी ने मैसूर राज्य के विकास के क्षेत्र में अनेकों कार्य किये. उन्होंने उपर बताये गए कार्यों के अलावा भी, बहुत से सामाजिक कार्य किये. इन्होने 1917 में बैंग्लोर में सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की, यह देश का पहला सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज था. बाद में इस कॉलेज का नाम बदल कर यूनिवर्सिटी विश्वेश्वरैया कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग रखा गया. विश्वेश्वरैया जी ने मैसूर स्टेट में नयी रेलवे लाइन की भी स्थापना की. मैसूर के दीवान के रूप में, वे राज्य के शैक्षणिक और औद्योगिक विकास के लिए अथक प्रयासरत रहे.

विश्वेश्वरैया जी का व्यक्तित्व –
एम् विश्वेश्वरैया जी बहुत साधारण तरह के इन्सान थे.
जो एक आदर्शवादी, अनुशासन वाले व्यक्ति थे.
वे शुध्य शाकाहारी और नशा से बहुत दूर रहते थे.
विश्वेश्वरैया जी समय के बहुत पाबंद थे, वे 1 min भी कही लेट नहीं होते थे.
वे हमेशा साफ सुथरे कपड़ों में रहते थे. उनसे मिलने के बाद उनके पहनावे से लोग जरुर प्रभावित होते थे.
वे हर काम को परफेक्शन के साथ करते थे. यहाँ तक की भाषण देने से पहले वे उसे लिखते और कई बार उसका अभ्यास भी करते थे.
वे एकदम फिट रहने वाले इन्सान थे. 92 साल की उम्र में भी वे बिना किसी के सहारे के चलते थे, और सामाजिक तौर पर एक्टिव भी थे.
उनके लिए काम ही पूजा थे, अपने काम से उन्हें बहुत लगाव था.
उनके द्वारा शुरू की गई बहुत सी परियोजनाओं के कारण भारत आज गर्व महसूस करता है, उनको अगर अपने काम के प्रति इतना दृढ विश्वास एवं इक्छा शक्ति नहीं होती तो आज भारत इतना विकास नहीं कर पाता.
भारत में उस ब्रिटिश राज्य था, तब भी विश्वेश्वरैया जी ने अपने काम के बीच में इसे बाधा नहीं बनने दिया, उन्होंने भारत के विकास में आने वाली हर रुकावट को अपने सामने से दूर किया था.

एम् विश्वेश्वरैया जी अवार्ड (Mokshagundam Visvesvaraya awards) –
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1955 में विश्वेश्वरैया जी को भारत के सबसे बड़े सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया था.
लन्दन इंस्टीट्यूशन सिविल इंजीनियर्स की तरफ से भी विश्वेश्वरैया जी को सम्मान दिया गया था.
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस की तरह से भी विश्वेश्वरैया जी को सम्मानित किया गया.
विश्वेश्वरैया जी कर्नाटका के सबसे प्रसिद्ध लोगों में से एक है.
इसके अलावा देश के आठ अलग अलग इंस्टिट्यूट के द्वारा उन्हें डोक्टरेट की उपाधि दी गई.
विश्वेश्वरैया जी के 100 साल के होने पर भारत सरकार ने उनके सम्मान में स्टाम्प निकाला.
इनके जन्म दिवस पर समस्त भारत में इंजिनियर डे मनाया जाता है.
14 अप्रैल 1962 को विश्वेश्वरैया जी की मृत्यु हो गई.

हिंदी दिवस: मैं हिंदी हूँ।

    



मैं हिन्दी हूं। बहुत दुखी हूं। स्तब्ध हूं। समझ में नहीं आता कहां से शुरू करूं? कैसे शुरू करूं? मैं, जिसकी पहचान इस देश से है, इसकी माटी से है। इसके कण-कण से हैं। अपने ही आंगन में बेइज्जत कर दी जाती हूं! कहने को संविधान के अनुच्छेद 343 में मुझे राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। 

अनुच्छेद 351 के अनुसार संघ का यह कर्तव्य है कि वह मेरा प्रसार बढ़ाएं। पर आज यह सब मुझे क्यों कहना पड़ रहा है? नहीं जानती थी मेरा किसी 'राज्य-विशेष' में किसी की 'जुबान' पर आना अपराध हो सकता है। 

मन बहुत दुखता है जब मुझे अपनी ही संतानों को यह बताना पड़े कि मैं भारत के 70 प्रतिशत गांवों की अमराइयों में महकती हूं। मैं लोकगीतों की सुरीली तान में गुंजती हूं। मैं नवसाक्षरों का सुकोमल सहारा हूं। मैं जनसंचार का स्पंदन हूं। 

मैं कलकल-छलछल करती नदिया की तरह हर आम और खास भारतीय ह्रदय में प्रवाहित होती हूं। मैं मंदिरों की घंटियों, मस्जिदों की अजान, गुरुद्वारे की शबद और चर्च की प्रार्थना की तरह पवित्र हूं। क्योंकि मैं आपकी, आप सबकी-अपनी हिन्दी हूं। 

विश्वास करों मेरा कि मैं दिखावे की भाषा नहीं हूं, मैं झगड़ों की भाषा भी नहीं हूं। मैंने अपने अस्तित्व से लेकर आज तक कितनी ही सखी भाषाओं को अपने आंचल से बांध कर हर दिन एक नया रूप धारण किया है। फारसी, अरबी, उर्दू से लेकर 'आधुनिक बाला' अंग्रेजी तक को आत्मीयता से अपनाया है। 

सखी भाषा का झगड़ा मेरे लिए नया नहीं है। इससे पहले भी मेरी दक्षिण भारतीय 'बहनों' की संतानों ने यह स्वर उठाया था, मैंने हर बार शांत और धीर-गंभीर रह कर मामले को सहजता से सुलझाया है। लेकिन इस बार मेरी अनन्य सखी मराठी की संतानें मेरे लिए आतंक बन कर खड़ी है। इस समय जबकि सारे देश में विदेशी ताकतों का खतरा मंडरा रहा है, ऐसे में आपसी दीवारों का टकराना क्या उचित है? 

लेकिन कैसे समझाऊं और किस-किस को समझाऊं? महाराष्ट्र में 'कोई' दम ठोंक कर कहता है कि मेरा अस्तित्व मिटा देगा। मैं क्या कल की आई हुई कच्ची-पक्की बोली हूं जो मेरा नामोनिशान मिटा दोगे? मैं इस देश के रेशे-रेशे में बुनी हुई, अंश-अंश में रची-बसी ऐसी जीवंत भाषा हूं जिसका रिश्ता सिर्फ जुबान से नहीं दिल की धड़कनों से हैं। 

मेरे दिल की गहराई का और मेरे अस्तित्व के विस्तार का तुम इतने छोटे मन वाले भला कैसे मूल्यांकन कर पाओगे? इतिहास और संस्कृ‍ति का दम भरने वाले छिछोरी बुद्धि के प्रणेता कहां से ला सकेंगे वह गहनता जो अतीत में मेरी महान संतानों में थी। 

मैंने तो कभी नहीं कहा कि बस मुझे अपनाओ। बॉलीवुड से लेकर पत्रकारिता तक और विज्ञापन से लेकर राजनीति तक हर एक ने नए शब्द गढ़े, नए शब्द रचें, नई परंपरा, नई शैली का ईजाद किया। मैंने कभी नहीं सोचा कि इनके इस्तेमाल से मुझमें विकार या बिगाड़ आएगा। 

मैंने खुले दिल से सब भाषा का,भाषा के शब्दों का, शैली और लहजे का स्वागत किया। यह सोचकर कि इससे मेरा ही विकास हो रहा है। मेरे ही कोश में अभिवृद्धि हो रही है। अगर मैंने भी इसी संकीर्ण सोच को पोषित किया होता कि दूसरी भाषा के शब्द नहीं अपनाऊंगी तो भला उद्दाम आवेग से इठलाती-बलखाती यहां तक कैसे पहुंच पाती? 

मैंने कभी किसी भाषा को अपना दुश्मन नहीं समझा। किसी भाषा के इस्तेमाल से मुझमें असुरक्षा नहीं पनपी। क्योंकि मैं जानती थी कि मेरे अस्तित्व को किसी से खतरा नहीं है। पर महाराष्ट्र से छनकर आते घटनाक्रमों से एक पल के लिए मेरा यह विश्वास डोल गया। 

पिछले दिनों मैं और मेरी सखी भाषाएं मिलकर त्रिभाषा फार्मूला पर सोच ही रही थी। लेकिन इसका अर्थ यह तो कतई नहीं था कि हमारी संतान एक-दूसरे के विरुद्ध नफरत के खंजर निकाल लें। यह कैसा भाषा-प्रेम है? 

यह कैसी भाषाई पक्षधरता है? क्या 'मां' से प्रेम दर्शाने का यह तरीका है कि 'मौसी' की गोद में बैठने पर अपने ही भाई को दुश्मन समझ बैठो। क्या लगता है आपको, इससे 'मराठी' खुश होगी? नहीं हो सकती। 

हम सारी भाषाएं संस्कृत की बेटियां हैं। बड़ी बेटी का होने का सौभाग्य मुझे मिला, लेकिन इससे अन्य भाषाओं का महत्व कम तो नहीं हो जाता। और यह भी तो सच है ना कि मुझे अपमानित करने से मराठी का महत्व बढ़ तो नहीं जाएगा? 


यह कैसा भाषा गौरव है जो अपने अस्तित्व को स्थापित करने के लिए स्थापित भाषा को उखाड़ देने की धृष्टता करें। मुझे कहां-कहां पर प्रतिबंधित करोगे? ‍पूरा महाराष्ट्र तो बहुत दूर की बात है अकेली मुंबई से मुझे निकाल पाना संभव नहीं है। 

बरसों से भारतीय दर्शकों का मनोरंजन कर रही फिल्म इंडस्ट्री से पूछ कर देख लों कि क्या मेरे बिना उसका अस्तित्व रह सकेगा? कैसे निकालोगे लता के सुरीले कंठ से, गुलजार की चमत्कारिक लेखनी से? 

कोई और रचनात्मक काम क्यों नहीं करते 'मराठी पुत्र'? जो 'मन' से सबको भाए ना कि 'मनसे' सबको डराए। अपनी सोच को थोड़ा सा विस्तार दो, मैं आपकी भी तो हूं। 


वैसे तो भारतवर्ष में 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है लेकिन क्या आप को पता है कि हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है? भारत की मातृभाषा होने के बाद भी बोल-चाल की भाषा में हिंदी का पतन होता जा रहा है। हिंदी चीख कर कह रही है कि संविधान में मुझे राजभाषा का दर्जा प्राप्त है फिर भी हमें लोग अपनी जुबान पर लाने में डरते हैं। चलिए हम आप को बताते हैं कि हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है।

वर्ष 1918 में महात्मा गांधी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था। इसे गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था। भारत देश में प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने निर्णय लिया था कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इस महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने और हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर वर्ष 1953 से पूरे भारत में इस दिन हर साल हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343(1) में दर्शाया गया है कि संघ की राज भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा। चूंकि यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया था। इस कारण हिन्दी दिवस के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया था। लेकिन जब राजभाषा के रूप में इसे चुना गया और लागू किया गया तो गैर-हिन्दी भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे और अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा।

वर्ष 1991 में इस देश में नव-उदारीकरण की आर्थिक नीतियां लागू की गई। इसका जबर्दस्त असर भाषा की पढ़ाई पर भी पड़ा। अंग्रेजी के अलावा किसी दूसरे भाषा की पढ़ाई समय की बर्बादी समझा जाने लगा। जब हिन्दीभाषी घरों में बच्चे हिन्दी बोलने से कतराने लगे, या अशुद्ध बोलने लगे तब कुछ विवेकी अभिभावकों के समुदाय को थोड़ा थोड़ा एहसास होने लगा कि घर-परिवार में नई पीढ़ियों की जुबान से भाषा के उजड़ने, मातृभाषा उजड़ने लगी है।


भरी-पूरी हों सभी बोलियां यही कामना हिंदी है।
गहरी हो पहचान आपसी यही साधना हिंदी है।
सौत विदेशी रहे न रानी, यही भावना हिंदी है।
हाथ कंगन को बिंदी क्या, पढ़े लिखे को हिंदी क्या।
हिंदी जन की बोली है, एक डोर में सबको जो है बाँधती 

वह हिंदी है।
हर भाषा को सगी बहन जो मानती वह हिंदी है।


बकरीद की कहानी महत्व और इतिहास

    



बकरीद इस्लाम धर्म में सबसे अधिक मनाये जाने वाले त्यौहारों में से एक हैं | एक जश्न की तरह इस त्यौहार को मनाने की रीत हैं | इस मौके पर बाजारों में बाजारी बढ़ जाती हैं | ना ना प्रकार की वस्तुओं के साथ मुस्लिम जश्न मनाते हैं | लेकिन इस सबसे बढ़कर बकरीद का दिन कुर्बानी के लिए याद रखा जाता हैं | इस दिन इस्लाम से जुड़ा हर शख्स खुदा के सामने सबसे करीबी को कुर्बान करता है, इसे ईद-उल-जुहा (Eid al-Adha ) के नाम से जाना जाता हैं |

यह कुर्बानी का त्यौहार रमजान के दो महीने बाद आता हैं, इसमें कुर्बानी का महत्व बताया गया हैं | इस वर्ष 2016 में बकरीद 13 सितम्बर को मनाई जायेगी | इसे खास तौर पर हज के बाद इस्लामिक संकृति में किया जाता हैं |इस्लामिक कैलंडर के अनुसार इसकी शुरुवात 10 धू-अल-हिज्जाह से हो कर हैं और खत्म 13 धू-अल-हिज्जाह पर होगी | इस प्रकार यह इस्लामिक कैलंडर के बारहवे माह के दसवे दिन मनाये जाते हैं |

बकरीद का महत्व:
बकरीद का दिन फर्ज-ए-कुर्बान का दिन होता हैं :
आमतौर पर हम सभी जानते हैं कि बकरीद के दिन बकरे की कुर्बानी दी जाती हैं | मुस्लिम समाज में बकरे को पाला जाता हैं | अपनी हेसियत के अनुसार उसकी देख रेख की जाती हैं और जब वो बड़ा हो जाता हैं उसे Bakrid के दिन अल्लाह के लिए कुर्बान कर दिया जाता हैं जिसे फर्ज-ए-कुर्बान कहा जाता हैं | क्या आप जानते हैं कि किस तरह से यह दिन शुरू हुआ ?

बकरीद की कहानी इतिहास:
इस इस्लामिक त्यौहार के पीछे एक एतिहासिक तथ्य छिपा हुआ हैं जिसमे कुर्बानी की ऐसी दास्तान हैं जिसे सुनकर ही दिल कांप जाता हैं | बात उन हजरत इब्राहीम की हैं जिन्हें अल्लाह का बंदा माना जाता हैं, जिनकी इबादत पैगम्बर के तौर पर की जाती हैं| जिन्हें हर एक इस्लामिक द्वारा अल्लाह का दर्जा प्राप्त हैं, जिसे इस औदे से नवाज़ा गया उस शख्स का खुद खुदा ने इम्तहान लिया था |
बात कुछ ऐसी हैं : खुदा ने हजरत मुहम्मद साहब का इम्तिहान लेने के लिए उन्हें यह आदेश दिया कि वे तब ही प्रसन्न होंगे, जब हज़रत अपने बेइंतहा अज़ीज़ को अल्लाह के सामने कुर्बान करेंगे | तब हज़रत इब्राहीम ने कुछ देर सोच कर निर्णय लिया और अपने अज़ीज़ को कुर्बान करने का तय किया | सबने यह जानना चाहा कि वो क्या चीज़ हैं जो हज़रत इब्राहीम को सबसे चहेती हैं जिसे वो आज कुर्बान करने वाले हैं | तब उन्हें पता चला कि वो अनमोल चीज़ उनका बेटा हजरत इस्माइल हैं जिसे वो आज अल्लाह के लिए कुर्बान करने जा रहे हैं | यह जानकर सभी भौंचके से रह गये | कुर्बानी का समय करीब आ गया | बेटे को इसके लिए तैयार किया गया, लेकिन इतना आसान न था| इस कुर्बानी को अदा करना इसलिए हज़रत इब्राहीम ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली और अपने बेटे की कुर्बानी दी | जब उन्होंने आँखों पर से पट्टी हटाई तब अपने बेटे को सुरक्षित देखा | उसकी जगह इब्राहीम के अज़ीज़ बकरे की कुर्बानी अल्लाह ने कुबूल की | हज़रत इब्राहीम के कुर्बानी के इस जस्बे से खुश होकर अल्लाह ने उसके बच्चे की जान बक्श दी और उसकी जगह बकरे की कुर्बानी को कुबूल किया गया |
तब ही से कुर्बानी का यह मंज़र चला आ रहा हैं जिसे बकरीद ईद-उल-जुहा के नाम से दुनियाँ जानती हैं |

बकरीद का सच :

इसके आलावा इस्लाम में हज करना जिंदगी का सबसे जरुरी भाग माना जाता हैं | जब वे हज करके लौटते हैं तब Bakrid पर अपने अज़ीज़ की कुर्बानी देना भी इस्लामिक धर्म का एक जरुरी हिस्सा हैं जिसके लिए एक बकरे को पाला जाता हैं | दिन रात उसका ख्याल रखा जाता हैं | ऐसे में उस बकरे से भावनाओं का जुड़ना आम बात हैं | कुछ समय बाद बकरीद के दिन उस बकरे की कुर्बानी दी जाती हैं | ना चाहकर भी हर एक इस्लामिक का उस बकरे से एक नाता हो जाता हैं फिर उसे कुर्बान करना बहुत कठिन हो जाता हैं | इस्लामिक धर्म के अनुसार इससे कुर्बान हो जाने की भावना बढती हैं | इसलिए इस तरह का रिवाज़ चला आ रहा हैं |

कैसे मनाई जाती हैं बकरीद:
सबसे पहले ईद गाह में ईद सलत पेश की जाती हैं |
पुरे परिवार एवम जानने वालो के साथ मनाई जाती हैं |
सबके साथ मिलकर भोजन लिया जाता हैं |
नये कपड़े पहने जाते हैं |
गिफ्ट्स दिए जाते हैं | खासतौर पर गरीबो का ध्यान रखा जाता हैं उन्हें खाने को भोजन और पहने को कपड़े दिये जाते हैं |
बच्चों अपने से छोटो को इदी दी जाती हैं |
ईद की प्रार्थना नमाज अदा की जाती हैं |
इस दिन बकरे के अलावा गाय, बकरी, भैंस और ऊंट की कुर्बानी दी जाती हैं |
कुर्बान किया जाने वाला जानवर देख परख कर पाला जाता हैं अर्थात उसके सारे अंग सही सलामत होना जरुरी हैं | वह बीमार नही होना चाहिये | इस कारण ही बकरे का बहुत ध्यान रखा जाता हैं |
बकरे को कुर्बान करने के बाद उसके मांस का एक तिहाई हिस्सा खुदा को, एक तिहाई घर वालो एवम दोस्तों को और एक तिहाई गरीबों में दे दिया जाता हैं |
इस प्रकार इस्लाम में बकरीद का त्यौहार मनाया जाता हैं | हर त्यौहार प्रेम और शांति का प्रतीक होते हैं जिस प्रकार इस्लाम में कुर्बानी का महत्व होता हैं उसी प्रकार हिन्दू में त्याग का महत्व होता हैं | दोनों का आधार अपने आस – पास प्रेम देना और उनके जीवन के लिए कुर्बानी अथवा त्याग करना हैं इसी भावना के साथ सभी धर्मों में त्यौहार मनाये जाते हैं | लेकिन कलयुग के इस दौर में त्यौहारों के रूप बदलते जा रहे हैं और ये कहीं न कहीं दिखावे की तरफ रुख करते नज़र आ रहे हैं |

कुर्बान-ए-फर्ज अदा कर
तेरे द्वार पर खड़ा हूँ मौला
रेहमत बक्श मुझ पर
पूरी कर सकू हर शख्स की दुआ

आज मैं चुप रहूंगा, क्योंकि मैं एक शिक्षक हूं...

    


भारत में शिक्षक दिवस 5 सितंबर को मनाया जाता है जबकि अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस का आयोजन 5 अक्टूबर को होता है। रोचक तथ्य यह है कि शिक्षक दिवस दुनिया भर में मनाया जाता है लेकिन सबने इसके लिए एक अलग दिन निर्धारित किया है। कुछ देशों में इस दिन अवकाश रहता है तो कहीं-कहीं यह कामकाजी दिन ही रहता है।


यूनेस्को ने 5 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस घोषित किया था। साल 1994 से ही इसे मनाया जा रहा है। शिक्षकों के प्रति सहयोग को बढ़ावा देने और भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शिक्षकों के महत्व के प्रति जागरूकता लाने के मकसद से इसकी शुरुआत की गई थी।

भारत में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। इस दिन देश के द्वितीय राष्ट्रपति रहे राधाकृष्णन का जन्मदिवस होता है।

चीन में 1931 में नेशनल सेंट्रल यूनिवर्सिटी में शिक्षक दिवस की शुरूआत की गई थी। चीन सरकार ने 1932 में इसे स्वीकृति दी। बाद में 1939 में कन्फ्यूशियस के जन्मदिवस, 27 अगस्त को शिक्षक दिवस घोषित किया गया लेकिन 1951 में इस घोषणा को वापस ले लिया गया।

साल 1985 में 10 सितम्बर को शिक्षक दिवस घोषित किया गया। अब चीन के ज्यादातर लोग फिर से चाहते हैं कि कन्फ्यूशियस का जन्मदिवस ही शिक्षक दिवस हो।

रूस में 1965 से 1994 तक अक्टूबर महीने के पहले रविवार के दिन शिक्षक दिवस मनाया जाता रहा। साल 1994 से विश्व शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर को ही मनाया जाने लगा।

अमेरिका में मई के पहले पूर्ण सप्ताह के मंगलवार कोशिक्षक दिवस घोषित किया गया है और वहां सप्ताहभर इसके आयोजन होते हैं।

थाइलैंड में हर साल 16 जनवरी को राष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यहां 21 नवंबर, 1956 को एक प्रस्ताव लाकर शिक्षक दिवस को स्वीकृति दी गई थी। पहला शिक्षक दिवस 1957 में मनाया गया था। इस दिन यहां स्कूलों में अवकाश रहता है।

ईरान में वहां के प्रोफेसर अयातुल्लाह मोर्तेजा मोतेहारी की हत्या के बाद उनकी याद में दो मई को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। मोतेहारी की दो मई, 1980 को हत्या कर दी गई थी।

तुर्की में 24 नवंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। वहां के पहले राष्ट्रपति कमाल अतातुर्क ने यह घोषणा की थी। मलेशिया में इसे 16 मई को मनाया जाता है, वहां इस खास दिन को 'हरि गुरु' कहते हैं।

आज शिक्षक दिवस है लेकिन में चुप रहूंगा, क्योंकि मैं शिक्षक हूं। मैं उस संवर्ग की इकाई हूं, जो सत्य का विस्तार करती है, जो अपना खून जलाकर देश केभविष्य को संवारती है। मैं उस चरित्र का हिस्सा हूं जिसके बारे में आचार्य चाणक्य ने कहा था- 'निर्माण और प्रलय उसकी गोद में पलते हैं।'

आज मैं चुप रहूंगा, क्योंकि मेरे दायित्व बहुत विस्तृत हैं। समाज को मुझसे अनंत अपेक्षाएं हैं। भारत के विकास का वृक्ष मेरे सींचने से ही पल्लवित होगा। माता-पिता सिर्फ अस्तित्व देते हैं, उस अस्तित्व को चेतनामय एवं ऊर्जावान मैं ही बनाता हूं।

आज मैं चुप रहूंगा, क्योंकि मैं विखंडित हूं। मेरे अस्तित्व के इतने टुकड़े कर दिए गए हैं कि उसे समेटना मुश्किल हो रहा है। हर टुकड़ा एक-दूसरे से दूर जा रहा है। इतने विखंडन के बाद भी में ज्ञान का दीपक जलाने को तत्पर हूं।

आज मैं चुप रहूंगा, क्योंकि ज्ञान देने के अलावा मुझे बहुत सारे दायित्व सौंपे या थोपे गए हैं, उन्हें पूरा करना है।

मुझे रोटी बनानी है।

मुझे चुनाव करवाने हैं।

मुझे लोग गिनने हैं। 

मुझे जानवर गिनने हैं। 

मुझे स्कूल के कमरे-शौचालय बनवाने हैं। 

मुझे माननीयों के सम्मान में पुष्प बरसाने हैं। 

मुझे बच्चों के जाति प्रमाण-पत्र बनवाने हैं। 

मुझे उनके कपड़े सिलवाने हैं।


हां, इनसे समय मिलने के बाद मुझे उन्हें पढ़ाना भी है। जिन्न भी इन कामों को सुनकर पनाह मांग ले लेकिन मैं एक शिक्षक हूं, चुप रहूंगा।

हां, इनसे समय मिलने के बाद मुझे उन्हें पढ़ाना भी है। जिन्न भी इन कामों को सुनकर पनाह मांग ले लेकिन मैं एक शिक्षक हूं, चुप रहूंगा।

आज आप जो भी कहना चाहते हैं, जरूर कहें। आप कह सकते हैं कि मैं कामचोर हूं। आप कह सकते हैं कि मैं समय पर स्कूल नहीं आता हूं। आप कह सकते हैं कि पढ़ाने से ज्यादा दिलचस्पी मेरी राजनीति में है।

आप कह सकते कि मैं शिक्षकीय गरिमा में नहीं रहता हूं। मेरे कुछ साथियों के लिए आप ये कह सकते हैं, लेकिन मेरे हजारों साथियों के लिए आपको कहना होगा कि वे अपना खून जलाकर भारत के भविष्य को ज्ञान देते हैं।

आप ये भी अवश्य कहें कि अपनी जान की परवाह किए बगैर मैं अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता हूं। आपको कहना होगा कि मेरे ज्ञान के दीपक जलकर सांसद, विधायक, कलेक्टर, एसपी, एसडीएम, तहसीलदार, डॉक्टर, इंजीनियर, व्यापारी, किसान बनते हैं लेकिन मैं चुप रहूंगा, क्योंकि मैं शिक्षक हूं।

आज के दिन शायद आप मुझे सम्मानित करना चाहें, मेरा गुणगान करें लेकिन मुझे इसकी न आदत है, न ही जरूरत है। जब भी कोई विद्यार्थी मुझसे कुछ सीखता है, तब मेरा सम्मान हो जाता है। जब वह देशसेवा में अपना योगदान देता है, तब मेरा यशोगान हो जाता है।

शिक्षा शायद तंत्र व समाज की प्राथमिकता न रही हो लेकिन वह शिक्षक की पहली प्राथमिकता थी, है एवं रहेगी। साधारण शिक्षक सिर्फ बोलता है, अच्छा शिक्षक समझाता है, सर्वश्रेष्ठ शिक्षक व्यावहारिक ज्ञान देता है लेकिन महान शिक्षक अपने आचरण से प्रेरणा देता है।

जिस देश में शिक्षक का सम्मान नहीं होता, वह देश या राज्य मूर्खों या जानवरों का होता है। आज भी ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के चांसलर के सामने ब्रिटेन का राजा खड़ा रहता है। शिक्षक को सम्मान देकर समाज स्वत: सम्मानित हो जाता है, लेकिन मैं आज चुप रहूंगा।

आज जो भी कहना है, आपको कहना है। आप जो भी उपदेश, जो भी संदेश, जो भी आदेश देने चाहें, दे सकते हैं।

आपका दिया हुआ मान, सम्मान, गुणगान, यशोगान सब स्वीकार है।

आपका दिया अपमान, तिरस्कार, प्रताड़ना सब अंगीकार है।



अगर रहना है हेल्दी तो रात का भोजन करें जल्दी

    


तुर्की की एक यूनिवर्सिटी में हुए शोध से पता चला है कि देर रात खाने से सेहत को कई तरह के नुकसान होते हैं। यह न केवल आपका रक्तचाप बढ़ाता है, बल्कि दिल का दौरा जैसे खतरों को भी न्योता देता है। शोध के मुताबिक, शाम 8 बजे तक डिनर खत्म कर लेना चाहिए।

यूनिवर्सिटी के कार्डियोलॉजिस्ट्स 700 से भी ज्यादा लोगों पर अध्ययन करके इस नतीजे पर पहुंचे हैं। जिन लोगों को शोध में शामिल किया गया, उनमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं। इन सभी को उच्च रक्तचाप की शिकायत थी। डॉक्टरों ने शोध में यह पता लगाने की कोशिश की कि खाने के समय और फ़्रीक्वेंसी का सेहत पर क्या असर पड़ता है।

देर से खाने पर बढ़ता है ब्लड प्रेशर
डॉक्टरों ने पाया कि शाम 8 बजे के बाद खाने से ब्लड प्रेशर पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है। पाया गया कि जो लोग 8 बजे से बाद खाते हैं, उन्हें हाइपरटेंशन होने की संभावना दोगुनी हो जाती है। मालूम हो कि एक स्वस्थ इंसान के शरीर का रक्चचाप सोते समय 10 फीसद से ज्यादा घट जाता है। इस रिसर्च में शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग देर से खाते हैं, उनके शरीर का रक्तचाप रात को कम नहीं हो पाता है।

सुबह नाश्ता न करना भी पहुंचाता है बहुत नुकसान
शोध में शामिल जो लोग रात में खाना खाने के 2 घंटे के अंदर ही सोने चले गए, उनमें से 25 फीसदी लोगों के शरीर का ब्लड प्रेशर रात को कम नहीं हो पाया। वहीं जिन लोगों ने शाम 8 बजे से पहले डिनर कर लिया, उनमें से 14 फीसद लोगों का ब्लड प्रेशर कम से कम 10% कम हो गया, जैसा कि एक सेहतमंद इंसान के शरीर में सामान्य तौर पर होना चाहिए। शोधकर्ताओं ने पाया कि शाम 8 बजे के बाद खाने से शरीर में ऐड्रेनलाइन जैसे तनाव पैदा करने वाले हार्मोन्स पैदा होते हैं। ये हार्मोन्स दिल की धड़कनों को अनियमित करते हैं। साथ ही, जो लोग सुबह नाश्ता नहीं करते हैं उनके शरीर का ब्लड प्रेशर भी कम नहीं होता।

इससे पहले आहार विशेषज्ञ शाम 9 बजे तक डिनर कर लेने की सलाह देते थे। आहार विशेषज्ञों का मानना है कि इसके बाद कुछ भी खाने से शरीर का मेटाबॉलिक रेट धीमा हो जाता है। इसके कारण मोटापा बढ़ता है और दिल का दौरा आने की संभावना भी बढ़ जाती है।

भोजन कैसे करें
हाथ-पैर, मुंह धोकर आसन पर बैठकर भोजन करना चाहिए। खड़े-खड़े, जूते पहनकर सिर ढंककर भोजन नहीं करना चाहिए।

भोजन को अच्छी तरह चबाकर खाना चाहिए। वरना दांतों का काम (पीसने का) आंतों को करना पड़ेगा जिससे भोजन का पाचन सही नहीं हो पाएगा।

भोजन करते समय मौन रहना चाहिए। इससे भोजन में लार मिलने से भोजन का पाचन अच्छा होता है।

टीवी देखते या अखबार पढ़ते हुए खाना नहीं खाना चाहिए। स्वाद के लिए नहीं, स्वास्थ्य के लिए भोजन करना चाहिए।

स्वादलोलुपता में भूख से अधिक खाना बीमारियों को आमंत्रण देना है। भोजन हमेशा शांत एवं प्रसन्नाचित्त होकर करना चाहिए।

भोजन के पश्चात क्या न करें
भोजन के तुरंत बाद पानी या चाय नहीं पीना चाहिए। भोजन के पश्चात घुड़सवारी, दौड़ना, बैठना, शौच आदि नहीं करना चाहिए।

भोजन के पश्चात क्या करें
भोजन के पश्चात दिन में टहलना एवं रात में सौ कदम टहलकर बाईं करवट लेटने से भोजन का पाचन अच्छा होता है। भोजन के एक घंटे पश्चात मीठा दूध एवं फल खाने से भोजन का पाचन अच्छा होता है।

क्या क्या न खाएं
रात्रि को दही, सत्तू, तिल एवं गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए। दूध के साथ नमक, दही, खट्टे पदार्थ, मछली, कटहल का सेवन नहीं करना चाहिए। शहद व घी का समान मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए। दूध-खीर के साथ खिचड़ी नहीं खाना चाहिए।

हैप्पी इंटरनॉट डे: इंटरनेट क्या था, क्या है और क्या होगा

    



इंटरनॉट, एक विशेषण होता है, जो अंतर्जाल के संसार से गहराई से जुड़े लोगों को दिया जाता है। कोई भी इंटरनॉट वर्षो के अनुभव के बाद तकनीकी रूप से दक्ष ऐसे व्यक्ति सर्च इंजन, सर्च स्ट्रिंग्स, इंटरनेट रिसोर्सेज, फोरम, न्यूजग्रुप्स और चैट रूम्स के प्रयोग में विशेष तौर पर पारंगत होते हैं। इस प्रकार जो व्यक्ति इंटरनेट के इतिहास, राजनीति के बारे में जितना अधिक ज्ञान रखता है, उसे उतना ही बड़ा इंटरनॉट कहा जाता है। इसके विपरीत, जिस व्यक्ति का इंटरनेट ज्ञान कुछ कम होता है, ऐसे व्यक्तियों के लिए अन्य विशेषण प्रयोग किए जाते हैं।

ऑनलाइन संसार यानी इंटरनेट के बारे में विशेष ज्ञान रखने वाले व्यक्तियों को साइबरनॉट भी कहा जाता है। लेकिन इंटरनॉट इंटरनेट की समस्त जानकारी रखने वालों को कहा जाता है और इंटरनॉट ऑनलाइन जगत से जुड़ा एक अकादमिक शब्द भी है। इसके विपरीत, साइबरनॉट ऑनलाइन खेल, वर्चुअल वर्ल्ड या अन्य ऑनलाइन कल्पना जगत का विशेषज्ञ होता है। इंटरनेट की दुनिया में यह केवल शब्द मात्र नहीं है। यह कहना उचित होगा कि साइबरनॉट वह व्यक्ति होते हैं जिनका विकास इंटरनेट के साथ-साथ होता है, लेकिन इंटरनॉट उन्हें कहा जाता है जिनका दखल इंटरनेट की समूची विकास प्रक्रिया में होता है, यानि वे इंटरनेट के विकास में भागी भी हो सकते हैं।

इसी तरह आम नेटिजन भी इंटरनेट से जुड़ी जानकारी रखता है। लेकिन इंटरनॉट या साइबरनॉट्स की तरह नेटिजन बहुत गहराई से इंटरनेट की जानकारी नहीं रखता है। इसका अर्थ ये हुआ, कि आवश्यक नहीं कि उसे इंटरनेट की स्थापना या गेमिंग आदि से जुड़ी कोई विशेष जानकारी हो ही। हालांकि, इंटरनॉट, साइबरनॉट और नेटिजन जैसे नाम इंटरनेट से जुड़े विशेषज्ञों को ही दिए जाते हैं, लेकिन इन्हें विशेष तौर पर लिया जाना आमफेहम वेब सरफर्स से अलग करता है। क्योंकि आम वेब सरफर्स में इंटरनेट पर अपने काम का डाटा खोजने वाले लगभग सभी लोग आते हैं।

23 अगस्त 2016 को डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू यानी वर्ल्ड वाइड वेब को अस्तित्व में आए 25 साल पूरे हो गए हैं. वर्ल्ड वाइड वेब को बनाने का श्रेय सर टिम बर्नर्स ली को जाता है जिन्होंने इस अवधारणा को मूर्त रूप प्रदान किया.

वर्ष 1983 में एक सर्वेक्षण के दौरान में उन लोगों से बात की गई थी जिन्होंने कंप्यूटर के ज़रिए किसी को संदेश भेजा था. इनमें से लगभग 50 प्रतिशत लोगों को यह तरीक़ा बहुत उपयोगी नहीं लगा था.

इसके बाद से प्यू रिसर्च सेंटर उन आंकड़ों को जुटाता रहा है जो बताते हैं कि गुजरे दशकों में अमरीकी इस तकनीक को किस तरह देखते रहे हैं.

आंकड़े बताते हैं कि 1983 में अमरीका में दस प्रतिशत लोगों के पास कंप्यूटर थे. लेकिन संदेश भेजने के लिए ज़्यादातर लोगों को यह तकनीक रास नहीं आई.

फिर लोगों को कंप्यूटर के ज़रिए ख़रीदारी का अनुभव हुआ.

सर्वेक्षण से पता चला था कि 1983 में कंप्यूटर का इस्तेमाल कर रहे दस में से सात लोग इससे ख़रीदारी करना सुविधाजनक पाते हैं.

इस बारे में उन्होंने जो संदेश भेजा था वो यह था, ''ऐसी बहुत सारी चीज़ें ख़रीदना बहुत आसान है, जो परिवार के बजट में नहीं हैं.''

नंबर वन तकनीक

1995 में प्यू रिसर्च सेंटर ने एक और सर्वेक्षण किया. इसमें पाया गया कि 42 प्रतिशत अमरीकियों ने इंटरनेट शब्द कभी सुना ही नहीं.

लेकिन ज़्यादातर लोगों ने माना कि कंप्यूटर के बिना रहना उनके लिए बड़ा मुश्किल है.

और फिर जब 2014 के आंकड़े देखे गए तो पता चला कि प्रत्येक दस में से एक व्यक्ति ऑनलाइन नहीं है.

प्यू रिसर्च की मानें तो आज वर्ल्ड वाइड वेब ही वह नंबर एक तकनीक है जिसे लोग छोड़ना नहीं चाहते हैं.

सर्वेक्षण में शामिल 67 प्रतिशत लोगों का मानना है कि संबंधों को मज़ूबत बनाने के लिए इंटरनेट अच्छा ज़रिया है.

यह विचार दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों में एक समान पाया गया है जिनमें स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े, अमीर-ग़रीब सभी तरह के लोग शामिल हैं.

ज़्यादातर लोगों का कहना है कि उन्हें 'इंफोर्मेशन सुपरहाइवे' पर सवारी करना मज़ेदार लगता है.

इंटरनेट के जन्म से आज तक, इसके स्वरूप में ज़मीन-आसमान का फ़र्क आ चुका है. गोपनीय सरकारी दस्तावेज़ों से लेकर आम लोगों के चैट रिकॉर्ड और ईमेल, सभी कुछ इंटरनेट की वर्चुअल ताकों पर रखा हुआ है.

सोचिए इसका मालिकाना हक अगर किसी व्यक्ति या देश के पास होता तो वह देश कितना माला-माल हो जाता. लेकिन सच यह है कि इंटरनेट का कोई एक मालिक नहीं है.

इंटरनेट की उत्पत्ति और उसमें रोज़ाना होने वाले इनोवेशनों के लिए सरकारों से लेकर निजी क्षेत्र, इंजीनियर्स, सिविल सोसाइटी के लोगों के अलावा और भी कई क्षेत्रों का सहयोग है.
पर स्थिति तब चिंताजनक हो जाती है जब इंटरनेट पर प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण रखने की बात की जाए.

इंटरनेट पर अमरीका का 'दबदबा'

इंटरनेट गवर्नेंस पर पिछले दो दशकों से बहस हो रही है और इसे नियंत्रित किए जाने और ना किए जाने के पक्षों में लगातार चर्चाएं हो रहीं हैं.

इंटरनेट डोमेन यानी वेबसाइट पता जारी करने वाली संस्था, आईकैन (इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर असाइंड नेम्स एंड नंबर्स) जैसी इंटरनेट की मूलभूत कंपनियां अमरीका में स्थित हैं, जिस वजह से ये माना जाता है कि इंटरनेट पर अमरीका का दबदबा है.

लेकिन इंटरनेट पर एकाधिकार की स्थिति से बचने के लिए इसे संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में लाए जाने की कोशिश की जा रही है.

कुछ देश चाहते हैं कि इंटरनेट गवर्नेंस की ऐसी व्यवस्था बने जिसमें इंटरनेट सरकारों के नियंत्रण में रहे.

ऐसी मांग के पीछे एक अहम कारण ये भी है कि देशों को साइबर सुरक्षा की चिंता भी है और सुरक्षा के क्षेत्र में इसके दुरुपयोग का डर भी. यही कारण है कि कई देश मन ही मन इसके नियंत्रण का हक पाना चाहते हैं.

संयुक्त राष्ट्र के कई सदस्य एक ऐसी बहुपक्षीय व्यवस्था चाहते हैं बने जिसमें इंटरनेट से जुड़े सभी पक्षों का हित संरक्षित हो.

भारत में भी इंटरनेट की आज़ादी पर चर्चा

भारत में भी इस बारे में व्यापक तौर पर चर्चा की जा रही है. बीते बुधवार दिल्ली में इंटरनेट और टेलिकॉम से जुड़ी संस्थाओं ने मिलकर एक गोलमेज़ बैठक का आयोजन किया जिसमें सरकारी, गैर-सरकारी वर्ग और सिविल सोसाइटी के लोगों ने हिस्सा लिया. इनमें अध्ययन, व्यापार, वकालत, तकनीक और सामाजिक कार्य से जुड़े लोग शामिल हुए.

इंटरनेट गवर्नेंस से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के विशेष समूह मैग (मल्टी-स्टेकहोल्डर एडवायज़री ग्रुप) के सदस्य कहते हैं, “इंटरनेट सरकार के प्रारूप से बाहर की उपलब्धि है. अभिव्यक्ति की आज़ादी, सार्वलौकिकता, इनोवेशन ये सभी इसके मूल सिद्धांत हैं. ऐसे में विचार इस बात पर करना है कि क्या यूएन के तहत ऐसा कोई मॉडल बन सकता है जिसमें समाज, सरकार और निजी क्षेत्र समेत सभी को बराबर का अधिकार मिले.”

उनका कहना है, “ट्यूनिस एजेंडा एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है जिसमें मल्टीस्टेकहोल्डर्स के बारे में विस्तार से चर्चा की गई थी लेकिन इसे लिखे गए नौ साल हो गए हैं और साल 2015 में इसे अपडेट किया जाना है.”

बीते साल जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र की कमीशन ऑन साइंस एंड टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट की बैठक में भारत ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा था कि इंटरनेट का अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन बहुपक्षीय, पारदर्शी और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए, जिसमें सरकार और दूसरे सहयोगियों की पूरी भागीदारी हो.

'अपनी जगह ब्राज़ील को दे रहा भारत'

हालांकि भारत ने इस बारे में अपने विचार दमदार तरीके से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के आगे नहीं रखे. कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने जानबूझकर इस बारे में मज़बूती से कदम नहीं उठाए और इस मामले पर विकासशील देशों के समूह का नेतृत्व ब्राज़ील को करने दिया.

विशेषज्ञ कहते हैं, “दूसरे विकासशील देशों के मुकाबले भारत की नुमाइंदगी काफ़ी कम है और इसके पीछे वजह आम जनमानस में इस मुद्दे पर जानकारी का अभाव है. इसीलिए सरकारें ऐसे मुद्दे प्रभावशाली तरीके से नहीं उठातीं.”

आने वाले समय में इंटरनेट की अगली एक अरब आबादी भारत, चीन और दक्षिण एशिया के देशों से ही आनी है. ऐसे में इस महत्वपूर्ण विषय पर भारत की भूमिका काफ़ी अहम हो जाती है.

फ़रवरी में यूएन-सीएसटीडी की बैठक में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश इंटरनेट गवर्नेंस और बहुपक्षीयता पर अपनी राय रखेंगे. ऐसे में ये देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत और अन्य विकासशील देश इस मुद्दे पर अपनी क्या राय रखते हैं.

रक्षाबन्धन: ऐसे हुयी इसकी सुरुआत

    


श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है। इसे आमतौर पर भाई-बहनों का पर्व मानते हैं लेकिन, अलग-अलग स्थानों एवं लोक परम्परा के अनुसार अलग-अलग रूप में रक्षाबंधन का पर्व मनाते हैं। वैसे इस पर्व का संबंध रक्षा से है। जो भी आपकी रक्षा करने वाला है उसके प्रति आभार दर्शाने के लिए आप उसे रक्षासूत्र बांध सकते हैं।
राखी या रक्षाबंधन भाई और बहन के रिश्ते की पहचान माना जाता है। राखी का धागा बांध बहन अपने भाई से अपनी रक्षा का प्रण लेती है। यहां हम आपको रक्षा बंधन का ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व बताने जा रहे हैं।


लक्ष्मीजी ने बांधी थी राजा बलि को राखी राजा बलि ने यज्ञ संपन्न कर स्वर्ग पर अधिकार जमाने की कोशिश की थी। बलि की तपस्या से घबराए देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णुजी वामन ब्राम्हण का रूप रखकर राजा बलि से भिक्षा अर्चन के लिए पहुंचे। गुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी बलि अपने संकल्प को नहीं छोड़ा और तीन पग भूमि दान कर दी।वामन भगवान ने तीन पग में आकाश-पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। बलि भक्ति के बल पर विष्णुजी से हर समय अपने सामने रहने का वचन ले लिया। इससे लक्ष्मीजी चिंतित हो गईं। नारद के कहने पर लक्ष्मीजी बलि के पास गई और रक्षासूत्र बांधकर उसे अपना भाई बनाया और संकल्प में बलि से विष्णुजी को अपने साथ ले आईं। उसी समय से राखी बांधने का क्रम शुरु हुआ जो आज भी अनवरत जारी है।


रक्षासूत्र बांधकर इंद्राणी ने दिलाई थी विजय रक्षाबंधन को लेकर दूसरी यह भी मान्यता है कि जब देवों और दानवों के बीच संग्राम हुआ और दानव विजय की ओर अग्रसर थे तो यह देख कर राजा इंद्र बेहद परेशान थे। इंद्र को परेशान देखकर उनकी इंद्राणी ने भगवान की अराधना की। उनकी पूजा से प्रसन्न हो भगवान ने उन्हें मंत्रयुक्त धागा दिया। इस धागे को इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर बांध दिया और इंद्र को विजय मिली। इस धागे को रक्षासूत्र का नाम दिया गया और बाद में यही रक्षा सूत्र रक्षाबंधन हो गया।


द्रौपती ने बांधी थी भगवान कृष्ण को राखी राखी का एक कथानक महाभारत काल से भी प्रसिद्ध है। भगवान श्रीकृष्ण ने रक्षा सूत्र के विषय में युधिष्ठिर से कहा था कि रक्षाबंधन का त्यौहार अपनी सेना के साथ मनाओ इससे पाण्डवों एवं उनकी सेना की रक्षा होगी। श्रीकृष्ण ने यह भी कहा था कि रक्षा सूत्र में अद्भुत शक्ति होती है।


खून रोकने के लिए बांधा साड़ी का कपड़ा शिशुपाल का वध करते समय कृष्ण की तर्जनी में चोट आ गई, तो द्रौपदी ने लहू रोकने के लिए अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दी थी। यह भी श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। भगवान ने चीरहरण के समय उनकी लाज बचाकर यह कर्ज चुकाया था। उसी समय से राखी बांधने का क्रम शुरु हुआ।

हुँमायू ने दिया राणा साँगा की विधवा को रक्षावचन मुग़ल काल के दौर में जब मुग़ल बादशाह हुमायूँ चितौड़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर रक्षा वचन ले लिया।  हुमायूँ ने इसे स्वीकार करके चितौड़ पर आक्रमण का ख़्याल दिल से निकाल दिया और कालांतर में मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज निभाने के लिए चितौड़ की रक्षा हेतु  बहादुरशाह के विरूद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्मवती और मेवाड़ राज्य की रक्षा की।

सुभद्राकुमारी चौहान ने शायद इसी का उल्लेख अपनी कविता, 'राखी' में किया है:

मैंने पढ़ा, शत्रुओं को भी
जब-जब राखी भिजवाई
रक्षा करने दौड़ पड़े वे
राखी-बन्द शत्रु-भाई॥

पुरू ने दिया सिकंदर को जीवनदान सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पुरूवास को राखी बाँध कर अपना मुँहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया । पुरूवास ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिये हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया।

ऐतिहासिक युग में भी सिकंदर व पोरस ने युद्ध से पूर्व रक्षा-सूत्र की अदला-बदली की थी। युद्ध के दौरान पोरस ने जब सिकंदर पर घातक प्रहार हेतु अपना हाथ उठाया तो रक्षा-सूत्र को देखकर उसके हाथ रुक गए और वह बंदी बना लिया गया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया।

चंद्रशेखर आज़ाद ने भेंट किये 5000₹ बात उन दिनों की है जब क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत थे और फ़िरंगी उनके पीछे लगे थे।

फिरंगियों से  बचने के लिए शरण लेने हेतु आज़ाद एक  तूफानी रात को एक घर में जा पहुंचे जहां  एक विधवा अपनी बेटी के साथ रहती थी। हट्टे-कट्टे आज़ाद को डाकू समझ कर पहले तो वृद्धा ने शरण देने से इनकार कर दिया लेकिन जब आज़ाद ने अपना परिचय दिया तो उसने उन्हें ससम्मान अपने घर में शरण दे दी। बातचीत से आज़ाद को आभास हुआ कि गरीबी के कारण विधवा की बेटी की शादी में कठिनाई आ रही है। आज़ाद ने महिला को कहा, 'मेरे सिर पर पाँच हजार रुपए का इनाम है, आप फिरंगियों को मेरी सूचना देकर मेरी गिरफ़्तारी पर पाँच हजार रुपए का इनाम पा सकती हैं जिससे आप अपनी बेटी का विवाह सम्पन्न करवा सकती हैं।

यह सुन विधवा रो पड़ी व कहा- "भैया! तुम देश की आज़ादी हेतु अपनी जान हथेली पर रखे घूमते हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है। मैं ऐसा हरगिज़ नहीं कर सकती।" यह कहते हुए उसने एक रक्षा-सूत्र आज़ाद के हाथों में बाँध कर देश-सेवा का वचन लिया। सुबह जब विधवा की आँखें खुली तो आज़ाद जा चुके थे और तकिए के नीचे 5000 रुपये पड़े थे। उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था- "अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट- आज़ाद।"
रक्षाबंधन का सही मायना धार्मिक त्यौहार एवम रीतिरिवाज कई अच्छी बातों को ध्यान में रखकर मनाये जाते हैं | नारी शारीरिक बल में पुरुषों से कमजोर होती हैं | इस कारण सुरक्षा की दृष्टी से इस सुंदर त्यौहार को बनाया गया पर कलयुग के दौर में परिपाठी बदलती ही जा रही हैं |

रक्षाबंधन का आधुनिकरण आज के समय में यह एक त्यौहार की जगह लेन देन का व्यापार हो चूका हैं |बहने अपने भाई से गिफ्ट या रूपये ऐसी चीजों की मांग करती हैं | शादी हो जाने पर मायके से ससुराल गिफ्ट्स एवं मिठाइयाँ भेजी जाती हैं | मान परम्परा का नहीं अब लेन देन का होता हैं | पिछले वर्ष इतना दिया इस वर्ष कम क्यूँ दिया | आज यह त्यौहार हिसाब किताब का रक्षाबंधन हो चूका हैं | ऐसी महंगाई में कहीं ना कहीं यह त्यौहार भाइयों पर बोझ बनते जा रहे हैं | रक्षा और कामना से परे हट यह एक व्यापार का रूप बनते जा रहा है|

अगर आज रक्षाबंधन की श्रद्धा सभी के भीतर उतनी ही प्रबल होती जितनी की वास्तव में इतिहास में हुआ करती थी तो आये दिन औरतों पर होने वाले अत्याचार इस तरह दिन दोगुनी रात चौगुनी रफ्तार से ना बढ़ते | यह त्यौहार बस एक दिखावे का रूप हो गया हैं |

कैसे मनाये रक्षाबंधन अगर असल मायने में इसे मनाना हैं तो इसमें से सबसे पहले लेन देन का व्यवहार खत्म करना चाहिये | साथ ही बहनों को अपने भाई को हर एक नारी की इज्जत करे, यह सीख देनी चाहिये | जरुरी हैं कि व्यवहारिक ज्ञान एवम परम्परा बढे तब ही समाज ऐसे गंदे अपराधो से दूर हो सकेगा |

रक्षाबंधन का यह त्यौहार मनाना हम सभी के हाथ में हैं और आज के युवावर्ग को इस दिशा में पहला कदम रखने की जरुरत हैं | इसे एक व्यापार ना बनाकर एक त्यौहार ही रहने दे | जरूरत के मुताबिक अपनी बहन की मदद करना सही हैं लेकिन बहन को भी सोचने की जरुरत हैं कि गिफ्ट या पैसे पर ही प्यार नहीं टिका हैं | जब यह त्यौहार इन सबके उपर आयेगा तो इसकी सुन्दरता और भी अधिक निखर जायेगी |

कई जगह पर पत्नी अपने पति को राखी बांधती हैं | पति अपनी पत्नी को रक्षा का वचन देता हैं | सही मायने में यह त्यौहार नारी के प्रति रक्षा की भावना को बढ़ाने के लिए बनाया गया हैं | समाज में नारी की स्थिती बहुत गंभीर हैं क्यूंकि यह त्यौहार अपने मूल अस्तित्व से दूर हटता जा रहा हैं | जरुरत हैं इस त्यौहार के सही मायने को समझे एवम अपने आस पास के सभी लोगो को समझायें | अपने बच्चो को इसे लेन देन से हटकर इस त्यौहार की परम्परा को समझायें तब ही आगे जाकर यह त्यौहार अपने एतिहासिक मूल को प्राप्त कर सकेगा |